"पलकों की सब ख़ामोशी,
और, होठों से कुछ आवाजें!
सन्नाटे की गुन-गुन लोरी,
सपनो - सपनों, परवाज़ें !!"
मैं हूँ मेरे सपने भी हैं पर,
ख़ामोशी और आवाजें ना !
खुलते-खुलते खुल जायेंगे,
मन दर्पण, सब दरवाज़े !!"
और, होठों से कुछ आवाजें!
सन्नाटे की गुन-गुन लोरी,
सपनो - सपनों, परवाज़ें !!"
मैं हूँ मेरे सपने भी हैं पर,
ख़ामोशी और आवाजें ना !
खुलते-खुलते खुल जायेंगे,
मन दर्पण, सब दरवाज़े !!"
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