Manish Awadh Narayan Singh
Thursday, February 2, 2012
जुगनु-तारे और ख़ामोशी,हैं सन्नाटों की भाषाएँ !!
" माथे-माथे सूरज बिंदिया , आँखों-आँखों उजियारा,
दिन-घंटों की गठरी बांधे,चढ़ता आता अँधियारा !
मुट्ठी-मुट्ठी कसती जातीं, कल होने की आशाएं ,
जुगनु-तारे और ख़ामोशी,हैं सन्नाटों की भाषाएँ !!"
+ * + * + * शुभरात्री * + * + * +
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