Thursday, February 2, 2012

जुगनु-तारे और ख़ामोशी,हैं सन्नाटों की भाषाएँ !!

" माथे-माथे सूरज बिंदिया , आँखों-आँखों उजियारा,
  दिन-घंटों की गठरी बांधे,चढ़ता आता अँधियारा !
  मुट्ठी-मुट्ठी कसती जातीं, कल होने की आशाएं ,
  जुगनु-तारे और ख़ामोशी,हैं सन्नाटों की भाषाएँ !!"

        + * + * +  *   शुभरात्री * + * + * +

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