" बन्धनों से मुक्त होना है, हमें स्वीकार्य फिर भी,
बन्धनों का शोध है हम, बन्धनों को चाहते हैं !
रिक्तियों से कुछ कभी, आलोक सा मिलता नहीं है,
जी.., तभी तो सृष्टि के संग, बन्धनों को ब्याहते हैं !! "
रात बहुत हो चुकी ...अब निंद्रा से बंधन बांधिए ,ताकि स्वप्न आकर्षित हों !
..................... शुभरात्री !!
बन्धनों का शोध है हम, बन्धनों को चाहते हैं !
रिक्तियों से कुछ कभी, आलोक सा मिलता नहीं है,
जी.., तभी तो सृष्टि के संग, बन्धनों को ब्याहते हैं !! "
रात बहुत हो चुकी ...अब निंद्रा से बंधन बांधिए ,ताकि स्वप्न आकर्षित हों !
..................... शुभरात्री !!
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