Tuesday, December 27, 2011

बन्धनों का शोध है हम, बन्धनों को चाहते हैं !

" बन्धनों से मुक्त होना है,  हमें स्वीकार्य फिर भी,
  बन्धनों का शोध है हम,    बन्धनों को चाहते हैं !
  रिक्तियों से कुछ कभी, आलोक सा मिलता नहीं है,
  जी.., तभी तो सृष्टि के संग, बन्धनों को ब्याहते हैं !! "

 रात बहुत हो चुकी ...अब निंद्रा से बंधन बांधिए ,ताकि स्वप्न आकर्षित हों !
..................... शुभरात्री !!

 

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