Saturday, December 31, 2011

.... तुम, से आप हो गयी है समय की वाणी,

बचपन मैं खूब पढ़ी किताबें ...अब कहाँ हैं, लगता है की ....हम बड़े हो गए .....

" डायमंड के चाचा,रमन, साबू के फ़साने ,
  चंपक की थपथपी , नंदन  सिरहाने !
  डिबरी के प्रकाश मैं , पिंकी का तराना ,
  विक्रम - बैताल संग आते चंदामामा !! "

 "बीत गए पल - छिन वो, शंखनाद जैसे,
  पुस्तकों से होता नहीं हैं , संवाद वैसे !
  तुम, से आप हो  गयी है समय की वाणी,
  मैं नहीं , तुम भी नहीं हैं ,अपवाद जैसे !! "

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