बचपन मैं खूब पढ़ी किताबें ...अब कहाँ हैं, लगता है की ....हम बड़े हो गए .....
" डायमंड के चाचा,रमन, साबू के फ़साने ,
चंपक की थपथपी , नंदन सिरहाने !
डिबरी के प्रकाश मैं , पिंकी का तराना ,
विक्रम - बैताल संग आते चंदामामा !! "
"बीत गए पल - छिन वो, शंखनाद जैसे,
पुस्तकों से होता नहीं हैं , संवाद वैसे !
तुम, से आप हो गयी है समय की वाणी,
मैं नहीं , तुम भी नहीं हैं ,अपवाद जैसे !! "
" डायमंड के चाचा,रमन, साबू के फ़साने ,
चंपक की थपथपी , नंदन सिरहाने !
डिबरी के प्रकाश मैं , पिंकी का तराना ,
विक्रम - बैताल संग आते चंदामामा !! "
"बीत गए पल - छिन वो, शंखनाद जैसे,
पुस्तकों से होता नहीं हैं , संवाद वैसे !
तुम, से आप हो गयी है समय की वाणी,
मैं नहीं , तुम भी नहीं हैं ,अपवाद जैसे !! "
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