" अंधियारों मैं दीपक जैसी , धुप मैं शीतल छाया जैसी ,
सूनेपन मैं उत्सव जैसी , मेरी माँ , तुम्हारी माँ !
आओ माँ का आँचल ओढ़े , सुख सपनो मैं खो जाएँ ,
बंद मुट्ठी के जुगनू छोड़े , धीरे धीरे सो जाए !! "
सूनेपन मैं उत्सव जैसी , मेरी माँ , तुम्हारी माँ !
आओ माँ का आँचल ओढ़े , सुख सपनो मैं खो जाएँ ,
बंद मुट्ठी के जुगनू छोड़े , धीरे धीरे सो जाए !! "
- मनीष सिंह
No comments:
Post a Comment