Monday, May 19, 2014

एक कहानी : उधार की पूजा !!

           " लाल  कपडे में लिपटे ताम्बे के कलश में स्पर्श माँ की अस्थियों को दोनों हाथों से अपनी छाती से चिपका लेता था , जब जब संगम में तैरती उसकी नाव डगमगाती थी , वैसे ही जैसे स्कूल से घर लौटने पर वो माँ से लिपट जाता था ! " 
 
       बेटा ये कलश यहाँ रखो और तुम गंगा जी में नहा कर कपडे पहन लो तब तक हम तैयारी करते हैं तब तक परिवार के कुल गुरु भी जा जाएंगे पूजा के लिए ! - पंडित जी ने स्पर्श से कलश लगभग लेते हुए कहा !
 
स्पर्श सहम गया ! क्या ये भी मेरे पास नहीं रहेगा सोचता हुआ और गंभीर हो गया !
 
संगम में नहाते हुए और सरस्वती को तलाशता था ! कोई दो बरस पहले की तो बात थी !
 
माँ : स्पर्श रुको , मुझे आने दो !
 
स्पर्श : बड़ा हो गया हूँ मैं माँ ? मैं ठीक हूँ !
 
माँ : हाँ , लेकिन तुम्हे अंदाज़ा नहीं है , वहां फिसलन है संभल के !
 
स्पर्श : अच्छा, आइये !
 
माँ : देखो यहाँ दो रंगों का पानी साफ़ साफ़ दीखता है ! एक है गंगा और एक यमुना !
 
स्पर्श : मैंने सुना है एक और नदी हैं यहाँ इसी लिए इसे त्रिवेणी कहते हैं !
 
माँ : हाँ , उस तीसरी नदी का नाम है सरस्वती , जो क़िले के भीतर से आती हैं , अब लगभग गुप्त सी हैं !

स्पर्श : अरे माँ आप का नाम भी तो सरस्वती है , लेकिन आप तो गुप्त नहीं मेरे सामने हैं !
 
माँ : कभी हो गयी तो ?
 
स्पर्श लिपट गया अपनी माँ से इस सवाल के जवाब में !
 
पंडित जी : बेटा संभल के !
 
और स्पर्श का ध्यान टूटा ! आज दोनों सरस्वती गुप्त थी स्पर्श के लिए !
 
स्पर्श का मानस कहीं और था और शरीर संगम में पूजा के लिए तैयार हो रहा था !
 
           जनेऊ , माथे पर चन्दन , सफ़ेद धोती जो उसके ताऊ जी के बेटे ने पहनाई थी स्पर्श रेत पर अपने पंजों के निशान छोड़ते हुए पूजा के लिए परिवार के सदस्यों की तरफ बढ़ रहा था ! सब की निगाहें उसकी ही तरफ ! उसको किसी तरह की परेशानी ना हो सब इसका ध्यान रख रहे थे ! आज इतने लोग मेरे लिए , माँ तो अकेले ही सब करती थी , सब जानती थी !
 
माँ : स्पर्श पैर पीछे करो , ये मछलियाँ तुम्हे नुकसान भी कर सकती हैं !
 
मानसर झील में मछलियों को आटा खिलाते खिलाते ज़्यादा करीब चला गया था वो और मछलियों का झुण्ड उसके हाथों के पास आ गया था !
 
आज देर तक नदी में रहा स्पर्श अकेले, भय तो था अनगिनत पानी के जीवों का ,लेकिन ये करना था उसको उसी माँ के लिए !
 
तभी पुल से गुजरती हुओ रेलगाड़ी ने स्पर्श का ध्यान फिर से टूटा !
 
जल्दी करो बेटा  , स्पर्श के चाचा जी ने पुकारा !
 
स्पर्श , जी चाचा जी कहता हुआ तेज़ क़दमों से आगे बढ़ा !

           रेत पर क़दमों के निशान कुछ ज़्यादा गहरे होते जाते थे और पंजों में ठंडी रेत लिपटती जाती थी जैसे बचपन की यादें परेशान कर देती हैं कभी कभी जब अपना दूर होता है , अचानक !

गंगा , यमुना का पानी बहता जाता था ! शांत और निर्मल !

              स्पर्श ने हर मन्त्र शांति से सुना , हर वो बात जो पंडित जी ने कही धीरज से सुनी , हर कुछ सही सही किया जो उस से करने को कहा गया ! माँ की अस्थियों को ले कर संगम में बीचों बीच गया नाव परिवार के साथ और प्रवाहित किया !

            पुल से गुजरती रेल और नीचे गंगा में बहती माँ अस्थियों सवरूप , स्पर्श के माथे का चन्दन पलकों से होता हुआ होठों पर बह चला था आँखों के पानी से लिपट कर !
 
कुछ दिनों पहले ही :
 
माँ :  इस बार कहाँ से शुरू करेंगे ?

पापा ने माँ के इस सवाल पर मुस्कुराते हुए स्पर्श की तरफ इशारा किया था और कहा था : यस शेर इस बार तू फिक्स कर एल टी सी का रोड मैप !

स्पर्श : पा , इस बार साउथ से शुरू करते हैं और लास्ट में दादी के घर चलेंगे कश्मीर , मानसर लेक  होते हुए !

माँ , पा : ओके

               कन्याकुमारी और मीनाक्षी मंदिर में माँ के दर्शन , पॉण्डीचेरी में  मडुकुल विनायकम मंदिर परिसर में घुमते हांथी को जब बनाना खिलाया था तो हाथ बचा लिया था माँ ने ! श्री अरबिंदो आश्रम में सफ़ेद गुलाबी फूलों से सजी समाधी के समीप माँ को हाथ जोड़ कर देख कर स्पर्श ही झुका था !

           पूरा भारत बचपन से घूमता आ रहा था स्पर्श चप्पे चप्पे के जानकारी थी उसे ! बस फर्क था तो हर साल होने वाले अनुभवों की ! किशोरावस्था , युवावस्था दोनों के अनुभव अलग होते हैं !

           कांगड़ा से जम्मू के लिए बड़ी गाड़ी से चले थे सब ! मानसर झील से जम्मू की तरफ बढ़ रहे थे की अचानक पहाड़ टूट कर गिरने लगे और हम खाई में थे !

माँ , पा ने स्पर्श को अकेला छोड़ दिया था !

कुलगुरु किनारे पर खड़े नाव के किनारे लगने का इंतज़ार कर रहे थे !

          स्पर्श ने पहली बार देखा था उनको ! वो कश्मीर में ही रहते थे ! उनके पास कभी नहीं आये थे दिल्ली में ! जब से स्पर्श ने होश संभाला था दिल्ली में ही रहा ! परिवार के कुल के काम में कभी कश्मीर नहीं गया ! माँ नहीं ले जाती थी , डर के कारण ! वो कहती थी की कश्मीर जल रहा है उनीस सौ अठासी से , मेरे जन्म के आस पास से ही !

कुलगुरु के सब ने एक एक कर के पैर छुए !

स्पर्श ने भी !

कुलगुरु जी की निगाहें शायद किसी को तलाश रहीं थी !

ताऊ जी ने कुछ भांपते हुए कुल गुरु को एक किनारे ले जाने की असफल कोशिश करी !

कुलगुरु : प्रबोध कहाँ है ?

ताऊ जी : जी महाराज वो घर पर ही है ?

कुलगुरु : अरे , तो तर्पण किसने किया किरण और विनोद का ?

ताऊ जी : जी , स्पर्श ने !
 
कुलगुरु जैसे अचानक नाराज़ हो गए थे !
 
ये क्यों : कुलगुरु बोले !

ताऊ जी : महाराज आप  आइये मेरे साथ !

भैया ने मुझे कस के पकड़ लिया और ताई जी जैसे अजीब से अनकही आत्मग्लानि से भर गयीं और दूर तक गंगा में देखने लगी ! स्पर्श समझ गया कुछ इस घटना से भी अधिक गंभीर है !

स्पर्श : भैया , मुझे बताइये क्या हुआ !

सहमा सा स्पर्श पसीने से भीग गया था और तनाव चेहरे पर था !
 
कुलगुरु जा चुके थे , नाराज हो कर !

भईया बताइये ना : स्पर्श ने जोर दे कर पुछा अपने कपडे पहनते हुए !

सबेरे की ट्रैन थी उनकी , इलाहाबाद से !
 
कमरे में बस वो और भाई ही थे !

प्रबोध : स्पर्श आज ये तर्पण मुझे करना था तुम्हे नहीं !

स्पर्श : क्यों ? तर्पण तो बेटा करता है ना ?

प्रबोध : हाँ !

स्पर्श : तो ?

प्रबोध : मैं उनका बायलॉजिकल बेटा हूँ , तुम नहीं !
 
 
              भाई के ये शब्द सुनते ही  जैसे लाखों गैलन पानी अचानक बाँध तोड़ कर अविरल भयावह आवाज़ करता हुआ स्पर्श के कानो के पास बहने लगा हो ! रात की शांत और शीतल आवाज़ें जैसे अचानक तेज़ कर्कश में बदल गयी हों ! रेल की पटरियों पर दौड़ती रेल गाड़ी ने अचानक ब्रेक लगा दी हो और तेज़ रगड़ से निलकली चिंगारियों से सब २१ - २२ सालों का तानाबाना छलनी हो गया हो ! सारे रिश्ते बेमानी ! सब सम्बन्ध अपरिभाषित , अजनबी से !
 
स्पर्श को जैसे उन शब्दों ने निष्प्राण कर दिया हो !
 
खुद से पूरा तन सवाल पूछता था :तो कौन हूँ मैं ?
 
प्रबोध : तुम एक कश्मीरी पंडित जी के बेटे हो जो हमारे कश्मीर के घर के पडोसी थे ! जिनको देहशदगर्दों ने शहीद कर दिया था और मेरे माँ पिता जी तुम को ले कर दिल्ली आ गए थे ! मुझे ताऊ जी के पास रहने दिया था क्यों की उनको कोई संतान नहीं थी ! क्योंकी मैं बड़ा था और तुम छोटे तो मुझे ही उनके पास रहने दिया गया , तुम्हे देख  रेख की ज़्यादा ज़रुरत थी उस समय !
 
 
स्पर्श : तो आज ताऊ जी ने आपसे पूजा क्यों नहीं करवाई ?
 
प्रबोध ने स्पर्श को दोनों हाथो से अपने आगोश में ले लिया और नम आँखों से बोला  : चल तूने पुछा और मैंने तुझे बता दिया ! सब याद रखने के लिए नहीं , बस तुझे पता रहे , भूल जा सब !
 
      स्पर्श का मन कचोटता था उसको भीतर ही भीतर आत्मग्लानि से जो की उसे बार बार झकझोरती थी कहते हुए सब जीवन उधार में पला और पूजा भी उधार की रही अपनी माँ पिता जी की तो दूसरी तरफ मानस कहता था की माँ ने जो दिया था वो मेरा था , कुछ भी फ़र्क़ किये बिना !
 
ट्रेन सरकने लगी थी , स्पर्श की निगाहें स्टेशन की बेंच पर बैठे एक बच्चे के माथे का पसीना पोछती उसकी माँ पर थी और दूसरी तरफ बैठा प्रबोध अब भी सोचता था की क्या उसने सही किया था  ................ ??
 
एक कहानी : उधार की पूजा !!
 
 ~~~~~~~~~~~~~~~~ मनीष सिंह ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 

1 comment:

  1. Woow... Great Story...

    Kabhi Kabhi dur ke sambandha, sage sambandho se bhi upper utha jate hai.....

    Very Nicely Written...

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