माँ !
संसार के,
खारे पानी में,
सीपियों सरीखी !
सह लेती है,
सब उतार चढ़ाव,
तब पनपते हैं,
आप और हम,
मोतियों से,
गर्भ में,
सीपियों के !
आइयें
हम और आप,
सहेजें इनको,
संसार के पानियों में,
उनके लिए,
जो वंचित हैं,
सीपियों से !!
माँ - अबतक भी अपरिभाषित शब्द !!
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