सूखता बरगद,
हरी कर देता है ,यादें !
जिसकी छाँव मे,
डगमगाते कदमों से,
स्कूल का पहला दिन !
लू चलती दोपहर में,
जिसकी छावं तले ,
इण्टर के रिज़ल्ट ,
का इंतज़ार !
सुबह , दोपहर,
शाम , रात ,
दिन प्रतिदिन,
साइकल से सकूटर,
फिर कार,
सब समा जाते थे ,
उसकी छावं के फैलाव मे !
घर वहीँ ,वो वहीँ,
वही कमीज़ पहने,
नए नन्हे डगमगाते कदम,
मेरी अंगुली थामे,
पूछते हैं,
ये कौन है ,
जो छाँव नहीं देता ?
मैं और बरगद,
खो जाते हैं ,
अतीत के विस्तार में,
अशब्द,
आँखे नम किये !
सूखता बरगद,
हरी कर देता है , यादें !
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