... संबंधों की सीपियाँ !!
घंटों ,दिनों
महीनो में,
निरंतर ,
घटता जा रहा हूँ ,मैं,
और शायद,
तुम भी !
वर्ष दर वर्ष,
जन्मदिवस,
सालगिरह,
याद रखते हैं,
हमारी इस ,
गतिशीलता को !
जैसे
संबंधों की सीपियाँ,
सहेजती हैं,
नवजीवन,
स्वयं को,
खुल कर,
बिखर जाने तक !!
:: मनीष सिंह
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