Thursday, June 21, 2012

" आजकल वो नहीं है ...... !! "

" ....आजकल वो नहीं है ....... !! "

                मेरे घर के आँगन के बिलकुल पीछे से भारतीय रेल गुजरती है ....हाँ कुछ एक ठहरती भी हैं , लोहपथगामिनी विश्राम स्थल भी तो है ....बस उसके ही किनारे किनारे पेड़ लगे हुए हैं ....जिनमे से एक बूढा बरगद है ...जो हमारे ब्लोक के मकान संख्या 3 में रहने वाली एक बुजुर्ग ने लगाया था ...जिन्हें हम नानी कह कर संबोधित करते थे ....और उनके अंतिम समय तक करते रहे .....!! "
               बूढे बरगद पर एक दो या कुछ एक कोयल रहती हैं सुबह सवेरे हमलोगों के जागने से पहले जाग कर 
अपने होने के हस्ताक्षर कर देती थी, अपने सुरीले स्वर के कुहू कुहू कर के ..... !
अहाते में कुछ गौरैयों का झुण्ड अपने चु चू के स्वरों से अगले अहाते में चलने का  कार्यक्रम बनाता हुआ जल्दी जल्दी से दाना चुगने में ...मस्त .दिखाई पड़ता था ....!!

                  कोयल सुबह सवेरे बोलती थी उसके पीछे पीछे मैं भी कोशिश करता था उसके सुर से सुर मिलाने की , जब वो बोलती तो में भी बोलता था.....फिर वो बोलती , फिर में बोलता , फिर मैं बोलता .....फिर वो , फिर में .....फिर में हार जाता था ....और वो जीत जाती थी !! इसी तरह से गौरैया के झुण्ड से में हार जाता था ....कितनी बार कोशिश करी की उनकी एक फोटो निकाल लूं किन्तु एसा कभी हो ही नहीं सका की सब की एक साथ निकाल पाया हूँ .....कभी कोई कभी कोई ...कैमरे की हद से बाहर निकल जाती थी !! फिर भी अच्छा लगता था ये लुकाछिपी का खेल ....कोई था तो खेलने के लिए ...अब तो कोई नहीं है .....!!
              
             आजकल ना तो कोयल और ना ही गौरया ही दीख पड़ते हैं !! आवाजें भी सुने नहीं देती ...वो कहाँ हैं नहीं पता हाँ हम हैं अकेलापन लिए हुए .... !! रोज़ रेलगाड़ी आती हैं जाती हैं , नानी नहीं हैं , एक समान्तर दीवार खड़ी है रेल की पटरियों के सहारे ....हम बंधन में हैं या वो पता नहीं .... किन्तु कुछ तो है जो छूट सा गया है ....या धीरे धीरे छूट रहा है ...जिसके कारण हम बौने होते जा रहे हैं ....कद में नहीं ...अपनेपन में , सहयोग में , विचारों में , संबंधों में और ना जाने किस किस में ....आजकल वो नहीं है ..सूनापन है ...अकेलापन है ....सबके होते हुए भी वो सब नहीं है ....जो था किन्तु आज है तो खोखलापन और खालीपन किये हुए ! एक बड़ा सा कमरा सा होगया है जीवन -जहाँ कभी चहल पहल थी और आज निर्वात सा कायम है ....आशा है वो फिर से गाएगी बरगद पर की ये सन्नाटा ख़तम हो और मन का बनवास समाप्त हो जो किसी सीमा के लिए नहीं है एसा जान पड़ता है !!  चलिए अब सोते हैं कल सवेरे उसकी आवाज़ की उम्मीद में ....की जीवन चले !! "

       

         

2 comments:

  1. कुछ तो है जो छूट सा गया है ....या धीरे धीरे छूट रहा है :(

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    1. कल सवेरे उसकी आवाज़ की उम्मीद में ....Chaltey rehna hoga...

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