टूटे हुए रंगबिरंगे टुकड़ों को एक तिकोने से लगभग डेढ़ फुट लम्बी सी नली में दाल कर घुमाने पर बनने वाली फूलों की आकृति से मन को कितनी ख़ुशी मिलती थी , जिसकी तुलना आज के टेबलेट और एप्पल के अताय्धुनिक लेपटोप से भी नहीं होती ....जबकि सब आसानी से उप्लब्ध है !!
जी हाँ हम और आप जो अपना बचपन 80 के दशक में बिता चुके और 90 के दशक में अपनी किशोरावाथा में जिए हैं ...को इस बात का ज्यादा अनुभव होगा !! आइये एक एक उधाहरण ले कर के यादों के शीशे पर ज़मी धूल को साफ़ करते हैं ....!!
चाक और मिटटी के बने खिलोने, रंगबिरंगे काग़ज़ों से बने विभिन्न प्रकार के , पोस्टर्स , आकृतियाँ , चकरियां , मिटटी से बने फल , लकड़ी से बनी अलग अलग तरह की घरों में काम आने वाली चीज़ें ...जैसे रसोई का पीढ़ा , मथनि , नीबू का रस निकालने वाला सामान्य सा यंत्र , चकला - बेलन , कलछुल ,पलटा और छनौटा ....सब अपने अपने जगह पर काम की चीज़ !! मिटटी के तेल से जलने वाले लेम्प .... कभी कभी मिटटी के तेल का बर्तन टिन का होता था ...और यदि थोड़ी आधुनिकता से देखा जाये तो वो भी कांच का ....! मुझे याद है ...मेरे नाना जी घर के दो या तीन मिटटी के तेल के लेम्पों को रोज़ शाम को सुबह के बुझे चूल्हे के उपले की राख से साफ़ करते थे ....बड़ा धीरे धीरे और प्रभावी प्रोसेस हुआ करता था वो ...में तो बड़े मज़े ले कर देखता था जैसे कोई रिसर्च चल रही हो और तय समय में परिणाम आने वाला हो ..... !! अंतिम परिणाम आता था पुराने अखबार से साफ़ करने पर ...एकदम चकमक चकमक ...और जब लेम्प उस शीशे के साथ जलता था तो पूरा कमरा रोशन रोशन ....कमाल का समय था वो ...आजकल हम कहाँ एक साल की गारंटी वाली सी ऍफ़ एल की रौशनी में वो मजा ले पाते हैं !!
कुछ दिनों बाद मैं दोबारा फिर उस सब्जी मंडी में जाना होगा ....जहाँ मैंने अपने बचपन का काफी लम्बा समय गुज़ारा है ...वहां नेकर में घूमता था ...नीली रंग की जुर्राब , काले जूते , सफ़ेद कमीज़ और नीली नेकर में आलू चाप खाते हुए .....पीली मटर की पनियल सब्जी के साथ !!
अभी पिछ्ले हफ्ते ही वहां जाना हुआ था , एक विवाह में ! इस बार मेरे साथ मेरा परिवार था और कभी मैं वहां किसी के परिवार का हिस्सा था अपनी जगह ढूंढता हुआ ...वो तलाश अंतिम दिन तक चलती रही जब मैंने उस शहर को छोड़ा और रेल की गाड़ी ने प्लेटफोर्म को ...! आज में हूँ और मेरा परिवार है ...और वहीँ हूँ जहाँ वो समय बिताया जो नीव के पत्थरों की तरह से है ...जिनके कारन ही आज ये इमारत खड़ी है !!
वो सब्जी का बाज़ार आज भी लगता है , वो टाटा कंपनी का नाला आज भी बहता है , रात में कभी कभी आज भी आकाश आज भी नारंगी सा दिखाई देता है ...आज भी वहां सडकों के किनारे किनारे छोटी छोटी चाय की दुकानों पर लोकल मेड बिस्कुट मिलते हैं ....जो बड़े ही सम्मान के साथ खरीद कर खाए जाते हैं .... आज भी रबर के दबा कर बजाये जाने वाले भोपू टाइप साइकल पर लगी घंटी को बजा कर इडली सांभर बेचने वाला आता है ...जिसको कभी आता और जाता देख कर अपने सक्षम ना होने पर इश्वर पर कोफ़्त होती थी और आज उसके हाइजिनिक न होने पर हम नहीं खाते ...सक्षम हम तब भी नहीं थे और आज भी नहीं हैं चाहे जैसे भी हो उस इडली को खाने के लिए !!
कुछ दिनों बाद मैं दोबारा फिर उस सब्जी मंडी में जाना होगा ....जहाँ मैंने अपने बचपन का काफी लम्बा समय गुज़ारा है ...वहां नेकर में घूमता था ...नीली रंग की जुर्राब , काले जूते , सफ़ेद कमीज़ और नीली नेकर में आलू चाप खाते हुए .....पीली मटर की पनियल सब्जी के साथ !!
अभी पिछ्ले हफ्ते ही वहां जाना हुआ था , एक विवाह में ! इस बार मेरे साथ मेरा परिवार था और कभी मैं वहां किसी के परिवार का हिस्सा था अपनी जगह ढूंढता हुआ ...वो तलाश अंतिम दिन तक चलती रही जब मैंने उस शहर को छोड़ा और रेल की गाड़ी ने प्लेटफोर्म को ...! आज में हूँ और मेरा परिवार है ...और वहीँ हूँ जहाँ वो समय बिताया जो नीव के पत्थरों की तरह से है ...जिनके कारन ही आज ये इमारत खड़ी है !!
वो सब्जी का बाज़ार आज भी लगता है , वो टाटा कंपनी का नाला आज भी बहता है , रात में कभी कभी आज भी आकाश आज भी नारंगी सा दिखाई देता है ...आज भी वहां सडकों के किनारे किनारे छोटी छोटी चाय की दुकानों पर लोकल मेड बिस्कुट मिलते हैं ....जो बड़े ही सम्मान के साथ खरीद कर खाए जाते हैं .... आज भी रबर के दबा कर बजाये जाने वाले भोपू टाइप साइकल पर लगी घंटी को बजा कर इडली सांभर बेचने वाला आता है ...जिसको कभी आता और जाता देख कर अपने सक्षम ना होने पर इश्वर पर कोफ़्त होती थी और आज उसके हाइजिनिक न होने पर हम नहीं खाते ...सक्षम हम तब भी नहीं थे और आज भी नहीं हैं चाहे जैसे भी हो उस इडली को खाने के लिए !!
No comments:
Post a Comment