" अक्सर हम अपने आसपास घटने वाली घटनाओ को कभी कभी सामान्यतः होने वाले बदलाव मान कर हलके में ले लेते हैं ....किन्तु जब उनका ही असर भारी सा लगता है तब विचारों के तहत उनका विश्लेषण करने का प्रयास करते हैं ....पर तब तक अत्यधिक देर हो चुकी होती है ...और संभलने का न तो वक़्त होता है और न ही कोई औचित्य !! " घटनाओ को घटने से नहीं रोका जा सकता किन्तु उसके अनुमानित असर को जानते हुए भी सही वक़्त पर कोई कदम नहीं उठाना असल में घटना को सही में घटना बना देता है, अन्यथा ......कोई और भी शब्द का प्रयोग संभव है !!"
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