Friday, February 24, 2012

नदियों की लहरें का कम्पन, मिलते और बिछुड़ते मीत !

            " कितना कठिन होता है कभी कभी ऐसी परिस्थिति का सामना करना जो अपनापन होने के ढोंग जैसी हो...अपनेपन सा  नहीं ....!! "  अपने अपने जीवन मैं हम सब एक ना एक बार ऐसे किसी अनुभव से दो चार ज़रूर हुए होते हैं...हाँ ये ज़रूर है की समझ मैं तब आता है जब कुछ समझने लगते हैं ...यानि बड़े होते है और तब तक सब कुछ घट चूका होता है....और घटना तजुर्बा हो जाती है .....

"नदियों की लहरें का कम्पन,
मिलते और बिछुड़ते मीत !
अपनों का कुछ अपनापन,
बहते झरने, बूँदें और नीर  ,
मन एकांकी, सन्नाटों सा ,
स्वयं संजोया कुछ संगीत !!"

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