" आइये रंगों से मन बहलाएं ! "
बस अभी कुछ ही दिनों की बात ही उसको उंगली पकड़ कर टहलने ले जाया करता था ....ये क्या है , वो क्या है .. एसा क्यों है ...ये एसा क्यों नहीं है....और न जाने कितने ही तरह के बचपने के सवाल ....जिनका हर बार उत्तर मेरे पास नहीं होता था ....पर हर बार मेरा मन करता की वो ये सब मुझसे पूछे और मैं जिसका दे सकूं उत्तर दूं और बाकि के सवालों के उत्तर तलाशते हुए सो जाऊ और नए दिन की शुरुवात हो...!
आज नया दिन है ...साल भर का त्यौहार है होली ....पर कुछ रंग नहीं हैं...कुछ हैं तो कुछ के बिना वो भी अपना वजूद तलश रहे हैं ...!
मैं पीछे रह गया लगता हूँ ....हमेशा नहीं कभी कभी ..!! कुछ बहुत नजदीकी ही हमें इस का एहसास करते हैं....कमी हमारे मैं ही होती है की...हम समय पर नहीं समझ पाते और खुद को तकलीफ देते रहते हैं... खामख्वाह !!!!
आप के पास दो ही चीज़ हो सकती हैं ...या तो किसी के पास रहने के अधिकार या किसी से पास से दूर होने का ...जो बीच मैं रहा उसकी तो बस परेशानी ही परेशानी होती है !
अरे मैं ये सब क्या लिख रहा हूँ....परसों तो रंगों का त्यौहार है ...होली......उस पर बात होनी चाहिए ....और हम ये संब क्या बात करने लगे !!
दुःख , तकलीफ , परेशानी , किसी दोस्त का दूर जाना , किसी का आपको धोखा देना...और ना जाने क्या क्या ...ये सब रंग हैं जिनसे होली खेलने का अपना मजा है !!
हैप्पी होली , हैप्पी होली...हैप्पी होली.
- मनीष
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