" सन्नाटे की चादर ओढ़े रजनीगंधा महक गया ,
कोई सपना न कहे की मैं अपनी राहें भटक गया !
आखें मूंदें , लोरी सुनते दिन के बंधन छु जाएँ ,
आओ तुम हम कल फिर जागने को, सुख सपनो मैं खो जाएँ ,
सो जाएँ !!
No comments:
Post a Comment