Wednesday, January 29, 2014

एक कहानी : ये आकाशवाणी है !!

                         " ये आकाशवाणी है , अब आप नवीन कुमार से समाचार सुनिये ! "

            सरकारी नौकरी ,सरकारी गाड़ी ,सरकारी ठाठ बाट और समाज में प्रतिष्ठा सब थे नवीन के पास किन्तु उसे गाहे बगाहे लगता था कि ये सब  किस काम का ? रोज़ आकाशवाणी भवन से अपने घर और घर से फिर पास के ढाबे वाले के पास जाने के रास्ते  में ये सोचता जाता था !

मैं किसके लिए हूँ ?

क्यों कर रहा हूँ ये सब ?

क्या है मेरा संसार ?   

कार में पड़े अखबार को देखता जा रहा था सोचते सोचते !

शाम के साढ़े सात बजते होंगे !

नवीन सात बजे का बुलेटिन पढ़ कर सरकारी गाड़ी से ढाबे कि तरफ चल दिया !

समाचार बाबू आज क्या खायेंगे ? ढाबे वाले सरदार जी ने बड़े अदब से कार से उतरते हुए नवीन से पुछा !

     नवीन ने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया : सरदार जी आज सर में हल्का सा दर्द है , एक कप चाय पिला दीजिये पहले , खाना फिर जो आप खिला दें ! अगला बुलेटिन रात ११ बजे पढ़ना है ,बहुत टाइम है !

हाँ हां , अभी लो  कहते हुए सरदार जी ने खुद चाय का बर्तन उठा लिया !

अमूमन उनके ढाबे में काम करने वाले बहुत से लड़के ये सब काम देखते हैं और सरदार जी केवल गल्ला सम्भालते हैं !

नवीन को प्यार जो करते हैं तब से जब वो हाफ नेकर में उनके पास तंदूरी रोटियां सिकवाने आया करता था !तकरीबन १५ सालों पहले अपनी नानी के साथ ! अब ना तो नहीं रहीं और ना माँ ! 
पिता का साया बचपन में नहीं रहा , माँ ने दूसरी शादी कर ली ! घर को किराये पर दे दिया और नवीन को पास के होस्टल में रख छोड़ा ! होस्टल का खर्च कनाडा से ही भेजती रहती थी कुछ सालों तक ! जब वो बंद हो गया तो सरदार जी ने नवीन का साथ दिया , अब भी दे रहे हैं !

जनवरी के महीने कि सर्द शाम ,हवा और धुंध के साथ सर्द हो चली थी !

तभी , दूर बैठे एक साधू ने नवीन से अपने पास आने को कहा !

नवीन : आप मुझे बुला रहे हैं बाबा ?

साधू : हाँ बेटा !

नवीन साधू के पास जा कर चारपाई पर बैठ गया और बोला : जी , बाबा !

साधू : सर में दर्द कब से है ?

नवीन : बस सुबह से ही है , आज दिन भर थोड़ी थकावट भी रही !

साधू : अरे बेटा रोज़ सवेरे तुम्हारी आवाज से हमारा दिन निकलता है ! दिन दुनिया कि खबर लगती है ! संसार में क्या चल रहा है सब पता चलता है ! चाहे कही भी रहे , यहाँ या फिर हरिद्वार , तुम से जुड़े रहते हैं ! ऐसा लगता ही नहीं कि हम किसी को नहीं जानते ! सब दुनिया हमारी है , ऐसा ही एहसास रहता है ! एक तो तुम्हारी आवाज़ इतना अपनत्व लिए है और फिर तुम समाचार ऐसे पढते हो कि हर सुनने वाले को लगता है कि उसके ही लिए पढ़ा जा रहा हो !

नवीन मुस्कुरा रहा था और बार बार अपने सर पर हाथ रखता जाता था , दर्द के कारण ! साधू बोलते जा रहे थे !

अभी कल ही मैं हरिद्वार से लौट रहा था , गाड़ी में लगे रेडिओ पर तुम्हारी आवाज़ सुनी सब संसार के समाचार मिल गए वर्ना चार दिन से गंगा किनारे धुनि रमाये कहाँ कुछ खबर थी !

नवीन ने बाबा को टोकते हुए पुछा : बाबा आप तो साधू हैं , फिर संसार कि खबर आपके किस काम कि होती होगी ?

साधू हल्का मुस्कुराते हुए बोले : बेटा जब कोई ये कहे कि मैं संसार से दूर हो रहा हूँ समझो और करीब आने कि कोशिश में है ! क्यों कि वो याद रखता है कि उसको संसार से दूर रहना है ! एक विज्ञापन भी आजकल सुना है मैंने " जितना दूर जाओगे , अपनों के उतने करीब आओगे ! "

नवीन अपना सरदर्द भूल चूका था ! चाय कि चुस्कियों का आनंद लेते साथ एफ एम् पर चले पुराने गानो कि धुन के शाम को और लम्बा होने इच्छा जगा रही थी लेकिन घडी कि सुइयां कहती थीं कि समय के साथ चलो !

ये कप ले के जाऊं नवीन भैया ? छोटे लड़के ने नवीन से पुछा !

नवीन जैसे चलती ट्रेन में अचानक लगे झटके के साथ काँप गया और बोला : हाँ हाँ , कप रख कर मेरे पास आना !

कॉलसेंटर में काम करने वाले कुछ बच्चों कि दो गाड़ियां रोज़ कि तरह ढाबे पर आ कर रुकीं !
हंसी ठहाके ,महंगे महगे मोबाइल ,टेबलेट ,लैपटॉप और सब सुख सुविधाओं वाली चीजों के साथ 
सब ५ रुपये वाली चाय का आनंद ले रहे थे ! संसार कि सारी कीमती चीजें एक तरफ और जनवरी कि सर्द शाम में ढाबे कि ५ रूपए कि चाय एक तरफ होती है लेकिन उनके लिए ही ,जिनका संसार होता है !

नवीन के लिए या सब बे मानी था !

         तीन सालों पहले हुई शादी ! संतान सुख नहीं ! पिछले ६ महीनो से वाईफ मायके में रह रही थी ! मैं और तुम का झमेला ! बस और  कुछ नहीं !
         तभी उन किशोरों में से किसी ने सरदार जी को नवीन से बात करते सुन  लिया और पहचान गए कि वो रेडियो कि आवाज़ वाला नवीन कुमार है !

        बस फिर क्या था अकेलेपन और सन्नाटे से घिरे नवीन के इर्दगिर्द रंगबिरंगे कपड़ों में अब नए लडके लड़कियां खड़े थे !

सर , हम भी आपकी बुलेटिन और दूसरे कार्यकम रेडिओ पर सुनते हैं !  

बल्कि हमारी ट्रैनिंग में कई रेडियो के सीनियर ने हमें टिप्स दिए थे !

आज आप से रूबरू होने का मौका है तो प्लीज़ हम को कुछ गाइड कीजिये !

नवीन अचानक से जैसे सन्नाटे भरी सड़क के सुनसान रस्ते से निकल कर  खचाखच लोगो से भरे गली मोहल्ले में पहुच गया था , ऐसा सोचने लगा और बोला :

देखो दोस्तों तुमलोग मुझसे क्या सीख सकते हो, मैं तो सिर्फ वो पढता हूँ जो मुझे पढ़ने को कहा जाता है लेकिन तुम लोग तो सामने वाले कि समस्या का समाधान करते हो , वो भी सुन्दर तरीके से साफ़ आवाज़ में !

ये सुनकर एक लड़का बोला :लेकिन अपने सही नाम से नहीं ,

आप को आपके नाम से सब जानते हैं सर पर हमें कोई नहीं ! फर्क है !

नवीन : तो फिर एक बात ही शेअर कर सकता हूँ कि जब आपके पास अपना कोई ना हो , हो भी तो दूरी बनाये हुए रहे तब संसार के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए ,
उनके लिए जिनको आप न जानते हों और वो जो आपको ना जानते हों ! रिश्ते जन्म लेंगे किन्तु सीमित समय और दायरे में जो अंतहीन दर्द नहीं देंगे ,

और फिर ये कशिश आपकी आवाज़ में उतरेगी जिसे हर सुनने वाला अपने लिए ,

कहा गया समझ कर आपको याद रखेगा !

नवीन कि आवाज़ सघनता से हर एक के कान में सरक रही थी !

ठंडी हवाओं के झोके एक दूसरे को और करीब ला रहे थे नवीन बोलता जा रहा था  , बे सुध निरंतर कि अचानक सरदारजी ने आवाज़ लगायी :

बच्चो आप सब को देर हो जाएगी और समाचार बाबू को भी तो रात का बुलेटिन पढ़ना है !
लो एक एक कप चाय मेरी तरफ से पियो और काम पर चलो !

नवीन का संसार कितना बड़ा था ये उसे आज खबर लगी ! एक घर ! एक स्टूडियो ! एक ढाबे के सिवाय !

वो जो उसको छोड़ कर दूर चले गए हैं उनका दुःख तो है लेकिन समय के साथ दूरियाँ करीबियत में बदलती हैं , ऐसा विश्वास है !

कुछ ही देर में नवीन स्टूडियो में था , टेक्नीशियन के ओके का इशारा मिलते साथ उसने अपनी आवाज़ का परिंदा संसार के मानस पर लिख देने को " सदैव समर्पण " माध्यम चाहे जो हो !

ये आकाशवाणी है , रात्रि के ११ बजने को हैं     , कल सबेरे फिर मुलाक़ात होगी ……… शुभरात्रि !!


Tuesday, January 21, 2014

एक कहानी : अंतिम आहूति !!



         " चन्दन " ने ओक से पानी पीते हुए पानी पिलाने वाली बूढी माँ के चेहरे कि झुर्रियों से झांकते हुए तज़ुर्बे और आँखों कि उमीदों कि और देखा , जो " और पियोगे बेटा " पूछते  हुए मुस्कुरा रहीं थी !

चन्दन , कितनी प्यास लगी है तुम्हे ? अब चलो भी !!

सरकारी गाड़ी में बैठी विभा ने अपने बेटे अनमोल को सँभालते हुए चन्दन को पुकारा !!

" नहीं माँ बस " कहते हुए चन्दन ने अपनी जेब से रुमाल निकालने कि असफल कोशिश कि , तभी बूढी माँ ने अपने आँचल को बढ़ाते हुए कहा - लो , इस से पोछ लो बेटा !

चन्दन ने हाथ पोछ कर  " बूढी माँ " को एक बार फिर से देखा और ठन्डे पानी के जार को ले कर सरकारी कार कि तरफ मुड़ गया !

बार - बार पीछे देखता जाता था ! बूढी माँ हाथ हिला कर अभिनन्दन कर रही थी , फिर से आने का निमंत्रण देते हुए !!

सरकारी गाड़ी अपने पीछे धूल और सूखे पत्ते उड़ाती हुई आगे निकल गयी !!

लगभग बीस सालों बाद !

शहर के बड़े रिहाइशी इलाके में बने बड़े बंगले में सुबह कि चाय पीते हुए चन्दन ने अनमोल से पुछा ?

किस  जगह पर कैम्प लगेगा ?

जंगल में " स्वर्णरेखा " नाम कि उसी के किनारे पापा , जगह मुझे नहीं पता ! शायद सर्कुलर में लिखा हो ! रुकिए देख कर बताता हूँ !

चन्दन ने अनमोल को रोकते हुए कहा - रहने दो , मैं जनता हूँ ! तुम जाने कि तैयारी करो !

अनमोल मुस्कुराया - आप जानते हैं , ठीक है फिर कहता हुआ मोबाईल पर आने वाली दूसरी तरफ कि आवाज़ को सुनता हुआ अपने कमरे कि तरफ बढ़ गया !

कितने दिन  के लिए  जा रहा है अनमोल ? चन्दन ने डायनिंग टेबल पर खाना परोसती हुई विभा से पुछा !

विभा ने कुछ नहीं कहा उसने प्लेट तैयार कर के चन्दन कि तरफ बढ़ा दी  !

चन्दन ने फिर से वही बात पूछी ! विभा फिर  चुप रही !

अजीब सा तनाव पसर गया था डायनिंग टेबल पर !

ख़ामोशी ने डिनर निगल लिया, लेकिन  भूख अभी भी आस में थी !

विभा ने रात के दूध के गिलास के साथ चन्दन को दवा ये बताते हुए दी कि कल से तीन दिन अनमोल घर पर नहीं है !

चन्दन :  अरे पिछले २ घंटों से ये पूछ रहा हूँ और तुम अब बता रही हो ?

विभा : हमारे क्या दर्जन भर बच्चे हैं जो  एक एक कि खबर तुम्हे नहीं ? अनमोल एक ही एक बेटा है और उसकी किसी भी बात में तुम्हे कुछ गलत नहीं दिखता ! उसकी सब बातों में तुम्हारी हाँ है ! तीन दिन वो जंगल में रहेगा अपने दोस्तों के साथ ! २२ साल के लड़के को दुनियादारी कि कोई खबर नहीं उसको तुमने ३ दिन के लिए अकेले  छोड़ दिया ! क्या रोक नहीं सकते थे ? लेकिन तुम्हे तो सब कुछ प्रेक्टिकल अप्प्रोच में करना होता है ना ? लो चाय  पियो अब जो होगा ठीक है बेटा तुम्हारा है चाहे जो करो मैं कहाँ हूँ तुम दोनों के बींच में ना माँ और ना कुछ और !

कहती हुई विभा दरवाजे कि  तरफ बढ़ गयी , नम आँखों से !

चाय कि प्याली हाथों में लिए चन्दन बिस्त्तर से उठ कर खिड़की से बहार बहते कोहरे को देखने लगा जिसके साथ गले में रुकी सघन घुटन आँखों के रस्ते बाहर टपकने लगी !

चाय ख़तम कर के चन्दन कुछ देर यू ही बाहर देखता रहा , दिशाहीन हवा और यादों के साथ ! 

विभा देर तक उसके पास नहीं आयी !

लंच अकेले ही किया चन्दन ने ये  सोचते हुए कि दोष क्या है ?

दोष किसका है ?

उपाय क्या करू ? हमेशा ऐसे ही तनाव में रहना नियति है क्या मेरी ?

दोपहर  को आँख नहीं लगी ! बिस्तर पर करवट बदलता रहा !

अनमोल ने भी एक  कोई फ़ोन नहीं किया !

कैसा है ! 

ठीक से पंहुचा कि नहीं कोई खबर नहीं !

       चन्दन ने खुद से सवाल किया : किस लिए ये सब खड़ा किया मैंने ? एक पत्नी और एक बेटे के लिए ? अपना बचपन खोया , अपने जीवन के स्वर्णिम समय को पैसा कमाने में लगाया ताकि बड़ा घर , पत्नी कि ज़रूरतें , बेटे को बड़े स्कूल में पढाई , हर छोटे बड़े खर्चे को समय से पूरा करना ! प्रोविडेंट फण्ड का पैसा रख  रखा है बेटे कि पढाई के लिए ! फिर भी सब नाराज़ ! किसी को मेरे सम्मान कि  परवाह नहीं ! अब, बेटा बड़ा हो गया है उसको उसके दोस्तों के साथ टूर पर जाने देने के लिए हाँ कहना गलत है ??  क्या गलत है इसमें मैं अब तक नहीं समझ सका !

लंच कर लो , विभा ने बेडरूम का दरवाज़ा धीरे से खोलते हुए कहा !

चन्दन को लगा जैसे कि उम्मीद कि सूखती गंगा में कटोरी भर पानी आ गिरा हो !

हाँ चलो आता हूँ ! चन्दन ने जवाब दिया !

विभा : क्या बुदबुदा रहे थे ?

चन्दन : तुमने सुना तो होगा ?

विभा : हाँ ?

चन्दन : तो फिर क्यों पूछ रही हो ?

विभा : इस लिए कि कुछ रह गया हो तो वो भी कह डालो , मैं सब सुन सकती हूँ , सेह सकती हूँ !

चन्दन : सेह सकती हूँ ? मतलब ?

विभा : मैं ५ साल तक माँ नहीं बन सकी तुमने क्या नहीं किया उसके लिए ! याद है वो जंगल वाली बूढी माँ , कब कब जाते थे तुम वहाँ , क्या मैं भूल सकती हूँ ! उनकी बेटी जिसका जिनकी बेटी का बेटा है हमारा अनमोल उसके लिए क्या नहीं किया तुमने कानूनी और सामाजिक रूप में ! आज तक किसी को नहीं मालूम कि अनमोल मेरा बियोलॉजिकल बच्चा नही है !

विभा बोलती जा रही थी : सब किया तुमने ! बस एक बात को  छोड़ कर !

चन्दन : क्या ?

विभा : पिता नहीं बने तुम ना ही मुझे माँ बनने दिया अनमोल का !

चन्दन : ओह्ह !! कैसे ?

विभा : तुम हमेशा दया भाव में क्यों रहे कि उन बूढी माँ ने तुम पर दया करी जब कि तुम सब कर चुके उनके लिए ज़रुरत से ज़यादा ! फिर क्यों डरे रहते हो ? क्यों अपने बेटे को पिता कि तरह से नहीं देखते ? क्यों नहीं डरता वो तुमसे एक बेटे कि तरह ? क्यों हर उसकी बात तुमको उसकी आज्ञा लगती है ? क्यों उसकी किसी बात को माना नहीं करते और तुम्हारा बेटा क्यों उसको नहीं मानता और जब बेटा को पिता का समर्थन हो तो माँ कहाँ रह जाती है इसमें ?

चन्दन सिर्फ सुन रहा था , डबडबी आँखों से बस सुन रहा था , सुनता ही जा रहा था !

वो विभा को पूरा बह जाने देना चाहता था ! आज कह डाले सब जो मन में है ! पिघले तो सही अंतस कि कुंठा ! क्या होगा , कह लेगी मन हल्का कर लेगी मेरे साथ !

अभी दो लोग आपस कि दूरियां ख़तम करने का प्रयास कर ही रहे थे कि अचानक पड़ोस में बैटमिंटन खेल रहे बच्चों ने जोर से आवाज लगायी ? अनमोल भैया हमारी कॉर्क दे दीजिये ?

विभा ने अंदर से जवाब दिया : अनमोल नहीं है बेटा , रुको मैं देती हूँ !

माँ आप और पापा बातें कजिये ,  मैं ही दे देता हूँ ! अनमोल कि आवाज़ आयी बाहर से !

विभा और चन्दन लगभग दौड़ते हुए बाहर आये , देखा अनमोल दीवार से लगे सोफे पर बैठा उनकी बातें सुन रहा था !

विभा और चन्दन - निःशब्द , अवाक् खड़े खड़े के खड़े रेह गए  !

चन्दन ने अनमोल के चहरे को अपने दोनों हाथों से अपनी छाती से चिपक लिया ! विभा दोनों से लिपट गयी !

फिर बह निकली अशब्द गंगा ६ आँखों से !

बाकि कुछ नहीं रहा !

सब ने सब कुछ कह डाला !

अनाम रिश्तों का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ बरसों बाद !!

चन्दन ने ड्राईवर से कहा : गाड़ी निकालिये  जंगल चलना है ,हवन में अंतिम आहूति के लिए !

चन्दन और विभा बेटे से मिलने वाले थे और अनमोल उन दोनों से !

एक कहानी : अंतिम आहूति !!

Tuesday, December 31, 2013

दोस्ती का कम्बल, अपनेपन कि वैसलीन !!

दिन से हफ्ते,
हफ्ते महीने,
महीने तिमाही,
और छमाही,
मिले तो पूरा साल हुआ !

सन्देश मिले,
आदेश मिले,
अनुबंध हुए,
प्रतिबन्ध हुए,
संपर्क किये,
विनिमर्श किये,
सफल हुए,
उत्थान मिला,
गतिमान रहे,
विफल रहे,
गतिमान रहे,
अभिमन्त्र रहे !

नव वर्ष का गुलाब,
दिन पंखुड़ियों से
गुथे गुथे,
खुश्बू खुश्बू सन्देशे।
संपर्कों कि रेवड़ियां,
आशाओं कि ताप,
संतोष के मफ़लर,
दोस्ती का कम्बल,
सम्बन्धों कि कड़क चाय,
सुर्ख होठों पर,
अपनेपन कि वैसलीन,
मुबारकबाद देती हैं,

हम आपको , सबको ,

हैप्पी न्यू ईयर !!

: मनीष सिंह 

Tuesday, December 24, 2013

बुलबुले ,संवेदनाहीन होते हैं !

बुलबुले ,
संवेदनाहीन होते हैं !
फूट जाते हैं !

समर्पण पर भी,
नमन पर भी,
आचमन पर भी,
संजोने में भी,
बिखेरने में भी,
समेटने में भी !

बुलबुले,
तलाशते हम,
सिमट जाते हैं,
रेत में,
सूखते पानी कि तरह,
आशाओं का !

बुलबुले,
संवेदनाहीन होते हैं !
फूट जाते हैं !

## मनीष सिंह ##  

Saturday, December 7, 2013

" रवि " , अंतहीन पथ का, अग्रणी हो कर !!

आज " रवि " नहीं है !!
डूबा नहीं है वो !
छुप सा गया है !

फिर झांकेगा,
कलियों में,
मुस्कुराते फूलों में,
मेरे  तुम्हारे साथ,
चाय पीते हुए,
बातों में,
शब्दोँ में,
पलकों के किनारे,
आंसुओं में,
कंधे पर झुकते हुए,
हाथ हिलाते हुए,
बारिश में,
छतरी लिए !
उतरते हुए,
और फिर से,
चढ़ते हुए,
सीढ़ियां, यादों कि !
मेरे और तुम्हारे लिए,

डूबा नहीं है " रवि ",
छुप सा गया है,
हम सब में,
मुस्कुराता हुआ ,

" अंतहीन " पथ का,
अग्रणी  हो कर !

मेरे श्रद्धा सुमन " रवि मूल्या " को !

: - मनीष सिंह

Wednesday, November 20, 2013

प्लेटफॉर्म पर सर्दी !

गुनगुनाती ठण्ड,
खौलती चाय,
आलाव कि लकड़ी,
डूबती किरणे,
महकता हरश्रृंगार,
दौड़ती कारें,
धुंध में छुपते ,
लैंप पोस्ट,
सब कहते हैं,
सर्दी आ गयी !
किन्तु ,
छोटू अब भी,
हाफ नेकर में है,
कहता है , 
प्लेटफॉर्म पर सर्दी,
कम्बल बटने कि ,
रात और शाम ,
को ही आती है,
जब शहर के
सम्मानित आते हैं !! 
  :::::: मनीष सिंह :::::::


Wednesday, November 13, 2013

एक कहानी : " अखबार, लोगे बाबू !! "

         " शलभ " कोलकत्ता के नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हवाई अड्डे से बहार आ कर अपने लिए भेजी गयी टैक्सी का इंतज़ार कर रहा था कि तभी ड्राईवर का फ़ोन उसके मेहेंगे मोबाइल पर आया और उसने आधे घंटे का बाद आने कि बात बड़े परेशानी से कही कि ट्रेफिक में फंस गया है ! 
           ये बात जैसे " शलभ " के लिए जैसे मन कि मुराद  पूरी होने जैसी थी ! वो तो चाहता था कि बरसों बाद अपने शहर आया था तो कुछ समय मन भर इसे देख ले कि कितना बदल गया है कोलकत्ता और उसकी वो गालियां जहाँ वो " अमृत बाजार पत्रिका " और " दैनिक आज " अखबार को सड़कों पर दौड़ दौड़ कर बेचा करता था टैक्सी वालों , रिक्शा वालों , साईकिल वालों , ठेलों वालों , मछली वालों , डबल रोटी वालों, चाय वालों , कार वालों , बस में , ट्राम में , मेट्रो स्टेशन के बाहर , रेलवे स्टेशन पर , हावड़ा ब्रिज के इस पार से उस पार मिनी बस में , हुगली नदी कि लहरों में नाव पर " झाल मुढ़ी " खाते हुए , कुल्हड़ में दो घूँट चाय को सुड़कते हुए हाफ पैंट और नीली हाफ कमीज़ में ! 
             कोलकत्ता कि पहचान " पीले और काले " रंग कि एक टैक्सी को शलभ  ने प्रीपैड काउंटर से बुक किया और होटल का पता बताते हुए चलने को कहा ! एयरपोर्ट से सिर्फ १० मिनट कि दूरी पर ही था होटल ! टैक्सी ड्राईवर ने  मायूस हो कर शलभ को देखा और अटेची ले कर डिक्की में डाली ! तब तक शलभ टैक्सी में बैठ चुका  था ! लेपटॉप का बैग अपने साथ ले कर !

टैक्सी डाइवर : कोथाय थिके एशेछैन अपनी ? ( आप कहाँ से आये हैं ? ). 

शलभ : काठमांडू !

टैक्सी डाइवर : ठीक आछे ! कोलकाताये कि काज ? ( कलकत्ता में क्या काम है ?) 

शलभ : एक बड़ा ठेका मिलने वाला है अनाथालयों में कपडे सप्लाई का , उसकी हो मीटिंग है सरकारी अधिकारिओं के साथ कल !

टैक्सी ड्राईवर : आप क्या करते हैं ?

शलभ : नेपाल में गारमेंट कि एक बड़ी विदेशी कंपनी में बड़ा अधिकारी हूँ !

टैक्सी ड्राईवर : सही है !

टैक्सी छोटी बड़ी गलियों से होती हुई गुज़र रही थी ! शलभ ५ साल के बच्चे कि तरह एकटक  अपनी ठुड्डी को टैक्सी कि खिड़की पर टिकाये बाहर  सब देखता जाता था और कुछ सोचता जाता था ! 

             विक्टोरिया मेमोरियल के सामने से गुजरते हुए हाफ पेंट में घुमते बड़े , छोटे लोग मॉर्निंग वाक करते दिखे ! उनके साथ उसने खुद को दौड़ता पाया बायें हाथ पर अखबार लिए ! ले लीजिये बाबू आज कि सबसे पहली खबर है मेरे पास ! साथ में २ पन्नो का एक मेगजीन भी है " फोकट " का ! किसी को दो रूपये किसी को डेढ़ रूपये का, पचास पैसे उधार कर के सब अखबार २ घंटे में बेच डलता था " शलभ " ! फिर काका कि दूकान पर कुल्हड़ कि चाय और फेन खाता था ! वापसी में एक रुपए कि जलेबी और दही ! बस हो गया नाश्ता ! पास का स्कूल और स्कूल में  मास्टर जी कि डाँट ! अनाथाश्रम में ही रहता था ! वहीँ हावड़ा ब्रिज के उस कोने पर तो था वो घर जहाँ तो आठ साल रहा ! कौन लाया उसको आज तक कोई बता नहीं सका ! जब आया था तो घोषाल दा थे और अब वो नहीं हैं ! उनके समय में ही एक मारवाड़ी परिवार जो नेपाल में कपड़ो का व्यापार करता था ने उसको गोद ले लिया था ! 

" अखबार लोगे बाबू ? "

किसी ने जैसे अचानक चलती हुई ब्लेक एण्ड वाइट पिक्चर के सामने रंगीन शीशा रख दिया हो ! 

एक १० साल का लड़का शलभ के कंधे पर हाथ रख कर पूछ रहा था : अखबार लोगे बाबू ?

शलभ ने अपनी आँखों कि गंगा - जमुना को रुमाल रुपी शिवजटा में सँभालते हुए उस लड़के से पुछा : कितना अखबार बेच लिया अब तक ?

लड़का : १० रुपया का !

शलभ : कितना का लिया है सब ?

लड़का : १०० रुपया का !

शलभ : कितना कमा लेगा ?

लड़का : पता नहीं,  लेकिन मेरे स्कूल का फीस और खाने का पैसा जुट जाता है, बाबू !

शलभ के तन में जैसे सिहरन सी दौड़ गयी !

              ये ही तो उसके भी गणित थे उस समय , जब वो अखबार बेचता था ! आँखों कि नदियां उफान पर थीं ! सब बाँध तोड़ कर बाहर आना चाहती थी ! उसने टैक्सी का दरवाज़ा खोला और सड़क के किनारे उस लड़के के कन्धों पर हाथ रखता हुआ बैठ गया ! टैक्सी ड्राईवर भी उतर कर आती जाती गाड़ियों को देखने लगा !

शलभ  ने अपने सिगारदान से महंगा सिगार निकाल कर लाइटर से सुलगाया और अखबारवाले लड़के से  बांगला पुछा : तुमार नाम कि ? ( तुम्हारा नाम क्या है ? ) .

लड़का :  अनिरुद्ध। 

शलभ : अच्छा अनिरुद्ध ये सब अखबार तू मुझे बेच दो और ये लो १५० रूपए !! 

अनिरुद्ध : जी अच्छा ,  अखबार आपकी गाड़ी कि डिक्की में रख देता हूँ !

और उसने वैसा ही किया ! फिर से उसके पास आ कर बैठ गया !!

शलभ सिगार के कश लेता जाता था और अनिरुद्ध से बतियाता जाता था !

शलभ को कुछ देर बाद ये महसूस हुआ कि अनिरद्ध उसकी बातों को ठीक से सुन नहीं रहा है , तो उसने अनिरुद्ध कि तरफ देखते हुए पुछा : कि रे कि होलो ? ( क्या हुआ ? ).

अनिरुद्ध ने परेशानी भरे अंदाज़ में जवाब दिया : मुझे जाना होगा दादा !

शलभ : क्यों, तुम तो ये अखबार २ घंटों में बेचते हो , और १०० रुपया कमाते हो जो कि तुम आज ५० रुपया ज़यादा कमा ही चुके हो फिर किस बार कि जल्दी है ! अभी तो डेढ़ घंटा है तुम्हारे स्कूल को खुलने में !

अनिरुद्ध : दादा , सब अखबार तो आपने ले लिए हैं और आज  मदर टेरेसा के अनाथाश्रम में अगर मैं आज अखबार नहीं दूंगा तो वहाँ कि सिस्टर बच्चो को खबर कैसे सुनाएंगी ,असेंबली में ?

आज बेनेर्जी बाबू कि पान कि दूकान पर अखबार नहीं गया तो वहाँ के लोग कैसे अपना बीड़ी सिगरेट लेंगे !

वो मेट्रो वाले ड्राईवर दादा आज परेशान हो जाएंगे ! 

घोष जी कि दूकान पर आज चाय कैसे बिकेगी !

सरकार अंकल आज अपनी बाउड्री से बाहर ही खड़े रेह जाएंगे , नाश्ता भी नहीं लेंगे !

शलभ सब सुनता जा रहा था !

मानो पूरा कोलकत्ता अनिरुद्ध के ही चलते रहने पर चलता हो ! ठीक पंद्रह साल पहले ऐसे ही ये कोलकत्ता शलभ के चलने पर चलता था !

शलभ ने अनिरुद्ध कि भावनाओं का सम्मान करते हुआ , सब अखबार उसको वापस किये और ५० रूपये और दिए ये कहते हुए कि तुमने मुझे कुछ भी भूलने नहीं दिया अनिरुद्ध - धन्यवाद !.

टैक्सी आगे बढ़ गयी !

              काली मंदिर के सामने से गुजरी तो शलभ ने प्रणाम किया और फिर खो गया अपने बचपन में ! पास के मेट्रो स्टेशन से मेट्रो ले कर पूरा महीना दसवीं के एग्जाम दिए थे ! जोमेट्री बॉक्स नहीं था तो मंदिर के पास कि जानी बाबू से रिक्वेस्ट कि थी और उन्होंने उसे बिना सवाल किये जोमेट्री बॉक्स और एक फाउंटेन पेन स्याही भर कर दिया था अपने आशीर्वाद के साथ कि सफल हो जाओ !  रिज़ल्ट  के दिन शाम को जब घोषाल बाबू जी अनाथाश्रम कि देख रेख करते थे , ने उसको और उसके दो साथियों को पास होने कि ख़ुशी में ५० - ५० रूपये दिए थे ! शलभ दौड़ता हुआ काली मंदिर आया था ! माँ को प्रणाम कर के जानी बाबू को जोमेट्री  बॉक्स के पैसे चुकाए थे ! १५ साल पहले ही पूरी कहानी उसके सामने से गुजर रही थी !!

टैक्सी ने हार्न बजाया ! शलभ का ध्यान टूटा ! सामने से सर पर मछली लिये एक मछली वाली जा रही थी ! ताज़ा ताज़ा मछली कहाँ मिलती है कोलकत्ता के सिवाय !

             टैक्सी धीरे धीरे होटल के पास पहुच रही थी ! टैक्सी से लगभग सट कर ट्राम चल रही थे ! पैदल कितना रेस लगता था शलभ ट्राम से अपने बचपन में ! अखबार हाथों में लिए पूरा का पूरा इलाका नाप लेता था ! वो दिन याद जब वो ट्राम में एक मारवाड़ी परिवार जो कोलकत्ता घूमने आया था को हिंदी अखबार बेच रहा था उस से उनकी धोती कि तारीफ़ निकल गयी ये कहते हुए :

         साब , आपकी धोती में जो डिजाइन है अगर उसमे लाल रंग का एक धागा और पड़  गया होता तो ये सुनेहरा रंग और खिल जाता सफ़ेद रंग कि धोती पर ! बस उन्होंने मुझे कानून गोद ले लिए और अपने साथ नेपाल ले गए ! देस विदेस में पढ़ कर अपना काम कर रह था , कपडे कि ट्रेडिंग का ,  पर काम सीखने कि ठानी और बड़ी कंपनी में आज बड़े पद पर है ! उसी  के सिलसिले में कोलकत्ता आया है ! अपने शहर  कोलकत्ता जो  आज भी अपने आँचल में कई शलभ , कई अनिरुद्ध लिए चलता है !
        हावड़ा ब्रिज आज भी अपनी छाती पर सैकड़ों गाड़ियों का बोझ ले कर खड़ा है ! हुगली ने जाने कितना पानी सागर में मिला दिया ! इन पंद्रह सालो में !

सुदीप्तो : दादा , होटल आ गया !

शलभ ने बिना टैक्सी से उतरे सुदीप्तो से वापस विक्टोरिया मेमोरियल चलने को कहा !

सुदीप्तो : क्यों दादा ? अभी तो वहीँ से आये हैं !

शलभ : सुदीप्तो मैं एक चीज़ भूल आया वहाँ कि सड़कों पर ! जल्दी चलो नहीं तो कोई और ले जाएगा !

सुदीप्तो हल्का सा मुस्कुराया और टैक्सी ले कर चल दिया वापस उसी रास्ते पर जिस से आया था !

दोनों कि निगाहें इधर उधर कुछ तलाश कर रही थीं और वो था कि दीखता ही नहीं था ! ( आप भी समझ गए ना कि क्या तलाशना है ? ).

आधा घंटा बीत गया ! वो नहीं दिखा ! सुदीप्तो और शलभ जैसे एक सुई तलाश रहे थे कोलकत्ता कि भीड़ में !

टैक्सी रेड लाइट पर रुकी , किसी ने शलभ के हाथ पर छूते हुए पुछा : अखबार लोगे बाबू ?

शलभ  ने गहरी सांस भरी और बहने दिया गंगा जमुना को !

दरवाज़ा खोल कर अनिरुद्ध को टैक्सी के अंदर बैठा लिया और चल दिया उसके अनाथाश्रम क़ानूनी कारवाही ख़तम करने के लिए !

तभी उसके फ़ोन कि घंटी बजी !

दूसरी तरफ से : तुम अभी होटल नहीं पहुचे शलभ,  मेनेजर का फ़ोन आया मेरे पास था !

शलभ : बाबा , अपने लिए एक भाई तलाश रहा था !

बाबा : मिला ?

शलभ : हाँ , बिलकुल मेरे जैसा है !

                                                                                        : By Manish Singh