पूर्वाह्न से,
चल कर,
मध्याह्न तक,
सिमटते हैं हम,
परछाइयों से,
आस पास धधकते,
सम्बन्धों सरीखे,
खिलते,
फिर बिखरते,
सूरजों के सहारे !!
अपराह्न के,
प्रारब्ध से,
खुलती हैं गांठे,
रिश्तों कि,
फिर, बढ़ जाते हैं,
परछाइयों से,
परेशानियों सरीखे,
डूबते सूरजों के साथ,
ढलते ,
रिश्तों कि,
शामों के सहारे !!
चल कर,
मध्याह्न तक,
सिमटते हैं हम,
परछाइयों से,
आस पास धधकते,
सम्बन्धों सरीखे,
खिलते,
फिर बिखरते,
सूरजों के सहारे !!
अपराह्न के,
प्रारब्ध से,
खुलती हैं गांठे,
रिश्तों कि,
फिर, बढ़ जाते हैं,
परछाइयों से,
परेशानियों सरीखे,
डूबते सूरजों के साथ,
ढलते ,
रिश्तों कि,
शामों के सहारे !!
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