तब वो यू एस एस आर ( U S S R ) हुआ करता था !!
सन उनीस सौ अट्ठासी (1988 ) उन्नीस सौ इक्क्यानबे (1991 ) के वर्षों के बीच की बात है ! हर रोज़ स्कूल से आते वक़्त मैं अपने दोस्तों के साथ एक किताबों की अस्थाई दूकान पर रुका करता था , घंटों वहां पर रखी रंगीन और बढ़िया चित्रों वाली किताबों को अलट - पलट कर देखा करता था ! भाषा हिंदी , रुसी , अंग्रेजी और इतालवी में होती थी !! हिंदी भाषा की किताबें और उनके रंगीन कलेवर ( COVER ) , पन्नों और मुद्रण का स्तर इतना उम्दा की देखने वाला बरबस ही उनकी ओर आकर्षित हुए बिना न रह सके !!
वो समय भी सब के जीवन में विशेष होता है जब हम आठवीं और दसवीं क्लास में पढ़ रहे होते हैं ...जब सब कुछ पा लेने की चाहत होती है जो भी हमारे आस-पास होता है , चाहे जो कुछ भी हो ....अपनी सीमाओं में हो या ना हो !! सब कुछ अपने पास रख लेने की चाह !!
कभी डाक टिकट इकठ्ठा करने में मन लगता है तो कभी रह चलते मिलती हुई खाली माचिस की डिब्बियों के ऊपर छपे विभिन्न चित्रों को संचित कर ने की इक्छा होती है ....फिर वो खाली डब्बी चाहे जीतनी भी धुल भरी जगह पर पड़ी हो ....उठा लेते हैं और रख लेते है ...अपने बचपन के खजाने को बढ़ाने के लिए ...!! कभी बोटनी की क्लास में जाने का मौका मिले , वैसे सरकारी स्कूलों में इसे मौके सिर्फ एग्जाम के समय ही मिलते है जब दुसरे जगह के एक्स्ज़मिनर लेने आते हैं ....वर्ना तो सारी पढ़ाई बिना प्रयोगशाला में गए ही पूरी हो जाती है ....और जब बोटनी की प्रगोय्शाला में जाते हैं तो उसी दिन से शुरू हो जाता है ....सभी दिखाई पड़ने वाले पेड़ पौधों के पत्तों को किताबों में रख कर सुखाने और संगृहीत करने का सिलसिला ....दर असल कई बार इस तरह से मैंने अपनी कितनी ही किताबों के पन्नो को खराब किया था !
घर में लाइब्रेरी बनाने का शौक़ चाहे अपने कोर्स की किताबों को पढ़ने का वक़्त मिले या ना मिले , पढ़ने का मन करे ना करे !! इसी शौक़ को हमारे मित्र देश रूस की लिए भारत में मुद्रित होने वाली किताबों ने और पंख लगा दिए ....रोज़ दोपहर स्कूल से लौटते वक़्त उस बस अड्डे के किनारे वाली अस्थाई दूकान पर घंटों खड़े हो कर देखने का मन और सामने से आती जाती बसों , कारों और ऑटो के शोर का कोई फर्क नहीं होना ...बस उस उम्र और चाहत के कारण था !! तब इस किनारे जहाँ आज भी एक मशहूर पोद्दार नर्सिंग होम है से G D A की विकास बिल्डिंग साफ़ साफ़ दिखाई पड़ती थी ...तब पुल नहीं बना था ...और संतोष मेडिकल कालेज का काम पहले होटल केलिंवोर्थ के नाम से प्रगति पर था .... !!
अब आप समझ ही सकते हैं की उत्तर प्रदेश के किसी सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले किसी आठवीं के बच्चे की अंग्रेजी में कितनी पकड़ होगी ...फिर भी उस किताब की दूकान पर खड़े हो कर के अंग्रेजी में छपी और इन्गिनिरिंग की किताबों को अलट पलट कर देखने से गर्व महसूस हो था था ...और तब ज्यादा जब कोई हमें देख रहा हो ऐसा करते हुए ...!! ये सही है !! उन किताबों के पीछे के पन्नों पर उनके दाम लिखे होते थे , स्टाम्प किये होते थे नील रंग की स्याही से !! सबसे मेहेंगी किताब उन दिनों मैंने उस दूकान पर देखि थे 50 रूपए की !! कुछ और भी मंहगी रही होंगी किन्तु इतनी मोटी और प्रभाव छोड़ती हुई , कभी उनको उठा कर भी नहीं देख सका!!
मेरा सब ले लेने का मन करता था बस उनके मुल्य चुकाने को पैसे नहीं होते थे ,आज पैसे हैं तो अब मन नहीं करता ....और वो किताबों की अस्थाई दुकाने भी नहीं लगती ! रोज़ या एक दिन बीच कर के मिलने वाले एक या दो रुपयों को सप्ताह भर इक्कठा कर के अंदाजा लगता था की कौन सी किताब आ सकती है ...किन्तु कई बार एसा हुआ की जब तक मनपसंद किताब के लिए पैसे जमा हुए तब तक वो अस्थाई दूकान शहर के किसी और इलाके में चली गयी ....और हम मन मार कर रह गए ....!! मैंने कई किताबें खरीदी थीं वहां से , कुछ तो आज भी मेरे पास हैं उनके शीर्षक ही मन को भा गए और फिर उनके रंगीन और आकर्षित करने वाले कलेवर तो क्या कहिये .....:
1. रुसी लोक कथाएँ ,
2. F I N S - रंगीन मछलियों के चित्रों और उनकी जानकारी सही,
3. लेव टॉलस्टॉय की - क्ज्ज़क्क इत्यादि ...
एक किताब तो कुछ 21 रूपए की है ...सन 1991 में ये भी बहुत थे भाई ....और मेरे पास 4 दिनों के बाद 21 रूपए पुरे होने वाले थे ...हब मैंने उस किताब बेचने वाले से एक सौदा किया ...की वो ये किताब मेरे सिवा किसी और को नहीं बेचेगा लेकिन इसके बदले में वो मुझ से 1 रुपया ज्यादा लेगा ....और मैंने उसको चार दिन बाद 22 रूपए दिया 21 किताब के और 1 उस किताब को मेरे लिए रखने के लिए !! एसा था मैं .......कज्जाक तो सिर्फ 8.50 रुपए की है !! आज उसी जगह पर एक चाट वाला खड़ा होता है जिसकी चाट के एक पत्ते की कीमत है 25 रूपए ....लोग लाइन लगा कर खाते हैं ....!! मेरे घर में आज भी हिंदी की चंदामामा आती है ! मेरी माँ को भी किताबें पढने का खूब शौक़ था , इंद्रजाल कामिक्स की तो दो मोटी मोटी एक साथ बाइन्द करी हुई किताबे आज भी हैं जिसमे " मेन्ड्रेक " और " बेताल " की किताबें आज भी हमको उन्ही जादुई दुनिया में ले जाती हैं !! वो नोवेल भी खूब शौक़ से पढ़ती थीं ...., कुछ तो आ भी रखीं हैं !!
मेरे किताबों के खजाने में एक और किताब अपनी संख्या बाधा रही है ..." विपाशा " जी हाँ उस पत्रिका का नाम है !! मुझे कई विशेषांक भी मिले हैं उसके !!
वस्तुतः हम जब किसी चीज़ को पाना चाहते हैं और वो बिना किस मशक्कत के मिल जाये तो "यादगार" नहीं बनती !
यद्यपि , कमियों में पूरे किये गए अच्छे शौक़ ... शौक़ नहीं रहते .... उनको पूरा करने का जूनून और किये गए प्रयास तथापि जीवन के " मार्गदर्शक " हो जाते हैं !!
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