Monday, June 3, 2013

एक कहानी : वो सफ़ेद शंख !!

               सब अपने अपनों की शुभयात्रा के  लिए शुभकामनाये स्वीकार कर रहे थे !
         कोई किसी को छोड़ने आया था तो कोई किसी कोई मोबाइल पर ही विदा कर रहा था ! कोई किसी के लिए खाने के पेकेट और ठंडा पानी ले कर आया था तो किसी के फ्रेंड्स अपने घर जाते हुए दोस्तों को फ़ास्ट फ़ूड की भेंट दे रहे थे , कोल्ड ड्रिंक्स के साथ साथ !
             रात के कोई दस बज कर पेंतीस ( १०:३० ) हो रहे थे और ओडिशा के पुरी के लिए जाने वाली एक प्रसिद्ध ट्रेन पुरुषोत्तम एक्स्प्रेक्स नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म से धीरे धीरे सरक रही थी ! प्लेटफोर्म की रौशनी धीरे धीरे कम हो चली थी ! आस पास बैठे लोग अब एक दूसरों में अगले लगभग तीस घंटों के लिए साथी की तलाश  करने लगे थे  जो अब तक दूर दूर थे ! एस वन ( S 1 ) की चौंतीस नंबर की बर्थ पर वो बैठा था ! खामोश ! बिना किसी के साथ ! एक तक खिड़की से बाहर देखते हुए ! बाहर बिलकुल घुप अँधेरा हो चुका , वो अब भी वैसे ही बाहर देख रहा था  !
           आधी रात के आस  पास का समय था ! कुछ लोग खाना घर से खा कर आये थे उन्होंने अपने अपने बिस्तर लगा लिए थे  ! कुछ नई उम्र के लोगो की सुबह अब हुई थी ! फेसबुक , चैटिंग सब शुरू हो चूका था , लेकिन वो भी मजबूरन सोने जा रहे थे ! इन्टरनेट का सिग्नल ठीक से नहीं मिलने के कारण ! धीरे धीरे एक के कर के ट्रेन के अन्दर की लाइट्स बंद होने लगी थी ! कोई अपने साथ चादर लाया था तो किसी को वैसे ही बर्थ अच्छी लग रही थी !

बच्चे सो रहे थे !

बड़े बच्चे एस मस एस (S M S -S M S ) खेल रहे थे !  

थोड़े और बड़े लोग बस लेटे थे और ऊँघ रहे थे , !

      लेकिन वो अब भी एक टक खिड़की से बाहर देख रहा था ! उसका हाथ अब उसके गालों पर था  ! कुछ सोचने की मुद्रा में !

ट्रेन ने अलीगढ क्रास कर रही थी ! एक छोटी बच्ची दिल्ली से  ही उस लडके को देख रही थी ! 

नीली रौशनी में रात की ख़ामोशी को उस बच्ची की मासूम आवाज़ ने तोडा !

भैया आपको छोड़ने कोई नहीं आया , आप लिए उदास हैं ?  -- बच्ची ने मासूमियत से पुछा ।

            सबका ध्यान उधर गया और सब से ज्यादा उस लकड़े की तरफ जो सब से अलग सब से दूर बैठा था ! हालाँकि सब ये मालूम तो करना चाहते तो थे की वो है कौन और सब से अलग क्यों बैठा था लेकिन कोई पहल नहीं कर पा रहा था ; उस बच्ची ने सब का प्रतिनिधितव किया !

          वो लड़का जिसकी उम्र लगभग बाईस साल के आस पास होगी : गेहेरे नीले रंग की टी शर्ट और महंगी जींस , मेहेंगे मोबाइल फ़ोन और मेहेंगे एयर बैग और महंगे लैपटॉप बैग के साथ अपनी सीट पर बैठा था ! उदास था शायद ! कुछ तलाश में था ! या फिर कुछ बहुत ही करीब का खो गया था !

बच्ची ने फिर पुछा : आप क्यों खामोश हैं भैय्या ?
किरण आप सो जाओ : बच्ची के पिता ने कहा !

बच्ची : ना ,पहले भैया से पूछो , कोई बात करो उनसे !

पिता : अच्छा मैं बात करता हूँ , तुम सो जाओ !

बच्ची : ठीक है !
और फिर बच्ची के पिता उसको चादर ओढा कर उस लडके के पास जा कर बैठते हुए बोले !
कहाँ जा रहे हो दोस्त ? क्या नाम है आपका ?

जी , मेरा नाम अनमोल है !

नाम भी आपकी ही तरह बिलकुल अलग है : वो सज्जन बोले !

अनमोल हल्का सा मुस्कुराया ! पिछले  तीन घंटों में पहली बार उसके चहरे पर कोई नया भाव आया था ! बच्ची भी मुस्कुराई और चादर ओढ़ कर करवट बदल कर सो गयी ! ऐसे जैसे कोई माँ अपने नन्हे से बेटे को सुला कर सोने जाती है ये तसाल्ली कर के की अब उसका लाडला सुकून से है !

सज्जन : कहाँ जा रहे हो ?
अनमोल : जी , पुरी , और आप लोग ?
सज्जन : हम भी वहीँ जा रहे हैं !
अनमोल : अच्छी बात है !
सज्जन : वहीँ के हो ?
अनमोल : नहीं जी , मैं बेसीकलि जमशेदपुर से हूँ ! वहां कुछ काम है !
सज्जन : काम , क्या काम करते हों ?
अनमोल : जी आय आय टी खडकपुर में केमिकल इंजीयरिंग का थर्ड इयर का स्टूडेंट हूँ !
सज्जन : अरे वाह ! दिल्ली कैसे ये थे ? कोई रिश्तेदार है यहाँ ?
अनमोल : नहीं जी बस किसी से मिलने आया था !
सज्जन : मिले ?
अनमोल : हाँ जी मिला !
सज्जन : पता नहीं लेकिन मुझे लग रहा ही की कुछ अच्छी नही रही तुम्हारी ये मुलाक़ात !!
अनमोल ने अपनी पलकें झुका ली !   ऐसा  लगा जैसे अनमोल कितनी देर से ये चाहता था की कोई उस से पूछे की क्या हुआ है !
सज्जन : वैसे जिस उम्र में तुम हो बहुत सी बातों का कुछ ज्यादा महत्व नहीं होता लेकिन कई बात बहुत  महतवपूर्ण हो जाती है ! कभी कभी तो संभाला नहीं जाये तो बात बिगड़ जाती है ! अगर हमारी इंतनी देर की बातों से तुम्हे सही लगे तो तुम मुझ से अपनी बात बता सकते हो ! मेरे भी दो बेटे हैं , जो कालेज गोइंग हैं और ये मेरी सब से छोटी बेटी है जिसे हम कभी किरण और कभी ज्योत्सना कहते हैं , जो तुमको पुकार रही थी !
अनमोल : जी ऐसा कुछ जयादा तो नहीं है , लेकिन सब ठीक भी नहीं है !
सज्जन : क्या हुआ ?

                  अब अनमोल उनके कुछ करीब आ गया था ! सज्जन ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा , बताओ हो सकता है मन हल्का हो जाये ! ट्रेन कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर रुक चुकी थी ! एक चाय वाले ने कुल्हड़ भर के दो चाय उन दोनों की तरफ बढ़ा दी ! अनमोल ने अपने बेग से बिस्किट निकाले और सज्जन जी दो देते हुए खाए ! कानपूर पीछे छूट रहा था !

अनमोल बोलने लगा !
अंकल एक दोस्त को छोड़ने आया था दिल्ली मैं ! मेरे साथ ही पढ़ती है खड़गपुर में ! बेच मेट हैं हम ! उसी को दिल्ली उसके घर छोड़ने के बाद वापस जा रहा हूँ !
सज्जन : वो तो ठीक है , तुम उदास क्यों हो ?
अनमोल : वो मेरी सब से अच्छी दोस्त है !
सज्जन :  अच्छा !
अनमोल : हम सब बात एक दुसरे को बताते हैं ! मैंने  भी सब बताया ! अपने बारे में ! असल में मैं एक अनाथालय में पल कर बड़ा हुआ और कम्पटीशन से दाखिला मिला ! हमारी दोस्ती हुई ! तीन साल से सब ठीक चल रहा है ! हम दोनों ने कई बार कई मौकों पर एक साथ देश विदेश में अपने कालेज को भी रिप्रेसेन्ट किया ! हमारी केमिस्ट्री मशहूर थी ! कई ख्वाब देखे हम दोनों ने !
सज्जन : फिर आज तुम अकेले वापस क्यों जा रहे हो ?

अनमोल : आज उसको मरी ज़रुरत नहीं !

सज्जन : क्यों ?

अनमोल : असल में कभी भी उसको मेरी ज़रुरत नहीं थी ! ऐसा मुझे ही लगता था की उसे मेरी ज़रुरत है !
सज्जन : हुआ क्या ?

अनमोल : परसों उसको मैं उसके घर ले कर उसके घर गया !  इमरजेंसी में बुलाया था उसके फादर ने , अपनी तबियत की  का बहाना कर के ! असल में उसकी सगाई करनी थी उनको !
सज्जन बड़ी तल्लीनता से उसकी बात सुन रहे थे !

अनमोल बोलता जा रहा था ! उसको तो ट्रेन में ही पता था इस बात का लेकिन उसने मुझे नहीं बताया ! मैं पुरे समर्पण के साथ उसके साथ उसके घर गया ! उसके फादर ने सिर्फ उसका सामान निकल कर मुझे जाने को कह दिया ! ऐसा तो  तो मैं सोच भी नहीं सकता था ! उसने भी नहीं कुछ कहा, सिर्फ रस्ते में रखवाला बना कर लाइ थे मुझे वो  ! दिल्ली में मुझे कोई नहीं जनता था ! कहाँ जाता ! होटल के लिए पैसे नहीं थे ! वापसी का टिकट लिया और पूरा दिन वेटिंग रूम में बिताया !  ये सोचता रहा की ऐसा क्यों किया उसने ? नहीं रहना था मेरे साथ तो मना कर दिया होता ! कॊइ ज़बरदस्ती  के  दोस्त तो थे नहीं हम !
सज्जन : मैं समझ सकता हूँ !

रात के एक बज चले थे ! आंटी जी ने धीरे  से कहा : कुछ बातें कल रात में कर लीजियगा ,अब सो जाने दीजिये अनमोल को !

हाँ हाँ ये ही ठीक रहेगा : सज्जन बोले !

अनमोल ने पुछा : आपका नाम क्या है सर ?

सज्जन : तुम अंकल बुला सकते हो ! वैसे मुझे अनिल चक्रवर्ती कहते हैं ! मेरे बड़े बेटे का नाम सोरोदीप और छोटे का काम चन्द्रदीप है , और ऊपर सो रही बिटिया का नाम ज्योत्स्ना है , घर पर किरण भी पुकारते हैं !

अनमोल मुस्कुराया !

मिस्टर अनिल ने अपने बैग से एक पेकेट  निकाल कर अनमोल की तरफ बढ़ा दिया ये कहते हुए की : तुमने शाम से कुछ नहीं खाया , ये चार पुड़ियाँ और आलू की भुजिया है अचार के साथ ! तुम्हारी आंटी किसी भी सफ़र पर ऐसे छोटे छोटे पेकेट बना कर रख लेती है  सबको आसानी होती है ! 

अनमोल माना नहीं कर सका ! उसने चारो पुड़ी खाई और पानी पी कर अपने बैग से हवा वाला तकिया निकाल कर धीरे धीरे नीचे की और सरकता हुआ सो गया !

         ट्रेन मुगलसराय स्टेशन के आस पास थी!  सर नाश्ता का ऑर्डर देंगे ? किसी ने अनमोल के कंधे पर धीरे से हाथ रखते हुए पुछा तो अनमोल की आँख खुली !

अनमोल : क्या है नाश्ते में  ?

वेंडर : उपमा , ब्रेड रोल , वेज कटलेट और आमलेट हैं !

अनमोल अभी कुछ बोलने वाला था की उसकी निगाह मिस्टर अनिल की तरफ गयी !

अनमोल : गुड मोर्निग सर !

मिस्टर अनिल : वैरी गुड मोर्निंग यंग मन ! कैसे हो ? रात अच्छी नींद आई ?

अनमोल : आप से बातें कर के मन हल्का हो गया ओर मैं अभी तक सोता रहा ! थैंक यू वैरी मच सर !

मिस्टर अनिल : कितने फॉर्मल हो यार ! ये सब चलता रहता है ज़िन्दगी में ! रात के बाद सवेरा !

रात को ही ढोते नहीं रहना चाहिए !

अनमोल : जी !

वेंडर : सर क्या लेंगे ?

अनमोल : सर आप नाश्ता कर चुके हैं ?

मिस्टर अनिल : यस डिअर !

अनमोल : एक ब्रेड आमलेट ले आओ , एक पानी की बोतल भी लाना !

वेंडर : सौ रूपए दे दीजिये !

अनमोल : ओके लो !

        ज्योत्स्ना उठ चुकी थी ! मिस्टर अनिल उसको ले कर ब्रश करवाने के लिए बाथरूम की तरफ चले! अनमोल भी फ्रेश हो कर अपनी बर्थ पर लौट चूका था ! एक मिटटी के कुल्हड़ में चाय ले कर अनमोल बाहर की तरफ देख रहा था ! मुगलसराय स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर तीन पर ट्रेन लग रही थी ! ट्रेन के रुकते ही कितने ही तरह के खाने पीने के सामान बेचने वाले कम्पार्टमेंट में चढ़ गए ! ज्योत्सना फलों की चाट के लिए जिद करने लगी !
        खुले में रखे सामान को दिलवाने की इक्छा बिलकुल नहीं थी मिस्टर अनिल की लेकिन ज्योत्सना रोये जा रही थी ! ट्रेन ने लम्बी सीटी दी और प्लेटफार्म से सरकने लगी ! अनमोल ने ज्योत्सना को अपने गोद में ले लिया और कम्पार्टमेंट में घुमाने लगा ! उसका ध्यान चाट से हटाने के लिए ! अच्छा ज्योत्सना ये बताओ तुम्हारे क्लास में तुम्हारा सबसे अच्छा फ्रेंड कौन है !

ज्योत्सना : विपुल !

अनमोल को लगा शायद अब ये बात काम कर जाये ! ओके वैरी गुड , तो आप अपने साथ उसको क्यों नहीं लाइ ?

ज्योत्सना : कहाँ ?

अनमोल : दिल्ली ?

ज्योत्सना : वो आया ही नहीं !

अभी ये दोनों बात कर ही रहे थे की झालमुढ़ी बेचने वाल आ गया !

ज्योत्सना अब झालमूढ़ी खाने की जिद करने लगी !

मिस्टर अनिल ने रोक लिया आन्मोल को खरीदने से : नहीं अनमोल पता नहीं कैसा तेल रहता है सरसों का इसमें !

अनमोल ने अपना हाथ पीछे खीच लिया सोचते हुए : माँ बाप कितना ध्यान रखते हैं ना अपने बच्चों के  बुरे  का ! क्या खाना है , क्या पेहेनना है , कहाँ जाना है , किस के साथ रहना है ...और पता नहीं क्या क्या !

ज्योत्सना फिर से रोने लगी :

अनमोल ने पुछा : आप एप्पल खाते हो ?

ज्योत्सना : हाँ , लेकिन ट्रेन में एप्पल तो नहीं मिलता ! हैरानी भरी आवाज़ में उसने कहा !

अनमोल : हमारे पास है !

ज्योत्सना : खूब खुश हो गयी !

               अनमोल ने अपने लेपटोप के बैग की पहली चेन से एक पेकेट निकला ! वो एप्पल नहीं था ! उस पेकेट को देख कर अनमोल फिर से उदास हो गया ! हालाँकि दूसरी बार में उसने एप्पल निकाल कर ज्योत्सना को दिया लेकिन वो पहले पेकेट के लिए जिद करने लगी !
अनमोल ने उसको वो दे दिया ! उस पेक्ट में एक " सफ़ेद शंख " था ! देख कर ज्योत्सना खूब ज़ोर से चिल्लाई : ये तो दादी के जैसा है ! मिस्टर अनिल और उसकी माँ  का ध्यान उस तरफ गया ! दोनों ने शंख देखा और अनमोल के फिर से उदास होने की बात समझ गए !

मिस्टर अनिल ने वातावरण में फिर से छाई ख़ामोशी और अनमोल की चुप्पी तो तोडा !

ज्योत्सना , बेटा वो भैय्या को दो !

ज्योत्सना : ना !
            मिस्टर अनिल ने ज्योत्सना से वो शंख लगभग छीनते हुए अनिल की तरफ बढ़ा दिया ! उस पर दो नाम लिखे थे "  अनमोल और विशाखा " !  अनमोल शंख और ज्योत्सना के बीच चल रहे खीच  - तान से दूर दो बरस पहले अपने और विशाखा के साथ वो घूमना फिरना याद करने लगा था ! ट्रेन में बस शरीर था उसका , वो खुद पुरी के समुद्र के किनारे टहल रहा था अपने उस समय को याद करते हुए ज उसने साथ बिताया था !

         एक  साल के अन्दर अन्दर दोनों अच्छे हो गए थे! क्लोज़ फ्रेंड्स ! फर्स्ट इयर कम्प्लीट करने के बाद उनका फ्रेड ग्रुप पुरी के लिए गघूमने गया था ! भगवान जग्गनाथ के दर्शन के बाद समुद्र तट पर घुमते हुए विशाखा ने एक शंख की दूकान पर चलने को कहा ! बाकि दोस्तों ने मना  कर दिया लेकिन मैं गया उसको ले कर ! एक सफेद शंख उठा लिया उसने !

विशाखा : कितने का है ?

जी : आठ सौ का !

विशाखा : अनमोल मुझे ये चाहिए !

मैंने बिना कुछ पूछे अपने स्कोलरशिप के एक हज़ार रुपए में से आठ दो रुपए दुकानदार को दे दिए !

विशाखा : मुझे इसपर अपना नाम और तुम्हारा नाम लिखवाना है !

दुकानदार बोला  वैसे तो सौ रुपए लगते हैं क्यों की हम परमानेंट इंक से लिखते हैं लेकिन आपने कोई मोल भाव नहीं किया इस लिए आपको फ्री में लिख कर देंगे !

अनमोल ने धन्यवाद दिया !

            मेरा और विशाखा का नाम उस सफ़ेद शंख पर गेहेरे लाल नीले रंग से उकेर दिया गया उस चितेरे  द्वारा ! पुरे तीन साल अपने पास रखा था उस ने वो शंख पर कल मुझे वापस कर दिया बड़ी बेरुखी से ! उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था की ऐसा हुआ क्यों , फिर से अनमोल इसी उधेड़बुन में लग गया !
            ट्रेन टाटानगर स्टेशन पर रुकी हुई थी ! उसका अनाथालय यहीं था ! कोई नहीं आया था उसको मिलने !  कुछ लोग नए आये थे कम्पार्टमेंट में और कुछ पुराने उतर गए थे !
               मिस्टर अनिल ने अनमोल से कहा ! बस ये कहूँगा अनमोल तुम उसको एक छोटे सफ़र का अस्थाई साथ समझ कर भूल सको तो अच्छा  होगा ! किसी और के लिए खाली करी गयी बर्थ पर आने वाले का स्वागत करो , कल कालेज पहुचने के बाद ! अनमोल को बात अब सीधे सीधे समझ में आ गयी ! उसने देखा  ज्योत्सना " शंख" को अपने नन्हे - नन्हे हाथो में ले कर सो गयी थी ! जैसे वक़्त को अपनी गिरफ्त में कर लिया हो उसने  , लेकिन ये समय पिछले समय को भुला कर नए शंखों की तलाश का था अनमोल के लिए  ! 
         
मिस्टर अनिल ने सबका बिस्तर लगा दिया था ,रात के खाने के बाद  !

अनमोल भी आज जल्दी सो चुका  था !

कल की तलाश में !

शंख ज्योत्सना को के पास ही था ...उसके पास ही रहेगा अब हमेशा !
                                                                                                                  :: मनीष सिंह ::    




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