" बाईस्कोप " - जो लोग 35 से 40 वर्षो के हो चले होंगे उनको इस शब्द से अनजानेपन का कोई कम्पन नहीं महसूस हो रहा होगा !!
तब में शायद पांचवी ये छठी क्लास में पढता रहा होऊंगा तब की ही बात है ! घंटाघर के रामलीला मैदान पर हर साल की ही तरह दशेहरे के मौके पर "मेला " लगा था ! पुरे मौहल्ले से टोली की टोली जा रही थी घूमने के लिए !! बुजुर्गों की , युवाओं की , किशोरों की , घर की महिलाओं की और उनके साथ बच्चों की .... ! कोई बहुत ज्यादा रूपए पैसों को ज़रुरत नहीं होती थी उन दिनों , बस कुछ खास मौकों पर पहनने वाले कपडे और 100 - 200 रुपए ....बहुत हुआ करते थे !!
कहीं समोसे , कहीं आलू की टिक्की , कही फेनियाँ , कही पर सुगन्धित केवड़े वाला दूध वो भी कुल्हड़ में , कहीं चाट , कहीं फलों की चाट , कहीं पूरा खाना , कहीं गोलगप्पे और फिर झूलों की बारी ....सर्कस , मौत का कुआँ और चलता फिरता स्टूडियो - इम्पाला में फोटो खिच्वाइये या फिर कश्मीरी पोशाक में .....बिलकुल पता ही नहीं चलेगा की आप ही कभी कश्मीर गए थे या विदेश में कब घूम कर आये ! कहीं गुब्बारे , कहीं तरह तरह की सीटियाँ, विशेष तरह के खिलौने , चीनी मिटटी के बने बर्तन ....और अचार रखने वाली बर्रनी ! अत्यंत धार्मिक पुस्तकों की दूकान , कपड़ों की दूकान , रंग बिरंगी मिठाइयों की दूकान ! साथ में कभी कभी उद्घोषणा करते भोपू - भाइयों और बहनों ...आज हनुमान जी को सीता मैया अपनी स्मृति चिन्ह के रूप में अपनी " चूड़ामणि " देंगी ...आइये और रामलीला का आनंद लीजिये ...मंच सज चूका है और राखी कुर्सियां आपकी प्रथीक्चा कर रही हैं ......अब बड़ी ही संजीदगी से कहता हूँ ....भी इतने भीड़ भरे मेले में से शायद ही १० प्रतिशत लोग इस आवाज को सुन पते होंगे और जितनो ने सुना उनमे से ३ प्रतिशत लोग वहां जा कर राम लीला देखते होंगे ....हाँ जो बैठे होते हैं उनको अपनी थकान मिटानी होती थी तो बैठ कर सुस्ता लेते होंगे ....रामलीला कौन मन से देखता है ....सबके अपने घरों में ही लीला कुछ कम होती है क्या ....और इसे मौकों पर लोग अपने रोज़मर्रा के झंझटो से थोडा सुकून पाने के लिए जाते हैं और वहां भी वो ही तनाव देखने को मिले तो ..........कम से कम मैं तो नहीं देखता था......हाँ देखता था एक विशेष चीज़ ......" बाइस्कोप "
आजकल कभी कभी दिख जाता है .....किन्तु देखा नहीं जाता !!
बहुत दूर हो गए हैं हम इस से ....! इसमें होता था , दिल्ली का कुतुबमीनार , अगरे का ताजमहल , गोलकुंडा का गुम्बद , काशी का कशिविश्वनाथ मंदिर , दिल्ली का बिरला मंदिर, मुंबई - तब बॉम्बे का गेट वे ऑफ़ इंडिया , दिल्ली का इंडिया गेट ! राष्ट्रपति भवन , लाल किला और ना जाने क्या क्या ! एक मोड़ के रखे जा सकने वाले टेबल पे रखा हुआ एक एक तरफ से त्रिभुजाकार बक्सा ....जिसमे तीन तरफ छोटे छोटे गोल गोल छेद होते हैं ....जिनमे से अन्दर झाँक कर देखा जा सकता है !! और अन्दर बेटरी से जलने वाला बल्ब लगा होता है ... जिससे सब साफ़ दीखता है ....और बक्से के ठीक ऊपर एक गोल घुमाने वाला लीवर होता है जिसके एक किनारे पर अन्दर लाल किले से ले कर कुतुबमीनार तक की रील बंधी होती है ....जो बस एक चोर से दुसरे चोर पर कोई ५ मिनट में आ जाती है ...और सब देखने वाले पुरे भारत के दर्शन कर लेते हैं ....जबकि आज कल सन २०१२ में भी भारत में सबसे तेज़ चलने वाली उत्तर रेलवे की मुंबई राजधानी ( भोपाल शताब्दी को छोड़ कर ) से भी लगभग १६ से १७ घंटे लगते हैं ......!! वह कमाल है .....ना ना था ,,,,,,,,,उन दिनों ....
आजकल बाइस्कोप तो है ...हर एक के पास किन्तु उसमे सिर्फ अपने मतलब के चित्र लगे हुए हैं या लोग अपने मतलब के ही चुनिदा चित्र लगाते हैं ....देखते भी खुद हैं और परिवर्तन भी खुद के लिए ही अनुमोदित करते हैं ....किन्तु लाभ का जब भी सरोकार होता है तो वो सब सामान्य से अलग वर्गों के मुताबिक ही चाहिए ....तब उन्हें अलगाव पसंद है ...किन्तु जब संज्ञात्मक या प्रचारात्मक द्रष्टिकोण हो तो बाइस्कोप में सिर्फ अपने मतलब के ही चित्र चाहिए .....वो जो बाइस्कोप चला कर दिखता है शायद वो स्वयं उन जगहों / तजुर्बों से मुखातिब ना हुआ हो जिनको वो सलीके से दिखा रहा होता है ....किन्तु जब वो आपको वो सब दिखता है हो एक मंझे हुए खिलाडी की तरह व्यवहार करता है ताकी उसपर विशवास बना रहे और मनोरंजन एवं मुलाकातों का रिश्ता बना रहे , हर अगली मुलाक़ात पर वो इसे और सुदृढ़ करने की कोशिश करता है .....भले ही कुछ बचपन से साथी बड़े हो रहे हों और दुनियादारी के साथ साथ मौकापरस्ती से ग्रसित हों.....!!
बाइस्कोप में जड़ता होती है ....किन्तु अविरलता के साथ साथ ....जिसका हर नयन के जोड़े को पता होता है किन्तु फिर भी वो देखता है .....क्यों .....क्यों की वो चाहता है की जीवन की सतत तरलता का गीलापन कभी कभी सघनता को तलाशता है , हाँ समर्पण के साथ , " बाइस्कोप " में तो बस समर्पण ही समर्पण है ....पूर्णतः !!
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