हमारे स्कूल की पूरी छुट्टी लगभग 3 बजे हुआ करती थी, और तब तक स्कूल की दीवार से सटा पोस्ट ऑफिस बंद हो जाता था ...इस लिए में आधी छुट्टी में जल्दी जल्दी से खाना खा कर कोशिश करता था की पोस्ट ऑफिस से पोस्ट कार्ड और अंतर्देशिये पत्र ले कर लौट आऊँ ! लेकिन इस गणित में भी एक पेच था ....हमारे प्रधानाचार्य महोदय श्री आर ए गुप्ता जी उसी समय मुख्य द्वार पर आ कर खड़े हो जाते थे ये अवलोकन करने के लिए की कौन कितना देर से आ रहा है ...और पकडे जाने पर उनके हाथ में एक लगभग 2.5 फुट का लकड़ी का डंडा होता था बस .....अब आप आगे समझ ही गए होंगे की क्या होता होगा !! मुझे ये सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ कभी .....!
ये कुछ 1992 से 1995 के बीच की बात होगी , हम उन दिनो मोबाईल फोन से परिचित नहीं थे ...हाँ ये जानते थे की कुछ वायर लेस जैसे चीज़ होती है ...बहुत बड़े बड़े लोगो के पास होती थी ! जिसमे बात करने का बड़ा ही खर्चा आत है ! तो भाई हम क्या बहुत लोग भारतीय डाक वयवस्था की सेवायें लेते थे ....और सब से कम खर्चे का पोस्टकार्ड उपयोग आधिक्य में होता था !! में भी करता था ! हमारे सब सर्व सम्मानित रिश्ते के लोग दूर दूर रहते हैं ...कोई मुंबई , कोई टाटानगर कोई वाराणसी , और कई मित्र भी दूर दूर रहते थे ....जैसे कोई पढने के लिए रुड़की चला गया था तो कोई वाराणसी में पढ़ रहा था , अब इनसे संपर्क हो तो हो कैसे ....और मुझे सबसे संपर्क में रहना अच्छा लगता था , और आ भी लगता है ....किन्तु यदि जब किसी चीज़ का अधिक्क्य होजाता है ना तो वो विष समानं हो जाती है ....और अधिकतर उए हुआ भी , कम से कम मेरे मामले में तो .....!
में पोस्ट कार्ड लिखता था !! श्रीमान पोस्टकार्ड लिखना कोई आसान काम नहीं ...छोटे से तुकडे पर आप कितना अधिक लिख सकें और वो एसा की जो पढ़ा जा सके .....और सब अहम् विषयों को कवर कर ले ....स्याही किस तरह की प्रयोग में लानी है किस पोस्टकार्ड के सफ़र में कहीं कोई मौसमी ग्रहण न लग जाये और गंतव्य तक पहुचते पहुचते सिर्फ सपाट मैदान हो ....इस लिए में बाल पॉइंट से लिखा करता था !! लगभग 15 से 30 दिनों की सब बड़ी छोटी घटनाये , जो मेरे साथ घटी हों, उनका हाल चाल , कोई नवीनतम कविता लिखी हो तो उसकी कुछ पंक्तियाँ, कोई बीमार हो तो उसके बारे में दो शब्द , इन दिनों मौसम कैसा रहा , कहीं घूमने गया क्या , इत्यादि इत्यादि !! मुझे परे कई बार परेशानी होती थी की पाने वाले का पता जब कुछ ज्यादा बड़ा होता था .....मन में खीज होती थे की अब इतना बड़ा पता रखने की क्या ज़रुरत थी ...बात पूरी नहीं लिख पता था !! तो उनके लिए मुझे थोड़े से ज्यादा पैसे खर्च कर के अंतर्देशीय प्रयोग करना पड़ता था !! किन्तु ये बहुत सही है की मुझे अंतर्देशिये पत्र पर मैं पानी बात खुच पूरे सलीके से लिख पाता था !!
शब्द जो तब लिखे जाते थे ...आज तो सुनने को भी नहीं मिलते ...
1. आदरणीये ........... को प्रणाम !
2. हम सब यहाँ कुशल है .....
3. आपका पत्र मिला ...समाचार मिले ...
4. आगे समाचार ये हैं की ...
5. अब समाप्त करता हूँ ....
6. लौटती डाक से पत्रोत्त्तर दीजियेगा ....
7. सादर ....
8. सप्रेम ,
इत्यादि इत्यादि ...
हलके पीले रंग का पोस्ट कार्ड , हलके नीले रंग का अंतर्देशिये पत्र ... आप और हम जिन्होंने उन दिनों को जिया है कुछ याद कीजिये ....खूब कड़कती दोपहर में अचानक से डाकिया अंकल जी आवाज़ लगते थे ...हाँ भाई 6 नंबर ...( मेरे मकान का नंबर ) ...मैं ये मेरी बहने भाग कर जाती थे और जो भी आया ले कर आते और पढते थे .... ! लगभग 10 से 15 दिनों पुरानी खबर कितनी नवीन लगती थीं , सब की सब ताज़ा....तभी मन में ये होने लगता था की जितना जल्दी हो सके इस का जवाब दे सकूं !! रात को बिना लाइट के , लालटेन जला कर चिठ्ठी का जवाब लिखने का मजा , आज के एस एम् एस लिखने में नहीं .... क्यों ....पता नहीं किन्तु इतना ज़रूर है की तेज़ चलना जीवन में ज़रूरी है किन्तु किसी रिश्ते को गाढ़ा और मज़बूत होने के लिए भावों की हलकी आंच और समझदारी का सहज उद्वेलन ज़रूरी है .... जैसे खीर पकती है !!
चिट्ठियां माध्यम थीं अपनों को समय देने का ....आज भी हैं ....अब देखिये ना कम से कम हम अपने घरों में होने वाले किसी मुख्य कार्यकर्म में शामिल होने के लिए कार्ड छपवाते हैं ....!!
आज भी पोस्ट ऑफिस हैं , लिकिन में मुझे याद नहीं की मैं वहां कितने सालों से नही गया , ज़रूरत तो है किन्तु बस मानव मन ...आसान तरिका ....मोबाइल जो है ! ये मोबाइल और मोबाइल से निभाये जाने वाले रिश्ते उस ही तरह से हैं ... जैसे की बरसाती नदी ...अचानक से उफनती हुई और थोड़ी ही देर में बिलकुल सूखा ! पोस्टकार्ड और हाथ से लिखी गयीं चिट्ठियाँ पहाड़ी जंगलों की नदियों जैसी ....बारिश के समय में पहाड़ और उनके पत्ते , पेड़ पानी को अपने में सोख कर रखते हैं और फिर धीरे धीरे पुरे वर्ष भर थोडा थोडा पानी नदी में बना रहता है ...कभी सूखता नहीं .....!!
में अमित कंसल को खूब लिखता था ! में अपने बड़े पिता जी को लिखता था ! अपनी बड़ी मासी को लिखता था ! नाना जी नानी जी लिखता था ! कुछ लोग आज भी हैं लेकिन नहीं लिख पाता , चाहता तो हूँ ...बहुत कुछ चाहने और कर लेने में फर्क है ...जो रहेगा लेकिन यादों के साथ साथ , हमें जीवित जो रहना हैं .....भावनाओं के साथ , उमीदों में की रिश्ते बने रहें !!
.............. यादों को प्रणाम !!
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