" मेरी बड़ी अम्मा जी का देहांत हो गया था ...१२ घंटे की सूचना पर मुझे अपने पैतृक जिले आजमगढ़ पहुचना था .... जल्दी जल्दी से टिकट करवाया एक गाडी मैं ...जो रात के २.३० बजे वाराणसी पहुचती है ...मैंने नई दिल्ली से गाडी ली और चल दिए ... !!
अपनी आदत के अनुसार मैं गाडी मैं खाता रहता हूँ और खाने लगा .. चाय , मठरी और अचार ख्य अ..और बहार के नजारों का आनंद लेने लगा ..... मेरी सीट बीच वाली थी... ठीक मेरे ऊपर वाली सीट पर कोई १५ - १६ साल का एक लड़का लेटा था ...मुझे लगा की वो मुझ से बात करना चाहता था तो अपनी आदत के अनुसार ...बात छेड़ दी... " क्या करते हो ? ...वो बोला ..." जी दिल्ली मैं एयरोनोतिक्स एन्ग्गिनिरिंग करूंगा ...अभी दिल्ली मैं रहता हूँ... अच्छा ...मैंने कहा ...बस फिर रात के १२ बजे तक हम बात करते रहे ... खाना भी साथ साथ खाया ...मेरे ही हाथों से उसने मेरे पड़ोस का एक लैंड लाइन नुम्बर लिए .... तब मोबाइल नहीं था ...ज्यादा चलन मैं ...नहीं था ..!
हमने एक दुसरे ko ४ साल तक कोई फोन नहीं किया ...चार साल बाद एक दिन अचानक पड़ोस के घर पर एक काल आई की पड़ोस के मनीष भैया ko बुला दीजिये.... मुझे बुलाया गया ... मैं बहुत खुश हुआ...चार साल के बाद एक दोस्त की आवाज सुन कर... उसने मोबाइल नंबर दिया मेने भी बात करी...
फिर तो सिलसिला चल निकला ...हम अक्सर baat कर लिया करते थे , करते रहते थे ...! यहीं ल्क्षमिनगर मैं रहता था वो... उसके कई बार बुलाने पर भी मैं उसके घर नहीं jaa सका ...!
एक बार हम हज़रत निज़मिद्दीन बस के अड्डे पर मिले ...सुबह के कुछ ९.३० का समय रहा होगा ... हम २ घंटे तक साथ रहे ...बातें करी ... साथ अच्छा रहा ..!
मेरे घर आया वो , पूरा विशवास के साथ रहा हमरे साथ ...उस रात मुझे याद है , बत्ती गुल हो गयी थी और सुबह के चार बजे तक तो इन्वेर्टर चला ...लेकिन उसके बाद हाथ के पंखे से ही काम चलाना पड़ा था ! ...बिलकुल घर के सदस्यों की तरह से रहा वो हमरे साथ !!
दिन बीतते गए !...हम आपस मैं खूब बातें करते ....एक दुसरे के साथ अपने अपने दुःख सुख बाँट लिया करते थे .... समय बीता !!
एक रोज़ उसका फ़ोन आया जैसे आता था... उसके कालेज की एक्साम फीस भरनी थी कुछ लगभग ५०००/- रूपये .... उसके पास टाइम कम था ...और उसके पिता के भेजे हुए पैसे कुछ दिनों के बाद आने वाले थे... तो मेरे तरफ उसने हाथ बढाया .... हमने अपने को ये मान कर के हमसे किसी ने अपनापन समझ कर के कुछ कहा है तो हमने भी खुल कर के सहयोग किया .... और उसका एडमिशन हो गया ...समय पर फीस भर सका वो ....
उस दिन के बाद वो मुझ से कभी नहीं मिला .... मैंने कई बार कोशिश करी... फेसबुक पर कई बार रेकुएस्ट डाली ...पर कोई जवाब नहीं ...
" अब वो ताल्लुक रखना ही नहीं चाहता .... हाँ मूर्खों से सिर्फ .............. काम भर का संपर्क रखना ही ठीक होता है ....ऐसा कुछ महामूर्ख समझते है .... !!
मैंने अपने संस्कारों के कारण वो किया जो मुझे मिले ...और उसने क्या और क्यों किया आप स्वयं सोचिये .....!! जीवन मैं कुछ चीजों का होना निश्चित है .....और कुछ का होना हमारे हाथ ...भाई जो हमारे हाथ मैं है , वो ज़रूर कीजिये .... ख़ुशी मिलती है ...आँखे नहीं चुरानी पड़ती किसी से !! शर्मिंदा तो नहीं होना पड़ता ना अपनी ही निगाहों मैं , हम खुश रहते हैं किसी को को खुश रख कर ....!! खुश रहिये !! अपनी नज़रों मैं तो शर्मिंदा नहीं होंगे ना !!
आज पूरा हो गया !! मैं खुश हूँ ...लेकिन अफ़सोस है की मेरी दोस्त की लिस्ट मैं इसे लोग भी हैं ...!!
अपनी आदत के अनुसार मैं गाडी मैं खाता रहता हूँ और खाने लगा .. चाय , मठरी और अचार ख्य अ..और बहार के नजारों का आनंद लेने लगा ..... मेरी सीट बीच वाली थी... ठीक मेरे ऊपर वाली सीट पर कोई १५ - १६ साल का एक लड़का लेटा था ...मुझे लगा की वो मुझ से बात करना चाहता था तो अपनी आदत के अनुसार ...बात छेड़ दी... " क्या करते हो ? ...वो बोला ..." जी दिल्ली मैं एयरोनोतिक्स एन्ग्गिनिरिंग करूंगा ...अभी दिल्ली मैं रहता हूँ... अच्छा ...मैंने कहा ...बस फिर रात के १२ बजे तक हम बात करते रहे ... खाना भी साथ साथ खाया ...मेरे ही हाथों से उसने मेरे पड़ोस का एक लैंड लाइन नुम्बर लिए .... तब मोबाइल नहीं था ...ज्यादा चलन मैं ...नहीं था ..!
हमने एक दुसरे ko ४ साल तक कोई फोन नहीं किया ...चार साल बाद एक दिन अचानक पड़ोस के घर पर एक काल आई की पड़ोस के मनीष भैया ko बुला दीजिये.... मुझे बुलाया गया ... मैं बहुत खुश हुआ...चार साल के बाद एक दोस्त की आवाज सुन कर... उसने मोबाइल नंबर दिया मेने भी बात करी...
फिर तो सिलसिला चल निकला ...हम अक्सर baat कर लिया करते थे , करते रहते थे ...! यहीं ल्क्षमिनगर मैं रहता था वो... उसके कई बार बुलाने पर भी मैं उसके घर नहीं jaa सका ...!
एक बार हम हज़रत निज़मिद्दीन बस के अड्डे पर मिले ...सुबह के कुछ ९.३० का समय रहा होगा ... हम २ घंटे तक साथ रहे ...बातें करी ... साथ अच्छा रहा ..!
मेरे घर आया वो , पूरा विशवास के साथ रहा हमरे साथ ...उस रात मुझे याद है , बत्ती गुल हो गयी थी और सुबह के चार बजे तक तो इन्वेर्टर चला ...लेकिन उसके बाद हाथ के पंखे से ही काम चलाना पड़ा था ! ...बिलकुल घर के सदस्यों की तरह से रहा वो हमरे साथ !!
दिन बीतते गए !...हम आपस मैं खूब बातें करते ....एक दुसरे के साथ अपने अपने दुःख सुख बाँट लिया करते थे .... समय बीता !!
एक रोज़ उसका फ़ोन आया जैसे आता था... उसके कालेज की एक्साम फीस भरनी थी कुछ लगभग ५०००/- रूपये .... उसके पास टाइम कम था ...और उसके पिता के भेजे हुए पैसे कुछ दिनों के बाद आने वाले थे... तो मेरे तरफ उसने हाथ बढाया .... हमने अपने को ये मान कर के हमसे किसी ने अपनापन समझ कर के कुछ कहा है तो हमने भी खुल कर के सहयोग किया .... और उसका एडमिशन हो गया ...समय पर फीस भर सका वो ....
उस दिन के बाद वो मुझ से कभी नहीं मिला .... मैंने कई बार कोशिश करी... फेसबुक पर कई बार रेकुएस्ट डाली ...पर कोई जवाब नहीं ...
" अब वो ताल्लुक रखना ही नहीं चाहता .... हाँ मूर्खों से सिर्फ .............. काम भर का संपर्क रखना ही ठीक होता है ....ऐसा कुछ महामूर्ख समझते है .... !!
मैंने अपने संस्कारों के कारण वो किया जो मुझे मिले ...और उसने क्या और क्यों किया आप स्वयं सोचिये .....!! जीवन मैं कुछ चीजों का होना निश्चित है .....और कुछ का होना हमारे हाथ ...भाई जो हमारे हाथ मैं है , वो ज़रूर कीजिये .... ख़ुशी मिलती है ...आँखे नहीं चुरानी पड़ती किसी से !! शर्मिंदा तो नहीं होना पड़ता ना अपनी ही निगाहों मैं , हम खुश रहते हैं किसी को को खुश रख कर ....!! खुश रहिये !! अपनी नज़रों मैं तो शर्मिंदा नहीं होंगे ना !!
आज पूरा हो गया !! मैं खुश हूँ ...लेकिन अफ़सोस है की मेरी दोस्त की लिस्ट मैं इसे लोग भी हैं ...!!
Dedicated to Mr.Ambuj Mishra .... !!
ReplyDeleteLearning is very important and we should be thankful to the people who help us to learn quickly,
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