Saturday, June 15, 2024

एक कहानी : टी टेस्टर - Tea Taster.

            घुमावदार अंधियारी सीढ़ियों से जैसे जैसे " पुलकित " कमरे की तरफ बढ़ रहा था उसके कानो में टेप रिकॉर्डर पर बजते गाने के शब्द साफ़ साफ़ सुनाई पड़ रहे थे !

धीमी आवाज़ में एक ग़ज़ल बज रही थी ;

                        दुनिया भर की यादें हमसे मिलने आती हैं,
                            शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है !
                                 हम भी पागल हो जाएंगे ऐसा , लगता है !
                                     दीवारों से मिल का रोना      ............. !

विपुल दा , विपुल दा कहाँ हैं आप ?
 
तबियत  तो ठीक है ना ?
 
दो दिनों से आये नहीं चाय दुकान पर !

चिंता भरी आवाज़ से  विपुल पुकारता हुआ कमरे के करीब पहुंच गया !
 
चौखट पर गहरे हरे रंग का पर्दा टगा था !
 
     अंदर से सिर्फ धीमी आवाज़ में बजती ग़ज़ल सुनाई देती थी कोई दूसरी हलचल नहीं ! पुलकित ने धीरे धीरे पर्दा उठाया और भीतर झांकने की कोशिश करी ! अंदर सिर्फ अँधेरा था और एक आवाज़ !
 
" आ जाओ पुलकित मैं यहीं हूँ ! " 
 
कोने की आराम कुर्सी पर आगे की तरफ झुके हुए एक ७० - ८० बसंत देख चुके बुजुर्ग बैठे थे और "पुलकित" को बुला रहे थे !
 
ये " पुलकित " के विपुल दा थे !

       अजब दोस्ती थी  दोनों में  , उम्र का कोई बंधन नहीं जहाँ पुलकित सोलह - सत्रह साल का लड़का और वहीँ विपुल दा उम्र के अंतिम पड़ाव पर ! अच्छी जमती थी दोनों में. अभी कुछ महीनो पहले की तो बात है , दोनों की मुलाक़ात हुए ! पुलकित स्कूल से लौट रहा था की चाय पीने की इच्छा हुई तो चौराहे की गुमटी में रुक गया, विपुल दा वहां पहले से बैठे चाय पी रहे थे !

पुलकित लकड़ी से स्टूल पर बैठते हुए विपुल दा से कहा : दादा , अखबार देंगे ?

विपुल दा : हाँ , हाँ ,लो भाई ! क्या कोई एग्जाम का रिजल्ट आया है ?

पुलकित ने अपने नज़र अखबार में गड़ाए हुए बंगला में कहा : ना , एम्नि देख्छी नूतन छोबी , कोथाए के आछे !

विपुल दा ने चाय की चुस्की लेते हुए जवाब दिया : किन्तु घर से तो बोल के आये होगे की स्कूल जा रहा हूँ ?

पुलकित ने सर उठा कर देखा और कहा : हाँ , वो तो है , किन्तु अपने आस पास की घटनाओ पर हम युवाओं को अपडेट  भी तो  रहना चाहिए !

चायवाले ने चाय पुलकित की तरफ बढ़ा दी , चाय विपुल दा के हाथो से होते हुए पुलकित तक पहुंची !

आप कुछ अलग है ! पुलकित ने विपुल दा की तरफ देखते हुआ कहा !

विपुल दा मुस्कुराये और बोले , हाँ , किन्तु तुम बिलकुल मेरे जैसे हो , ज़रा से भी अलग नहीं !

अंजाना बंधन दोनों को एक दूसरे से बाँध रहा था !

विपुल दा : कितना हुआ बेनर्जी ?

बेनर्जी ( चाय वाला ) : ५ रुपया !

वपुल दा ने दस रूपये का नोट चाय वाले की तरफ बढ़ाते हुआ कहा , आज मेरे नए बंधू का भी पैसा मैं दूंगा !

पुलकित औपचारिक भी मना नहीं कर सका !

विपुल दा ने पुलकित के सर पर हाथ रखते हुआ पुछा : बंधू नाम तो बताइये , मुझे भी अपडेट रहने की आदत है !

पुलकित ने मुस्कुराते हुआ कहा : पुलकित घोष ! और आपका नाम दादा ?

विपुल दा बोले :  विपुल नाम है मेरा !

पुलकित ने पुछा : सरनमे ?

विपुल , कुछ कल की मुलाक़ात के लिए रखते है ! मिलना ज़रूर  .

हाथ हिलाते हुए विपुल दा आगे बढ़ गए, पुलकित ने कंधे पर रखे बैकपैक को अपनी जांघो पर रखा और चायवाले से पुछा , ये कौन हैं बेनर्जी दा ?  कहाँ रहते हैं ?

चायवाला : बाबू ज़्यादा तो मैं भी नहीं जानता किन्तु , बड़ी चाय कंपनी में काम करते थे ! बहुत बड़े आदमी है ! सुना है परिवार भी है किन्तु देखा नहीं मैंने कभी ! वो अगली गली में सुन्दरपड़ा के कोने के मकान की दूसरी मंजिल पर रहते है ! अपना मकान है ! सुबह शाम आ जाते है मेरे पास चाय पीने के लिए ! मुझे बहुत कुछ सिखाया इन्होने की चाय कैसे पकाते हैं , चाय कंपनी में थे ना !

अच्छा बेनर्जी दा चलता हूँ , शाम को मौका  मिला तो आऊंगा !

और पुलकित बढ़ चला सरकारी अनाथालय की तरफ अपनी पहचान तलाशने !

कोथाए छिलेन बाबू ? दरवाज़े पर घुसते ही वार्डन ने सवाल किया !

पुलकित : चाय पीने लगा था , इस लिए देरी हुई !

वार्डेन : ठीक अच्छे, तडातडी आशो , खेये नाओ !

पुलकित : आश्चि !

अगले दिन फिर से उसी चाय की दुकान पर दोनों मिले !

और पुलकित कैसे हो ? चाय का घूँट भरते हुए विपुल दा ने पुछा !

अच्छा हूँ विपुल दा ! पुलकित ने सधा सा उत्तर दिया !

पुलकित का उत्तर  सुनकर चायवाले बनर्जी और विपुल दा एक दूसरे की और देखा और समझ गए कुछ सामान्य नहीं है !

बनर्जी ने कुल्हड़ में इलायची और अदरक वाली चाय पुलकित की तरफ़ बढ़ा दी !

पुलकित की आँखें डबडबाई सी थीं , बस कोई  पूछे और छलक जाएँ !

क्या हुआ बंधू ? विपुल  दा   पूछ लिया !

      रूंधे गले से कुछ आवाज़ और आँखों से पानी बहता हुआ पुलकित लिपट गया विपुल दा से , चाय का कुल्लहड बनर्जी ने थाम लिया और पुलकित को विपुल दा ने !

दो ,तीन ,चार ,पाँच मिनट पुलकित लिपटा हुआ रोता रहा ! जैसे कोई सागर अचानक कहीं से बह निकले किनारों को तोड़ते हुए !

दोनों संभले !

मुझे बताओ  क्या बात है ! - विपुल दा ने पुछा !

बस याद आ गया  की कोई नहीं है मेरे आगे और पीछे ! पुलकित बोला !

अरे बस इतनी सी बात ! विपुल दा पुलकित के माथे को अपने कंधे से सीधा करते हुए बोले !

लो चाय पियो और आंखे साफ़ करो ! विपुल दा ने अपनी बात पूरी की !

बनर्जी को दस रूपये का नोट देते हुए विपुल दा पुलकित को उठाते हुए अपने घर की और चल पड़े पुलकित का हाथ थामे !

आओ बैठो यहाँ ! आराम कुर्सी की और इशारा करते हुए विपुल दा ने कहा !

नहीं आप बैठिये ! पुलकित बोला !

अच्छा ठीक है मैं बैठता हूँ , तुम ज़रा वो रुमाल मुझे दे दो और बैठ जाओ ! विपुल दा बोले !

अब बताओ क्या बात है , तुम क्यो परेशान हो ? विपुल दा  बोले !

    पुलकित  कुछ देर तक ऐसे ही बैठा रहा , स्टूल के कोने को अपने उलटे हाथ के अंगूठे से दबाते हुए  , शांत ! किन्तु उसकी आँखों से आंसू बहते जाते थे जो बूँद बूँद होकर उसके गालों से होते हुए अखबार पर टपक रहे थे !

विपुल दा बोले - कुछ बताओगे की क्या हुआ है ?

पुलकित ने अपने को संभालते हुए कहा - विपुल दा मुझे जाना होगा यहाँ से , आप सब से दूर बहुत दूर !

कहाँ जा रहे हो पुलकित ?  विपुल दा ने भरे गले से पुछा। 

मैंने टाटानगर के एक कॉलेज में अप्लाई किया था आगे की पढाई के लिए स्कालरशिप के साथ , वहाँ से कॉल आगयी है ! पुलकित बोला। 

अरे ये तो खुश होने वाली बात है और तुम रोते हो।  विपुल दा चायवाले बनर्जी को देखते हुए बोले। 

पर वहीँ से कैंपस सिलेक्शन हो गया तो , नौकरी भी लग जाएगी और ये ज़रूरी हो नहीं नौकरी कोलकत्ता में ही मिले , तब कहाँ मिलोगे आप दोनों ? पुलकित ने रोआँसे गले से कहा अपनी नज़रें झुका के !

         वपुल दा ने उठ के पुलकित को अपने से चिपका लिया और उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोले।  आगे बढ़ने का ही नाम ज़िन्दगी है बेटा और हम कहाँ जाते है  यहीं मिलेंगे जब तुम बाबूजी बन कर लौटोगे , क्यों बनर्जी ?

         बनर्जी चायवाला तब तक चाय बना चूका तक और दो कुल्हड़ उनकी और बढ़ाते हुए बोला - चाय लीजिये और आज मठरी भी खाना होगा किन्तु पैसा नहीं लगेगा  , मेरी तरफ से छोटा पार्टी।

   भर्राई आँखों से विपुल और पुलकित ने चाय के कुल्हड़ पकड़ लिए , माहौल खुशनुमा हो चूका था।  हलकी बारिश की फुहार आने लगी थी  / कच्चे कोयले के धुएं की महक ने विपुल दा और पुलकित को दूर होने के लिए तैयार कर दिया था। 

हावड़ा रेलवे स्टेशन पर विपुल दा ने पुलकित को ट्रेन में टाटा जाने के लिए बैठा दिया  जैसे एक पिता विदा करता है  . कुछ समझाते हुए , ध्यान से जाना , पहुंच कर ख़बर करना , खाते पीते रहना , ठंडक में ज़यादा देर तक बहार मत रहना वगैरह वगैरह। 

समय अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ता गया , पुलकित पढता गया , बढ़ता गया साल दर साल , साल दर साल। 

कॉलेज में जॉब के लिए कैंपस आर्गनाइज्ड था , पुलकित ने भी रजिस्ट्रशन किया था / 

दार्जीलिंग से कुछ लोग आये थे किसी बड़ी चाय की कंपनी से, उन्हें तलाश थी एक " टी टेस्टर " की  . 

पुलकित ने कुछ सोचा और दार्जिलिंग के लिए हामी भर दी !

            समय बीतता रहा और पुलकित बड़ा होता गया  , एक बड़ा अधिकारी , एक सफल टी टेस्टर जिसने जीवन में ना जाने कियाने स्वाद चखे थे , अनाथ होने का , अकेले होने का , हर पल कमियों का , अच्छे दोस्तों का , समझोतो का , विपुल दा के साथ का और बनर्जी चायवाले की अदरकवाली चाय का और ना जाने कितने ही स्वाद जिनकी उनको याद भी नहीं।  

वैसे तो दार्जलिंग से कोलकत्ता आता जाता रहता था पुलकित किन्तु आधिकारिक यात्रा पर , सुबह आना और शाम को वापस पर उस दिन उसे पिली टैक्सी वाले से कहा - दादा आज एयरपोर्ट नहीं सरकारी अनाथालय चलिए किछु काज आछे.

किंतु देरी होये जबा बाबू , आपनार फ्लाइट मिस होये जाबे बोलो तो - टैक्सी वाला बोला  . 

ना आजके आमा के जेते होबे , खूब देरी होये गयेछे - पुलकित बोला अपने रुमाल से डबडबाई आखों को पोंछते हुए। 

टैक्सी वाला ख़ामोशी से अनाथालय की और चल दिया !

अनाथालय वैसा था   ... कुछ नए पुलकित खेलते हुए दिखे पुलकित को. 

टैक्सी को वहीँ रोक कर पुलकित कुछ ढूंढ रहा था , इधर उधर बेचैनी से देखता हुआ पर वो दोनों ही नहीं दिखाई दे रहे थे   - वो चाय की गुमटी जहाँ वो आता था अपने विपुल दा के पास  !

कोई था दूर जो बड़े हो चुके पुलकित को देख रहा था बैचैन !

क्या बाबू बहुत बड़े हो गए हो - किसी ने पुलकित को पीछे से सहलाते हुए कहा वैसे ही जैसे विपुल दा प्यार करते थे  . 

अनुभवों की झुर्रियों के साथ नीली पाड़ वाली सफ़ेद सदी में दादी माँ खड़ी थी पुलकित के पीछे , ये वही थीं जिनसे बनर्जी चाय वाला अख़बार लेता था और पुलकित के साथ विपुल दा मिटटी के कुल्हड़ में चाय पीते हुए उसको पढ़ते थे  .. 

माँ ओ दो जनि कोथाये आछें - पुलकित ने दादी माँ से पुछा   . 

वो दोनो अब नहीं हैं  इस दुनिया में  !

विपुल दा कुछ दिन पहले ही चले गए ! उनका मकान सरकार के पास है तुम्हारे नाम से  ... 

एक किताब है जो मेरे पास है जो उन्होंने मुझे दी थी   .. ऐशो तुमाके दिए दिछि !

दादी माँ ने एक किताब पुलकित के हाथो में रखी जो विपुल दा ने लिखी थी  शीर्षक था " टी टेस्टर " जिसमे कुछ पन्ने पुलकित के नाम भी थे  .. 

शाम ढल रही थी , खड़खड़ करती ट्राम पुलकित से पास से गुजरी और विटोरिया मेमोरियल की सफ़ेद मीनारों से डूबता हुआ सूरज कल आऊंगा कहता हुआ जा रहा था। . 

पीली टैक्सी में ड्राइवर ने गियर बदला और चल पड़ा   ....पुलकित विपुल दा की किताब को पृष्ट पृष्ठ पढ़ता जा रहा था   .... 

एक कहानी : टी टेस्टर 

:: मनीष सिंह ::