Friday, October 26, 2012

.... अच्छे समय में उठाया गया कदम !!

                  सर्दियों की शाम के कोई चार बजने को थे , भारतीय घरों में सामान्यतः चाय का समय लेकिन वो कुछ परेशान सा था ...अभी अभी तो आया था माँ को अस्पताल में छोड़ कर बेसुध ...वो कुछ नहीं बोलती थी बस देखती रहती थी , आज भी नहीं बोली थी जब दोपहर को आये उनके लिए अस्पताल के खाने को ले कर उसने ही खाया ...क्यों की वो तो खाती नहीं थी ..बस आजतक सब का ख्याल रखती आई थीं ...आज भी उनके ही हिस्से का खाना बच्चों ने खाया था !! 1 घंटे का सफ़र कर के घर वापस आया था कुछ देर आराम करने के लिए ...अस्पताल में आराम कहाँ मिलता है ...वैस कर ने को कुछ काम नहीं होता लेकिन मानसिक तौर पर आप हमेशा व्यस्त रहेते हैं ... चिंताग्रस्त पता नहीं क्या होगा ? सोच सोच कर ....!!

            अभी तीन महीने पहले ही उसकी माँ को जोंडिस हुआ था , संभल गयीं थी उनकी सेहत लेकिन पूरा घर अव्यवस्थित हो गया था ....सब कुछ दिशाहीन हो गया था !!  कभी कभी लोग आते थे उनसे मिलने , बस मुस्कुरा देती थीं सारा दर्द अपने गले से निगलते हुए !!  कमर में भी दर्द रहने लगा था ! थोडा झुक कर चलने लगी थीं ! एक दिन सबेरे अचानक चल नहीं सकीं , रुक गयीं कुछ बुखार सा था राहुल ने काम पर जाने से मना किया ...मम्मी मत जाओ आज ....हाँ पिता के देहांत के बाद काम करना पड़ता था राहुल की माँ को , राहुल और दो और बहनों की पढाई और खाने पीने के लिए .... बस आज नहीं जा सकी ...दर्द ज्यादा था !! दिन , हफ्ते  और महीनी बीते ....इलाज चल रहा था ...और पैसा पानी की तरफ बह रहा था ...जो भी था उसी में से !!

          स्थानीय डाक्टरों ने 26 जनवरी सन 2000 को मना कर दिया और किसी सरकारी अस्पताल में ले जाने ...हाँ दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले जाने की सलाह दी , लगभग कह ही दिया !! लोकल अस्पताल में जो खर्चा आया उसका भुगतान राहुल के मौसा जी ने किया ....वो खुद नहीं आये थे कभी भी ...हाँ पैसो का इन्तेजाम कर दिया !! अब दिल्ली के जी टी बी में था अपनी माँ को ले कर के ...सरकारी अस्पताल में ....अकेला ...दो बहने , पडोसी लोग आते थे मिलने कभी कभी , कोई दफ्तर से शाम को आता था ....कोई दिन में ...एक बार तो हाँ सिर्फ एक बार पुरे महीने माँ के अस्पताल में भारती होने के बाद माँ की पड़ोसन दोस्त साथ में मिलने आयीं थीं  ! सब जिगरी दोस्त थीं राहुल की माँ की !!  किसी ने स्वेटर बनाना सीखा था तो किसी ने जीवन में कैसे अकेले लड़ा जाये सीखा था .... उनको देख कर पुरे महीने चुप रहने वाली राहुल की माँ पहली बार और आखिरी बार बोली थीं ...एक सबसे करीबी दोस्त को देख का  कर और उनके शब्द थे - " अब आई हो ?? "  जैसे बोलना चाह रहीं थे की बस अब तो मैं जा रही हूँ ...इतने दिनों तक इंतज़ार किया और तुम लोग नहीं आये ....अब आये हो ...?? !! लेकिन इस पुरे समय में राहुल की सबसे छोटी मौसी उसके साथ थी ! हर कदम पर ....किन्तु सब को चलना खुद ही होता है ...और पैर नगें हो तो तपिश ...चाहे वो कैसे भी रूप में हो ....पैसो की कमी , नाते रिश्तेदारों का नकारीबियत समय पर , समाज में कम पहचान , इत्यादि !!

                 दिन , हफ़्तों कर के वो दिन आ ही गया जब उसकी माँ चली गयी !! रात के करीब 12 बज रहे थे ,  अचानक माँ की साँसें तेज़ चलने लगीं , राहुल समझ गया था की आज सब ख़तम ....हो जायगा ...वो चुपचाप अस्पताल के उसक वार्ड के दरवाज़े पर खड़ा हो कर अपनी माँ को कराहते हुए जाते हुए देख रहा था ...ना रो पा रहा था , ना ही कुछ कर पा रहा था ....दौड़ कर रात की ड्यूटी पर के डाक्टर को ले कर आया ...उसने देखा और सब बंधन निकाल दिए ...नेबुलिज़ेर , सलाइन सब ...और कहा ...ये अब जिन्दा नहीं हैं ...मेरे साथ आइये ...मैं मृत्यु प्रमाण पत्र लिख देता हूँ !!  सब खामोश ...एक डरवाना सन्नाटा !! उस रात ....राहुल के दो दोस्त ...अमित और सुधांशु उसके साथ थे ....एक दूर के भैया भी साथ थे ...एक अम्बेसेडर कार में पिछली सीट पर राहुल और उसके दोनों दोस्तों की गोद में लेट कर आयीं थीं , अपने घर राहुल की माँ ...अंतिम बार ...फिर जा कर कभी ना आने के लिए !!  बहनों को सान्तवना दी ...और रिश्तेदारों को फ़ोन किये !! सब कुछ आस पड़ोस और कुछ लोगो ने अंतिम सब किया जो ज़रूरी था !!
                 ये कोई समय नहीं था राहुल की माँ का जाने का !! दिशाहीन और पैसों की कमी के कारन उनका इलाज़ सही ...और सही समय पर न हो सका !! पिता लगभग 15 साल पहले गुजर गए थे ..और अब माँ भी नहीं !! ज़रा अंदाज़ा लगा लीजिये ...उन बच्चों का ...रिश्तेदार आये और तय किया की राहुल को एक नौकरी में मदद करेगे ...आज राहुल नौकरी कर रहा है ...लेकिन एक बात हमेशा कचोटती है उसे ....माँ का इलाज़ सही से ना हो सका ..सही अस्पताल में ...पास में पैसे नहीं थे ...!! उसने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया ...बचपने में सुनी एक कहानी और किशोरावस्था में अपने साथ हुए माँ के हादसे से सबक लेते हुए !!  कहानी सुनी थी की जब अच्छे दिन हो तो ..खाने पिने की चीज़ों को जमा कर लेना चाहिए ....बुरे वक़्त के लिए ....!!  जब माँ अस्पताल में भारती थी को वहाँ एक सज्जन ने सलाह दी थी : जब भी नौकरी करो तो अपना मेडिकल बीमा ज़रूर करवाना ....ताकि आपका परिवार दो तरह से ना पीड़ित हो ...एक आप को देख कर और दुसरे ये सोच सोच के की पैसे कहाँ से आएंगे .. ठीक इलाज़ के लिए .....!! एक रोटी कम खा लेना लेकिन मेडिकल बीमा ज़रूर करवाना !! आज राहुल ने अपना मेडिकल बीमा किया हुआ है ...खुश है , ये सोच कर की यदि बीमार पड़ा तो इलाज़ के लिए पैसे का ना होना मुद्दा नहीं होगा !! .....
                  ज़िन्दगी हम सब को समय से पहले बड़ा होने के लिए हमेशा तयारी करती रहती है !!  एक बड़ा कदम हम सबको अपनी ज़न्दगी में ज़रूर उठाना चाहिए .... कुछ रकम अपने ऊपर मेडिकल बिमा करवा कर ताकि आपके असमय कहीं जाने की परिस्थिथि में अकेलापन  ...साथी ना बने क्यों की राहुल के रिश्ते के लोग बार बार बुलाने पर भी शायद इस लिए वहां नहीं आये ये सोच कर के कहीं खर्चे न करने पड़ें ...हमें राहुल की ज़गह खुद को रख कर देखा ...और पाया की ज़रुरत है ...बेहद ज़रुरत है बिलकुल वैसे ही किसी मेडिकल बीमे की जैसे की हमें स्वयं को जीवित रखने के लिए भोजन करना होता है !!
                समय कभी एक सा नहीं रहता , अच्छे समय में उठाया गया छोटा ही सही बीमित होने का कदम आपको मानसिक और आपके परिवार को सहारा देता है ...ताकि सम्मान और सांसारिक बंधन बने रहें लम्बे समय तक !!  सोचियेगा ... अन्यथा सब कुछ तो चल ही रहा है अपनी गति से अब पिछड़ना या साथ चलना हम पर है , वर्ना ,   हम में से कोई भी राहुल हो सकता है !!

Wednesday, October 24, 2012

.... नहीं तो बस सिद्ध कीजिये की आप ही आप हैं !!

              दिल्ली के आकाशवाणी भवन से बाहर निकला तो मेरे हाथ में एक निमंत्रण पत्र था जो उस दिन से मुझे दस दिनों पूर्व सन 1991 में एक सामान्य डाक से मिला था !
                आकाशवाणी के युववाणी के लिए कुछ कविताएँ रिकार्ड करवाने के लिए !
तकरीबन 10 मिनिट्स के लिए 2 गीत मैंने रिकार्ड करवाए अपने अन्य साथीयों के साथ !! वो बड़ा ही सुनेहरा दिन था , तीसरी बार आया था मेरे सामने ये समय , हर बार मैं कुछ सीखता ही जाता था !! 

                रिकार्डिंग के 10वें दिन एक चेक मिला " भारतीय स्टेट बैंक , संसद मार्ग " का एक पत्र के साथ जिसकी पहली पंक्ति को पढ़ कर लगता है जैसे की आप ने ना जाने कितना देश हित का कार्य कर दिया और किसके लिए आपको पारितोषिक दिया जा रहा है .... लिखा है ( है इस लिए लिख रहा हूँ क्यों की वो पत्र अब भी है मेरे पास ) " भारत के राष्ट्रपति की और से .....आपको दिनांक ......आपके द्वारा किये गए कविता पाठ के लिए प्रति पाठ रूपये मात्र 100/- संलग्न चेक भेजा जा रहा है जिसकी अवधि 6 माह है ( अब 3 माह हो गयी है ) ! अब उन दिनों मेरे पास कोई बैंक अकाउंट नहीं होता था  तो ये चेक कहाँ जमा करूं !! किसी बैंक में अकाउंट खुलवाना 1991 - 1995 में कितनी बड़ी बात और पेचीदा बात होती थी ....जो लोग उस समय के होने को पता होगा और मेरे से इत्तेफाक रखेंगे !!   एक रास्ता निकला !! एक बायलर बनाने वाली कंपनी के मालिक स्वर्गीय श्री संजीवा तानिय्यापा सुवर्णा जी के सबसे छोटे बेटे को हिंदी पढ़ता था तो उनकी पत्नी जी ने मेरा अकाउंट अपने बैंक " विजया बैंक " नवयुग मार्किट में खुलवा दिया ! मैंने चेक जमा करवाया और पुछा की सर कितने दिनों में पैसा आ जायगा ?

          मैं पंद्रह दिनों के बाद अपने बैंक पहुंचा ! सुबह के 10.15 बज रहे थे ! सरकारी बैंक अब भी 10 बजे ही खुलते हैं और पब्लिक डीलिंग 2 बजे बंद हो जाती है ! अजीब सी बात है ! अपना ही पैसा ! अपने ही काम के लिए किसी दुसरे की सुविधा के अनुसार प्रयोग में लाये जा सकते हैं !! कमाल है भाई ! वैसे आज कल कुछ निजी बैंकों ने फिर से सरकारी कर्मचारियों को थोडा और समय पर काम करने के किये मजबूर किया तो है !!   खैर हमें अपने सामने बैठे अधिकारी को पुछा की साहब ज़रा मेरे अकाउंट का बैलेंस देख कर बता दीजिये !! ठीक है अपना अकाउंट नंबर बोलिए ....हमने बताया , उन्होंने एक बड़ी मोटी  सी लेज़र जो की दो मोटे मोटे काले काले लकड़ी के दो फ़ाइल नुमा पन्नों को पलते हुए देखा और सबसे आखरी पंक्ति को पढ़ते हुए कहा ...हाँ जी इतना बैलेंस है ... मैंने हिसाब लगाया ...अरे अभी तो वही है जो खाता खुलवाते हुए था ...उन्होंने पुछा कब खुलवाया था ? 15 दिन पहले ....!! अच्छा रुकिए !!उन्होंने कहाँ ...हाँ रुकिए ..एक एंट्री करनी बाकी है ....हाँ अब इतना है !!

            सही रकम के बारे में आश्वस्त होने के बाद मैंने कहा कुछ पैसे निकलवाने हैं !! उन्होंने एक विद्रोवल फॉर्म मेरी और बढ़ा दिया ...इस को भर दीजिये ...! हमें भरा ! फिर उनको दिया !! उन्होंने एक टोकन नुम्बर उस पर लिखा और मुझे एक पीतल का टोकन दे दिया मुझे और कह दिया की वहां बैठ जाइए ...जब ये नंबर पुकारा जाए तो केश काउंटर पर जा कर पैसे ले लीजियेगा !! हम जैसे एकदम विजयी मुस्कान के साथ वहां रखे एक लकड़ी के बेंच पर बैठ गए और अपने चेक की यात्रा को देखने लगे !!
          सबसे पहले टोकन देने वाले साहब ने टोकन दिया और टोकन नुम्बर लिखा विठ्राल फॉर्म पर ! फिर वो चेक चला गया एक और वरिष्ठ अधिकारी के पास , उन्होंने फिर से उसी मोटी सी फ़ाइल को पलता और बस दो बार में ही मेरे अकाउंट वाला पेज निकाल लिया , और समान्तर ही कम्प्यूटर पर कुछ देखा ....और कुछ किया ...बाप रे  उसको करते हुए वो साहब कुछ कुछ सामंजस में थे ....पर कुछ कर गए ...! अब अगले काउंटर पर चेक गया ! ये काउंटर सब से महत्वपूर्ण !! अगर यहाँ से पास हो गया तो पैसा मिलेगा नहीं तो बस सिद्ध कीजिये की आप ही आप हैं !!  वहां क्या क्या की हुआ ..... पहले तो उन्होंने देखा ....टोकन नंबर लिखा है की नहीं , फिर दो मैन्युअल लेज़र में एंट्री है तो उसके होने के प्रमाण सवरूप पहले अधिकारी के हस्ताक्षर हैं की नहीं , फिर वो ही एंट्री कम्पुटर में है की नहीं ....अगर हैं तो उसके होने के प्रमाण सवरूप दुसरे अधिकारी के हस्ताक्षर हैं की नहीं ....चलिए ये दोनों तो मिल गए ...अब बारी आई ...मेरे हस्ताक्षर मिलाने की .... उन्होंने अपने सामने रखी एक अलमारी में करीने से रखे कुछ छोटे छोटे गट्ठों में से मेरे एकाउंट्स के नुम्बर वाले गट्ठे को निकला और वो ही कार्ड निकला जिसमे मेरे दो नमूना हस्ताक्षर थे ...उनसे मिलान किया गया ...तब सब ओके मिला तो वहां से अगले काउंटर पर दिया गया ...वहां नंबर से सैम को बुलाया जा रहा था ... लगभग 15 मिनट्स के बाद मेरा नंबर आया ...मेरा चेक मेरी तरफ ही बढाते हुए उन्होंने कहा अपने हस्ताक्षर कीजिये ...ये कन्फर्म करने के लिए की में ही हूँ ...जिसने वो चेक सबसे पहले काउंटर को अपना चेक दिया था !! और पूरे 1 घंटे के बाद मुझे मेरे ही पैसे मिले .. वाह वो ज़माना !!  और आज सिर्फ एक क्लिक करने के बाद हम निश्चिंत हो जाते हैं की हमारा पैसा सही जगह पर सही समय पर पहुच गया !! मुझे याद नहीं की आजकल मैं अपने बैंक में व्यक्तिगत रूप से कब गया होऊंगा !! जब आज कल की सुविधाएं नहीं थीं तब ये चाहिए था किन्तु ये भी सही है की 50% लोग ...अपने बैंक में व्यक्तिगत रूप से नहीं जाते और ये तक नहीं जानते की वो लोग जो ये सुविधाएँ दे रहे हैं वो दिखने में कैसे हैं .... !! अरे ये क्या बात कह दी मैंने ..ज़रुरत क्या है उनको देखने की ? काम हो रहा है ना !! भाई तो कम तो तब भी होता था लेकिन हम उनको देख पाते थे और मन की भड़ास निकल पाते थे ...पर आज समय पर काम हो रहा है तो भी उनको साधुवाद नहीं दे पाते ...हाँ मन में हुआ तो कस्टमर केयर पर एक इ मेल छोड़ देते हैं .......लेकिन सुना है की इन बैंकों के दफ्तर काफी बड़े और सुन्दर होते हैं ....और कर्मचारी ड्रेस कोड में रहते हैं ...सब सामान दिखने के लिए ...क्यों की सरकारी सोपानो पर  आरक्षण का सहारा भी होता है ना म उस पर ना असर पड़े इस लिए !! 
                     
         


Wednesday, October 17, 2012

.. स्वयं सरीखे कुछ बुत बनाने चाहियें, खुद की तलाश के लिए !!

                   अनमने मन से उठा और बाहर की तरफ देखा छोटे से परदे को बड़ी सी खिड़की से हटा कर ....तो खुला सा समुन्दर अपने पूरे जोश में सब को संभावनाएं बाँट रहा था , रोज़ की तरह ...लेकिन मेरे होटल के किनारे एक छोटी सी दूकान पर उस नन्ही सी जान के लिए कुछ भी नया नहीं था आज ....  उसके लिए बस एक दिन था जिसमे दिन में गर्मी रहती है और शाम को हल्का अँधेरा और शाम को खाना मिला मिला ना मिला लेकिन खुले आसमान की चादर और ठंडी धरती का बिस्तर ज़रूर नसीब में था !!

                बात उन दिनों की है जब हमने नया नया उड़ना / घूमना सीखा था और शहर शहर घूम रहे थे , अधिकारिक यात्रा पर !!  उत्तर के शहर इतने करीब से देखें हैं की कुछ गूढ़ नहीं दीखता ..किन्तु वहीँ दक्षिण के शहर कभी देखे नहीं तो वहां की गलियां तक विशेष लगती हैं ! पोंडिचेरी की गलियों की सैर कर रहे थे अकेले ....पैदल !!  हाथ में डाभ ( कच्चा नारियल , पानी से भरा हुआ ) ले कर , गटकते हुए !! गवर्नर के बंगले से होते हुए जैसे ही गाँधी जी के पुतले की ओर बढ़ते हैं तो कुछ दूरी पर एक रेत से भरा हुआ रास्ता मिलता है  बिलकुल एसा लगता है जैसे की वहां की सरकारी आँखें इस टूकडे को देख नहीं सकीं नहीं तो इसको भी पुरे प्रयास से पथरीला कर देतीं या फिर ये भी लगता है की शायद इस को इस लिए उसके मूल स्वरूप में छोड़ा गया हो की आने वाले लोगों की कुछ सामीप्य लगे ...अपनी ज़मीन से इन पथरीले रास्तों में !!
              उसी रेतीली ज़मीन पर सुबह और शाम को छोटा सा बाज़ार लगता है , अपने शहर और आगंतुकों दोनों के लिए !! वहां दक्षिण के पारंपरिक पकवान के सिवा ,,,उत्तर भारत के भी पकवान मिलते हैं ....जैसे आलू की टिक्की , गोलगप्पे किन्तु उनमे आपको दक्षिण की खुशबू ज़रूर मिलेगी ताकि आपको स्मरण रहे की आप मूल स्थान से हट कर आनंदित हो रहे हैं !!
             चाय भी मिलती है !! मुरुगन उसी चाय की दूकान पर रहता था ! मेरा रोज़ का साथी ! आज कुछ उदास था , चाय भी कुछ फीकी बनी थी ....न चीनी तो उतने ही चम्मच डाली थी ज़रूरी पानी में बस स्वाद आया ही नहीं !! चाय की छन्नी में रखे बारीक कपडे के ऊपर पूरी की पूरी चाय उधेल दी थी उसने कुछ बहार छलक कर उसके हाथ पर आ गिरी तो उसे ख़याल आया की कुछ गलत जो रहा है !!... मैंने पुछा " क्या बात है मनु ? " कुछ नहीं साब .. ठेठ दक्षिण भारतीय हिंदी में जवाब मिला !! कुछ तो है बोल तो मन हल्का होगा ......मैंने इतना कहते हुए उसके कंधे पर अपना उल्टा हाथ रख दिया और कोशिश करी की उसके सर को सहारा दूं .....एसा लगा जैसे उसको कुछ मिल गया हो जैसे मृग मरीचिका .... वो मेरे कंधे और छाती से लगभग चिपक कर रोने लगा ..... ये कहते हुए ...." कोई अपना नहीं है साब ....देख लिया मैंने " !! मैंने उसको अपने दुसरे हाथ से सहारा दिया और उठने के लिए कहा ....और हम चल दिये महात्मा गाँधी की मूर्ति के पास ....समुद्र में सम्भावनाये समेटने !!
              वो दिन आज़ादी का दिन था ...15 अगस्त , कुछ बच्चे छोटे छोटे तिरंगे बेच रहे थे ,,,,मैंने मुरुगन से पुछा लोगे ? हामी में सर हिला दिया उसने !! मैंने कुछ झंडे खरीदे ! मुरुगन से पुछा अब बताओ क्या बात हैं क्यों उदास हो ? वो बोला " साब में पढना चाहता हूँ पर मुझे स्कूल में एड्मिसन नहीं मिला ...और कोरास्पोंदेंस - पत्राचार की पढ़ाई के लिए एक मुश्त पैसे हैं नहीं मेरे पास ...और इस चाय की दूकान पर काम करते करते अगर पढ़ना चाहूं तो मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखाई देती की मैं समय पर अपनी पढ़ाई पूरी कर सकूंगा !! .... अच्छा तो तुमने कोई हल तो ढूँढा होगा इस समस्या का ...? मैंने पुछा ! वो बोला हाँ साब ...अगर मुझे कहीं स 2500 रूपये मिल जाएँ तो मैं एक मुश्त फीस भर कर अपनी पढ़ाई जारी रखूंगा और धीरे धीरे पैसे भी चुकता कर दूंगा काम करके ...लेकिन कोई देता नहीं ना ...सब जान पहचान की बात करते हैं की कोई गारंटी दे दे ...जब की मैं इसी शहर का हूँ ...सब मुझे जानते हैं ....मेरे पिताजी और माता जी जब तक सुनामी में नहीं गुजरे थे सब मुझे पहचानते थे अब मेरे पास कुछ नहीं ...तो ये लोग भी नहीं पहचानते ....!!  अच्छा तो तुम इस लिए परेशान हो मैंने मुरुगन की टीशर्ट का कालर ठीक करते हुए कहा ? चलो मूंगफली खाते हैं ....!!  दक्षिण भारत में मूंगफलियाँ सडक पर मिलती हैं ! हा हा हा ....भाई ये तो कोई बाद ना हुई ...मूंगफलियाँ उत्तर भारत के शहरों में भी सड़कों पर मिलती हैं और लोग तो इसको " गरीबों का मेवा " कहते हैं !! खैर दक्षिण में मूंगफलियों को पानी में उबाल कर सडकों पर बेचा जाता है ....मैंने और मुरुगन ने कुछ मूंगफलियाँ खरीदीं और समुद्र की तरफ मुह कर के दीवार पर बैठ गए !!
                 अब मुरुगन के चहरे पर मुस्कान थे ....उमीदों भरी ...पर मैं अब उलझन में था !! मुझे नहीं याद की मैंने उस की क्या मदद करी थी किन्तु इस बात को सोच कर उलझ गया था की .... क्या विचित्र सी बात है की स्वयं के  शहर में व्यक्ति परिचय ढूँढने को बाध्य हो जाता है और अपरिचित शहर में कैसे परिचित होने की सम्भावनाये जन्म लेती हैं !! मुरुगन मुझे मिलता है विभिन्न रूपों में आज भी सपनों में और यदाकदा उन्ही गलियों में मिटटी के दिए बेचते हुए , सुगन्धित अगरबत्ती बेचते हुए , सुन्दर से मुरझा जाने वाली मालाएं बेचते हुए ...अपने ही लोगो के बीच अपरिचित सा ...बस उसी समय जब वो स्वयं के बारे में सोचता है ....अन्यथा सब के समीप है ...सबका अपना है वो , चाय की मीठास रूंधे हुए गले के कसैलेपन को कम नहीं कर सकती !!
                हमें , स्वयं सरीखे कुछ बुत बनाने चाहियें और उनमे खुद को तलाशना चाहिए ...तब जब आपको परिचय की दरकार ना हो ....ताकि जब आप अजनबियों के बीच हों तो कम से कम स्वयं को तो स्वयं का परिचय ना देना पड़े !!  मुरुगन आज बारहवीं कर चुका है , स्वयं को स्थापित कर रहा है और मुरुगनो से परिचित होने के लिए !!!  ये तो सफ़र है , चलता ही रहेगा कभी आपसे मुआकात हो तो कृपया पहचान लीजियेगा , बिना परिचय दिए श्रीमान !! 

Friday, October 12, 2012

...... कम्पित , पत्ते पीपल से !!

मेरा मन ,तुम्हारा मन,


उमीदें , सपने कल के !

नयनों में ही पलते, या

अश्रु होते , अविरल से !!


स्थिरता स्वाति बूंदों की,

परिवर्तन की आस लिए,

भावावेश की आंधी में ,

कम्पित , पत्ते पीपल से !!



Sunday, October 7, 2012

...रेडियो पर कहानियों का सुनना अच्छा अनुभव है, सुन कर देखिएगा, अच्छा लगता है !!

                आज बहुत दिनों के बाद एक कहानी सुनी ...जी हाँ ठीक पढ़ा अपने " सुनी " पढ़ी नहीं !! 

               अब देखिये ना आजकल के इन्टरनेट के ज़माने में हम सब कुछ पढ़ लेते हैं ...सब कुछ , कुछ भी नहीं छूटता ; कोई पर्दा नहीं हाँ वोही पर्दा टाट का ,जो कभी इंटर में पढ़ी एक मिर्जा साहब के दरवाजे पर पड़ा होता था ...सब इज्ज़त को घर की चौखट के भीतर समेटे हुए .... और वो भी पर्दा जिसके होने पर सब है जिसके ना होने का ग़म उस से पूछिए जिसके पास अदद चौखट भी नसीब नहीं , और वो पर्दा भी जो कभी कभी कुछ लोगो की अक्ल पर पड़ जाता है तो मुश्किल होती है पर्देवालों के लिए !!
               खैर ,हम कहानी के सुननाने और सुनने की चर्चा कर रहे थे ...आइये उसी विषय पर ही सफ़र करते हैं ...कहाँ परदे वालों के बीच फंस  गए ....हमारे आप के बीच क्या पर्दा , सब अपना और जाना पहचाना है !!
             मेरे घर का टेलिविज़न अचानक ख़राब हो गया है ! हम अक्सर घर में शाम की चाय के  साथ में और मेरी प्यारी सी पत्नी " रीना " टेलिविज़न पर हो रही किसी देश से जुड़े दिन के ज्वलंत मुद्दे पर चर्चा को देखते हुए पीते हैं !! आजकल मेरी अर्धांगिनी ओने मायके में हैं ....तो शाम की चाय कुछ फीकी लगती है और उसका फीकापन कुछ तब से और बढ़ गया है जब से वो कुछ दिनों के लिए अपने मायके में है ...जबतक वो वापस आये उसकी यादों के सहारे ही चाय पीता था की टी वी भी खराब हो गया !! फिर एक सहारा मिला ...इन्टरनेट का ...फेसबुक का , ब्लॉग का , जीमेल का , याहू का , ऑनलाइन अखबारों का ....ये सब आँख गडा कर देखना होता है !! कब तक एक टक 14 इंच के लेपटोप पर मन बहलाते रहेंगे ....अब टी वी की बात कुछ और है ....वहां तो द्रश्य बदलते रहते हैं ...और यहाँ खुद तय करना होता की क्या देखना है !! कुछ  देर में मन ऊब गया ! फिर ध्यान गया अपने घर के कोने में रखे एक ऍफ़ एम् , रेडिओ , सी दी , केसेट प्लेअर पर ....रीना जब अक्सर घर में उसी को चला कर पुराने , नए गानों को सुनते हुए अपना घर का सब काम निबटती है .... उसे साफ़ सफाई खूब पसंद है और में उसके उलट ... ! सोफे के कपडे को करीने से सजा कर जाती है और में उस पर बैठ कर उसको बेतरतीब कर देता  हूँ ....! वो फिर ठीक करती है !
                     आज मैंने भी उस ऍफ़ एम् रेडियो की ओर अपना  बढाया और उस पर रखे कपडे हो हटा कर चला दिया ....थोडा वक़्त लगा किसी चेनल को  सर्च करने में ...फिर एक गाना सुनाई दिया ..." आ चल के तुझे , मैं ले के चलूँ इक इसे गगन के तले  " ये तो बस मेरे मन की बात हो गयी ...मुझे कुछ अच्छा सा सुंनं था और ये गाना सुनाई दिया जैसे मुझे सही में उस दिशा की ओर ले जा रहा था जहाँ की सब सूनापन और खालीपन काफूर हो जाये ! दर असल ये एक कहानी का हिस्स्सा था जो उस चेनल पर सिलसिलेवार सुने जा रही थी .... !!
                 याद शहर के नाम से एक शहर काल्पनिक जगह के इर्दगिर्द उद्घोषक रोज़ एक कहानी सुनाता है और उसको सिलसिलेवार क्रमशः रखने के लिए हर विराम पर उस विराम की भावनाओं से जुड़ता हुआ कोई गाना सुनाता है ....वो ही था ....!!
            अब तो घर पर नया टी वी भी आ गया है किन्तु मैं अब भी उस दिन के बाद से कोशिश करता हूँ की 9 बजे से 10 बजे के बीच उस चेनल को सुनु और कहानी सुनु ....नानी और दादी से तो स्वयं कोई कहानी सुनी नहीं ....हाँ ये सुना है की नानी और दादियाँ कहियां सुनती हैं .... !! अब तक जो भी कहानी सुनी सब उत्तम हैं !! हर कहानी के साथ हम जुड़ते चले जाते हैं ...और कभी कभी तो उद्घोषक के स्वर के उतार चढ़ाव, बोली में मिठास से एसा लगता है की सब कुछ अपने ही साथ गुजरा बीता हो ...अपने ही जीवन की बात हो ....अब देखिये ना सबसे पहली कहानी जो सुनी उसका नाम थे ...." भगत जी " ....एक ऐसे इंसान की कहानी जिसके जीवन में शादी के 30 सालों के बाद भी औलाद का सुख नहीं था ....बाढ़ में सब ख़तम हो गया था ...गाँव के ही प्राथमिक स्कूल में संस्कृत पढ़ाते थे , और शाम को घर के पास के मंदिर में देवी देवताओं की सेवा करते थे ...रिश्ते नातेदार थे तो 30  सालों से कोई  आया नहीं उनकी सुध लेने ...वो सब गाँव के घरों में जा जा कर उनके काम में बिना मांगे मदद करते थे ...और दिन बिता लेते थे ..जब एक दिन उनको पता चला की उनके भतीजे की शादी उनके ही गाँव के एक बड़े सेठ के घर तय हुई तो ये सोच कर शायद उनको बुलावा आएगा उन्होंने उधार ले कर नए कपडे , चाही के लिए साडी और जुटे खरीद ली ...पर कोई बुलावा नहीं आया ....मन मार कर घर में बैठे थे की उनको एक तरकीब सूझी ....उठे बाज़ार गए कुछ मिठाई लाये और अपनी पतनी संग मिठाई खाते हुए बोले ...पतनी जी ..कोई बुलाये ना बुलाये हम अपने घर पर तो अपने भतीजे की शादी की ख़ुशी मना  ही सकते हैं ....! सही है ...दुखी और खुश होना अपने ही हाथ में हैं !! गरीबी रिश्तो की मजबूती और अमीरी उनके ढीलेपन को परखती है !!
               दूसरी कहानी थी एक इसी लड़की की जिसने अपने परिवार के खिलाफ प्रेम विवाह किया था ....जिसको 10 साल हो गए थे ...मायके की याद आती थी ...अब उसकी बेटी भी   ननिहाल क्या होता है  पूछती थी और वो निरुत्तर हो कर रह जाती थी ! एक दिन एक पोस्ट कार्ड आया ..उसके नाम उसकी माँ का ...लिखा था ...तुझे कभी हमारी याद नहीं आती ....एक बार मिलने की कोशिश तो की होती !! ...कल तेरे पिताजी शहर आ रहे हैं !! बस इतना पढना था की वो सोचने लगी की क्या करून घर को कैसे ठीक करून की पिताजी को अच्छा लगे ...घर के खर्चे की लिए बचे 
पैसों में सिर्फ 300 रूपये बचे और बेटी के जुटे लेने थे और 5 दिन बाकी थे ....इस  उधेड़बुन में थे की शाम हुई और पिताजी नहीं आये ...बेटी का जो मन उसने मारा था उसको जुटे नहीं दिला कर ..
उसको जुटे दिलानी चल पड़ी ..क्यों की उसके पिता ने अपने परिवार को चुना था और उसको भुला दिया था ...तो आज की घटना की बाद उसने भी ठान लिए की मैं भी अपने परिवार पर ध्यान दूंगी ...ये ही मेरा परिवार है !!

           बस इस तरह से और भी दिल को छु लेनें वाली ना जाने कितनी कहानियां , जिसमे अपने  जीवन की सब झलक दिखाई देती हैं ... नेट पर काम करते हुए ये कहानी सुनता रहता हूँ ...साथ साथ में चलते गानों को भी सुनते रहता हूँ !   आजकल कहाँ समय है किसी के पास किसी की बात सुनने का ...पर जब बात कुछ ऐसी हो जो अपनी ही हो और अपने ही तरफ से कही जा रही हो तो ...ज़रूर सुनने की इक्षा होती है ...आनंद तब और बढ़ जाता है जब आप डूब जाते हैं ...शब्दों और भाव में ...
जिसका पता तब चलता है जब किसी कह जा रही बात से आप के मन के भाव आपके नयन के प्याले भर देते हैं किन्तु उनको छलकने नहीं दते ...और गला भर आता है ...और आपके  से मुह से कुछ नहीं निकलता !! स्वयं से जुड़ना कठिन है किन्तु नामुमकिन नहीं ... सहारा कहानी सुनने का लिया जा सकता है !! आगे की कहानियां अपनी पत्नी के साथ सुनूंगा जल्दी ही !!

       रेडियो  पर कहानियों का सुनना अच्छा अनुभव है ,  सुन कर देखिएगा ...अच्छा लगता है !!  

Thursday, October 4, 2012

...... और जंतर-मंतर मर गया !!

                              ....मित्रों मैं जिस रास्ते से अपने दफ्तर जाता और आता हूँ आज भी उस पर कुछ खेत मिलते हैं ... जिनमे मौसमों के आधार पर कुछ न कुछ फसल लगी रहती है .....आज कल धान लगी है , सुर्ख हरे रंगों की घान की ऊपर की और उठती एक एक पौध और उसमे अंगडाई लेती हलके पीले रंगों की बालियाँ ....जी हैं अभी बाद बनना ही शुरू हुआ है ...शाम के लगभग पौने सात बजे में उन खेतों के बीच से हो कर गुजरती हुई सड़क से गुजरता हूँ ...बस सुगन्धित बालियों से निकली हुई खुशबू मेरी नासिका को इस कदर अपनी और आकर्षित कर लेती है की बस कभी कभी तो रुक कर उस का आनंद लेता हूँ ! मुझे मालूम है की खुच महीनो के बाद से सब ख़तम हो जायेगा , बालियाँ पाक जाएंगी और खेत सूने हो जाएँगे ,,,,तेज़ लू चलेगी और सुखी धुल उड़ेगी , लेकिनं ये भी आशा है की फिर से इसमें धान लगे जाएगी इस लिए आज के होने और कल न होकर फिर से होने के मध्य का काल इतना दुःख नहीं देता जितना आज एक खबर ने दिया !!

            आइये उस खबर पर चर्चा करते हैं !! वैसे तो अखबार के माध्यम से किसी खबर पर चर्चा करना कितना उचित और न्यायसंगत है ये आपने कुछ दिनों पूर्व एक प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक प्रगतिशील संगठन के मध्य होते विवाद को देख और सुन लिया ही होगा !! फिर भी हम ये हिम्मत करेंगे की उस खबर के आधार पर चर्चा करैं और दुःख प्रकट करैं जो हमने आज पढ़ी , और साथ में जा कर उस खबर का सच भी जाना ...जो अक्षर अक्षर सच निकला ....!!
           एक अखबार में पढ़ा की दिल्ली के जंतर मंतर को वो दर्जा देने से मना कर दिया गया है जिसका वो हक़दार है !! अन्तराष्ट्रीय धरोहर का !! क्यों की उस अन्तराष्ट्रीय संस्था ने पाया की जिस विशेषता के लिए जंतर मंतर जान और पहचाना जाता है ....मौके पर उसको वैसा नहीं पाया जा सका , अतः अन्तराष्ट्रीय धरोहर नहीं कहा जा सकता !!  एक बात साफ़ कर दें की जंतर मंतर में स्वयं एसा कुछ नहीं हुआ की उसकी पहचान कम हो गयी है .... उस को जबरदस्ती ...धीरे धीरे मारा गया !! आज जंतर मंतर उस फूल की तरह हो गया है जो खिला हुआ है ...जिसमे चटक रंग भी है ...जिसमे मकरंद भी है ...परागकण भी हैं ....किन्तु उसको एक शीशे के घर में क़ैद कर दिया है जिस पर कभी तितलियाँ नहीं बैठ सकती , जिस पर कभी परागकण ले कर मधुमखियाँ अपनी मिठास की गगरी में उसका योगदान नहीं ले सकती !!
           हुआ क्या ? जैसा की हम सब जानते हैं की जंतर मंतर एक यन्त्र है जो की सूरज की किरणों के आधार पर करता है ...और गड्नाओं के आधार पर समय का पता लगाया जाता है ! भारतीय और अन्तराष्ट्रीय दोनों !! सतरहवी शताब्दी में इस का निर्माण करवाया गया था जब घड़ियाँ नहीं थी !! सूरज की किरणों के आधार पर सटीक समय की गद्नाये की जाती थी !! आज इस के यंत्रों के ऊपर सूरज की किरणे ही नहीं पहुच पाती ....चारो और ऊँची ऊँची इमारतें कड़ी हो गयी है ....जिसके करने जंतर मंतर में प्राण तो हैं किन्तु वो स्वयं संवादहीन हो गया है !!
           बचपन से सुनते आ रहे हैं ...दिल्ली में एक जंतर मंतर है ! कई बार वहां गए भी ! आनंद लिया ...उस इमारत का जिसको कितने मन से बनवाया गया है !! आज उसका गला घोट दिया गया ! कितने ही आन्दोलनों की जन्स्थाली आज स्वयं निर्जीव सी हो कर पड़ी है !! कितने ही आन्दोलनों को जीवित रखने वाला जंतर मंतर आज स्वयं मरित्श्य्या पर है !! कितने की आन्दोलनकारियों की आवाज बन्ने वाला जंतर मंतर स्वयं अपने लिए एक आवाज खोज रहा है !! 1982 के एशियाड खेलों का शुभंकर रह चूका ये ...आज अपने अशुभ समय को कोस रहा है !! आज भी कितने आन्दोलन हो रहे हैं इसकी दीवारों के इर्दगिर्द ! कितने लोगो का घर बन चुकी इस की दीवारें अपने लिए एक अदद सहर ढूंढ रही है जो इसकी आवाज़ बन कर कुछ कहे सरकार से की कुछ करिए ...मैं ही था जब समय घड़ियों में बही था ...! एसा लगता है सच में समय आगे निकल गया है ...तेज़ रफ़्तार से चली ज़िन्दगी में कहीं पीछे छूट गया है ...हमारा जंतर मंतर ....लिकिन है तो !! नै पीढ़ी जिसको इसके मायने नहीं पता ...क्या सोचेंगे इस ईमारत के बारे में ....क्या बनाया था लोगो ने टेढ़ा मेधा ...दीवंरें पूरी भी नहीं बनवाइय ....!! उनको कुछ दिशा देने वाले दिशानिर्देश क्या उम्मीद तब तक वहां रहेंगे भी की नहीं !!!!

               विदेशों में सुनते हैं की पूरी की पूरी इमारत को एक स्थान से दुसरे स्थान पर विस्थापित कर दिया जाता है !! हमरे नेता और नौकरशाह तो पूरी दुनिया में घुमते हैं ....शायद किसी को ये तरकीब सूझे जंतर मंतर के बाबत , ऐसी हैं उम्मीद करते है !!  दिल्ली के जंतर मंतर सरीखा के और जंतर मंतर है ...जयपुर में ....मैंने देखा है ...हवामहल से साफ़ साफ़ दिखाई देता है ! जी हैं अभी उसके चारो और सब साफ़ है ! ऊँची दीवारें नहीं बनी !! किसने कहा की इमारतें ऊँची हों तो ही तरक्की होती है !! एक बड़े देश की सबसे ऊँची इमारतो को गिरते देखा है हमने ,  दुनिया का सबसे विक्सित देश है ...फिर भी इमारतें गिर गयी !! धरोहर सम्हालानी चाहिए !! हमें कुछ तो मिला है पूर्वजों से , कुछ नया अपनी आने वाली पीढ़ी को दे नहीं सकते तो पाया हुआ ही संभाल कर हस्तांतरित कर दिया जाये !! 
                  अपनी विशेष पहचान और मनमोहक कलाकृति के कारण हमेशा याद किया जाता रहेगा ...किन्तु आज भी उसमे वो सब है जिसके लिए वो जाना जाता है ...बस उस तक सूरज की किरणों के  आने का इन्तेजाम करना होगा , वैसे ही जैसे हम अपने घरों में आगंतुक के लिए द्वार खोल देते हैं ....और अपनी निगाहें  द्वार पर लगा कर टकटकी कगाये उसके आने का इंतज़ार करते हैं ....आज जंतर मंतर उसी इंतज़ार में हैं ....
और सूरज की किरणे उस से दूर हो चली हैं ...बहुत दूर व्यापारिक संस्थाओं की इमारतों के पीछे ...जहाँ व्यापार
आ जाता है वहां अपनापन ...........मर ही जाता है ........ और जंतर - मंतर मर गया !!
                                                                                                                 आपका अपना - मनीष

आपकी सुविधा के लिए उस अखबार का लिंक दे रहा हूँ ....  



Saturday, September 22, 2012

..... चिंताएं सर्वदा ही परिष्कृत होती रहती है !

             याद कीजिये अपनी क्लास 2 की उस हाफ पैंट को जिसपर की कोई भी क्रीज़ नहीं होती थी और बेल्ट स्कूल के ही बिल्ले के साथ इंतनी टाईट बंधी होती थी की सुबह सुबह के खाली पेट मे भी आधा पराठा ठीक से नहीं जा पता था और इतनी सलवटें की पैंट ...पैंट कम झोला ज्यादा लगती थी ....और हम उसी में खुश थे , चिंता थी तो बस इस्कूल में प्रार्थना के शुरू होने से पहले पहुच सकें ...वरना लेट आने वाले बच्चों की लाइन में लगना पड़ेगा ....और अगर एक बार भी एसा हुआ तो फिर पहले क्लास टीचर , फिर प्रिन्सिप्ल और अंत में पूरी क्लास में छुट्टी की घन्टी बजने तक पूरी कलास के दिन भर दिए जाने वाले ताने ....बाप रे बाप कितना जुल्म था उन दिनों ....!! ये ही चिंता थी बस लेनिन उन उन् दिनों !
           समय बीता अपने पास का ज्यमितिये बक्सा और उस में का सामान पूरा होने की चिंता ...एक दो चिली हुई पेन्सिल ज्यादा रख लेते थे ताकि पिरीअड में दिक्कत ना हो ! दसवीं से समय रात दिन की पढ़ाई ....और फिर इस्कूल के रस्ते में मिलने वाली कोई .....जिसको हमारे जन्नाने में हम खूब अछे लगते थे से भेंट ...बस निगाह भर .....! जूते मोज़े सजीले होते थे , अगर तै का चलन होता तो वो हमेशा सीधी होती / या होनी चाहिए ...! फिर परिणाम की चिंता और जल्दी से परिणाम आजाये तो फिर कुछ वोकेशनल कोर्स की तलाश ...अ फिर बारहवीं में एड्मिसन की चिंता ...क्या पता कम प्रतिशत में विज्ञान मिलेगा भी की नहीं ...भले हम विज्ञान केलायक ना हों किन्तु एक दोस्त ने वो विषये चुना हो तो हम भी वो ही लेंगे ....ना मिल्पाये तो कला से ही डिग्री पा लेंगे या सोच कर कम से कालेज में दाखिला तो मिले !! कुछ और बड़े हुए तो ...जूते छोटे होगये ...बदलने की चिंता किन्तु लकी होने के कारन उन्हें छोड़ने का मोह और नए कैसे होंगे की चिंता ....! गग्रेज़ुएत हो जाएँ तो बस कोई नौकरी मिल जाने की चिंता !! नुकरी मिली तो हम दिशाहीन !! क्या ये ही सही रहेगा अपने लिए ...की चिंता !! घर को खूब सजा देंगे ...के लिए कुछ नया खरीदें लिकिन हात में अपने पैसे न होने की चिंता ....कैसे कुछ ज़यादा कमाया जाए ...की चिंता !! चलिए अब जब नौकरी मिल जाये तो जहाँ हैं वहां से और ऊपर की और की तरक्की की चिंता , चलो तरक्कि भी हो गयी ...तो वंश की चिंता .... शादी ब्याह हो जाये उसका अपना आनंद जिम्मेदारिओं का और चिंता के स्तर का , उपलब्धियों का !

            मैं यहाँ एक विशेष समय को लेकर ज्यादा केन्द्रित हूँ की ये सही है की समय , आयु और संबंधों के साथ साथ आपकी चिंताएं बदलती और घटती और बढाती रहती हैं ....जिनको समझदारी से निभाया और पूरा किया जाता है ....फिर भी एक समय होता है आपके जीवन में जब आपको कोई चिंता नहीं होती और सब आपकी चिंता करते हैं ....पर उस समय को सब लोग नहीं जी पाते ....आइये उस पर बात करते हैं .....
        
          पिता जी , माँ सब ध्यान से आपके हर सामान को जुटाने में लगे होते हैं ...और आपके सामने आते ही आप किसी ना किसी बात पर उसमे नुक्स मिकल देते हैं ... रंग अच्छा नहीं है ड्रेस का , जूते इसे नहीं वैसे वाले चाहिए थे, कल टिफिन नहीं केक ले जाने का मन है ....आज दूध नहीं पियूँगा , सेब अच्छा नहीं लगता , घिया बाप रे ये किस चीज़ की सब्जी बना कर रख दी , दाल ओहो हो ..मुझे दाल नहीं खानी ..कढी में से खट्टी खट्टी बदबू आती है ....अनार इसके दाने आपने धोये क्यों नहीं ...? कल ही तो ये टी शर्ट पहनी थी आज दूसरी दो , आप ने मेरी चाकलेट तोड़ी क्यों ? मुझे साबुत खानी है ....! टेबल का लेम्प ज्यादा रौशनी देता है ...लो वोल्ट का बल्ब लगाइए तो पढूंगा !! पेंसिल छोटी हो गई है ....दूसरी दीजिये , रबर सफ़ेद होगी तो ही स्कूल जाऊंगा !! मेरे ग्लास से दीदी , भैया ने क्यों पानी पिया ....मुझे नया ला कर दो !! पहले टीवी पर कार्टून लगाओ तब डिन्नर खाऊंगा ! पहले बोलो की कल मुझे वहां ले चलोगे तो होमे वर्क करूँगा .....और अंत में आप घोडा बनो मुझ को घुमाओ नहीं तो में सोऊंगा नहीं .....और ना जाने क्या क्या ....!!
         जिन लोगो ने ये सब या इस से भी ज्यादा सुख और करीबियत का आनंद लिया है ...उनको बधाई ...! किन्तु सब लोग इस प्रकार के सुख लायक अपने को नहीं पाते .... जो है बस वो ही है ....विकल्प नहीं ....कोई !!
         चिंताएं सर्वदा ही परिष्कृत होती रहती है ...किन्तु अवय्श्क ये है की उनको जिया जाए उनके मूल स्वरुप में , निभाया जाये , संप्रेषित किया जाए उन तक जिनको आभास तक नहीं उनका ...किन्तु संवेदना के साथ , विनय के साथ , आभार के साथ ....समर्पण के साथ ....!!