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Wednesday, May 28, 2014

एक कहानी : वो गुलाबी पेन !!

            विशाखा अपने दफ़्तर में बैठी किसी का इंतज़ार कर रही थी ! उसकी निगाहें टिक - टिक करती पुरानी पेंडुलम वाली घड़ी पर टिकी थी ! खिड़कियों से आती जाती ठंडी हवांयें पास के मंदिर से लोहबान की खुशबू आपने साथ ले आती थीं ! सड़क पर शोर कुछ कम हो चला था ! पास के स्टेशन से आखिरी ट्रैन के अनाउंसमेंट हो चूका था ! पास के मोहल्ले में लगने वाली साप्ताहिक पैठ से अपनी दुकानदारी समेट कर व्यापारी वापसी  पर थे ! सब दीखता था विशाखा की पीछे वाली खिड़की से ! शाम रात में तब्दील होने को बैचैन थी की अचानक दरवाज़े पर तैनात सिपाही ने सेल्यूट करते हुए विशाखा का ध्यान अपनी तरफ खींचा !
 
जनाब, कोई आबिद आप से मिलना चाहते हैं !
 
विशाखा ने सम्भलते हुए कहा : हाँ , उन्हें अंदर भेजिए !
 
सिपाही ने फिर से सेल्यूट किया और गर्वीले अंदाज़ में घूम गया !
 
आओ आबिद आओ , कोई परशानी तो नहीं हुई आने में ! विशाखा ने २३ , २५ साल के युवक आबिद से ममता भरी आवाज़ में कहा ! अपनी सीट से उठ कर  लगभग दरवाज़े तक आ गयी थी वो आबिद को लेने के लिए  !
 
        आबिद , एक लम्बा अच्छी डिल डॉल वाला, नव युवक सुन्दर गोल चेहरा , नीली आँखे , काले रंग की टी शर्ट और डार्क ब्लू कलर की जींस में दरवाज़े की चोखट पर खड़ा झिझक रहा था रौबीली विशाखा के बड़े से दफ्तर में कदम रखने से ! वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थी वो जिले की ! ये पहली पोस्टिंग थी विशाखा की इस वरिष्ठ पद पर ! लगभग १५ सालों बाद मिल रहे थे दोनों एक दूसरे से !
 
आबिद ने विशाखा के पैर छुये और नमस्ते कहा !
 
डबडबाई आँखों से विशाखा ने आबिद को उठाते हुए उसका माथा चूमते हुए गले से लगा लिया !
 
विशाखा : आ , बैठ यहाँ !
 
         बड़े बड़े सोफों पर बैठने के इशारा करते हुए विशाखा ने आबिद का बैकपैक ले कर सिपाही से अपनी गाड़ी में रखने को दिया और थोड़ी देर में निकलते हैं कह कर तैयारी करने को कहा !
 
सिपाही ने जी जनाब कहते हुए लॉगबुक आगे कर दी !
 
विशाखा : आबिद वो पेन पकड़ाना !
 
आबिद ने अपनी जेब से एक पेन निकाल के विशाखा की तरफ बढ़ा दिया और विशाखा ने लॉगबुक पर सिग्नेचर कर के पेन आबिद की तरफ़ वापस बढ़ाया ,
 
तभी आबिद ने पुछा :
 
दी , आपको ये पेन याद है ?
 
विशाखा को जैसे किसी ने बर्फ के टुकड़े से छू दिया हो , ये प्रश्न ऐसा था उसके लिए !
 
आबिद : दीदी ,आपको ये पेन याद है ?

विशाखा : हाँ रे , इसी पेन से हो हमारी दोस्ती हुई थी ! वाह , तूने ये अभी तक संभाल कर रखा है !!
 
आबिद : दीदी ये मेरी बांह पर लगे ठीके  का दाग़ और ये पेन ताउम्र मेरे साथ रहेंगे !
 
विशाखा : पेन तो ये पकड़ और बता खा खाएगा , रस्ते से लेते चलेंगे घर पर तो नार्मल खाना बन चूका होगा मैंने किसी से तेरे आने की बात नहीं कही है !
 
आबिद : दीदी, अगर आज वो ही गोबी की पकौड़ियाँ खाई जायें तो ? जो आपने वैभव भैया की शादी के दिन बारात के जाने के बाद बनाई थी ?
 
             विशाखा ने मुस्कुराते हुए घर पर नौकर को गोबी खरीद कर रखने को कहा और आबिद को ले कर चल दी अपने बड़े से सरकारी बंगले की तरफ ! आगे पीछे सिपाहियों की कतारें ,  हर काम के लिए एक सिपाही ! 
 
            विशाखा के लिए रोज़ दफ़्तर से घर जाना जैसे एक दूसरी डियूटी पर जाने जैसा था ! अकेले रात भर सरकारी बंगले में कभी लैपटॉप तो कभी टेलीविज़न तो कभी रेडिओ के साथ नींद आने तक कर सफर और फिर सुबह जल्दी से दफ्तर , घर पर रुके भी तो किसके लिए और घर वापस जल्दी आये तो लिए !
 
            लेकिन आज ऐसा नहीं था ! उसका छोटा भाई आबिद था उसके साथ ! दफ्तर से सरकारी गाड़ी तक पहुचने में जितने भी अधिकारी मिले सब से आबिद को मिलवाती चली विशाखा मेरा छोटा भाई है कह कर !
 
सब अधिकारिओं ने पहली बार अपनी साब के चहरे पर मुस्कान देखी थी , मातृत्व देखा था !
 
विशाखा ने रस्ते से कुछ कोक और स्वीट्स खरीदी ! बंगले के पास के मदर डेरी वाले को फ़ोन कर दिया की घर पर एक टूटी फ्रूटी आइसक्रीम की ब्रिक पंहुचा दे !
 
आबिद पूरे रस्ते विशाखा को देखता रहा ! उसके हाव भाव पढता रहा ! बीच बीच में आते अधिकारीयों के फ़ोन काल पर वो कैसे बात करती थी , जवाब देती थी सुनता रहा और याद करता रहा १२ , १५  साल पहले का वो दिन जब पहली बार वो विशाखा से मिला था !

अरे आप कहाँ चली गयी थी फातिमा बी , इतना सारा काम पड़ा है ! विशाखा की चाची ने आबिद की अम्मी को ज़ोर दे कर बोला !

फ़ातिमा बी : जी , आबिद के स्कूल की  छुट्टी का वक़्त था तो बस उसको लेने थी !

चाची : ठीक है , अब आगया ना ! अब काम देख लीजिये !

फातिमा बी : जी अच्छा कहते हुए ८ , ९ साल के हाफ़ नेकर में खड़े आबिद से बहार बरामदे में जा कर बैठने को कहा !

आबिद : अम्मी , प्यास लगी है !

फातिमा बी : अच्छा तुम वहां चलो  पानी लाती हूँ !

          आबिद बाहर बरामदे में  किनारे बैठ गया और देखने लगा कही फूल तो कहीं लाईट लगाते कारीगरों को ! कभी कोई आता तो कभी कोई ! सब्ज़ियों के ठेले , तो कभी राशन वाले के रिक्शे ! कभी दूध के बर्तन तो कभी मिठाइयों से भरी टोकरियाँ ! कभी उसके आस पास से खेलते हुए गुज़ारे शादी में शामिल होने आये रिश्तेदारों के बच्चे तो कभी वैभव भैया के दोस्तों के  सिलसिला ! एक दो बार कुछ लोगो ने आबिद से घर से किसी को बुलाने को कहा और आबिद बड़े अपनत्व से भीतर जा कर जो भी पहला शख्स मिला उसे बुला लाया ! मानो जैसे उस बड़े घर में उसके होने की भी सब को फ़िक्र है ! कभी चाचा जी ने किसी मेहमान के आने पर आबिद से ही कह डाला जाओ अंदर जा कर चाय नाश्ते का देखो !

        इस सब में शायद अम्मी पानी देना भूल गयी थी आबिद को, पर कोई था जिसे ख्याल था की आबिद स्कूल से सीधे शादी के घर में आया है और भूखा प्यासा है सब बरात की तैयारी में लगे थे तो सका ख्याल अम्मी को भी नहीं रहा !

किसी ने आबिद की तरफ एक पत्ते का दोना और गिलास में पानी आबिद की तरफ बढ़ाते हुए कहा , लो तब तक पानी पियो तुम्हारी अम्मी काम कर रही है !
 
आबिद : जी अच्छा !

            इस घर में पहले तो देखा नहीं था आबिद ने इनको !  शायद वैभव भैया की रिश्तेदार होंगी और शादी में आई है ! कितनी अच्छी है ! आबिद पानी पीते और मिठाई खाते सोचता जाता था की तभी चाची ने आवाज़ लगाईं !

कहाँ रह गई विशाखा ?

विशाखा आई चाची कहती हुई  अंदर चली गयी !

चाची : विशाखा बार बार मैं काम के लिए टोकूंगी नहीं , बड़ी हो सब बच्चो में कुछ तो ख्याल करो भाभी जी और भैया का ! शादी के घर में कई तरह के लोग आते हैं और तुमको इस लिए भी हॉस्टल से शादी में बुलाया है की शायद किसी की तुम पर नज़र पड़े और तुम्हारी शादी की बात बने ! तुम्हारे चाचा कब तक अपने बच्चो के साथ साथ तुम्हारा भी खर्च उठाते रहेंगे ! भैया भाभी कुछ छोड़ कर तो गए यही जो था वो सब उनके इलाज़ पर खर्च हो चूका है ! तुम समझ रही हो ना ?

 " विशाखा तो जैसे कोने में लगी तुलसी सी सुकुड गई थी ! कड़वे शब्दों और घूरती निगाहों के स्पर्श से मुरझने को थी वो की तभी आबिद भीतर आया और बोला  : दीदी वो डाकिया आया है ,कोई रजिस्टरी है ,कहता है बिना सिग्नेचर के नहीं देगा ! "

चाची : अच्छा अच्छा उसको रोको अभी आती हैं तेरी दीदी !

विशाखा ने मन ही मन आबिद और देखिए को शुक्रिया कहा , नहीं तो और कुछ से चाची बातों के ताने देती !

डाकिया : यहाँ सिग्नेचर करिये !

विशाखा : जी पेन दीजिये !

डाकिया : बिटिया , आज पेन मेरा रास्ते में गिर गया !

विशाखा : ओह्ह , ठीक है रुकिए मैं लाती हूँ अंदर से !

आबिद : दीदी ये लीजिये पेन , चलता गुलाबी है मुझे पिछले हफ्ते ही क्लास टीचर ने दिया था , पूरी अटेंडेंस होने पर  !

विशाखा ने रजिस्ट्री ले ली और गुलाबी पेन को लिए लिए भीतर चली गयी !
 
आबिद बाहर बैठा बैठा इंतज़ार करता रहा ! अपनी अम्मी और विशाखा का भी !
 
       पूरी गली में रौशनी , बैंड बाजा, शहनाई का तरन्नुम , केवड़े और गुलाबजल की खुशबु , सजे धजे मेहमान ! चारो तरफ़ खुशियों और उल्लहास  माहौल ! वैभब भैया की बारात चलने को थी !
 
चाचा : अरे , विशाखा तुम नहीं चलोगी ?
 
अभी विशाखा कुछ बोलती चाची बीच में बोल उठी , सब शादी में चले जायंगे तो  घर पर कौन रहेगा !
 
चाचा : अच्छा ठीक है , विशाखा तुम यही रुको , फातिमा बी से भी बोल देता हूँ रात में इधर ही रुकने को !
 
विशाखा : जी चाचा जी आज देर शाम मेरे आई पी एस का रिजल्ट आने को है रिटन का मैंने आपका ही नंबर दिया है अपने दोस्त को , हो सका तो वो आपको फ़ोन करेगा लखनऊ से !
 
चाची : अरे इतने शोर में कहाँ फ़ोन सुनाई देगा ,कल सुबह शादी के बाद देख लेंगे !
 
मायूस हो गया विशाखा का चेहरा और पास खड़े आबिद को भी कुछ ठीक नहीं लगा ये सब !
 
             बारात जा चुकी थी ! घर में दिन भर के शोर ने ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली थी ! बड़े से घर के दरवाज़े खिड़की बंद कर के विशाखा अकेली बैठी थे ड्राइंग रूम में ! तभी नीचे से फातिमा बी ने आवाज़ लगाईं :
 
विशाखा दरवाज़ा खोलो , आबिद को तब तक रखो अपने साथ में घर पर खाना बना कर बुला लूंगी उसको !
 
विशाखा : चाची ( फातिमा बी को भी चाची पुकारा उसने ) , आप यही रहिये और यहाँ जो खाना बना है वो ही बहुत है हम सब के लिए !
 
        आबिद को अचानक जैसे किसी ने झकझोर दिया था ! उसकी माँ को किसी ने चाची कह कर पुकारा था ! वो भी विशाखा ने जो अब तक के मिले सब लोगो में सब से अच्छी लगी थी उसको !
 
मौसम खराब हो चला था ! तेज़ बारिश , बिजली का चमकना और फिर तेज़ हवायें ! ठंडक बढ़ गयी थी !
 
चाय पियेंगी चाची : विशाखा ने फातिमा बी से पुछा और आबिद से बोली तुम खाना खा लो ,  फिर सो जाना !
 
आबिद : क्या है , खाने में दीदी ?
 
कढ़ी और चावल ,पर पकौड़ियाँ खत्म हो गयी हैं !
 
आबिद : तो क्या हुआ , लाइये दीजिये बगैर पकौड़ियों के खा लूँगा !
 
     अजीब से संतोष की खुशबू  थी आबिद के इस कथन में जैसे भरी दोपहर में तेज़ लू के बीच अचानक चन्दन की खुशबू फ़ैल गयी हो !
 
अच्छा रुको आबिद कुछ देर ! विशाखा ने एक तरफ चाय और एक तरफ गोभी की पकौड़ियाँ बनाई !
 
आबिद खाने के बाद विशाखा की गोद में ही सो गया और फातिमा बी के  कहने के बावजूद उसने उसे अपने से अलग नहीं किया !
 
    पड़ोस के घर में लैंड लाइन कब से बज रहा था ! सब तो शादी में गए थे बस एक २० , २३ साल का लड़का विपुल  था जो कभी कभी विशाखा को छत से देखा करता था !
 
विपुल : अरे ,विशाखा है कोई वैभव भैया के घर में !

फ़ोन वाले घर से उस लड़के ने आवाज़ लगाईं !
 
विशाखा ने आबिद के सर को धीरे से सोफे के कुशन पर संभाल कर सरकाया और भाग कर गयी बरामदे में !
 
हाँ बोलो ?
 
विपुल : तुम विशाखा हो ?
 
हाँ ? क्यों क्या हुआ ?
 
विपुल : तुम्हारे चाचा जी का  फोन था , तुम्हारा रिज़ल्ट आ गया है और तुम ने क्लियर कर लिया है !
 
उछल पड़ी इतना सुन कर ! छलांग लगाने को तैयार इतना उत्त्साह !
 
विपुल : अरे , सम्भलना और पहले अंदर जाओ , मैं आता हूँ वहां थोड़ी देर में !
 
विशाखा बिना चुन्नी के चली आई थी बरामदे में , विपुल के अंदर जाओ कहने के बाद समझी और नज़रें झुका कर अंदर चली गयी !
 
विपुल दरवाज़े पर था छतरी लिए , फातिमा बी ने अंदर आने को कहा उसको !
 
विपुल : किस चीज़ का एग्जाम क्लियर किया तुमने ?
 
आय पी एस का रिटन ! विशाखा बोली !
 
वाओ , ये बड़ी अच्छी बात है ! लाओ मिठाई खिलाओ !
 
विशाखा ने लो कहते हुए परवल की घर में बनी मिठाई आगे बढ़ा दी !
 
अपना लैंड लाइन नंबर दे दो प्लीज़ , कभी  चाचा जी से बात करने को मन किया तो कॉल कर लूंगी !
 
विपुल  : हाँ हाँ , लाओ पेपर और पेन दो !
 
विशाखा ने वो आबिद का गुलाबी पेन आगे बढ़ा दिया ! विपुल ने नंबर लिखा और पेन अपनी जेब में रख लिया , शायद जान बूझ कर किया था उसने !
 
आबिद अब जाग गया था ! सब सुन और देख रहा था !
 
      बारिश थमी तो विपुल अपने घर लौट गया ! अगले दिन बारात वापस आई ! विशाखा अपने हॉस्टल  फिर वहां से ट्रेनिंग पर गयी ! सब का व्यवहार बदला बदला था ! कुछ दिनों में पोस्टिंग और पोस्टिंग के साथ वो आज सीनियर पोस्टिंग पर थी !

ड्राइवर ने लंबा हॉर्न दिया , गाड़ी बंगले के सामने कड़ी थी !
 
ओ भाई कहाँ खोये हो ? घर आ गया ! सरकारी गाड़ी में पुरानी यादों में खोये आबिद को विशाखा ने पुकारा !
 
आबिद का यादों का झूला अचानक थम गया था !
 
आओ आबिद ये है तुम्हारी दीदी का घर ! विशाखा ने गर्मजोशी से आबिद का स्वागत किया !
 
    डिनर के बाद आइसक्रीम खाते हुए आबिद ने विशाखा से पुछा : दीदी आप इतने साल मुझ से मिली क्यों नहीं ? आपने  मेरी हर ज़रुरत का ख्याल रखा फिर भी आप मुझ आज मिली जब मैं कुछ बन गया और नौकरी शुरू करने वाला हूँ , क्यों ? मुझे भी खुद से मिलने नहीं दिया , क्यों ? हर बार प्रिंसिपल से कह कर मुझे अपना पता देने से मना कर दिया !

अचानक डाइनिंग टेबल पर माहौल बदल गया था !

विशाखा ने खाना परोसने वाले सहायक को अंदर जाने को कहा !
 
विशाखा : क्या ये सब जानना ज़रूरी है आबिद  ? आज हम दोनों एक दूसरे के साथ हैं क्या ये ही कम है ?
 
आबिद : हाँ वो तो ठीक है पर क्या मुझे ये जानने का हक़ नहीं की मेरी परवरिश करने वाले ने क्यों मुझे खुद से अलग रखा इतने दिन ? आप बताइये और अभी बताइये !

आबिद ने अपनी चम्मच प्लेट में रखी पिघलती आइसक्रीम पर रख दी और आँखे नीची कर कर चुप हो गया !

           विशाखा जैसे ऐसे अधिकार को तरस रही थी ! कोई उस से ऐसा अधिकार जताता ! वो उठी और आबिद के करीब आ कर खड़ी हो गयी ! आबिद लिपट गया अमर लता सा विशाखा से ! अपने जीवन को सँवारने वाले से शिकवा करता हुआ ! विशाखा ने आबिद की आँखों टपकती लालसा देखी जो चाहती थी की उसे पता चले की माँ के बाद दूर रह कर भी कैसे कोई उसकी माँ का फ़र्ज़ निभा रहा था !

विशाखा ने आबिद के चहरे को दोनों हथेलियों से सँभालते हुए कहा : अच्छा चल , ये आइसक्रीम फिनिश कर फिर वाक पर चलते हैं , सब बताती हूँ !

विशाखा : वैभव भैया की शादी के बाद मैं ट्रेनिंग पर चली गयी ! बीच बीच में मैं विपुल  से बात करती रहती थी ! तुम्हारा हाल भी मिलता रहता था ! एक साल के बाद मेरी ट्रेनिंग खत्म हुई ! मुझे पहली  पोस्टिंग मिली ! मैंने ख़ुशी ख़ुशी विपुल  को  फ़ोन किया लैंड लाइन पर  तो मुबारकबाद के बाद उन्होंने बताया की फातिमा बी नहीं रही ! मुझे तुम्हारी चिंता हुई ! तब मैंने और विपुल ने तुम्हे अच्छे हॉस्टल में दाखिल करने का फैसला लिए ! हर महीने तुम्हारे स्कूल की फीस मैं भर्ती थी तो बाकि की चीज़ों का ख्याल विपुल करते थे ! दिन बीतते जा रहे थे , मैं और विपुल करीब आते जा रहे थे ! तुम्हारी पढ़ाई  ज़रूरतों का वो ही ख़याल करते थे ! मैं तो बस अपनी सैलेरी का एक हिस्सा तुम्हारे अकाउंट में ट्रांसफर करती थी जिसे वो ऑपरेट करते थे  तुम्हारे लिए !

सुनते सुनते आबिद ने ध्यान दिया की अचानक दीदी ने विपुल भैया को उन्हें , उनके कह कर सम्बोधित करना शुरू किया था !

विशाखा तो जैसे पानी से बही जा रही थी यादों की सुरंगों से ,जिसके एक किनारे पर आबिद था तो दूसरे किनारे पर विपुल !

विशाखा : एक रोज़ विपुल  ने मेरे सामने शादी का प्रोपोजल रखा ! अच्छा कारोबार था उनका ! अच्छा परिवार ! उनके परिवार ने मेरे चाचा जी से बात करी और शादी भी हो गयी ! कुछ दिन मैं रही भी अपने ससुराल फिर पोस्टिंग्स के कारण मुझे आना पड़ा ! व्यापार के कारन वो मेरे साथ नहीं आ सकते थे तो मैं नौकरी नहीं छोड़ना चाहती थी ! बस फिर धीरे धीरे हमारा मिलना कम हो गया और पिछले ३ सालों से बिलकुल संपर्क नहीं है !

आबिद बीच में बोला : लेकिन इतना सब के बाद भी मुझे और मेरी पढ़ाई पर आप दोनों ने कोई असर नहीं होने दिया !

विशाखा : हाँ वो ख्याल रखते है बहुत तुम्हारा !

आबिद विशाखा से लिपट गया और ज़ोर से पकड़ लिया अपनी दीदी को ,रूंधे गले भीगी आँखों से कहता हुआ आप दोनों एक साथ क्यों नहीं है ?

विशाखा के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था !

अगले दिन !

आबिद तुम आज रहोगे ना तुम्हारी जॉइनिंग तो कल से है ना ? विशाखा ने आबिद के कमरे के परदे सरकाते हुए पुछा !

आबिद : हाँ दी !

ठीक है , लो ऑरेंज जूस पियो और फिर अपने आप प्लान कर लो सब ,मैं गाड़ी और ड्राइवर छोड़े जा रही हूँ !

आबिद : जी दीदी ! ड्राइवर वही है ना जिसे आपने मुझे लाने के लिए हॉस्टल भेजा था !

विशाखा : हाँ , वो ही हैं ! पहचान हो गयी उनसे तुम्हारी ? गुड !

         शाम को विशाखा घर लौटी ! भीतर घुसते साथ लेवेंडर की खुशबू से सारा घर महक रहा था ! आबिद ने रजनीगंधा के गुच्छे से वेलकम किया अपनी दीदी का और कहा की आइये भीतर चलते है , विशाखा ने जैसे ही अगला कदम डाइनिंग रूम की तरफ बढ़ाया सामने टेबल के उस छोर पर विपुल को बैठा देखा फिर नज़रे आश्चर्य से आबिद की तरफ कर ली !

      डाइनिंग टेबल का माहौल बदल चूका था और पीछे दीवारों पर लगे वूफर्स पर मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ गूंज उठी "
                                           " ओ शहज़ादी सपनो की ,
                                                    इतनी तू हैरान ना हो !
                                                          मैं  भी  तेरा  सपना हूँ,
                                                              जान मुझे अनजान हो ! "
                                                                       जनम जनम का साथ है ,
                                                                               निभाने को ………   
                                                                                    सौ सौ बार मैंने जनम लिए !!

विपुल , विशाखा और आबिद याद कर रहे थे उस गुलाबी पेन को  जसे डाकिया ने माँगा था , जिससे लैंड लाइन नंबर लिखा था ................... उस बारिश की रात गोबी की पकौड़ियों की महक  के साथ

                                                                 ~~~~  समाप्त ~~~~

एक कहानी : वो गुलाबी पेन !

                                                                      ::: मनीष सिंह :::

Thursday, May 22, 2014

एक कहानी : चिरुनी ( कंघी ) !!

सिस्टर निरुपमा ने धीरे से दरवाज़े को भीतर की तरफ धकेलते हुए पुछा : उज्जवल बाबू आज कैसा महसूस कर रहे हैं आप ?
 
प्रतिउत्तर में में उज्जलव बाबू कुछ नहीं बोले !
 
सफ़ेद और हलके आसमानी रंग की अस्पताल के ड्रेस में कोई 80  - 85 बरस  बुजुर्ग हो चुके उज्जवल घोष एक टक टप - टप टपकती सलाइन की बोतल की बूंदों के देख रहे थे ! 
 
सिस्टर निरुपमा ने अपने साथ आई एक नयी ट्रेनी सिस्टर का परिचय करवाते हुए बेड पर BP नापने की मशीन रखी और बोली : ये अरुणिमा है , आज से ये आपका ख्याल करगी !  
 
उज्जवल बाबू ने मुस्कुराते हुए अरुणिमा के तरफ देखा तभी उनकी पलकों से दो बूँदें ढलक गयीं !

अरुणिमा अपनी सीनियर के रहते हुए भी खुद को रोक न सकी और उनके आंसुओं को कोमल गुलाबी अंगुलियों से पोछते हुए बोली !
 
क्या हुआ बाबा ? कुछ तकलीफ हो रही है ?
 
उज्जवल बाबू ने हामी में सर हिलाया !
 
सिस्टर निरुपमा : क्या हुआ ?
 
उज्जवल बाबू : आज सर में काफी दर्द है सिस्टर !
 
सिस्टर निरुपमा ने कोई टैबलेट लिखी पेपर पर और अरुणिमा को डाक्टर की विजिट के बाद खिला देना को कहा फिर अगले वार्ड में चली गयी !
 
अब उस वार्ड में उज्जवल बाबू और अरुणिमा रह गए थे !
 
अरुणिमा : बाबा, मैं ये टेबलेट ले कर आती हूँ !
 
उज्जवल बाबू : ठीक है बेटा !
 
और अरुणिमा बाहर चली गयी !
 
कैसे हैं उज्जवल बाबू : सीनियर डॉक्टर के साथ दो और जूनियर डॉक्टरों तपन और बियोज  ने वार्ड में आते हुए पुछा !
 
उज्जवल बाबू : ठीक हूँ सर , बस आज सर में कुछ दर्द है !

डाक्टर : हाँ, सिस्टर निरुपमा से बताया था , उन्होंने कोई टेबलेट लिखी है ! दिखाइये क्या लिखा है !
 
उज्जवल बाबू : वो तो एक नयी सिस्टर अरुणिमा लेन गयी हैं !
 
डॉक्टर : खुद लेने गयी हैं ? क्यों ,वो तो स्टोर का डिलीवरी बॉय पंहुचा जाता !
 
तभी अरुणिमा ने वार्ड के दरवाज़े पर दस्तक दी : में आय कम इन सर ?
 
सीनियर डॉक्टर : आइये , आप खुद क्यों गयी थीं ? आपको मालूम होना चाहिए की ये डॉक्टर्स के विजिट का वक़्त है और हर पेशेंट के साथ सिस्टर का साथ होना ज़रूरी है !

आप ड्यूटी आवर्स के बाद मुझ से मिल कर जाइयेगा और जो सिस्टर आपको  लीड कर रही हैं उनको बता दीजियेगा , हो सके तो उनको भी साथ में लाइए  !
 
अरुणिमा के चेहरे पर शांत भाव लेकिन आँखों में डर साफ़ घर कर गया था , आँख झुका कर धीरे से बोली : सॉरी सर !
 
वो टैबलेट दिखाइए : सीनियर डाक्टर ने कहा !
 
अरुणिमा ने छोटा सा काग़ज़ और टेबलेट आगे बढ़ा दी  !
 
सीनियर डाक्टर ने हां में सर हिलाया और कहा : ये ठीक है , ताज़े पानी से अभी एक टेबलेट दीजिये और फिर भी तकलीफ रहे तो मुझे बताइये मेरे एक्सटेंशन पर - खुद मत आइयेगा !
 
सिस्टर अरुणिमा ने हामी में सर हिलाया और बोली : जी सर ,मैं शाम को आप को रिपोर्ट करती हूँ !
 
ओ के कहते हुए डॉक्टर दरवाज़े से बाहर की तरफ बढ़ गए !
 
        डॉक्टर तपन को अरुणिमा ने और सिस्टर अरुणिमा ने डॉक्टर तपन को धीरे से पलकें उठा कर देखा  - ये सामान्य नहीं था ! अरुणिमा ने अपनी उठती पलकों से तपन को इस डांट से हुए को दर्द बताया हो जैसे , तो तपन ने अपनी धीरे से झुकती हुई पलकों से अरुणिमा को जैसे सांत्वना दी , कोई बात नहीं ,वो बड़े हैं , मैं हूँ न तुम्हारे साथ ! दो अनजान लोगो में अशब्द किन्तु अर्थपूर्ण संवाद जिसमे केवल समर्पण था !
 
दोनों लगभग हमउम्र डाक्टर तपन 25 बरस और अरुणिमा कुछ 21 बरस की उम्र में नर्सिंग की ट्रेनिंग पर इस अस्पताल में , आये थे ! ये पहली मुलाक़ात थी उनकी !
 
उज्जवल बाबू की तजुर्बे वाली निगाहें ये सब देख रहीं थी !
 
सादे पानी का गिलास और टेबलेट उज्जवल बाबू को देते हुए अरुणिमा ने कहा : बाबा , ये खा लीजिये फिर मैं आपके बेड के चादर और तकिया गिलाफ़ बदल देती हूँ !
 
उज्जवल बाबू : बेटा ,आज मैं बेड से उठ नहीं सकूँगा  , कमजोरी महसूस हो रही है , आज चादर बदलना रहने दो !
 
अरुणिमा : बाबा आपको उतरना नहीं होगा ,मैं आपके लेटे लेटे ही बदल दूँगी ! आप पहले टेबलेट खाइये !
 
उज्जवल बाबू ने पानी का गिलास अरुणिमा की तरफ कर दिया दवाई खा कर और लेट गए !
 
अरुणिमा : बाबा ,आप बेड के एक तरफ करवट ले लीजिए !
 
बस फिर सिस्टर अरुणिमा ने बारी बारी से पुरानी चादर हटाई और फिर नई चादर बदल दी !
 
उज्जवल बाबू के साथ एक हफ्ते में ये पहली बार था की चादर बदलने के लिए उनको बेड से उतरना नहीं पड़ा था !
 
सिस्टर अरुणिमा ने वार्ड में रखे सभी सामान को करीने से सजा दिया और फिर आ कर बैठ गयी उज्जवल बाबू के पास रखे स्टूल पर !
 
सिस्टर अरुणिमा : बाबा ,आपके सर के बाल इतने लम्बे क्यों हैं ?
 
उज्जवल : बेटा मुझे शौक़ था लम्बे बाल रखने का ! मेरे ज़माने में जाने माने लेखक और कलाकार रखते थे ! तुमने गुरुदेव रबिन्द्र नाथ की तस्वीर तो देखी होगी !
 
सिस्टर अरुणिमा : हाँ देखी तो है ! लकिन ये तो उलझ गए हैं ! आपके घर से कोई नहीं आता ! सर पर तेल लगा कर इनको ठीक करना ज़रूरी है !
 
घर की बात सुनते ही उज्जवल बाबू का मन दुखी हो गया  , शांत हो गए !
 
सिस्टर अरुणिमा : बाबा,आपके घर पर कौन कौन हैं ?
 
उज्जवल : दो बेटे , बहुए, शायद पोते पोती भी है !!
 
सिस्टर अरुणिमा : शायद , मतलब बाबा ?
 
उज्जवल बाबू ने काफ़ी देर शांत रहने और अरुणिमा के बार बार पूछने पर बोलना शुरू किया !
 
कोई 50 - 60 सालों पहले की बात है मैं तब छोटा था लेकिन जीने के लिए पैसा और पैसे के लिए मेहनत ज़रूरी है बहुत जल्दी समझ गया था !
 
          रोज़ सुबह देबासिस दा  की दुकान पर चाय  पीता था और वो चाय तब देते थे जब मैं दो ड्रम पीने का पानी भरता था ! फिर अखबार बांटना और 10 बजे से हावड़ा रेलवे स्टेशन पर रेल गाड़ियों के यात्रियों को चिरुनी ( कंघियाँ )बेचता था ! ड्यूटी जाने और वापस आने के समय पर चिरुनी खूब बिकती थी ! दोपहर में कम ! दिन भर में दस से बीस कंघियां बेच लेता था ! दोपहर का खाना वहीँ पर एक मठ था उसमे खाता था ! शाम को चाय नाश्ता भी करता था वहीँ देबसिस दा की दूकान पर दो ड्रम पानी और मठरी के लिए मैदा सानेने के बाद !
 
       ऐसे ही बचपन बीत रहा था ! मुझे नहीं पता की मैं कहाँ से हूँ ! किस परिवार से हूँ ! जब से होश संभाला देबसिस दा के पास पाया ! ना कभी मैंने पुछा और ना  कभी उन्होंने बताया !
 
सिस्टर अरुणिमा शान्त और नम आँखों से सब सुनती जाती थी ! बीच बीच में वो दवाओं और सलाइन का भी ख़याल कर लेती थी !
 
       उज्जवल बाबू को जैसे अपनापन अचानक मिल गया था बरसों बाद अरुणिमा के रूप में और मन की जड़ हो चुकी भावनायें पिघल कर बह चली थीं यादों की लहरों पर शब्दों की नावों पर सवार हो कर !
 
सिस्टर अरुणिमा आप लंच के लिए चलेंगी ? वार्ड के दरवाज़े को हलके से खोलते हुए डॉक्टर तपन ने पुछा !
 
उज्जवल बाबू ने अरुणिमा से पहले जवाब दिया : अंदर आइये छोटे डाक्टर बाबू !
 
         डॉक्टर तपन , २५ - २६ साल का सजीला युवक ! यौवन की चरम सीमा चहरे पर झलकती थी  ! बार बार अरुणिमा की निगाहें तपन को देख कर झुक जाती थी ! कुछ आधा फुट लम्बा था तपन अरुणिमा से ! आज उसने मूँगिया हरे रंग की शर्ट और लाइट चॉकलेट कलर का ट्राउज़र पहना था और ऊपर से सफ़ेद ऐप्रॉन ! गले में स्थेस्टस्कोप ! अरुणिमा ने कच्चे पीले रंग के सूट और सलवार उसपर काले रंग  की चुन्नी पहनी थी साथ में सफेद ऐप्रॉन सलीके से ओढ़ रखा था , दोनों सुन्दर और सोबर दीख पड़ते थे !
 
       बाबा हम लंच कर के आते हैं ! अरुणिमा और तपन दोनों ने एक साथ अगल बगल खड़े हो कर उज्जवल बाबू की तरफ देखते हुए पुछा  ! जैसे अनुमति चाहते थे इस असामान्य बात के लिए ,ये सामान्यतः संभव नहीं ड्यूटी टाइम में !
 
उज्जवल बाबू : हाँ , मैं खुद  अरुणिमा को लंच के लिए याद दिलवाने वाला था ! ठीक हुआ जो आप आ गए !
 
डॉक्टर तपन : जी ,बिलकुल चिंता न करें !
 
      अदभुद रश्तों के अंकुर पनप रहे थे ! कौन किस की देखभाल और देख रेख करने को था अस्पताल में  कुछ समझ नहीं आता था ! सारी परिभाषाएँ बदली बदली सी थीं !
 
दोनों मेस की तरफ बढ़ गए !
 
शाम की चाय और बिस्किट लिए उत्पल खड़ा था ! रोज़ वो ही चाय दे जाता था ! अरुणिमा ने चाय  बाबू को दी और उनसे अपनी बात आगे कहने को कहा !
 
उज्जवल बाबू कहने लगे : फिर २५ - २८ साल की उम्र में मेरे साथ बहुत सारी घटनाएँ एक साथ हुई ! एक दिन मैं हावड़ा से दुर्गापुर जाने वाली ट्रैन में चिरुनी बेच रहा था ! ट्रैन में भीड़ खचा खच थी !
 
         मैं अपने हाथों में कंघियों के गुच्छे लिए चिल्ला रहा था : चिरुनी ले लो चिरुनी ! सुन्दर , टिकाऊ चिरुनी ! आपके केश को ऐसा संवारे जैसे माँ का हाथ ! कोमल कोमल हाथों से ऐसे आनंद से जैसे की चमेली का तेल लगा हो केश में ! चिरुनी ले लो चिरुनी !
 
अरे, इधर आओ : एक रौबीले आदमी ने मुझे बुलाया !
 
उज्जवल : हाँ बाबू , कैसी चिरुनी लेंगे ?
 
आदमी : मुझे चिरुनी नहीं चाहिए ! तुम से कुछ बात करनी है ! मेरे साथ दुर्गापुर चलोगे ?
 
उज्जवल : वो क्यों ?
 
आदमी : वहां मेरी एक दूकान है और एक दुकान मैंने कोलकत्ता में भी ली है अब दोनों जगह मुझ से वो संभाला नहीं जाएगा ! बेटा है नहीं एक बेटी है , थोड़ी कमजोर है दिमाग से ! तुम अगर चाहो तो मेरे साथ मेरे घर चलो और सब सम्भालो !
 
उज्जवल : पर आप मुझ पर ऐसे कैसे विश्वास कर ले रहे हैं ! मैं तो आपको अभी अभी मिला ?
 
आदमी : मैं ट्रैन के इंतज़ार में तक बाहर देबसिस की पास बैठा था ! वो मेरे एक कोलकत्ता के दोस्त का दोस्त है ! वहीँ उसने  तुम्हारे बारे में बताया !
 
उज्जवल : मेरे सामने पूरा जीवन था और साथ में थी एक उम्मीद और मौका ! बस मैंने हाँ भर दी !
 
दो बेटे हुए , प्रभात और विनय ! दोनों जगह की दुकाने ठीक था चल रही थीं !
 
दोनों को अच्छा पढ़ाया ! बड़ा बेटा सरकारी नौकरी में है और दार्जिलिंग में ! उसकी शादी करी लड़की उसने अपनी पसंद की देखी ! शादी के बाद वो दार्जिलिंग से मुझे कभी मिलने नहीं आया !
 
दूसरे बेटे ने सारा काम संभाल लिया था ! उसकी माँ का देहांत हुआ तो  घर में किसी लड़की की कमी खेलने लगी ! मेरे गॉड फादर के ही घर से एक लड़की के साथ उसका विवाह कर दिया ! उस दिन से वो घर मेरे लिए जेल से कम नहीं रहा ! मैंने कोलकत्ता की दूकान में रहने का फैसला किया ! २० साल सब ठीक चला ! 
 
बाबा आप चाय लेंगे : अरुणिमा ने बीच में गंभीर होते माहौल को कुछ हल्का  करने की कोशिश करी और सफ़ेद बड़े बड़े चीनी मिटटी के प्याले में चाय उज्जवल बाबू की तरफ बढ़ा दी !
 
शाम हो चली थी !
 
दूर हावड़ा ब्रिज के सहारे सूरज ढल रहा था !
 
अरुणिमा ने खिड़कियों के परदे खोल कर ठंडी हवाओं को निमंत्रण दिया !
 
अब , अरुणिमा के जाने का समय था !
 
उज्जवल बाबू उदास हो गए थे !
 
कल आती हूँ कह कर अरुणिमा ने रात की सिस्टर से चेंज ओवर किया और चली गयी !
 
डाक्टर तपन ने अरुणिमा को टैक्सी में बैठाया और घर की  तरफ चल दिया ! कोलकत्ता की पहचान पिली पीली टैक्सी बरसों पुराने हावड़ा ब्रिज पर आगे बढ़ गयी ! उज्जवल बाबू देर तक खुले आकाश में सितारों को देखते रहे !
 
अगली सुबह !
 
आज आपको हल्का दूध देने को कहा है बड़ी सिस्टर ने वो भी छाली ( मलाई ) हटा कर ! सुबह सवेरे उत्पल ने बड़े गिलास में दूध  बिस्किट टेबल पर रखते हुए उज्जवल बाबू से कहा !
 
उज्जवल बाबू में आज अनोखी ऊर्जा थी आज ! जल्दी जल्दी दूध पिया और बिस्किट बचा लिए अरुणिमा के लिए !
 
अरुणिमा : केमोन आछेन बाबा ? ( कैसे हैं बाबा ?)
 
कमरे में जैसे गुलाब की खुशबू बिखर गयी हो ! रात भर उदास सिकुड़ी छुईमुई के पत्तों सरीखीं उज्जवल बाबू की पलकें अचानक खिलखिला गयी थीं अरुणिमा की आवाज़ सुन कर !
 
उज्जवल बाबू : मैं ठीक हूँ , तुम कैसे हो बेटा ?
 
अरुणिमा ने जल्दी जल्दी सब कमरा ठीक किया ! दवा दी ! चाय नाश्ते और सफाई का प्रबंध किया ! डाक्टर की विजिट पर समय पर रही ! सब ठीक ठाक था ! ११ बजे  बाद सब सामान्य कल की तरह !
 
अरुणिमा और उज्जवल बाबू वार्ड में बस !
 
अरुणिमा : बाबा कल अपने पुछा नहीं की सीनियर डाक्टर ने क्या कहा मुझे शाम को अपने केबिन में बुला कर ?
 
उज्जवल बाबू थोड़ा परेशान होते हुए : क्या तुम्हे उनके पास जाना पड़ा था ?
 
अरुणिमा : नहीं। ये ही तो बात थी मैं उनके पास गयी थी पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कोई बात नहीं जाओ ! मुझे लगा शायद तपन ने कुछ कहा होगा उनसे पर कल शाम तपन सर ने बताया उनकी कोई बात इस बारे में नहीं हुई !  समझ में नहीं आया की उन्होंने मुझे बुलाया  थी डांटने के लिए पर , कुछ कहा नहीं !
 
उज्जवल बाबू मुस्कुराये और बोले मेरी आगे की कहानी बताऊँ ? वो छुपा गए की कल उन्होंने ही बड़े डाक्टर से उसके लिए बात कर ली थी !
 
अरुणिमा : एक मिनट रुकिए !
 
           उसने अपने हैंडबैग से नारियल के तेल की शीशी , कंघी निकाल कर टेबल पर रखी ! बेड के लीड स्क्रू को लिवर के सहारे से घुमा कर उज्जवल बाबू का सिरहाने ऊंचा किया फिर उनके सर के पीछे स्टूल रख कर सर पर  तेल की मालिश करने लगी !
 
अब बोलिए बाबा : अरुणिमा बोली !
 
        उज्जवल बाबू को कोमल कोमल अँगुलियों के माथे पर एहसास ऐसे होता था जैसे दूधमुहे बच्चे के होठो पर रूई के फोहों में दूध  रखा हो ! असीम आनदं ! असीम वैराग्य से भरे जीवन में ये भावनात्मक पल ऐसे थे जैसे बड़े से पानी के बर्तन में बूँद बूँद टपकती नील , जो धीरे धीरे पुरे पानी को अपना सा कर देती है !अनोखा समय उज्जवल बाबू के लिए बरसों बाद ! माँ और बेटी के प्यार को तरसते उज्जवल बाबू की पलकें डबडबा गयी !
 
     मेरे बेटों ने मुझ से कोई संपर्क नहीं किया ! दुर्गापुर वाले को शायद एक बेटा और एक बेटी है , देबसिस बाबू कह रहे थे ! बड़े का तो कुछ पता नहीं ! यहाँ मैं बूढा हो गया तो अपने लिए ओल्ड एज़ होम में इंतज़ाम कर लिया ! सब की सेवा भी हो जाती है और मेरी खुद की देखभाल भी करते हैं सब !
 
अरुणिमा : दुर्गापुर में कहाँ रहते थे आप बाबा ?
 
उज्जवल बाबू : स्टेशन के पास के सब्जी बाजार में !
 
अरुणिमा : आप के बेटे का नाम क्या बताया ?
 
उज्जवल : प्रभात और विनय !
 
अरुणिमा धीरे धीरे कंघी से उनके लम्बे सफ़ेद बाल सीधे कर रही थी ! कितने दिनों  बाद मौका आया था ! पत्नी के गुजरने के बाद बालों को किसी ने नहीं सवांरा !
 
उज्जवल : ये बढ़िया और लड़कों वाली चिरुनी कहाँ से ली ?
 
अरुणिमा : तपन सर की है , वो भी तो दुर्गापुर के हैं !
 
उज्जवल : क्या उन्होंने अपनी कंघी मेरे लिए दी ?
 
अरुणिमा : हाँ , मैंने ये बता कर ली उनसे !
 
तभी दरवाज़े पर डाक्टर तपन ने दस्तक दी !
 
तपन : कैसे हैं बाबा आप ?
 
उज्जवल : अच्छा हूँ ! तुम कैसे हो ?
 
तपन : सब ठीक है !
 
उज्जवल बाबू : डाक्टर जी सिस्टर अरुणिमा बता रही थी की आप भी दुर्गापुर से हैं !!
 
तपन : हाँ जी स्टेशन के पास जो सब्जी बाज़ार है ना , बस वही हमारी भी मनिहारी की दूकान है ! बहुत साल पहले मेरे  बाबा के बाबा ने शुरू किया था , अब बाबा चलाते है ! मुझे डाक्टरी पढनी थी इस लिए मैंने वो काम नहीं किया !
 
उज्जवल : क्या नाम है तुम्हारे बाबा का ?
 
तपन : जी , विनय  !
 
उज्जवल : तुम्हारे बाबा के बाबा का क्या नाम है और कोई बड़े पिता जी भी हैं तुम्हारे ?
 
तपन : जी उनका नाम तो नहीं पता पर बड़े पिता जी तो हैं मेरे , बल्कि आज उनको साथ लाया हूँ , दार्जिलिंग में रहते हैं वो ! कल ही आये थे आँखों में तकलीफ है उनके !मेरे साथ हॉस्टल में ही ठहरे हैं  !
 
उज्जवल : क्या नाम ?
 
तपन : जी , उनका नाम प्रभात है !
 
अरुणिमा : अरे तपन सर मुझे लगता है की ये उज्जवल बाबा ही तुम्हारे बाबा के बाबा हैं !
 
तपन ने उज्जवल बाबा की तरफ देखा वो नाम आँखों से हाथ में तपन की दी चिरुनी को निहार रहे थे !
 
तपन : बाबा , क्या अरुणिमा सही कहती है ?
 
उज्जवल ने अपने होठों पर ढलके आँसुंओं को भीतर करते हुए चेहरा एक तरफ कर लिया  !
 
तपन लिपट गया उज्जवल से !
 
अरुणिमा सीमाओं से बंधी टकटकी लगाये देख  रही थे दादा पोते को !
 
सालों से अघोषित तलाश आज अंतिम पड़ाव पर थी !
 
क्या डॉक्टर तपन यहाँ हैं ? किसी ने वार्ड का दरवाज़ा खटखटाया !
 
अरुणिमा ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा : उज्जवल बाबा आपके बेटे , तपन सर आपके पिता जी !
 
कई शब्द गढ़ गए , कितनी परिभाषाएँ हो गयी और कितने सम्बन्ध बिखर के फिर बंध गए दो दिनों में !
 
उज्जवल बाबा : तपन चलो घर चलते है , अरुणिमा को लाने का दिन तय करना है !
 
अरुणिमा ने चाय का प्याला  उज्जवल बाबू की तरफ बढ़ाते हुए कहा : चाय लीजिये बाबा !
 
आज भी सूरज ढल रहा था , किन्तु सन्तोष और आग्रह के साथ !
 
       बड़ी सी गाड़ी में बैठे उज्जवल बाबा ने चलने का इशारा किया ! हावड़ा ब्रिज से गुजरते हुए किसी ने उज्जवल बाबा के बड़े बालों को  देख कर पुकारा : चिरुनी लेंगे बाबू ?
 
उज्जवल दा ने एक चिरुनी खरीद ली !
 
ना लेने के बाद की तकलीफ उन्हें पता थी , एक लम्बी तकलीफ जो सब के लिए सुखद अंत नहीं लाती !
 
एक कहानी : चिरुनी ( कंघी ) !
 
~~ समाप्त ~~ 
 
 
:::: मनीष सिंह ::::   
  

Wednesday, March 12, 2014

एक कहानी : " छावनी " .

           ऑफिसर्स मेस से जल्दी जल्दी रात का खाना खा कर विक्रम विशेष परमिशन पर  छावनी के बाहर अपने एक और साथी के साथ निकला ही था कि हलकी बूंदा बांदी शुरू हो गयी और उन्हें बेग़म पुल के दूसरे छोर पर एक चाय कि दूकान पर रुकना पड़ा !

निशांत वर्मा : चाय लोगे केप्टन ?

विक्रम : मैं रात को चाय नहीं पीता !

निशांत : ये भी कोई स्कूल कि घंटी है जो रात में नहीं बजती , चल आज पी कर देख !

विक्रम : यार कुछ चीज़ों में मुझे जबरदस्ती पसंद नहीं और तू ये जनता है !

निशांत : ठीक है दोस्त , चाय के बहाने पुरानी यादें ताज़ा हो जाती , सोचा था !

विक्रम स्टूल को अपनी और खीचते हुए चाय वाले से बोला : भैया जी , दो कप अच्छी चाय बनाइये !

चायवाला : अदरक दाल दूं सर ?

विक्रम और निशांत ने एक दूसरे कि तरफ देखते हुए जैसे कुछ याद किया और गले मिले !

चायवाले ने अदरक वाली अच्छी सी चाय बनाई   मिटटी के कुल्हड़ में को सेना के नोजवान अधिकारियों कि तरफ बढ़ा दी !

            छत  पर पड़ी नीले रंग कि तिरपाल बार बार हलकी हवा से उड जाती थी और बारिश कि बूंदे दूकान के भीतर झाँक लेती थी ! कभी विक्रम कि पलकों पर तो कभी निशांत के बाँहों पर !

सड़क पूरी भीग चुकी थी !

बेग़म पुल पर एक किनारे से दूसरे किनारे पर सायकल , रिक्शा , बस , ट्रक और ठेले सब आते जाते थे !

विक्रम और निशांत के लिए नया नहीं था ये सब देखना हाँ समय और उम्र ज़यादा हो गयी थी ये नज़ारा देखे !

विक्रम तूने देखा वो गवर्नेंट कॉलेज के पीछे वाले गेट का नीम का पेड़ कितना घना हो गया है ! : निशांत ने ट्रक कि मैं लाइट से रोशन हुए नीम के पेड़ कि तरफ इशारा करते हुए कहा !

निशांत भाई सब कोलगेट जो करने लगे हैं , हमारे बचपन जैसे दातुन करते तो देखते इतना घना कैसे होता ये ! विक्रम ने चाय कि आखरी घुट लेते हुए जवाब दिया

चल भाई देर होने को आई , परमिट भी ओवर होने वाली है !

दोनों लौट आये छावनी में , अपने अपने कमरों में !

       बारिश रात भर होती रही ! हवाएँ शहर के इस कोने से उस कोने तक तेज़ चाल से टहलती रहीं ! छावनी के कोने कोने पर जवान अपने अधिकारियों कि रक्षा में रात भर पहरा देते रहे !  रात भर बेगम पुल से धीमे , तेज़ हॉर्न कि आवाज़ें आती रहीं ! फिर रोज़ कि तरह ये रात भी बीत गयी जैसे पास कि काली नदी कि गहराइयों में बारिश का पानी समां गया  , अगली बारिश के आने तक !

गुड मॉर्निंग निशांत : विक्रम ने कैम्पस के ग्राउंड में बड़े से झूले पर सर के पसीने को सफ़ेद तौलिये से पोछते हुए कहा !

निशांत : गुड मॉर्निंग दोस्त , कैसी लगी कैंटोनमेंट में पहली रात ?

विक्रम : रात भर सो न सका !

निशांत : क्यों भाई ?

विक्रम : तुम अगर आज फिर मेरे साथ उसी चायवाले भैया के पास चलो तो बताऊंगा !!

निशांत : नॉट ए बिग डील , ठीक है फिर शाम को छेः बजे शार्प मैं गेट पर मिलो !

विक्रम : ओ के !

मेन गेट से कुछ कदम कि दूरी पर के चोराहे से होते हुए बेगम पुल कि तरफ निशांत और विक्रम बढे ही थे कि किसी ने पीछे से आवाज़ लगायी !

साब एक बात पूछूं ? करीब १५ - १६ साल का लड़का हाथों में रजनीगंधा के फूलों के गुलदस्ते लिए खड़ा पूछ रहा था !

सेना कि वर्दी में रौबीले दो अधिकारीयों से एक आम लड़का ऐसे कैसे कुछ पूछ सकता है ! सामान्यतः ऐसा हो होता है ! पुलिस , सेना ही आम आदमी से सवाल करते हैं , पर आज कुछ उल्टा था !

विक्रम ने अपनी चाल कुछ कम करते हुए लडके के पुछा :  तुमने हमसे कुछ कहा ?

लड़का : जी  , मैं आपसे ही कुछ पूछना चाहता हूँ !

निशांत : हाँ बोलो, क्या बात है ?

लड़का पहले आप ज़रा किनारे हो जाइये , यहाँ पुल पर कम जगह है तो इस लिए गाड़ियों से बचना पड़ता है !

निशांत  , विक्रम : तुम जल्दी पूछो क्या काम है हमसे ?

लड़का : साब आप दोनों मेरठ कि ही हैं ना ?

निशांत और विक्रम : हाँ , तो ?

लड़का : साब ये आपके १०० रूपये बाबा बाबा ने दिए थे और कहा था कि अगर कभी आप लोग मिले तो लौटने को !

निशांत , विक्रम ने एक दूसरे को जैसे सवाल करते हुए देखा और बोले : ये क्या है भाई ?

लड़का : साब , अब मैं चलता हूँ !

विक्रम ने थोडा भारी  आवाज़ में लड़के से पुछा : देखो लड़के हम  तुम्हे नहीं जानते और ये कैसे रूपये है हमें नहीं पता लो ये वापस लो और हमें जाने दो !

लड़का : नहीं साब ये आपके ही रुपये है और ये काग़ज़ भी है मेरे पास जिसमे आपने बाबा को इस के बारे में कुछ लिखा था !

कहते हुए लड़के ने एक पीले पड़ चुके लिफाफे को विक्रम कि तरफ बढ़ा दिया !

            लिफाफे को देखते ही जैसे विक्रम और निशान्त अपने आप में नहीं रहे ! किनारे कि दीवार का सहारा ले कर कुछ देर खड़े रहे ! आँखे दब डबडबा रहीं थी और उनमे १० सालों पहले कि यादें काग़ज़ कि नावों कि तरह हिचकोले खा रहीं थी ! मन था कि कहता था कि सब अनोखा है और सच नहीं है लेकिन आखें थीं कि कहती थीं कि सब सच है और यथार्थ है !

       हम असमय मिली चीज़ों के लिए उतने उत्साहित नहीं होते जितना समय से पहले मिल जाने  वाली चीजो के लिए रहते हैं , किन्तु सहेजने कि आदत जब तक आती है तब तक समय निकल जाता है और प्राप्त चीज़ों का अर्थ सामयिक एवं तर्कसंगत नहीं रेह जाता !

दस साल पहले !

     नौचंदी में इस बार नई सर्कस आई है तू चलेगा  , निशांत ने विक्रम से कॉलेज से वापस लौटते हुए पुछा !

विक्रम सायकल से उतर गया और निशांत भी क्यों कि घर पास में ही था और रास्ता सायकल से जल्दी कट जाता फिर मौका कहाँ मिलता है इन सब बातों का !

विक्रम : हाँ , जाने का मन तो है लेकिन पैसे कहाँ हैं !

निशांत : ये ही तो परेशानी है !

विक्रम : फिर नौचंदी और सर्कस भूल जा , चल घर चल !

बेटा अगर तुम मेरा एक काम करो तो मैं तुम्हारे लिए नौचंदी का इंतेजाम कर सकता हूँ ! पास के चायवाले ने दोनों कि बातें सुन कर कहा !

वो कैसे ? : निशांत और विक्रम दोनों एक साथ बोले !

        दो दिन बाद जो इलेक्शन है ना उसमे अधिकारीयों को चाय देने का काम है सिर्फ एक दिन का काम है और वो भी चार फेरों का , तुम दोनों उस दिन मेरा या काम करो तो मैं दोनों को ५० ५० रुपए दूंगा !

विक्रम ने एक पल में हाँ केह दी निशांत ने अगले दिन अपनी माँ से पूछ कर हामी भरी !

         अगले दिन चाय वाले ने दोनों से एक सादे पेज़ पर लिखवाया कि " चाय के गिलास के टूटने पर कीमत हमारे तय मेहताने ५० रुपयों में से काट ली जाये ! "

इलेक्शन के दिन के बाद अगले दिन आने को कहा था चायवाले ने पर दुकान पर नहीं मिला , गाँव चला गया था शायद !

कॉलेज और फिर सेना कि भर्ती परीक्षा दोनों अच्छे से पास करी दोनों ने ! जीवन में कुछ बन जाने कि धुन में कुछ याद नहीं रहा !

सेना में भर्ती , फिर ट्रैनिंग , फिर दूर दूर कि पोस्टिंग्स !

मेरठ जैसे ख्याल में ही नहीं आया ! 
विक्रम  का तो कोई था नहीं खून के रिश्ते में मेरठ में ,अनाथाश्रम के मालिक और इंचार्ज से बीच बीच 
में ख़त लिख कर हाल ले लेता था और निशांत के माँ के देहांत के बाद उसने भी मेरठ से मुह मोड़ लिया था !

लेकिन आज सब कुछ अपना अपना सा लगने लगा था !

मेरठ कि छावनी में पोस्टिंग के दो दिन के समय में दोनों को कभी अपने बचपन कि याद नहीं आयी , पर सब आखों के सामने था ! दोनों दोबारा जी लेना चाहते थे वो ज़िन्दगी !

किन्तु , बीता समय नहीं आता ! 

कहाँ हैं तुम्हारे बाबा : निशांत ने  रूंधे गले से कहाँ !   

लड़का : वो तो बेगम पुल के उस किनारे पर ही तो दूकान है हमारी चाय कि !

निशांत और विक्रम चल दिए अपने पहले मालिक के पास जिसने

कर्मठ नौजवानो का मेहनताना सम्भाल कर रखा और उम्मीद 

जगाई अपने बेटे कि आँखों में कि

   संपर्क निशचल किन्तु भावपूर्ण होने चाहिए ताकि उनके गर्भ में स्वस्थ एवं सम्मानीय भविष्य पल सके !

छावनी के गेट पर हूटर ने आवाज़ लगायी !

निशांत और विक्रम तेज़ कदमो से वापस लौट चले !

एक दम निशब्द !  दोनों के मन बातें करते थे !

मानस अशब्द संवाद समझते थे और आखें भविष्य देखती थी !

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एक कहानी : छावनी  !!             ~~   मनीष सिंह

Tuesday, December 31, 2013

दोस्ती का कम्बल, अपनेपन कि वैसलीन !!

दिन से हफ्ते,
हफ्ते महीने,
महीने तिमाही,
और छमाही,
मिले तो पूरा साल हुआ !

सन्देश मिले,
आदेश मिले,
अनुबंध हुए,
प्रतिबन्ध हुए,
संपर्क किये,
विनिमर्श किये,
सफल हुए,
उत्थान मिला,
गतिमान रहे,
विफल रहे,
गतिमान रहे,
अभिमन्त्र रहे !

नव वर्ष का गुलाब,
दिन पंखुड़ियों से
गुथे गुथे,
खुश्बू खुश्बू सन्देशे।
संपर्कों कि रेवड़ियां,
आशाओं कि ताप,
संतोष के मफ़लर,
दोस्ती का कम्बल,
सम्बन्धों कि कड़क चाय,
सुर्ख होठों पर,
अपनेपन कि वैसलीन,
मुबारकबाद देती हैं,

हम आपको , सबको ,

हैप्पी न्यू ईयर !!

: मनीष सिंह 

Tuesday, October 29, 2013

एक कहानी : रूही और निशान्त !

           "निशान्त" अब तक तीन  बार उस कहानी को पढ़ चुका था ! बार बार वो उस कहानी में एक पात्र  रूप में खुद को और एक पात्र  रूप में "उसको" पाता था, और कल्पना के बहते झरने में डुबकियां लगाता हुआ अपने मन माफिक भविष्य के सपने देखता जाता  था !

            निशान्त ३ सालों पहले भारतीय वायुसेना में तकनिकी विभाग में चयन होने के बाद एक साल कि ट्रैनिंग और फिर सुदूर दक्षिण में पहली पोस्टिंग के बाद अपने  छोटे से शहर रांची लौट रहा था !  घर में माँ और पिता जी के साथ उनकी देख रेख करने वाला उदय था ! जिसे पिताजी ४ साल पहले गाव से  लाये थे ! दसवीं के बाद उसको आई टी आई करने के लिए तयारी  कर रहा है !
           दूसरी गली में उसका भी घर है ! वो ही जिसके साथ निशान्त ने दसवीं में आते ही कुछ नए अनुभव किये ! किसी के लिए मन में ख्याल का भाव ! किसी के लिए उसकी ज़रूरतों को समझने कि समझ ! किसी के ना होने पर  जीवन में खालीपन ! किसी के कुछ समय अपने आस पास न होने पर सब ख़तम हो जाने जैसा लगना ! किसी के  बस अपने पास ही रहने कि ख्वाहिश ! स्कूल , कॉलेज का समय के जल्दी बीत जाने पर चिंता होना ! शाम के समय बार बार घर के आस पास सायकिल से जान बूझ कर दूकान से गरज़रूरी चीज़ों के खरीदने और फिर उसको वापस करने जाना ! बस एक उद्देश्य , किसी तरह से उसके आस पास रहूँ ! ऐसा अक्सर किया करता था निशान्त !
         स्कूल से , कॉलेज से यूनिवर्सिटी और फिर वायुसेना में चयन ! वो और निशान्त बचपन कि गलियों से शहरों कि सड़कों पर घूमने लगे थे ! दोनों के परिवारों को भी ये सब स्वीकार्य था ! वो घंटों एक दूसरे के साथ समय बिताते और घर आते ! सब ने भविष्य भी सोच लिया था ! उसकी एम् एस सी जो वो केमिस्ट्री से  थी के ख़तम होने के बाद जैसे ही निशान्त अपनी ट्रैनिंग से लौटेगा दोनों कि शादी कर दी जाएगी ! 

लेकिन , सब कुछ बदल चूका था अब !

भैय्या  चाय पियेंगे ?

दूसरी सीट पर बैठे एक लडके ने निशान्त तो एकटक ट्रैन से बहार देखते हुए पुछा !

निशांत के काल्पनिक झरने का जैसे सारा पानी एकदम से ख़तम हो गया और बोल पड़ा : कहाँ आ गए हैम ?

विपुल : बस चेन्नई के बाद एक स्टेशन ही निकला है !

निशान्त : ओके , ओके ! , तुम कहाँ जा रहे हो दोस्त ?

विपुल : विशखापट्टम् !

निशान्त : वहाँ क्या करते हो ?

विपुल : मैं वहाँ पढता हूँ , इंजीनिरिंग मैकेनिकल , थर्ड सेम है !

आप कहाँ जा रहे हैं : विपुल ने  निशान्त से पुछा !

निशान्त : मैं अपने घर जा रहा हूँ , रांची !

विपुल : आपके घर में कौन कौन है ?

निशान्त : माँ, पिता जी , भाई जैसा दोस्त उदय और........

निशान्त किसी एक और का नाम जोड़ते जोड़ते रुक गया !!

विपुल : और कौन भैय्या ?

निशान्त : कोई नहीं , वो तो बस मैं ऐसे ही केह गया !!

विपुल ने कुछ सोच कर उस समय बात पलट दी और निशान्त से पुछा : आज लंच में आप क्या आर्डर करने वाले हो भैय्या ?


निशान्त जैसे चाहता था कि विपुल उससे उस कौन के बारे मैं पूछे लेकिन विपुल ने बाद लंच के तरफ मोड़ दी थी !

निशान्त : मैं तो एग्ग बिरयानी खाऊंगा ! इस ट्रैन में पैक्ड मिलती है और लोकल लोग बना कर बेचते हैं ! केले के पत्ते में पैकिंग विथ प्रॉपर लोकल मसला एंड सॉस ! कई बार खाया है मैंने !

विपुल : तो आज मैं भी वो ही खाऊंगा !

निशान्त : एक एग्ग और एक हैदराबादी बिरयानी मंगवाते हैं शेयर कर के खाएंगे ! मैंने और उसने खूब किया है कॉलेज के दिनों में केंटीन में !

विपुल को मौका मिला और पूछ बैठा : किस के साथ ऐसा किया था आपने भैय्या कॊलेज में ?

निशान्त :  मेरी कॉलोनी कि ही एक लड़की है वो !
हमने ग्रैजुएशन साथ में किया ! साथ में ही रहे हमेशा दोस्त कि तरह पर अब नही हैं हम वैसे !

विपुल : क्यों ?

निशान्त : हमारे पेरेंट्स ने भी ये तय किया था कि मेरी ट्रैनिंग के बाद और पोस्टिंग से पहले हैम दोनों कि शादी करा दी जाएगी और मैं ट्रैनिंग पर चला गया !

विपुल : फिर क्या हुआ ?

निशान्त : मेरी ट्रैनिंग ६ महीने ही थी ! दो महीने बिताने के बाद मुझे माँ का फ़ोन आया कि उसकी शादी के लिए उसके घर लोग हमारे घर पर दबाव बना रहे हैं कि जल्दी कीजिये वर्ना एक अच्छा रिश्ता है सेना का ही , लड़का सेना में डाक्टर है और उसकी मामा कि तरफ से रिश्ता है ! माँ और पिता जी ने भी खूब समझाया कि ट्रैनिंग के बाद शादी होनी तो तय है तो फिर ये अचानक क्यों ? वो लोग नहीं माने और उसने भी मुझ से बात नहीं करी ! उसकी शादी उस सेना के डाक्टर से हो गयी !

बिरयानी देना भाई दो : एक एग और एक हैदराबादी ! विपुल ने सीरियस होते माहौल को हल्का करने कि कोशिश करी , बिरयानी से !

ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी ! चाय , केले के पकोड़े और दही के साथ दोनों ने बिरयानी का आनंद लिया ! फिर दोपहर के समय खाने के बाद कि नींद आने लगी दोनों को ! ट्रैन अगले ३ घंटो तक नहीं रुकने वाली थी ! ट्रैन के हौले हौले हिचकोले और दोपहर के नींद ऐसा मिलाप कि कुछ और न अच्छा लगे ! दोनों अपनी अपनी सीट पर सो गए !

चाय चाय !

निशान्त कि नीद इस सामान्य आवाज़ से खुली !

एक चाय ले कर अपनी साइड लोवर कि सीट पर बैठ गया !


                   फिर से उसी कहानी को पढने लगा जिसमे एक लड़की और लड़के बचपन से साथ होते हैं जवानी तक और फिर किसी कारण दोनों कि शादी नही होती ! सबकुछ भुलाकर लड़की अपने पति के साथ अपना जीवन बिताने लगती है ! परिवार सम्भालने लगती है ! एक दिन अचानक उसेक पति के साथ बचपन का वो ही साथ उसके घर आता है डिनर पर जो कि उसके पति का बॉस है ! दोनों एक दूसरे को न पहचाने कि हरकत करते हैं ! फिर दिन रात का मिलना शुरू होता है दोनों का उसके पति कि जानकारी के बिना ! क्यों कि उसका पति उसको ज़यादा टाइम नहीं दे पाता था अपने काम कि वज़ह से तो उसको भी अपने पुराने दोस्त में एक करीबी मिल गया और नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू करने कि प्लानिंग करते हैं दोनों ! एक रात जब उसका पति अपनी माँ कि तबियत खराब होने के कारण घर नहीं आता ! दोनों ने एक दूसरे को शाम को फ़ोन किया आज रात को हैम भाग जाएंगे ! शाम हुई ! रात हुई ! फिर आधी रात हुई ! बॉस का फ़ोन नहीं आया ! वो परेशान हो कर इधर उधर घूमती रही ! अगर सुबह हो गयी और मेरा पति आ गया तो क्या होगा ? ऐसा सोच ही रही थी कि अचानक पंखे से किसी चीज़ के टकराकर गिरने कि आवाज़ आयी ! देख तो घोंसले के चिड़ा गलती दे बल्ब कि रौशनी को सुबह समझ कर घोंसले से बहार आ गया था और पंखे से टकरगया और मर गया ! उसने पंखा बंद किया ! और देखा कि पीछे पीछे चिड़िया भी उस मरे चिड़े के पास आयी और १० से १५ मिनट तक कभी उसकी चोंच में दाना , पानी डालने कि कोशिश करी रही और आखिर हार कर वो भी वहीँ मर गई ! बस इस घटना ने उस लड़की का मन बदल दिया ! बॉस का फ़ोन सुभा ४ बजे आया और वो बोला : डियर रात में पार्टी में देर हो गयी इस लिए फ़ोन नहीं कर सका , अभी आ रहा हूँ , तुम तय्यार हो ना ? उस लड़की ने सोचा एक चिड़िया अपने पति के लिए इतना प्यार दिखा सकती है तो मैं उस से भी गयी गुजारी हों हूँ ! अच्छा पति है , सब सुख सुविधाएँ हैं और मैं ये क्या करने चली थी ? उधर से फिर से बॉस ने पुछा ? आर यू रेडी ना बेबी ? उस लड़की ने भरी और गुस्से से जवाब दिया : सॉरी ये रॉन्ग नंबर है और फोन काट दिया !

निशान्त ने अपनी ट्रैनिंग के बाद अपने घर ना जाने का फैसला किया था !

अपनी पोस्टिंग में वो चेन्नई में था ! उसकी उस गर्ल फ्रेंड कि शादी को भी २. ५ साल बीत चुके थे ! 

उस दिन माँ के फोन के बाद उसने भी माँ से कभी  उसका ज़िक्र कभी नहीं किया और परिवार वालों ने भी उसकी भावनाओं का सम्मान करते हुए कभी भी उस को कुछ नहीं कहा और ना ही कुछ बताया !

विपुल : भैय्या अकेले अकेले चाय पी ली आपने ?

निशान्त के ध्यान को एक बार फिर से तोडा विपुल ने !

निशान्त : नहीं भाई तुम सो रहे थे और मेरी नीदं खुल गयी थी इस लिए पी ली ! फिर से ले लेते हैं !

विपुल : ठीक है आप चाय ले कर रखिये मैं फ्रेश हो कर आता हूँ ! केह कर विपुल भारतीय रेल आनंद एक और तरह से लेने को चल दिया ! स्लीपर बगल वाले अंकल जी कि ले कर ! इस मांग कर ट्रैन में टॉयलेट का अलग आनंद हैं !

   सुदूर सूरज समुद्र में डूब रहा था !  किनारे पर चलती गोलाकार घूमती ट्रैन से अगले से पिछले डब्बे को देख कर बच्चे खुश हो रहे थे मानो इंजन को देख कर ये पता कर लिया हो जैसे कि इस संसार को कौन चला रहा है का पता कर लिया हो !

विपुल ने चाय का कप हाथों में लेते हुए पुछा : भैय्या और कौन है आपके घर में माँ , पिता जी और उदय के सिवाय ?

निशान्त कि कल्पना कि पतंग ने फिर से उड़ान भरी और बोला ! फिलहाल तो कोई नहीं लेकिन वो ही मेरी बचपन कि दोस्त भी मेरे साथ हो जाये !

विपुल : वो कैसे होगी , उनको तो शादी हो चुकी है अभी अभी आपने बताया !!

निशान्त को काटो तो खून नहीं !

हाँ लेकिन भविष्य किसने देखा है ?

विपुल : फिर भी भैय्या मुझे ये कुछ समझ नहीं आ रहा ! शादी के बाद फिर वो कैसे ??

निशान्त के मन में बहुत कुछ चल रहा था उस कहानी जैसे शायद परिस्थिति बदल जायें और वो उसके पास आ जाए ! लेकिन साथ में ये भी सोच लेता था कि अगर कहानी कि तरह अंतिम समय में उसका मन बदल गया तो क्या होगा ?

निशान्त : हाँ ठीक है , जब मेरी शादी होगी ना मैं तुमको भी बुलावा दूंगा , आ जाना और कौन का पता लग जाएगा ! हा हा हा !

दोनों ने नंबर बदले और सो गए ! विपुल रात में ही विशखापट्टम् उतर गया और अगले दिन निशान्त सुबह सुबह राँची रेलवे स्टेशन पंहुचा !

वो ही खपरेल के घर !

पुरानी चाय कि दूकान !

सायकल पर इडली ,डोसा बेचते हाफ लुंगी डाले अन्ना !

पास के स्कूल में जाते वो ही सफेद शर्ट और खाकी नेकर में बच्चे !

निशान्त ने रिक्शा किया और चल दिया घर कि तरफ !

       रस्ते ने सोचता जाता था कि शायद वो दिख जाये क्यों कि सुना था उसका ससुराल रांची में ही है ! अपने स्कूल और कालेज के सामने से होता हुआ घर के करीब पंहुचा ! पहले उसकी बचपन कि दोस्त का मायका पड़ता है ! अनचाहे मन से ही उधर देख ही लिए ! उसकी दोस्त के पिता जी सबेरे कि चाय ले रहे थे ! उन्होंने निशान्त को पहचान  लिया  !

सोच के उलट उन्होंने ही पुकारा : अरे निशान्त बेटा !

निशान्त ने रिक्शे को रुकने का इशारा किया ! उतर कर उनके पैर छुए और घर कि कुशलता पूछी ?

वो उदास हो गए !

निशान्त : क्या हुआ चाचा जी ?

वो कुछ बोल पाते कि अंदर से रूही बहार आई ! सफ़ेद स्याह कपोड़ों में ! आँखे सूजी हुई ! कोई श्रृंगार नहीं !

निशान्त को देख कर ठिठक गयी !

निशान्त : कैसी हो ?

रूही बिना कुछ कहे उस से लिपट गयी !

रूही के पिता जी ने उन दोनों को अकेले छोड़ दिया और अंदर चले गए !

कुछ देर बाद निशान्त के माता पिता जी के साथ लौटे ! उदय निशान्त का सामान ले कर जा चूका था !

सब चुप थे !

उदय ने चुप्पी तोड़ी !

माँ , पिता जी : अब तो भैय्या दीदी कि शादी हो जाएगी ना ?

सब ने ज़ोर से कहा , हाँ आते सोमवार को ही है !

निशान्त ने रात में विपुल को फ़ोन किया : हेल्लो विपुल  , अगले सोमवार को मेरी शादी है और तुम आ रहे हो !

विपुल : अरे कोंग्रेट्स भैय्या ! किस के साथ है ?

निशान्त : उसी के साथ , बचपन कि दोस्त के साथ !

विपुल : ये गलत है भैय्या !

निशान्त : नहीं ये ही सही है !

विपुल : नहीं नहीं बिलकुल गलत है , आप अच्छा नहीं कर रहे हैं और मैं आप कि शादी में नहीं आ रहा हूँ !

निशान्त : अरे मेरी बात तो सुन भाई !

और निशान्त कहने लगा : रूही कि शादी के बाद वो अपने ससुराल चली गयी और में अपनी पोस्टिंग पर ! उसके पति को पोस्टिंग अरुणाचलप्रदेश में मिली ! वहाँ पर किसी घातक बीमारी के कारण उसको सेना कि नौकरी छोड़नी पड़ी और वो घर आ गया ! कुछ दिन बाद यहाँ उसकी डेथ हो गयी ! इस बात कि जानकारी मेरी माँ और पिता को थी लेकिन उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया और उदय को भी मना कर दिया था बताने को ! आज जब मैं उसके घर के सामने से गुजर रहा था तो सब ने मुझे देखा और उदय ने भी ! जैसे सब के मन में एक चीज़ थी जो सब करना चाहते थे ! ईश्वर ने एक दाग तो रूही पर लगा दिया लेकिन एक मौका भी दिया और उदय ने सब को इक्ट्ठा किया और आधे घंटे में सब तय हो गया !

अब तो आएगा ना रूही कि शादी में ?

विपुल ने उधर से रुंधे गले से हाँ कहा !

          समुद्र के किनारे कि रेत ज़यादा देर तक अपने उस आकार में नहीं रहती जो चले गए लोगो के पांव से बनते हैं बल्कि ज़यादा देर तक वो खुशबुएं चारो तरफ रहती हैं जो चले गए मुसाफिर अपने साथ लाये थे !

            अथाह समुद्र से अधिक फैलाव हवा का है !

आनंद सिर्फ अंकित होने में नहीं , आनंद चिन्हित होने में भी है !!