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Friday, February 21, 2014

एक कहानी : " अलविदा "

          अपने साथी डाक्टर्स के साथ हॉस्पिटल के केफेटेरिया से  " प्राचीर "  जल्दी जल्दी लॉबी से होता हुआ मेन गेट कि तरफ बढ़ रहा था ! बीच-बीच में नीचे कि तरफ बाकी डाक्टर्स कि तरफ भी देखता जाता था जो सुबह से सांकेतिक हड़ताल पर थे  और मेन गेट पर इक्कट्ठा थे !
      
अरे , आप यहाँ ?

प्राचीर ने एक ४०-४५ साल कि महिला से पुछा जो लॉबी में पड़े सरकारी लम्बे से लकड़ी के तखत पर बैठी थी !

कोई जवाब नहीं मिलने पर प्राचीर ने फिर से पुछा :

आभा दी आप यहाँ क्या कर रही हैं ? क्या हुआ है आपको ?

कोई जवाब नहीं मिला तो प्राचीर के बाकि साथियों ने भी उस महिला के पास आ कर पुछा आपको क्या तकलीफ है मैडम ?

सर , ये बोल नहीं सकती और सुनाई भी कम देता है ! पानी कि बोतल में सरकारी ठन्डे पानी को भर कर लाता हुआ एक १२ - १३ साल का लड़का बोला जो जल्दी जल्दी उनकी तरफ चला आ रहा था !

प्राचीर : तुम कौन हो ? क्या नाम ?

जी मेरा नाम अतुल है और मैं मौसी कि सहेली का बेटा हूँ ! मेरी माँ और मौसी दोनों एक ही एन जी ओ में काम करते हैं !

प्राचीर : कब से बीमार हैं आभा दी ?

अतुल : पता नहीं , मुझे तो आज माँ ने कहा कि ले जाओ हॉस्पिटल ! पर सर आप कैसे जानते हैं इनको ? क्या ये पहले भी आपके पास इलाज कर चुकी हैं ?

प्राचीर ने कुछ सम्भलते हुए अपने दूसरे साथियों से कहा : स्ट्रेचेर मगवाओ जल्दी !

अतुल और बाकि साथियों ने प्राचीर कि आभा दी को आई सी यू में पहुँचाया ! ड्यूटी पर मौजूद नर्स ने जब एडमिशन फॉर्म भरने के लिए आभा जी डिटेल्स जाननी चाही तो अतुल वहाँ नहीं था ! रुपेश ने बताया कि अतुल बोल कर गया है कि आभा दी का दुनिया में कोई नहीं है और वो अतुल और माँ  के साथ ही वो रहती थी अब वो वापस जा रहा है सुबह आएगा !

नर्स : सर आपने  बिना  किसी  इनफार्मेशन  के  इस  पेशेंट  को  एडमिट  कर  लिया  और  बेस्ट  ट्रीटमेंट भी शुरू करवा दिए हैं अब में कैसे बाकि कि फॉर्मलिटीज़ पूरी करू ?

प्राचीर : लाइए एडमिशन फॉर्म और बाकि के पेपर्स मुझे दीजिये , थोड़ी देर में मुझ से ले लीजियेगा !

शाम के ७ बज रहे थे !

सूरज कि किरणे चन्द्रमा के लिए रास्ता बुहार रहीं थी !

बाहर हवायें हलकी ठंडी हो चली थी  लेकिन आभा दी का माथा अभी भी आग उगलता था ! 

नर्स ने ब्लैक कलर का पेन प्राचीर कि तरफ बढ़ाते हुए कहा : कॉफी लेंगे सर ?

प्राचीर ने पेन लेते हुए हल्की सी मुस्कराहट से हामी भरी !

सुबह के ११ बजे से शाम के ७ बजे तक वो लगातार अपनी आभा दी के साथ था ! जहाँ जरूरत पड़ती थी स्पेशलिस्ट को बुला लेता था !

थोड़ी देर में नर्स ने दो कप कॉफी ले कर दरवाज़े पर दस्तक दी !

प्राचीर : अंदर आजाइए !

नर्स : लोजिये सर !

प्राचीर : अरे , आ खुद ले आयीं !!

नर्स ने पास पड़े एडमिशन फॉर्म और बाकि परमिशन फॉर्म्स देखे सब प्राचीर ने भर दिए थे ! 

आभा दी को अपनी बड़ी दीदी और खुद को उनका छोटा भाई बताया था ! पता अपने घर का दिया था !
रिफरेन्स में अपने पिता का नाम लिखा था ! परमिशन फॉर्म पर खुद सिग्नेचर कर थे !

प्राचीर : कुछ बाकि है सिस्टर ?

नर्स ने एक नज़र प्राचीर कि तरफ देखा और कहा नहीं सर !

दी ठीक हो जायें सब को सब बता दूंगा सिस्टर !

प्राचीर ने एक अद्र्श्य प्रश्न का उत्तर दिया !

नर्स ने अपराधबोध से अपनी गर्दन बाईं तरफ हलके से मोड़ दी !

तुम आज घर नहीं आओगे ?

प्राचीर : नहीं माँ , आभा दी को अभी होश नहीं आया है ?

आभा ? तुम कहाँ हो ? प्राचीर कि माँ ने फोन पर पुछा !

माँ अपने हॉस्पिटल में ही हूँ और आभा दी के पास ही हूँ !

ठीक है हम आते हैं , प्राचीर कि माँ बोली !

प्राचीर के आँखे डबडबाई हुई थी ! आभा दी के शरीर में कोई हलचल नहीं थी अभी भी !

सर आप भी थोडा आराम कर लीजिये हम हैं यहाँ ! प्राचीर के साथी रुपेश और जलज ने प्राचीर के कन्धों पर हाथ रखते हुए कहा !

     बस , ऑखें छलक गयी प्राचीर कि , वाशरूम कि तरफ बढ़ता हुआ लगभग रोने लगा था वो !
कुछ देर में बाहर आया तो बाकि साथी भी आ चुके थे !

जलज : सर, अभी डाक्टर बेनेर्जी आये थे और कहा है कि अगले १ घंटे में अगर कुछ डेवलपमेंट नहीं हुआ तो ट्रीटमेंट चेंज करंगे !

प्राचीर ठीक है कहता हुआ आभा के सिरहाने जा कर बैठ गया ! आभा दी का हाथ अपने हाथों में लेता हुआ बोला सिस्टर कमरे कि सारी लाइट्स ऑन कर दीजिये प्लीज़ !

डॉ.रुपेश , डॉ.जलज , डॉ.नयन , डॉ.कुणाल और सिस्टर नंदिता सब प्राचीर को देख रहे थे !

बाहर अँधेरा गहराता जाता था और कमरे के भीतर सन्नाटा !

       जब कोई ५ साल का था तब आभा दी से पहली बार मिला था मैं ! अपने घर के सामने वाले पार्क में दो ग्रे रंग के बॉक्स ले कर बैठी थी वो और पार्क के किनारे पर पीले रंग का एक कपडे का बेंनर लगा था " पल्स पोलियो रविवार " दो बूँद ज़िदगी कि !

प्राचीर अपनी आभा दी का हाथ पकडे पकडे बोलता जा रहा था !

       माँ ने मुझे और मेरे चचेरे भाई को आभा दी के पास से दो बूँद दवा पिलवाई थी  ! दीदी ने मेरी नन्ही सी छोटी उंगली पर एक नीला सा निशान लगाया था और हम दोनों को एक एक प्लास्टिक कि सीटियाँ दी थी ! दिन भर उछलते फिरे थे हम सीटियां बजाते हुए !

कमरे के सन्नाटे को जैसे हलकी सी चपेट पड़ी हो , सब के चेहरे मुस्कुरा रहे थे !

           हर महीने , दो महीने में आभा दी आ जाती थीं पार्क में और मेरी माँ मुझे हर बार दवा पिला कर लाती थी ! जब में बड़ा हुआ तो तो मैं छोटे बच्चो को दी के पास ला कर दवा पिला देता था और सीटियां बांटता था ! वैसे तो दी अपने साथ अपना लंच लाती थी लेकिन कभी कभी में माँ या चाची कभी चाय और नाश्ता मुझे देती थी दीदी को देने के लिए ! घर पर भी आकर बैठ जाया करती थी दी ! एक बार दी को मैंने साड़ी पहने देखा हाथों में भरी भरी चूड़ियाँ , मांग भरी हुई - शादी हो गयी थी दीदी कि !
         जब मैं छोटा था तब वो शायद स्कूल में पढ़ती थी तो सूट सलवार में आती थी ! फिर मेरे इंटरमीडिएट कर लेने के बाद एक रोज़ पता चला  कि आभा दी के पति का रोड एक्ससीडेंट में देहांत हो गया , दूसरी वाली आंटी ( अतुल कि माँ ) मेरी माँ से बता रही थी ! फिर उसके बाद कभी नहीं देखा दी को बस अचानक आज यहाँ मिला हूँ !

कैसी है आभा अब ? प्राचीर कि माँ ने अंदर आते हुए पुछा !

      प्राचीर सिरहाने से उठकर माँ के पास जाने लगा तो आभा कि हलकी पकड़ से वो अपना हाथ छुड़ा नहीं सका !

      जैसे गीली हो चुकी अपनेपन कि मिटटी से दूरियों का पानी निचुड़ चूका था और बंधन अपनी आभा पर था , आस यथार्थ में परिवर्तन होना चाहती थी !

डॉ.बेनेर्जी को बुलाओ दी को होश आ रहा है  : प्राचीर ने कहा !

दी आप मुझे सुन सकती हो ? प्राचीर ने आभा से पुछा !

आभा ने सर हिलाया और जैसे कहा कि तुमने जो भी कहा मैंने सब सुना बेटा !

कमरे में  चेहरों पर ख़ुशी थी !

        आभा ने सबसे पहले प्राचीर  को अपना माथा नीचे करने का इशारा किया और चूम लिया !

असीम संतोष ,  अलौकिक आनंद ,  प्रगाढ़ स्नेह ,  निःस्वार्थ समर्पण दोनों तरफ से !

    सब आनंद मूर्तियों से खड़े निःशब्द कमरे में हो रहे मंचन को देख रहे थे , जिस जीवन नाट्य के वो खुद भी पात्र थे !

आभा दी अब आप बिलकुल ठीक हो जाएंगी और फिर हमारे साथ ही रहेंगी !

         प्राचीर कि माँ सोफे पर बैठे बैठे सब देखती जाती थी , सोचती जाती थी उन्होंने तो सिर्फ एक प्राचीर को अपने पैरों पर  खड़ा किया लेकिन आभा ने तो अनगिनत बच्चो को उनके पैरों पर खड़े
रह सकने लायक बनाया और आज वो खुद सहारे कि मोहताज है ! किस ले लिए जिन्दा रही वो अब तक और आगे किस ले लिए रहेगी ?

आभा ने  प्राचीर कि माँ से मिलने के लिए इशारा किया , माँ के हाथो में हाथ ले कर रो पड़ी दोनों !

डॉ.बेनर्जी कमरे में आ चुके थे और बोले :  अब सबको बाहर जाना होगा , प्राचीर तुम अंदर ही रुको !

सब बाहर पड़े सरकारी लकड़ी के तख़्त पर बैठे थे ,कोई खड़ा था !

सब अपने को प्राचीर और आभा दी कि कहानी का एक पात्र मान खुशनुमा अंत कि और बढ़ रहे थे !

रुपेश कि नज़र कमरे के अंदर गयी और चहरे से सारी ख़ुशी काफूर !

            प्राचीर कि आभा दी जा चुकी थी और प्राचीर अपने बचपन ,किशोरावस्था की अनेकानेक
घटनाओं कि खुलती बंधती गाठों में यादों कि खुशबूओं को जीता जाता था ताकि उनकी आभा और बढे अपनी आभा दी को अलविदा कहता हुआ  !

       सही है ज़िन्दगी सिर्फ दो बूंदों कि सी ही है , जीने वाले इसे सागर में तब्दील कर लेते है, जीने के कारण तलाश कर !!

एक कहानी : अलविदा , आभा दीदी !!

Wednesday, November 13, 2013

एक कहानी : " अखबार, लोगे बाबू !! "

         " शलभ " कोलकत्ता के नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हवाई अड्डे से बहार आ कर अपने लिए भेजी गयी टैक्सी का इंतज़ार कर रहा था कि तभी ड्राईवर का फ़ोन उसके मेहेंगे मोबाइल पर आया और उसने आधे घंटे का बाद आने कि बात बड़े परेशानी से कही कि ट्रेफिक में फंस गया है ! 
           ये बात जैसे " शलभ " के लिए जैसे मन कि मुराद  पूरी होने जैसी थी ! वो तो चाहता था कि बरसों बाद अपने शहर आया था तो कुछ समय मन भर इसे देख ले कि कितना बदल गया है कोलकत्ता और उसकी वो गालियां जहाँ वो " अमृत बाजार पत्रिका " और " दैनिक आज " अखबार को सड़कों पर दौड़ दौड़ कर बेचा करता था टैक्सी वालों , रिक्शा वालों , साईकिल वालों , ठेलों वालों , मछली वालों , डबल रोटी वालों, चाय वालों , कार वालों , बस में , ट्राम में , मेट्रो स्टेशन के बाहर , रेलवे स्टेशन पर , हावड़ा ब्रिज के इस पार से उस पार मिनी बस में , हुगली नदी कि लहरों में नाव पर " झाल मुढ़ी " खाते हुए , कुल्हड़ में दो घूँट चाय को सुड़कते हुए हाफ पैंट और नीली हाफ कमीज़ में ! 
             कोलकत्ता कि पहचान " पीले और काले " रंग कि एक टैक्सी को शलभ  ने प्रीपैड काउंटर से बुक किया और होटल का पता बताते हुए चलने को कहा ! एयरपोर्ट से सिर्फ १० मिनट कि दूरी पर ही था होटल ! टैक्सी ड्राईवर ने  मायूस हो कर शलभ को देखा और अटेची ले कर डिक्की में डाली ! तब तक शलभ टैक्सी में बैठ चुका  था ! लेपटॉप का बैग अपने साथ ले कर !

टैक्सी डाइवर : कोथाय थिके एशेछैन अपनी ? ( आप कहाँ से आये हैं ? ). 

शलभ : काठमांडू !

टैक्सी डाइवर : ठीक आछे ! कोलकाताये कि काज ? ( कलकत्ता में क्या काम है ?) 

शलभ : एक बड़ा ठेका मिलने वाला है अनाथालयों में कपडे सप्लाई का , उसकी हो मीटिंग है सरकारी अधिकारिओं के साथ कल !

टैक्सी ड्राईवर : आप क्या करते हैं ?

शलभ : नेपाल में गारमेंट कि एक बड़ी विदेशी कंपनी में बड़ा अधिकारी हूँ !

टैक्सी ड्राईवर : सही है !

टैक्सी छोटी बड़ी गलियों से होती हुई गुज़र रही थी ! शलभ ५ साल के बच्चे कि तरह एकटक  अपनी ठुड्डी को टैक्सी कि खिड़की पर टिकाये बाहर  सब देखता जाता था और कुछ सोचता जाता था ! 

             विक्टोरिया मेमोरियल के सामने से गुजरते हुए हाफ पेंट में घुमते बड़े , छोटे लोग मॉर्निंग वाक करते दिखे ! उनके साथ उसने खुद को दौड़ता पाया बायें हाथ पर अखबार लिए ! ले लीजिये बाबू आज कि सबसे पहली खबर है मेरे पास ! साथ में २ पन्नो का एक मेगजीन भी है " फोकट " का ! किसी को दो रूपये किसी को डेढ़ रूपये का, पचास पैसे उधार कर के सब अखबार २ घंटे में बेच डलता था " शलभ " ! फिर काका कि दूकान पर कुल्हड़ कि चाय और फेन खाता था ! वापसी में एक रुपए कि जलेबी और दही ! बस हो गया नाश्ता ! पास का स्कूल और स्कूल में  मास्टर जी कि डाँट ! अनाथाश्रम में ही रहता था ! वहीँ हावड़ा ब्रिज के उस कोने पर तो था वो घर जहाँ तो आठ साल रहा ! कौन लाया उसको आज तक कोई बता नहीं सका ! जब आया था तो घोषाल दा थे और अब वो नहीं हैं ! उनके समय में ही एक मारवाड़ी परिवार जो नेपाल में कपड़ो का व्यापार करता था ने उसको गोद ले लिया था ! 

" अखबार लोगे बाबू ? "

किसी ने जैसे अचानक चलती हुई ब्लेक एण्ड वाइट पिक्चर के सामने रंगीन शीशा रख दिया हो ! 

एक १० साल का लड़का शलभ के कंधे पर हाथ रख कर पूछ रहा था : अखबार लोगे बाबू ?

शलभ ने अपनी आँखों कि गंगा - जमुना को रुमाल रुपी शिवजटा में सँभालते हुए उस लड़के से पुछा : कितना अखबार बेच लिया अब तक ?

लड़का : १० रुपया का !

शलभ : कितना का लिया है सब ?

लड़का : १०० रुपया का !

शलभ : कितना कमा लेगा ?

लड़का : पता नहीं,  लेकिन मेरे स्कूल का फीस और खाने का पैसा जुट जाता है, बाबू !

शलभ के तन में जैसे सिहरन सी दौड़ गयी !

              ये ही तो उसके भी गणित थे उस समय , जब वो अखबार बेचता था ! आँखों कि नदियां उफान पर थीं ! सब बाँध तोड़ कर बाहर आना चाहती थी ! उसने टैक्सी का दरवाज़ा खोला और सड़क के किनारे उस लड़के के कन्धों पर हाथ रखता हुआ बैठ गया ! टैक्सी ड्राईवर भी उतर कर आती जाती गाड़ियों को देखने लगा !

शलभ  ने अपने सिगारदान से महंगा सिगार निकाल कर लाइटर से सुलगाया और अखबारवाले लड़के से  बांगला पुछा : तुमार नाम कि ? ( तुम्हारा नाम क्या है ? ) .

लड़काअनिरुद्ध। 

शलभ : अच्छा अनिरुद्ध ये सब अखबार तू मुझे बेच दो और ये लो १५० रूपए !! 

अनिरुद्ध : जी अच्छा ,  अखबार आपकी गाड़ी कि डिक्की में रख देता हूँ !

और उसने वैसा ही किया ! फिर से उसके पास आ कर बैठ गया !!

शलभ सिगार के कश लेता जाता था और अनिरुद्ध से बतियाता जाता था !

शलभ को कुछ देर बाद ये महसूस हुआ कि अनिरद्ध उसकी बातों को ठीक से सुन नहीं रहा है , तो उसने अनिरुद्ध कि तरफ देखते हुए पुछा : कि रे कि होलो ? ( क्या हुआ ? ).

अनिरुद्ध ने परेशानी भरे अंदाज़ में जवाब दिया : मुझे जाना होगा दादा !

शलभ : क्यों, तुम तो ये अखबार २ घंटों में बेचते हो , और १०० रुपया कमाते हो जो कि तुम आज ५० रुपया ज़यादा कमा ही चुके हो फिर किस बार कि जल्दी है ! अभी तो डेढ़ घंटा है तुम्हारे स्कूल को खुलने में !

अनिरुद्ध : दादा , सब अखबार तो आपने ले लिए हैं और आज  मदर टेरेसा के अनाथाश्रम में अगर मैं आज अखबार नहीं दूंगा तो वहाँ कि सिस्टर बच्चो को खबर कैसे सुनाएंगी ,असेंबली में ?

आज बेनेर्जी बाबू कि पान कि दूकान पर अखबार नहीं गया तो वहाँ के लोग कैसे अपना बीड़ी सिगरेट लेंगे !

वो मेट्रो वाले ड्राईवर दादा आज परेशान हो जाएंगे ! 

घोष जी कि दूकान पर आज चाय कैसे बिकेगी !

सरकार अंकल आज अपनी बाउड्री से बाहर ही खड़े रेह जाएंगे , नाश्ता भी नहीं लेंगे !

शलभ सब सुनता जा रहा था !

मानो पूरा कोलकत्ता अनिरुद्ध के ही चलते रहने पर चलता हो ! ठीक पंद्रह साल पहले ऐसे ही ये कोलकत्ता शलभ के चलने पर चलता था !

शलभ ने अनिरुद्ध कि भावनाओं का सम्मान करते हुआ , सब अखबार उसको वापस किये और ५० रूपये और दिए ये कहते हुए कि तुमने मुझे कुछ भी भूलने नहीं दिया अनिरुद्ध - धन्यवाद !.

टैक्सी आगे बढ़ गयी !

              काली मंदिर के सामने से गुजरी तो शलभ ने प्रणाम किया और फिर खो गया अपने बचपन में ! पास के मेट्रो स्टेशन से मेट्रो ले कर पूरा महीना दसवीं के एग्जाम दिए थे ! जोमेट्री बॉक्स नहीं था तो मंदिर के पास कि जानी बाबू से रिक्वेस्ट कि थी और उन्होंने उसे बिना सवाल किये जोमेट्री बॉक्स और एक फाउंटेन पेन स्याही भर कर दिया था अपने आशीर्वाद के साथ कि सफल हो जाओ !  रिज़ल्ट  के दिन शाम को जब घोषाल बाबू जी अनाथाश्रम कि देख रेख करते थे , ने उसको और उसके दो साथियों को पास होने कि ख़ुशी में ५० - ५० रूपये दिए थे ! शलभ दौड़ता हुआ काली मंदिर आया था ! माँ को प्रणाम कर के जानी बाबू को जोमेट्री  बॉक्स के पैसे चुकाए थे ! १५ साल पहले ही पूरी कहानी उसके सामने से गुजर रही थी !!

टैक्सी ने हार्न बजाया ! शलभ का ध्यान टूटा ! सामने से सर पर मछली लिये एक मछली वाली जा रही थी ! ताज़ा ताज़ा मछली कहाँ मिलती है कोलकत्ता के सिवाय !

             टैक्सी धीरे धीरे होटल के पास पहुच रही थी ! टैक्सी से लगभग सट कर ट्राम चल रही थे ! पैदल कितना रेस लगता था शलभ ट्राम से अपने बचपन में ! अखबार हाथों में लिए पूरा का पूरा इलाका नाप लेता था ! वो दिन याद जब वो ट्राम में एक मारवाड़ी परिवार जो कोलकत्ता घूमने आया था को हिंदी अखबार बेच रहा था उस से उनकी धोती कि तारीफ़ निकल गयी ये कहते हुए :

         साब , आपकी धोती में जो डिजाइन है अगर उसमे लाल रंग का एक धागा और पड़  गया होता तो ये सुनेहरा रंग और खिल जाता सफ़ेद रंग कि धोती पर ! बस उन्होंने मुझे कानून गोद ले लिए और अपने साथ नेपाल ले गए ! देस विदेस में पढ़ कर अपना काम कर रह था , कपडे कि ट्रेडिंग का ,  पर काम सीखने कि ठानी और बड़ी कंपनी में आज बड़े पद पर है ! उसी  के सिलसिले में कोलकत्ता आया है ! अपने शहर  कोलकत्ता जो  आज भी अपने आँचल में कई शलभ , कई अनिरुद्ध लिए चलता है !
        हावड़ा ब्रिज आज भी अपनी छाती पर सैकड़ों गाड़ियों का बोझ ले कर खड़ा है ! हुगली ने जाने कितना पानी सागर में मिला दिया ! इन पंद्रह सालो में !

सुदीप्तो : दादा , होटल आ गया !

शलभ ने बिना टैक्सी से उतरे सुदीप्तो से वापस विक्टोरिया मेमोरियल चलने को कहा !

सुदीप्तो : क्यों दादा ? अभी तो वहीँ से आये हैं !

शलभ : सुदीप्तो मैं एक चीज़ भूल आया वहाँ कि सड़कों पर ! जल्दी चलो नहीं तो कोई और ले जाएगा !

सुदीप्तो हल्का सा मुस्कुराया और टैक्सी ले कर चल दिया वापस उसी रास्ते पर जिस से आया था !

दोनों कि निगाहें इधर उधर कुछ तलाश कर रही थीं और वो था कि दीखता ही नहीं था ! ( आप भी समझ गए ना कि क्या तलाशना है ? ).

आधा घंटा बीत गया ! वो नहीं दिखा ! सुदीप्तो और शलभ जैसे एक सुई तलाश रहे थे कोलकत्ता कि भीड़ में !

टैक्सी रेड लाइट पर रुकी , किसी ने शलभ के हाथ पर छूते हुए पुछा : अखबार लोगे बाबू ?

शलभ  ने गहरी सांस भरी और बहने दिया गंगा जमुना को !

दरवाज़ा खोल कर अनिरुद्ध को टैक्सी के अंदर बैठा लिया और चल दिया उसके अनाथाश्रम क़ानूनी कारवाही ख़तम करने के लिए !

तभी उसके फ़ोन कि घंटी बजी !

दूसरी तरफ से : तुम अभी होटल नहीं पहुचे शलभ,  मेनेजर का फ़ोन आया मेरे पास था !

शलभ : बाबा , अपने लिए एक भाई तलाश रहा था !

बाबा : मिला ?

शलभ : हाँ , बिलकुल मेरे जैसा है !

                                                                                        : By Manish Singh


Monday, October 7, 2013

व्यवस्थाएं , आकाशगंगा सी !!


व्यवस्थाएं,
और हम,
तलाशते है ,
एक दुसरे को,
सतत जीवन की,
पहचान यात्रा में,
सांसों की डोर ,
के थमने तक !

परिधि,
सरकारी,
सामाजिक,
पारिवारिक,
व्यवस्थाओं की,
बढती ही जाती है,
आकाशगंगा सी,
खोज यात्रा में,
इन सब की !

Saturday, September 7, 2013

आशाएं , भ्रमित रखती हैं !!

आशाएँ, 
आकांक्षाएँ,
अभिलाषाएँ , 
रोके रहती हैं,
अनगिनत,
सिन्धु एवं गंगाएं,
पलकों पर !

निर्बाध,
बह निकलती हैं,
आँसू बन,
अवसरों पर, 
दोनों के , 
पूरा होने ,
और, ना होने पर भी  !

आशाएं , 
भ्रमित रखती हैं !
सिन्धु ,
रुके रहते हैं,
निरंतर,
अचेत , होने तक ,
बहने के लिए !

Thursday, August 15, 2013

उधार पर लिए, तिरंगे बेच कर !

आज के लिए,
वो कल,
जल्दी सोया,
भूखा ही !

विकास पथ पर,
लाल बत्ती पर,
चौक के,
फास्ट फ़ूड के पास !
हम सब ने,
उसे देखा,
अनदेखा ,
करते हुए !

उधार पर लिए,
तिरंगे बेच कर,
जीवित रखने के लिए
स्वतंत्रता को ,
प्रयासरत !

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं !

: मनीष सिंह 

Thursday, June 27, 2013

एक कहानी : हाईवे !!

                                तेज़ हवाओं और धूल का दौर अभी अभी ख़तम हुआ था !

         हलकी बूंदा बांदी होने लगी थी ! करण अपनी 2nd हैण्ड मारुती 800 के सामने वाले शीशे को साफ़ करने के लिए हाई वे के किनारे रुक कर कपड़ा ढूँढने लगा ! कपडा  डेशबोर्ड में मिला !
शीशा साफ़ कर के चलने को हुआ की पीछे से एक १६  - १८ साल के लड़के ने उसे पुकारा :

Excuse me सर !

करण ने पीछे मुड़ कर देखा : कौन ?

सर , मैं अनिरुद्ध हूँ !

करण : ओके, मुझ से क्या चाहते हो ?

अनिरुद्ध : सर अगर पुणे तक जा रहे हों तो मुझे भी बस पुणे के एंट्री पर ड्राप कर दें तो मेहेरबानी होगी ! मैं किराया दे सकता हूँ सर लेकिन मौसम खराब होने के कारण कोई बस नहीं आ रही और मेरे पास ये एक ही ड्रेस है जो गन्दी हो सकती है , काम पर पहुचने तक !

वो सब कह गया एक सांस में !

करण हलकी सी मुस्कुराहट के साथ सब सुनता रहा !

करण ने बिना एक मिनट लगाये उसको कहा : ठीक है अन्दर आ जाओ !

और  दूसरी तरफ का दरवाज़ा खोल दिया ! 

अनिरुद्ध अन्दर बैठ गया !

            बहार का मौसम काफी खराब हो चूका था ! तेज़ बारिश और हवा के करण कार चलाना मुश्किल हो रहा था ! कुछ भी साफ़ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था !

अनिरुद्ध शांत लेकिन बेचैन सा सावधान सा बैठा था !

कभी वो करण को देखता तो कभी बहार सामने पड़ने वाली बारिश की बूंदों को !

बीच बीच में बगल से बड़े बड़े ट्रक और गाड़िया तेज़ रफ़्तार से निकल जाती थी ! 

संतोष और बेचैनी का अजीब सा सन्नाटे वाला समय था उन दोनों के लिए कार के अन्दर !

       करण ने ऍफ़ एम् का कोई स्टेशन ट्यून करने की कोशिश करी ! मौसम के कारण सिर्फ घरघराहट के कुछ भी सुनाई नहीं देता था ! काफी कोशिश के बाद उसने कोशिश बंद कर दी और हंसते हुए अनिरुद्ध की तरफ देखा ! दोनों मुस्कुरा दिए ! कार अपनी धीमी रफ़्तार से पुणे की और बढ़ रही थी !
      लगभग 15 मिनट की ख़ामोशी के बाद करण ने अनिरुद्ध से पुछा : कहाँ रहते हो ?

अनिरुद्ध : सर, बस जहाँ से आपके साथ हूँ वह्नी हाई वे से नीचे की तरफ कोई २ किलोमीटर पगडंडी के रस्ते पर मेरा गाँव है !

करन : वहां सड़क नहीं है ?

अनिरुद्ध : है सर , लेकिन सड़क से कुछ दूरी बढ़ जाती है तो बाइक और पैदल सब लोग ईसिस रस्ते से जाते हैं !

करण : हम्म !! क्या करते हो ?

अनिरुद्ध :  सर , ओपन यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएसन कर रहा हूँ ! सब्जेक्ट इकोनोमिक्स हैं !

करण : अच्छी बात है ! अब कहाँ जा रहे हो !

अनिरुद्ध जैसे ही  बोलने को हुआ करन का मोबाईल बज उठा !

करण  : हाँ बोलो भाई !

कारन की पत्नी थी दूसरी तरफ से ! करण को उसकी वाइफ़ ने बताया की आगे पुणे हाई वे पर एक बड़ा सा हादसा हुआ है इस लिए जाम लग गया है !

करण  की वाइफ़ : तुम कहाँ हो इस वक़्त ?

करण : अब पता नहीं चल रहा , रुको देखता हूँ गाड़ी रोक कर !

करण ने अनिरुद्ध को बताया की उसकी वाईफ ने खबर दी है की आगे जाम है और हम शायद फंस चुके हैं जाम में ! आगे जाम और पीछे से गाड़ियों का रेला , कार मोड़ कर वापस जाने का कोई चांस नहीं !  बस चलते रहना होगा !

करण अपनी वाइफ़ से बोला : हमें अभी जाम नहीं मिला है और पीछे हम जा नहीं सकते ...इस लिए अब जो भी हो पुणे तो पहुचना ही होगा , तुम चिंता मत करो , और बार बार फ़ोन मत करना मैं वहां पहुच कर खुद कन्फर्म कर दूंगा , चलो बाय !

करण के चहरे पर थोड़ी शिकन आ चुकी थी ! शायद मीटिंग में देर से या फिर न पहुचने की शंका थी ! इधर अनिरुद्ध भी परेशान था ! सबरे जल्दी निकला था की 8 बजे की शिफ्ट पर टाइम पर पहुच जाएगा तो एक दिन की तनख्वाह नहीं कटेगी , लेकिन शायद ये भी संभव नहीं दिखाई दे रहा था उसको भी !

कार में फिर से ख़ामोशी !  शीशों पर पड़ती बारिश की बूंदों की आवाजें आज अच्छी नहीं लग रही थी ! गर्मी से तपते वातावरण में खुशनुमा सुगंध तो थी लेकिन दोनों का मानस चिंता में था !उलझन में था ! 

अब कार की गति और धीमी हो चुकी थी ! आगे सब रुके थे जो इनको तेजी से पीछे छोड़ कर आगे निकल गए थे वो भी कशमकश में थे !

करण ने अनिरुद्ध को देखा और दोनों फिर से मुस्कुरा दिए ! जैसे कह रहे हों भाई अब तो साथ पुणे तक है ही चाहे जो हो !

तभी अचानक करण को जैसे कुछ याद हो आया हो और अनिरुद्ध से बोला : तुमने बताया नहीं की कहाँ जा रहे हो ?

अनिरुद्ध : सर पुणे में एक तीन स्टार होटल में सर्विस बॉय का काम करता हूँ , सबेरे आठ बजे से शाम के आठ बजे तक !

करण : ने अपनी कलाई की घडी की तरफ देखा और बोला : अरे आज तो तुम समय से नहीं पहुच सकोगे  ! देखो 10 तो यहीं बज गए और पता नहीं कब तक रुकना पड़े !

अनिरुद्ध : हाँ सर आज तो हम दोनों परेशान हो गए !

करण : तुम्हे आज की सेलेरी नहीं मिलेगी ?

अनिरुद्ध कुछ नहीं बोला बस सर झुका लिया !

कार की छत पर बारिश की आवाज़ तेज़ हो चली थी  ! अन्दर भी जोर दे कर बोलना पद रहा था !

करण  : घर पर कौन है तुम्हारे ?  वैसे अब हम दोस्त हो गए हैं तो ये जान सकते हैं ! संकोच हो तो कोई बात नहीं !

अनिरुद्ध : अरे नहीं सर , अब हम दोस्त हैं और सफ़र लम्बा होगया है ! एक दुसरे को जान लेना लाज़मी हो गया है अब ! मेरे घर पर एक छोटी बहन है , पिता जी हैं और दादी है ! माँ नहीं है ! हम सब साथ रहते हैं ! पिता जी शुरू से ही घर पर रहे और खेतीबाड़ी का काम देखा और हम भी इसी कारण गाँव में , गाँव की रफ़्तार से ही प्रगति कर सके ! बाकि चाचा लोग बहार शहर में रहते हैं और सब ठीक ठाक हैं !

करण  सब सुन रहा था , अनमने ढंग से जैसे उसको तो बस रास्ता ख़तम होने की चिंता थी ! लेकिन अनिरुद्ध सब सही सही बता रहा है !

करण  : अच्छा !

अनिरुद्ध : सर आप क्या करते हैं और आपके घर पर ......!!

करण हलकी मुस्कान से अनिरुद्ध को देखते हुए बोलने लगा ! : हम बेसिकली चंडीगढ़ से हैं ! मुंबई में अपना घर है और मैं काम भी वहीँ करता हूँ ! एक मल्टीनेशनल कंपनी में ! ये मारुती तो हमारे सर्वेंट की है वो सब्जी और घर के काम के लिए इस्तेमाल करता है ! हमारे पास तीन बड़ी गाड़ियाँ हैं !

अनिरुद्ध ध्यान से सब सुन रहा था ! बारिश कम थी इस लिए आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी ! कभी कभी बीच बीच में सड़क पर देख लेते थे की रास्ता खुला की नहीं ! कारन बोलता जा रहा था !

करण : आज तीनो गाड़ियाँ सर्विस पर दी हैं और मुझे अर्जेंट यहाँ पुणे एक मीटिंग में आना था इस लिए ये ले आया !  घर पर एक माँ और पत्नी है ! पिता जी का देहांत हो चूका है ! रेलवे में बड़े अधिकारी थे ! 25 हज़ार रुपया माँ को उनकी पेंशन आती है !

अनिरुद्ध सोच रहा था और सुन रहा था ! उसने  ने बहार झाँक कर देखा तो घुमावदार सड़क पर रिमझिम बारिश में उनकी कार के पीछे और आगे अनगिनत गाड़ियाँ खड़ी थी ! एक राई के भी बराबर आगे पीछे खासकने की जगह नहीं थी !  आधुनिकता की पराकाष्ठा ये की एक नियत जगह से पहले कोई चाय , बिस्किट वाला नहीं मिलेगा इन हाई वे पर !

दोपहर के २ बज चुके थे !

करण  : भूख लग रही है ! कुछ खाने का भी नहीं रखा इस कार में ! बड़ी गाड़ी में तो सब रहता है ! सुबह हल्का नाश्ता ही किया था ये पता नहीं कब हम पुणे न सही कम से कम किसी ढाबे तक तो पहुचे!

अनिरुद्ध ने संकोच के साथ कहा : सर मेरे पास लंच है , आइये दोनों मिल कर खाते हैं !

करण : अरे नहीं ! तुम खाओ ! लो ये पानी की बोतल ले लो !

कुछ अच्छा नहीं लगा अनिरुद्ध को करण  का ऐसे मना कर देना ! फिर हिम्मत भी नहीं हुई दोबारा से पूछने की ! कितने बड़े घर से हैं करण , उनको कहाँ अच्छे लगेंगे उसकी बहन की हाथ की रोटियां और अचार !  अनिरुद्ध बस चुप चाप बैठ गया ! 

कभी रेडियो , कभी कार का शीशा , कभी बहार खड़े हो कर पड़ोस वाले कार वाले से बतियालेने में समय गुजर रहा था ! धीरे धीरे शाम के 4 बज गए ! करन को अब भूख बर्दाशत नहीं हो रही थी और ट्रेफिक था की टस से मस नहीं हो रहा था ! करण  से रहा नहीं गया और अनिरुद्ध से बोला : चलो अब लंच कर ही लेते हैं और अनिरुद्ध की तरफ हाथ बढ़ा दिया ! अनिरुद्ध सकते में था !

आनन् फानन में अपनी पेंट की जेब से एक पोलिथीन में लपेटे हुए पेकेट को करण की तरफ बढ़ा दिया !

करण  ने पेकेट खोल कर दो रोटियां अनिरुद्ध को दी और दो खुद ली एक एक अचार की फांक भी बाँट ली और खाना शुरू किया ! खाते समय दोनों कुछ नहीं बोले ! पानी पिया और सुकून लिया ! जैसे अगले 4 घंटो के लिए जान आ गयी हो !

अब दोनों को नींद आने लगी थी ! तभी अनिरुद्ध की तरफ किसी ने ठक ठक किया !

अनिरुद्ध : हाँ , क्या है ?

बाहर 10 साल के आस पास का एक लड़का मूंगफली बेच रहा था !

करण  ने 4 पेकेट ख़रीदे !

अब कार और दूसरी गाड़ियाँ आगे को सरक रही थी ! जाम खुल चूका था ! शाम के ५ बजे का समय था ! पुणे आने वाला था !

अनिरुद्ध बोला : सर आप मुझे यहीं ड्राप कर दीजिये मैं वापसी की बस ले लूँगा , अब होटल का तो समय रहा नहीं !

करण : नहीं तुम मेरे साथ चलो !

करण  अपने साथ उसको अपने पुणे के ऑफिस ले आया ! ऑफिस में चाय , काफी और समोसे भजिया का लुत्फ़ ले रहे थे सब !

करण  : हेलो !

कोई चार पांच लोग एक साथ करण का जवाब दे रहे थे : हेलो , अरे कहा थे भाई ?

बस हाय वे के जाम में था ! करण  एक काफी अनिरुद्ध की तरफ बढ़ाते हुए बोला !

भाई मीटिंग तो कल के लिए पोस्टपोन हो गयी है !

अब क्या वापस जाएगा मुंबई !

यही गेस्ट हॉउस में रुक जाओ कल मीटिंग अटेंड कर के चले जाना एच आर में हम बोल देते हैं !

करण  : हाँ वो कोई बात नहीं है !

आज रात मेरे साथ ये मेरा दोस्त अनिरुद्ध भी रुकेगा ! 

हम दोनों हाई वे के साथी हैं अपनी कंपनी में इसके लिए काम देखना हैं बस !

अनिरुद्ध को काम मिल गया !  ऑफिस  का काम ! सुबह ९ बजे से शाम ५:३० बजे तक का ! अब वो अपनी पढ़ाई ठीक से कर सकता था !

करण के फ़ोन से अनिरुद्ध ने अपने घर फोन कर दिया की और कल शाम को आयेगा !

उस रात बड़े बड़े लोगो के साथ उसने एक बड़े होटल में डिनर किया !

वैसे ये डिनर  उसके लिए नया नहीं था ! बस फर्क इतना था आज की वो टेबल के इस तरफ था !

करण  ने मीटिंग अटेंड कर ली !

  अनिरुद्ध ने पुणे के तीन स्टार होटल में जा कर उस दिन का काम संभाला और अपना रिजाइन दिया सब कुछ सही सही बताते हुए ! उसको सम्मान के साथ विदाई मिली ! 

शाम को एक आइसक्रीम की दूकान पर वो करण से मिला जहाँ कारन ने उसको आने को कहा था और
दोनों वापस मुंबई की तरफ चल दिए !

रस्ते में अनिरुद्ध को उसके गाँव के पास छोड़ कर करण आगे चल दिया !

करण   का मोबाइल नंबर अनिरुद्ध के पास था ,आगे किसी भी बात के लिए !

बॉम्बे पुणे हाई-वे के साथी दूर - दूर हो चले ,  लेकिन अब एक ही कंपनी में साथ- साथ थे ! 

साथ संबंधों में प्रगाढ़ता लाता है , और दूरियां परिपक्कवता !!

                                                                                                 :: ~~ :: मनीष सिंह

Saturday, June 1, 2013

एक कहानी : कांच के चार गिलास !!

          सुबह के पांच बज रहे थे ...कालका मेल धीरे धीरे कालका स्टेशन के प्लेटफार्म पर लग रही थी !   सब की  जानी पहचानी आवाज चाय चाय चाय  सुनाई देने लगी थी ! सब सुकून से बैठे थे !
किसी को जल्दी नहीं थी ट्रेन से उतरने की ! यहाँ के बाद अगली ट्रेन कोई तीन घंटो के बाद थी !
          तीस लोगो का ग्रुप था ! दिल्ली से कालका होते हुए शिमला के लिए निकला था ! उज्जवल ने सारा इन्तेजाम किया था अपनी शादी की ख़ुशी में ! दोस्तों ,रिश्तेदारों को ले कर घूमने निकला था !
सब अपने अपने सामान के साथ कालका के प्लेटफोर्म पर ठाकाहे लगा रहे थे ! आने जाने वाले उनको देख देख कर अपने ज़माने को याद कर रहे थे ...जब वो ऐसे मजा करते थे !  फिर उम्र और जिम्मेदारियों के साथ साथ सब पिघल गया जीवन की मोमबत्ती की तरह !

उज्जवल ने सबका धयान अपनी और खीचा :हाँ भाई लोग कौन कोन समोसे खायगा और
कौन कौन ब्रेड पकोड़े और कौन कौन ये दोनों खायेगा जल्दी बोलो , आर्डर करना है !

सब एक साथ बोल रहे थे ! किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था !

उज्जवल : ठीक है सब के लिए सब ले लेता हूँ !

दूर खड़ा रवि ये सब देख रहा था !

रवि हाँ वहीँ की एक बड़ी मिठाई की दूकान पर काम करता है ! उज्जवल ने उसे ही बुलाया था अपने ग्रुप के लिए नाश्ते का इंतज़ाम करने के लिए !

उज्जवल : देख रवि तू देख ही रहा है यहाँ कुछ भी क्लियर नहीं है तो तू एसा  कर तीस समोसे , तीस ब्रेड पकोड़े और पचास कप चाय का इन्तेजाम कर दे ! ये पकड़ दो हज़ार रुपे बाकि हिसाब बाद में करता हूँ !

रवि : ठीक है जी ! आधा घंटा लगेगा !

उज्जवल : हाँ कोई बात नहीं ! वैसे भी ये लोग वेटिंग रूम में फ्रेश होने में इस से कम समय कहाँ लेंगे ! जा तू  जल्दी से शुरू हो जा !

रवि मुस्कुराता हुआ दूकान की और लपका !

अभी अभी दूकान पर आये फ़िरोज़ भाई रवि को और उज्जवल को देर से देख रहे थे !

रवि : भाई साब बड़ा आर्डर मिला है ...और एक सांस में उज्जवल का पूरा ऑर्डर उसने फ़िरोज़ भाई को बता दिया !

फ़िरोज़ भाई : चल तो फिर चाय तुम देख लो बाकि मैं करवा लेता हूँ !

एक चाय देना : एक रोज़ के ग्राहक ने उन दोनों की वार्ता को विराम लगाया !

रवि : सर आधे घंटे के बाद दे सकूँगा !

ग्राहक : क्यों ?

रवि : बस दूकान अभी अभी खोली है ना ...ज़रा संभाल लूं फिर देता हूँ !

ग्राहक : ठीक है !

दर असल रवि उज्जवल के ऑर्डर को पूरा करने की ख़ुशी में था !

सबेरे के छे बजे पूरी दूकान के लोग काम पर लगे थे ! कोई बेसन ! कोई आलू ! कोई मैदा ! कोई तेल और कोई चाय के साथ उलझा हुआ था !

फ़िरोज़ भाई समोसे तल रहे थे बीच बीच में उज्जवल की तरफ देख लेते थे ! कुछ तलाश रहे थे वो उज्जवल में ,  शायद !

उज्जवल भी इधर उधर घूमता फिरता नाश्ते की खबर ले लेता था और वो भी फ़िरोज़ भाई को छुपी निगाह से देख लेता था ....कुछ वो भी तलाश रहा था उनमे शायद !

गरमा गरम समोसे , ब्रेड पकोड़े और चाय  से  उठती भाप ,  कालका स्टेशन की हवा में  नरम हलकी नारंगी धुप में प्रकृति का अनोखा आनंद दे रही थी !

सब अपने अपने अनुभव एक दुसरे से साँझा करते हुए आनंद ले रहे थे ! इस बीच उज्जवल ने एक समोसा दूर पोल से सहारे खड़े रवि की और बढ़ा दिया एक कप चाय के साथ ! कितना अपनत्व , कितनी निकटता , कितना समर्पण ...!

उज्जवल ऐसा ही है शुरू से ! फ़िरोज़ भाई के मुह से धीरे से निकल गया !

रवि को वो फ़िरोज़ भाई की आवाज़ सुनाई दे गयी !

आप , आप जानते हैं इनको ? रवि ने जैसे अपनी गति से चलती हुई रहस्यमय पुरानी फिल्म का अंत सबको इंटरवेल से पहले बता दिया हो !

सबका धयान रवि और फ़िरोज़ भाई की तरफ गया !

याकूब बोला : उज्जवल भाई कोई पुराना रिश्ता लगता है तुम्हारा इस जगह से ! अब बता भी दो भाई !

        इसी बीच फ़िरोज़ भाई धीरे धीरे चलते हुए ग्रुप के बीच आ गए थे !  पांच वक़्त के नमाज़ी ! चौड़ा माथा ! मेहदी लगे बाल ! ढीले ढाले  कुर्ते पायजामे में एक गंभीर वयकतितव !  सब ने उनको बैठने के लिए जगह दी !

              फ़िरोज़ भाई एक बड़े से काले संदूक पर बैठ गए और उनके घुटनों के सहारे से ज़मीन पर उज्जवल भी बैठ गया ! ऐसे जैसे बरसों से अनाम , अनजान और अनिश्चित दूर मंजिल की और बढ़ता हुआ कोई मुसाफिर  बीच राह में बैठ जाता है !
          अब तक फ़िरोज़ भाई और उज्जवल एक दुसरे को पहचान चुके थे ! कोई संवाद नहीं हुआ एक दुसरे से फिर भी दोनों ने एक दुसरे को बधाई दी और ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया की आज मिला ही दिया !

फ़िरोज़ भाई : क्यों भाई जवान कोई ग्लानी तो नहीं होगी ना मेरे यहाँ तुम्हारे दोस्तों के बीच में आ जाने से ?

उज्जवल : क्या भाई आप कैसी बात कर रहे हैं ?

याकूब : सर आप कैसे जानते हैं हमारे उज्जवल सर को ?

फ़िरोज़ भाई ने अपना दाहिना हाथ उज्जवल के बालों पर फेरते हुए कहा : छोटे मिया क्या कहते हो सब बता दूं ये थोडा थोडा ?

उज्जवल : सब !

फ़िरोज़ भाई : सब कुछ ?

उज्जवल : हाँ एक एक बात !

फ़िरोज़ भाई : तू सच बोल रहा है ना ?

उज्जवल : जी बिलकुल - उज्जवल की ऑंखें नाम थीं !

बाकि के समोसे और चाय अपनी बारी का इन्तेजार कर रहे थे की कोई उनका लुत्फ़ के लेकिन यहाँ तो कुछ और ही खुलासा होने वाला था , सब उसका इंतज़ार कर रहे थे !

                   उज्जवल आज एक बड़ी कंपनी के एक बड़े औहदे पर था ! उसने सारी पढाई दिल्ली से की थी ! अपने बल बूते पर ! फ़िरोज़ भाई बोल रहे थे !
                 बात कोई बीस बरस पहले की है ! एक सुन्दर सा हाफ नेकर में गुलाबी गालों वाला लड़का जिसने पास के ही सरकारी स्कूल की ड्रेस पहनी हुई थी मेरी दूकान पर आया सुबह के कोई दस बजे का समय था और बोला: मुझे चाय दीजिये मैं छोटी गाड़ी में सब से पहले बीच दूंगा !
मैंने उसे बिना कुछ पूछे एक केतली में चार कप चाय दी और दो गिलास  दिए ! वो आधे घंटे  में सब बेच का आगया !  फिर चार कप ले गया और फिर वापस आ गया सिर्फ बीस मिनट में !  इतने सारे लोगो के बीच उसका अंदाज़ निराला था और लोग बाकि को छोड़ कर उससे ही चाय ले कर पीते थे ! ये सिलसिला रोज़ का हो गया ! एक दिन दो में से एक ग्लास टूट गया ! मैंने उसके पेसे उस के उस दिन के मेहनताने से काट लिए ! इस लिए नहीं की मुझे नुक्सान हुआ बल्कि इस लिए की इस को मेहनत का और भी अंदाज़ा हो !
              दो दिनों बाद ये अपने बचाए हए पैसों से चाल कांच के गिलास  ले आया ! बड़े ही सुन्दर थे वो ! अब मुझ से बस चाय लेता था ! गिलास  नहीं ! अब वो दिन में चार केतली चाय बेच लेता था ! दादा और दादी के गुजरने के बाद मैंने इसको दिल्ली के एक पहचानवाले के पास भेज दिया ! ये सोच कर की चाय बेच कर सिर्फ ये अपनी ज़िन्दगी चलाएगा जब की मुझे इस में दुनिया को दिशा देने की काबिलियत दिखती थी ! फिर धीरे धीरे ये अपनी पढाई और वहां के एक बड़े अखबार के साथ मस्त हो गया और फिर मुझ से दूर ...और मैं इस से दूर ! आज फिर से करीब हैं !

             सब लोग अपनी सांस रोके फ़िरोज़ भाई के एक एक शब्दों को सुन रहे थे ! उज्जवल आज कितना काबिल है ! उसने कभी अपनी पिचलि ज़न्दगी के ज़िक्र किसी से नहीं किया और सब का ख्याल रखा ! आज भी सब का गार्जियन बना हुआ है ! कितने अनाथ बच्चों की देख रेख का खर्च उठता है वो , सब को पता है ! 

फ़िरोज़ भाई बोले :  उज्जवल मिया छोटी गाड़ी आ गयी है , शिमला नहीं जाओगे ?

उज्जवल : हाँ , जाऊंगा तो पर आज नहीं !

फ़िरोज़ भाई : तो आज का क्या करोगे ?

उज्जवल : कांच के गिलास खरीदूंगा !

फ़िरोज़ भाई : वो क्यों ?

उज्जवल : ताकि फिर बीस बरस अपनों से दूरी न रहे !

फ़िरोज़ भाई मुस्कुराते हुए अपनी सुरमे वाली आँखों का पानी पोछ रहे थे और उज्जवल उनके कुर्ते की जेब से अपना वो ही एक बचा हुआ कांच  का गिलास निकाल कर छु कर अपना बचपन याद कर  रहा था !

वातावरण में ख़ामोशी  थी !

सब चुप चाप छोटी टॉय ट्रेन मे अपनी अपनी सीट पर बैठ गए थे !

सूरज पूरे तौर पर निकल चूका था ! चुभन वाली बर्फीली हवाएं कब की जा चुकी थी !

गार्ड ने एक लम्बी सीटी मारी ! ट्रेन ने भी जोर से आवाज लगायी ! उज्जवल का ध्यान गया की ट्रेन  सरक रही है ! वो ट्रेन पर चढ़ गया ! जसे बीस बरस पहले चढ़ गया था ....तब ना आने के लिए ...और आज जल्दी से लौट आने के लिए !

        नए कांच के गिलास महंगे हो गए हैं लेकिन वो एक बचा कांच का गिलास  सब से मूल्यवान है जो आज फ़िरोज़ भाई ने उज्जवल को दिया .....ट्रेन गहरे लकड़ी के पुल से गुजर रही थी और खिड़की के सहारे से बैठा उज्जवल अपनी बचपन की कमाई का पहला सौदा निहार रहा था बचपन के सब कुछ उसके सामने था जैसे कल ही की बात हो  ......!!

ट्रेन की रफ़्तार धीमी हो चली थी .... शिमला आने वाला था !
::मनीष सिंह ::

Thursday, May 16, 2013

पथिक की गति, जीवन्तता का हस्ताक्षर है !!

पथिक !
गतिशील हो तो,
संरक्षित रहते है,
आशाओं के ताल,
कोपलों में आनंद,
जीवट मानस में,
संबंधों के रंगों,
रंगे आँचल!

गलियों मुहल्लों,
शहरों - शहरों ,
गुजरता जीवन,
बचपन से,
उम्र होने तक,
पथिक ही तो है !

गतिशील रहिये,
पथिक की गति,
जीवन्तता का
हस्ताक्षर है ! 

                                                                                                :: मनीष सिंह ::

Saturday, April 27, 2013

बांस का काग़ज़, सिकुड़ती दोपहर !!

मोटी निब का पेन,
बांस का काग़ज़,
सिकुड़ती दोपहर,
विस्तृत एकांकीपन,
ढेरों शब्द,
उभरते से,
फैलते जाते हैं,
किशोरावस्था में !
जैसे आशाएं,
भूमि पर,
यथार्थ की,
आकार लेती,
फ़ैल जाती हैं,
आयु की दोपहर,
में लम्बी होती,
   परछाइयों के साथ !!

                                                        ~~~~  :: मनीष सिंह ::

Friday, April 12, 2013

..किसी की निगाह पड़े और चाय के लिए पूछे !!

                "भोर की हल्की ठंडक भरी गलियों में घुमते हुए चौकीदार की लम्बी सीटी ने "शील " को नींद से जगा दिया . बेतरतीब हुई सफ़ेद चादर को अपने से अलग कर के चपोतते हुए चप्पल पेहेन कर नित्य कर्म से निबट कर फिर से अपने फोल्डिंग पलंग पर आ बैठा ! फोल्डिंग पलंग ने जैसे उसका पुनः आने पर स्वागत किया ....कुछ आवाज़ दे कर जो सुबहा के शांत वातावरण में कर्ण प्रिय तो नहीं किन्तु अपनत्व लिए हुए थी ...किशोर होने तक का साथी जो है वो फोल्डिंग पलंग ! "
                अभी कुछ सोच ही रहा था की एक लम्बी सीटी फिर से सुनाई दी ! शील ने झरोखे से बहार झाँक कर देखा रमईलाल ( चौकीदार ) बांस का डंडा सड़क पर पिटता हुआ जा रहा था ! शील की निगाह अपनी टेबल घडी की तरफ गयी ...सोचा कही घडी बंद तो नहीं पड़ गयी , सुबहा का एलार्म नहीं बजा ! सबेरे के सवा तीन बज रहे थे ! आज तीन बजे ही नींद खुल गयी ? शील ने सोचा ! आजकल बारहवीं के इम्तेहान जो चल रहे हैं उसके रात में देर से सोता है पढ़ते पढ़ते और सबेरे ५ बजे का एलार्म लगा लेता है ! लेकिन आज ऐसा क्यों हुआ ? दरअसल इन दिनों वो ठीक से सो ही नहीं पा रहा था रातों में ! मन में कुछ न कुछ उधेड़बुन चलती रहती है उसके ! 
               चाय पीने की इक्छा हुई किन्तु कदम ने साथ ना दिया हिम्मत नहीं जुटा सका रसोई में जा कर चाय बना कर पी लेने की !  चार साल होने के बाद भी तो उस घर में आगंतुक और अपरिचित ही तो था वो ! कोई अधिकार नहीं ! अधिकार उनके होते हैं जो जीवित हों ! ना ,सिर्फ शारीरिक जीवन अधिकार नहीं ले सकता  ! होश संभालने से ले कर किशोर होने तक जिसने केवल खोया हो ,के पास अधिकार हैं के सोचने का भी अधिकार नहीं रह जाता !
               आज " रसायन विज्ञान " का पेपर था ! कल से जो वो पढ़ रहा था आज सब मूर्तरूप में सही और सटीक होते दिखाई दे रहे थे ! जीवन में " शील " के जीवन में ना जाने कितने ही रासायनिक परिवर्तन हुए -  माता पिता का बचपन में ही  नहीं रहना !  अपनी दो छोटी बहनों से दूर रहना ! बचपन में खिलोनो की जगह अपने लिए परिवार में , रिश्तेदारों में , दोस्तों में , समाज में जगह तलाशने की कोशिश ! टूटी हुई पेंसिल और घिसी हुई रबर को और कुछ दिन चला लेने के प्रयास में आशा की कोई रिश्तेदार आये और कुछ नया दे कर जाये ! किसी ज़रुरत के लिए घंटो , दिनों और कई बार तो महीनो सोचना की कैसे और किस से कहा जाये की आंशिक ही सही पर पूरी तो हो ! बचपन बीत गया ! वापस नहीं आता ! रासायनिक परिवर्तन है !
             चीज़ें कितनी जुडी हुई हैं ना एक दुसरे से ! अब देखिये ना माँ पिता ने कितना सोच कर रखा होगा उसका घर का पुकार का नाम " शील " ....सब सहना , शालीनता से ! वो ये सब सोच ही रहा था की सामने के पार्क में कुछ लोग चहलकदमी करते हुए हलके धुंधले से दिखाई देने लगे ! उसकी टेबल घडी का अलार्म भी बज उठा !
            सुबह के पांच बज चले थे ! दो घंटो तक वो अब तक के जीवन की घटित घटनाओं को भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तनों के द्रष्टिकोण से देख रहा था !

उसके दोस्त विकास ने आवाज लगायी : - शील , आज टहलने नहीं चलोगे ?

शील : नहीं , आज रसायन विज्ञान का पेपर है !

विकास : अरे , वो तो मेरा भी है , २ बजे से ! अभी क्या परेशानी है ?

शील : सोच रहा था कुछ पढ़ लूं  !

विकास : चल , अब आ जा ! पुरे साल की पढाई एक दो घंटे में नहीं दोहराई जाती !

शील : ज़रा मुस्कुराया , ठीक है आता हूँ रुक !

विकास : हाँ तो मैं  जा रहा हूँ बिना तुझे लिए क्या ?

       " शील " ने जल्दी जल्दी अपनी हाफ पेंट को बदला और कल ही मोची से सिलवाई हुई स्लीपर को पहना और ड्राइंग रूम से होता हुआ बाहर के दरवाज़े की तरफ लपका !

बड़े  भैया ने आवाज़ लगाई : "शील" बाहर पड़ा अखबार पकड़ना !

जी भैया - "शील" बोला और दरवाज़ा खोल कर अखबार ला कर भाई को दिया !
अखबार पकड़ते हुए भैया बोले : कहाँ जा रहे हो ?

"शील" : भैया , विकास के साथ मोर्निग वाक् पर !

भैया : आज तो तुम्हारा कोई पेपर है ना ?

"शील" : जी भैया , केमिस्ट्री का !

भैया : तो ?

"शील" : भैया , सब पढ़ लिया है !

भैया : तुम कहीं नहीं जाओगे , फ्रेश हो कर बैठ कर पढो , विकास को मैं मना कर देता हूँ !!

"शील" : बस २० मिनट में आ जाऊंगा !

भैया : ना बोल ना !

"विकास" आज "शील' नहीं आयगा ...तुम जाओ ...संडे को आयगा ! भैया ने कुर्सी पर से ही तेज़ आवाज़ में बोल दिया !!

          "शील" अपने फोल्डिंग पलंग पर जा बैठा ! फोल्डिंग पलंग  फिर से एक आवाज़ कर के उसका स्वागत किया , किन्तु इस बार अच्छा नहीं लगा उसे ! बीस मिनट की तो बात थी ! जाने देते तो क्या होता ! नहीं पढूंगा ! कल शाम को एक सवाल पुछा था तो टाल गए थे और ५ किलोमीटर दूर अपने दोस्त के घर जा कर बेडमिन्टन  चले गए थे ! फ़ोन को हाथ नहीं लगाने देते ! टूशन के बारे में कभी नहीं सोचा , जो पढ़ा है मैंने खुद पढ़ा और आज जब मैं खुश हूँ तो जाने नहीं देते ! शील ये सब सोच ही रहा था की छोटे भैया की आवाज़ आई : शील ज़रा देखना बहार " डाक्टर झिंगन " की कार कड़ी है क्या ?
         
       "शील" का ध्यान टूटा ! खिड़की से बहार जहां कर देखा और वापस आ कर बताया ,हाँ - खड़ी है !

ठीक है ये पेकेट ले और उनके ड्राईवर को दे आ - छोटे भैया ने आदेश दिया !

"शील" ने वहीँ बैठे बड़े भैया को देखा और चल दिया !

बड़े भैया ने भी "शील" को देखा और कहा , "शील" वापस आते हुए घोष बाबु के पार्क से दो गेंदे के फूल लेते आना ... अमृता ( भैया की बेटी ) को पसंद है !!

            इन सब में आधा घंटा बेकार हो गया ! मन भरा जा रहा था ! किन्तु करता भी क्या ! किस से कहता ! क्यों कहता ! गला रूंध गया , मन मारते हुए आज तक जिया है ...आगे भी निर्भरता के रहने तक ये ही नियति है !! 

            सफ़ेद रंग की कमीज़ जो कुछ पीलापन लिए हुए थी , खाकी रंग की पेंट ! एक दफ्ती ! जोमेट्री बाक्स , स्याही और निब वाले दो पेन ले कर स्कूल के बहार सब पहुँच गए !  वैसे बारहवीं के बच्चों के लिए ये सब चीज़े अब कुछ मायने नहीं रखती लेकिन शील को ये सब ले कर ही जाना था क्यों की उसके पास और कुछ था ही नहीं ले जाने को जिसको इनकी तुलना में कुछ अलग हो !!

            रसायन विज्ञान के पर्चा हो गया ! " शील " के जीवन में अभी ना जाने कितने पर्चे होने बाकि हैं ! परिवर्तन  बाकि हैं ! मन छोटा हो जाता है जब वीणा आंटी और शशि आंटी आपस में बात करती हुई अपने बी ऐ में पढ़ रहे बच्चों के बारे में बोलती है .... क्या करू दूध तो राहुल पीता ही नहीं ...सबेरे सबेरे उसके पीछे पीछे  दौड़ना पड़ता है ! क्या  किस्मत है ! एक कप चाय के लिए भी रसोई के आस-पास के चक्कर लगाने पड़ते हैं ... झूठ मुठ का बहाना ढूँढना पड़ता है रसोई में आने का की किसी की निगाह पड़े और चाय के लिए पूछे !!

          कल रात " शील " पूरी रात नहीं सोया , कल कोई एग्जाम नहीं था फिर भी .....सोचते हुए क्या ज़िन्दगी कभी ढर्रे पर आएगी और लोगो की तरह , और उसके उम्र के लड़कों की तरह ! जबतक आएगी तब तक ये सब वापस नहीं आने वाले परिवर्तन में परिवर्तिती हो चूका होगा !!  बचपन लौटता नहीं है किन्तु ...बचपन ही सबसे अधिक याद रहता है जीवन के किसी भी समय की तुलना मैं ...! हम ,यदि किसी से यदि सम्बद्ध है उसके बचपन में तो उसे "जीवंत" कर दीजिये उसकी पूरी उम्र के लिए !!


                                                             ::~~ :: मनीष सिंह ::~ ~ ::

Friday, February 22, 2013

... मंझा, धागा, हुचका, और उत्साह !!

"कटी-फटी पतंग,
  गीला अरारोट,
  मंझा, धागा, हुचका ,
  और उत्साह !
  दिन बीत जाता,
  आस में, की ,
 पतंग उड़ जाएगी !!"

"वो और मैं,
  हम सब,
  आशान्वित है,
 बिखरी संभावनाएं,
 सिमित साधन,
 ले चलेंगे हमें भी,
 ऊँची उड़ान पर ;
 अधिक प्रगति की !! "

Monday, February 11, 2013

कुंभ में हादसे पर एक श्रधांजलि !!

जैसे ,गरम कुल्हहड़ के किनारों से
चिपकते होठ !

आस्था की गोंद से चिपकती,
अथाह भीड़ !

आनंदित, समर्पित आत्माएं ,
चलती रहती हैं ,

साँसों के रुकने तक !
हर बार व्यवस्थाओं की अग्नि में,
आहुति ले कर ,
जीवित रहता है ;

आस्था का हवनकुंड !

जिसे , पुनः शुद्ध कर देते हैं ,
ऐसे कुंभ !!
                              :::::::::: मनीष सिंह ::::::::::::

Friday, January 18, 2013

~~~ भीगा-भीगा सा चाँद, कल रात सोया नहीं !!

                      **** भीगा - भीगा सा चाँद , कल रात सोया नहीं !! ****

              रूई से भी ज्यादा कोमल रेशों की तकिया बनवाई थी उसके पापा ने उसके लिए जब वो छोटा था ! पूरी पूरी रात कभी कभी तो अगले दिन भी वो अपने दफ्तर नहीं जाते थे ...इस लिए की वो अपने पापा की गोद में सोता रहता था ...और वो जाग ना  इस लिए वो अपने हाथों से उसको उतारते नहीं थे , और वो सोता रहता था !   आज उसके पापा उसके साथ नहीं हैं !! वो कोमल सा तकिया भी ना जाने किस के पास है ...उसके पास नहीं है !! वो दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह " पापा की गोद " भी उसके पास नहीं है ! आज वो देखता है बस और मन की समझा कर रह जाता है की ...कोई नहीं है सब था अब नहीं है !!
               कल रात बहुत ज़ोरों की बारिश आई और लगता था की ओले भी पड़ रहे थे ...उसको अपने बचपन की ऐसी  ही रात याद हो आई ...जब जोर से बारिश आई थी और उसके पापा ने उसको अपने सीने से लगा लिया था ...सारा डर , दिसंबर की सुर्ख सर्दी और कपकपाहट सब पापा ने ले लिया था और वो सुकून से सोया था !

                अगले ही दिन उसके पापा कहीं गए और फिर कभी नहीं लौटे !! उसकी गीली आँखे आज भी उस रात की ही तरह भयभीत है ...लेकिन उस दिन  तरह आज उसके पापा नहीं हैं उसके पास जो सब अपने में समां लेते ....!! कल रात भी बारिश हुई और सब कुछ वैसा ही हुआ ...बस पापा की गोद और उनके सीने से मिलते सुकून के सिवा !!

                रात भर बारिश होती रही और रह रह कर पापा के ना होने का खालीपन उसको खाता रहा !! ये भी एहसास करता था ...आज , कल और आने वाले कल में फर्क होता है ....!
               अपने सभी भाई बहनों में वो एक चाँद है ... और आज की रात ये भीगा भीगा सा चाँद सोया नहीं ....पूरी रात बारिश भिगोती रही और अपने खालीपन और आंसुओं से चाँद खुद भीगता रहा ...बिना किसी से कुछ कहे ...और जागता रहा ....चाँद सोया नहीं ....चाँद अकेले ही रहते हैं ...हमेशा भीगते हुए ...बारिश से आंसुओं की अकेले-अकेले !!

Thursday, October 4, 2012

...... और जंतर-मंतर मर गया !!

                              ....मित्रों मैं जिस रास्ते से अपने दफ्तर जाता और आता हूँ आज भी उस पर कुछ खेत मिलते हैं ... जिनमे मौसमों के आधार पर कुछ न कुछ फसल लगी रहती है .....आज कल धान लगी है , सुर्ख हरे रंगों की घान की ऊपर की और उठती एक एक पौध और उसमे अंगडाई लेती हलके पीले रंगों की बालियाँ ....जी हैं अभी बाद बनना ही शुरू हुआ है ...शाम के लगभग पौने सात बजे में उन खेतों के बीच से हो कर गुजरती हुई सड़क से गुजरता हूँ ...बस सुगन्धित बालियों से निकली हुई खुशबू मेरी नासिका को इस कदर अपनी और आकर्षित कर लेती है की बस कभी कभी तो रुक कर उस का आनंद लेता हूँ ! मुझे मालूम है की खुच महीनो के बाद से सब ख़तम हो जायेगा , बालियाँ पाक जाएंगी और खेत सूने हो जाएँगे ,,,,तेज़ लू चलेगी और सुखी धुल उड़ेगी , लेकिनं ये भी आशा है की फिर से इसमें धान लगे जाएगी इस लिए आज के होने और कल न होकर फिर से होने के मध्य का काल इतना दुःख नहीं देता जितना आज एक खबर ने दिया !!

            आइये उस खबर पर चर्चा करते हैं !! वैसे तो अखबार के माध्यम से किसी खबर पर चर्चा करना कितना उचित और न्यायसंगत है ये आपने कुछ दिनों पूर्व एक प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक प्रगतिशील संगठन के मध्य होते विवाद को देख और सुन लिया ही होगा !! फिर भी हम ये हिम्मत करेंगे की उस खबर के आधार पर चर्चा करैं और दुःख प्रकट करैं जो हमने आज पढ़ी , और साथ में जा कर उस खबर का सच भी जाना ...जो अक्षर अक्षर सच निकला ....!!
           एक अखबार में पढ़ा की दिल्ली के जंतर मंतर को वो दर्जा देने से मना कर दिया गया है जिसका वो हक़दार है !! अन्तराष्ट्रीय धरोहर का !! क्यों की उस अन्तराष्ट्रीय संस्था ने पाया की जिस विशेषता के लिए जंतर मंतर जान और पहचाना जाता है ....मौके पर उसको वैसा नहीं पाया जा सका , अतः अन्तराष्ट्रीय धरोहर नहीं कहा जा सकता !!  एक बात साफ़ कर दें की जंतर मंतर में स्वयं एसा कुछ नहीं हुआ की उसकी पहचान कम हो गयी है .... उस को जबरदस्ती ...धीरे धीरे मारा गया !! आज जंतर मंतर उस फूल की तरह हो गया है जो खिला हुआ है ...जिसमे चटक रंग भी है ...जिसमे मकरंद भी है ...परागकण भी हैं ....किन्तु उसको एक शीशे के घर में क़ैद कर दिया है जिस पर कभी तितलियाँ नहीं बैठ सकती , जिस पर कभी परागकण ले कर मधुमखियाँ अपनी मिठास की गगरी में उसका योगदान नहीं ले सकती !!
           हुआ क्या ? जैसा की हम सब जानते हैं की जंतर मंतर एक यन्त्र है जो की सूरज की किरणों के आधार पर करता है ...और गड्नाओं के आधार पर समय का पता लगाया जाता है ! भारतीय और अन्तराष्ट्रीय दोनों !! सतरहवी शताब्दी में इस का निर्माण करवाया गया था जब घड़ियाँ नहीं थी !! सूरज की किरणों के आधार पर सटीक समय की गद्नाये की जाती थी !! आज इस के यंत्रों के ऊपर सूरज की किरणे ही नहीं पहुच पाती ....चारो और ऊँची ऊँची इमारतें कड़ी हो गयी है ....जिसके करने जंतर मंतर में प्राण तो हैं किन्तु वो स्वयं संवादहीन हो गया है !!
           बचपन से सुनते आ रहे हैं ...दिल्ली में एक जंतर मंतर है ! कई बार वहां गए भी ! आनंद लिया ...उस इमारत का जिसको कितने मन से बनवाया गया है !! आज उसका गला घोट दिया गया ! कितने ही आन्दोलनों की जन्स्थाली आज स्वयं निर्जीव सी हो कर पड़ी है !! कितने ही आन्दोलनों को जीवित रखने वाला जंतर मंतर आज स्वयं मरित्श्य्या पर है !! कितने की आन्दोलनकारियों की आवाज बन्ने वाला जंतर मंतर स्वयं अपने लिए एक आवाज खोज रहा है !! 1982 के एशियाड खेलों का शुभंकर रह चूका ये ...आज अपने अशुभ समय को कोस रहा है !! आज भी कितने आन्दोलन हो रहे हैं इसकी दीवारों के इर्दगिर्द ! कितने लोगो का घर बन चुकी इस की दीवारें अपने लिए एक अदद सहर ढूंढ रही है जो इसकी आवाज़ बन कर कुछ कहे सरकार से की कुछ करिए ...मैं ही था जब समय घड़ियों में बही था ...! एसा लगता है सच में समय आगे निकल गया है ...तेज़ रफ़्तार से चली ज़िन्दगी में कहीं पीछे छूट गया है ...हमारा जंतर मंतर ....लिकिन है तो !! नै पीढ़ी जिसको इसके मायने नहीं पता ...क्या सोचेंगे इस ईमारत के बारे में ....क्या बनाया था लोगो ने टेढ़ा मेधा ...दीवंरें पूरी भी नहीं बनवाइय ....!! उनको कुछ दिशा देने वाले दिशानिर्देश क्या उम्मीद तब तक वहां रहेंगे भी की नहीं !!!!

               विदेशों में सुनते हैं की पूरी की पूरी इमारत को एक स्थान से दुसरे स्थान पर विस्थापित कर दिया जाता है !! हमरे नेता और नौकरशाह तो पूरी दुनिया में घुमते हैं ....शायद किसी को ये तरकीब सूझे जंतर मंतर के बाबत , ऐसी हैं उम्मीद करते है !!  दिल्ली के जंतर मंतर सरीखा के और जंतर मंतर है ...जयपुर में ....मैंने देखा है ...हवामहल से साफ़ साफ़ दिखाई देता है ! जी हैं अभी उसके चारो और सब साफ़ है ! ऊँची दीवारें नहीं बनी !! किसने कहा की इमारतें ऊँची हों तो ही तरक्की होती है !! एक बड़े देश की सबसे ऊँची इमारतो को गिरते देखा है हमने ,  दुनिया का सबसे विक्सित देश है ...फिर भी इमारतें गिर गयी !! धरोहर सम्हालानी चाहिए !! हमें कुछ तो मिला है पूर्वजों से , कुछ नया अपनी आने वाली पीढ़ी को दे नहीं सकते तो पाया हुआ ही संभाल कर हस्तांतरित कर दिया जाये !! 
                  अपनी विशेष पहचान और मनमोहक कलाकृति के कारण हमेशा याद किया जाता रहेगा ...किन्तु आज भी उसमे वो सब है जिसके लिए वो जाना जाता है ...बस उस तक सूरज की किरणों के  आने का इन्तेजाम करना होगा , वैसे ही जैसे हम अपने घरों में आगंतुक के लिए द्वार खोल देते हैं ....और अपनी निगाहें  द्वार पर लगा कर टकटकी कगाये उसके आने का इंतज़ार करते हैं ....आज जंतर मंतर उसी इंतज़ार में हैं ....
और सूरज की किरणे उस से दूर हो चली हैं ...बहुत दूर व्यापारिक संस्थाओं की इमारतों के पीछे ...जहाँ व्यापार
आ जाता है वहां अपनापन ...........मर ही जाता है ........ और जंतर - मंतर मर गया !!
                                                                                                                 आपका अपना - मनीष

आपकी सुविधा के लिए उस अखबार का लिंक दे रहा हूँ ....