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Tuesday, November 13, 2012

त्योहारों की तैय्यारी को जितना एन्जॉय कर लेते हैं उतना असल में त्यौहार मानाने को नहीं ....!!

                अब देखिये ना .आज दिवाली है ...अन्धकार से रौशनी की ओर जाने का पर्व ! अब अन्धकार किसी भी तरह से परिभाषित किया जा सकता है !!  वैचारिक , वाव्हारिक ,आलोचनातमक दृष्टिकोण इत्यादि इत्यादि ..... !

                अभी शाम के 9.30 बजे हैं और हमारे घर के सामने वाले पार्क को धुआं पूरी तरह से अपने आगोश में ले चुका है ! ठीक सामने वाले ब्लाक की रंगीन झालरें ठीक से नहीं दिखाई पद रहीं !! .... हर ब्लाक के सामने कोई ना कोई अपने अपने अंदाज़ से अपनी पहचान ज़यादा से ज़यादा पटाखे जला कर साबित करने में लगा है !! कितना अजीब है आज कल का माहौल , कल के बीते समय से बिलकुल अलग !! अभी कुछ दिनों पहले ही एक साथी हमें छोड़ कर इश्वर के पास चला गया , और साथ में चली गयीं उनकी यादें !! सब अपने अपने काम में मस्त / व्यस्त ! किसी को शयद याद भी ना आई हो ...और आई हो , तो आई हो ...दिवाली में क्या करियेगा !! दिवाली ही मनेगी !!

                 एक बार एक मित्र ने कहा था की <-> " रविवार से ज्यादा शनिवार को एन्जॉय करते हैं !" इस ख़ुशी में की कल छुट्टी है !! वैसे ही कल मुझे एहसास हो रहा था !!  रात के 10 बजे थे ...छोटी दिवाली के दिन , खाना खा कर के टहलने निकला था ...घर से पास के स्टेशन से होते हुए बसंत रोड पर निकल पड़ा ...वाह निकल गयी मुह से .... अमूमन 9:30 से 10:00 बजे सुनसान हो जाने वाली सड़क ....आज दिन के 10:00 की तरह से शबाब पर थी ...सभी दुकानें खुली थी और खरीदारी हो रही थी .... ! हाँ ये सड़क कुछ वर्षों पहले भी 9:00 और रात के 12:00 बजे गुलज़ार रहती थी ...जब " बसंत " सिनेमा हाल चला करता था .... मैंने भी उसमे एक आखिरी फिल्म देखि थी ...छोटे से अपने भाई अंकुर के साथ ...और फिल्म का नाम था " डर " !! आजकल उस जगह पर एक बहुत ही बड़ी कार बनाने वाली देसी कंपनी का शोरूम खुल गया है !! बड़े ही कुलीन लोग आते जाते हैं ...समय पर और समय पर वो बंद भी हो जाता है !! खैर हम तो सब दुकानों के खुले होने पर आश्चर्य प्रकट कर रहे थे !! मैं आधे घंटे में वापस आ गया और सोचा की क्यों ना कल की की जानेवाली खरीदारी को आज ही निबटा दिया जाये !
                 हमें एक थैला लिया , और चल पड़े बाज़ार ...रात के 10:45 पर !! मोटरसाइकल पर अब मुझे चोपला मंदिर और मोडल टाउन दिखाई देने लगा था ....बसंत रोड तो पैदल बाज़ार की लिए है ...मोटरसायकल पर तो घंटाघर और बजरिया की मार्किट बनती है ना  ......!! बसंत रोड से होते हुए ... मालीवाड़ा ...डासना गेट और फिर रमते राम रोड से आनंद चिकन ...फिर गंज से होते हुए चोपला ...वाह ...रात के 11:15 हो रहे थे और चहल पहल इस तरह की जैसे 7 तारीख के बाद पड़ने वाले किसी रविवार को होती हो !!
               खील , मीठी खील , खिलोने , बताशे , फल मोमबत्ती  , मिटटी के दिए ...रूई , तरह तरह की झालर ... रंगीन कागजों पर "  हैप्पी दिवाली " लिखा हुआ , पटाखे और ना जाने क्या क्या ....!! एक तबका तो अपनी अपनी संगिनी को ले कर के देसी घी के बने पकवान चखने में मशगुल दिखाई पद रहा था ....कंधे से कंधे टकरा जाएँ इस कदर भीड़ !! आलू की टिक्की , पानी के बताशे ( गोलगप्पे ) की ठेलियों पर तो लोग लाइन लगा लगा कर खड़े इस तरह की ...जैसे आज नहीं खाया तो ये स्वाद फिर शायद अगले साल ही नसीब हो ....!! 
               भगवान् की मूर्तियाँ ...! मोलभाव कर के खरीदते लोग अपने अपने भगवान जी को !! कम से कम भाव दे कर ख़रीदा जा सके ...खरीद लो ...कल उन्ही से जितना ज़यादा से ज़यादा माँगा जा सके !  माँ लक्ष्मी धन की देवी हैं और उन्ही को मोल भाव कर खरीद कर उन्ही से सम्पन्नता की आशा .... ये हम सब करते हैं ! अरे भाई दूकान पर तो मूर्ति बिकती हैं ...और भगवान् तो उनको हम अपने घरों में लाने के बाद बनाते हैं , तो मोल भाव करने में क्या संकोच करना ....अब ये कोई पके पकाए मिलने वाले फ़ास्ट फ़ूड की बात थोड़े ही है .की मोल भाव की संभावनाए नहीं ... !!  कल्कत्त्ता , टेराकोटा और लखनऊ की मूर्तियाँ कुछ जायदा महंगी है ...और जो लोकल मेड हैं ...वो कुछ कम दाम में उपलब्ध हैं ....पर उनको लेने वालों की कमी है ....अब घर में मंदिर को अपने आगंतुक मित्रों को दिखाएँगे क्या //// लोकल , ना जी ... ना टेराकोटा ही लेंगे भले महगी हो ...साल भर का त्यौहार होता है !! 
                  मोमबत्तियां , खील , बताशे , रूई , दिए और बाती खरीदी , एक पान खाया ( सादा ) और एक किनारे मोटरसाइकल खड़ी कर के बाज़ार की चेहेल पहल देखने लगा !! 

1. दीयों के ढेर के बगल में अम्मा जी खटोले पर बैठी थीं , शायद रात में वहीँ सोएंगी , उन दीयों के साथ जो नहीं जलेंगे ....नहीं बिकेंगे !

2. गन्नों का ढेर और उनके बगल में रखा एक तखत जिसपर उनसे जूस निकलने की मशीन लगी थी ...गुमसुम .. अब सर्दियों में गन्ने का रस कौन पीता है ...आज अगर ना बीके तो कल के लिए सोचेगा वो ...

3. मोमबत्तियों के ढेर , पेकेट और लड़ियों के बीच बैठा जुनैद .....जो बिकेंगी वो बिकेंगी नहीं तो फिर उसी अनाथ आश्रम में वापिस कर आऊंगा जहाँ से लाया था !

4. अंग्रेजी , हिंदी में लिखे हप्पी दिवाली की जुमले रंगीन कागजों पर ....अब शायद अगले साल ही कोई ले ....अगर आज नहीं बिके तो ...सोचता हुआ वसीम / तरुण मोल भाव में मगन !!

                पान का बाकि बचा हिस्सा खाया और चल दिया हनुमान जी के दर्शन करता हुआ घर की तरफ !! रस्ते में पूजा और पूजन से सम्बंधित सामग्री मिलती हुई दिखाई पड़ी ...और गर्व हुआ अपने भारतीय होने पर ...हम चाहे कितने भी आधुनिक और मॉल कल्चर के करीब क्यों ना आ जाएँ ...जब अपने संस्कारों और अपनी परम्पराओं की बात होती है तो हम ज़रूर अपने उन सभी पारंपरिक आलेखों को साफ़ कर के अपना लेते हैं जो हमारे बुजुर्गों ने हमें दिए हैं  !  एक रात को ही सही , हम सही में पारंपरिक हो जाते हैं !! कोई समझौता नहीं इसमें !! पूजा की थाल , उसमे सेब , केले , मीठे खिलोने , खील , मिठाई , चांदी का एक सिक्का , चन्दन , अगरबत्ती  , रोली , धुप , फूल माला , मिटटी के दिए , रूई की बाती , सरसों का तेल ...सब वो ही बरसों पुराना ...हम जुटा लेते हैं जैसा की हमारे और उनके माँ पिता ने बताया था !
             1812, 1912 और अब  2012 क्या कुछ नहीं बदला होगा वर्षों में बस लाल किला , ताज महल    को छोड़ दीजिये और भारत भी !! यद्यपि सब बदलता रहता है ...तथापि परिवर्तन का सामीप्य अर्थपूर्ण होना चाहिए !! ... मैं जैसे जैसे अपने घर की ओर बढ़ रहा था बजार की रौनक कम हो रही थी ... और एक अजीब सी शांति मुझे घेरने लगी थी ....रस्ते के निशाचर घूर घूर के मुझे देखने लगे थे ....अपने घर पंहुचा और सब सामान देखा ...कल की पूजन की तयारी पूरी थी !!

              आज ही वो कल वाला कल था ...मैंने अनुभव किया की हम स्वस्थ परम्पराओं और त्योहारों की तैय्यारी को जितना एन्जॉय कर लेते हैं उतना असल में त्यौहार मानाने को नहीं ....!! सहमती हो तो एन्जॉय कीजियेगा ...मुझ से शेयर कर के !! हप्पी दिवाली !! मेरा भांजा ( वासु - मृगांक ) कहता है ...हप्पी दियाली .....( दिवाली नहीं कह पता अभी ...) भवनाये और अनुभव दोनों शब्दों के मोहताज़ नहीं हैं !! 

Wednesday, October 17, 2012

.. स्वयं सरीखे कुछ बुत बनाने चाहियें, खुद की तलाश के लिए !!

                   अनमने मन से उठा और बाहर की तरफ देखा छोटे से परदे को बड़ी सी खिड़की से हटा कर ....तो खुला सा समुन्दर अपने पूरे जोश में सब को संभावनाएं बाँट रहा था , रोज़ की तरह ...लेकिन मेरे होटल के किनारे एक छोटी सी दूकान पर उस नन्ही सी जान के लिए कुछ भी नया नहीं था आज ....  उसके लिए बस एक दिन था जिसमे दिन में गर्मी रहती है और शाम को हल्का अँधेरा और शाम को खाना मिला मिला ना मिला लेकिन खुले आसमान की चादर और ठंडी धरती का बिस्तर ज़रूर नसीब में था !!

                बात उन दिनों की है जब हमने नया नया उड़ना / घूमना सीखा था और शहर शहर घूम रहे थे , अधिकारिक यात्रा पर !!  उत्तर के शहर इतने करीब से देखें हैं की कुछ गूढ़ नहीं दीखता ..किन्तु वहीँ दक्षिण के शहर कभी देखे नहीं तो वहां की गलियां तक विशेष लगती हैं ! पोंडिचेरी की गलियों की सैर कर रहे थे अकेले ....पैदल !!  हाथ में डाभ ( कच्चा नारियल , पानी से भरा हुआ ) ले कर , गटकते हुए !! गवर्नर के बंगले से होते हुए जैसे ही गाँधी जी के पुतले की ओर बढ़ते हैं तो कुछ दूरी पर एक रेत से भरा हुआ रास्ता मिलता है  बिलकुल एसा लगता है जैसे की वहां की सरकारी आँखें इस टूकडे को देख नहीं सकीं नहीं तो इसको भी पुरे प्रयास से पथरीला कर देतीं या फिर ये भी लगता है की शायद इस को इस लिए उसके मूल स्वरूप में छोड़ा गया हो की आने वाले लोगों की कुछ सामीप्य लगे ...अपनी ज़मीन से इन पथरीले रास्तों में !!
              उसी रेतीली ज़मीन पर सुबह और शाम को छोटा सा बाज़ार लगता है , अपने शहर और आगंतुकों दोनों के लिए !! वहां दक्षिण के पारंपरिक पकवान के सिवा ,,,उत्तर भारत के भी पकवान मिलते हैं ....जैसे आलू की टिक्की , गोलगप्पे किन्तु उनमे आपको दक्षिण की खुशबू ज़रूर मिलेगी ताकि आपको स्मरण रहे की आप मूल स्थान से हट कर आनंदित हो रहे हैं !!
             चाय भी मिलती है !! मुरुगन उसी चाय की दूकान पर रहता था ! मेरा रोज़ का साथी ! आज कुछ उदास था , चाय भी कुछ फीकी बनी थी ....न चीनी तो उतने ही चम्मच डाली थी ज़रूरी पानी में बस स्वाद आया ही नहीं !! चाय की छन्नी में रखे बारीक कपडे के ऊपर पूरी की पूरी चाय उधेल दी थी उसने कुछ बहार छलक कर उसके हाथ पर आ गिरी तो उसे ख़याल आया की कुछ गलत जो रहा है !!... मैंने पुछा " क्या बात है मनु ? " कुछ नहीं साब .. ठेठ दक्षिण भारतीय हिंदी में जवाब मिला !! कुछ तो है बोल तो मन हल्का होगा ......मैंने इतना कहते हुए उसके कंधे पर अपना उल्टा हाथ रख दिया और कोशिश करी की उसके सर को सहारा दूं .....एसा लगा जैसे उसको कुछ मिल गया हो जैसे मृग मरीचिका .... वो मेरे कंधे और छाती से लगभग चिपक कर रोने लगा ..... ये कहते हुए ...." कोई अपना नहीं है साब ....देख लिया मैंने " !! मैंने उसको अपने दुसरे हाथ से सहारा दिया और उठने के लिए कहा ....और हम चल दिये महात्मा गाँधी की मूर्ति के पास ....समुद्र में सम्भावनाये समेटने !!
              वो दिन आज़ादी का दिन था ...15 अगस्त , कुछ बच्चे छोटे छोटे तिरंगे बेच रहे थे ,,,,मैंने मुरुगन से पुछा लोगे ? हामी में सर हिला दिया उसने !! मैंने कुछ झंडे खरीदे ! मुरुगन से पुछा अब बताओ क्या बात हैं क्यों उदास हो ? वो बोला " साब में पढना चाहता हूँ पर मुझे स्कूल में एड्मिसन नहीं मिला ...और कोरास्पोंदेंस - पत्राचार की पढ़ाई के लिए एक मुश्त पैसे हैं नहीं मेरे पास ...और इस चाय की दूकान पर काम करते करते अगर पढ़ना चाहूं तो मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखाई देती की मैं समय पर अपनी पढ़ाई पूरी कर सकूंगा !! .... अच्छा तो तुमने कोई हल तो ढूँढा होगा इस समस्या का ...? मैंने पुछा ! वो बोला हाँ साब ...अगर मुझे कहीं स 2500 रूपये मिल जाएँ तो मैं एक मुश्त फीस भर कर अपनी पढ़ाई जारी रखूंगा और धीरे धीरे पैसे भी चुकता कर दूंगा काम करके ...लेकिन कोई देता नहीं ना ...सब जान पहचान की बात करते हैं की कोई गारंटी दे दे ...जब की मैं इसी शहर का हूँ ...सब मुझे जानते हैं ....मेरे पिताजी और माता जी जब तक सुनामी में नहीं गुजरे थे सब मुझे पहचानते थे अब मेरे पास कुछ नहीं ...तो ये लोग भी नहीं पहचानते ....!!  अच्छा तो तुम इस लिए परेशान हो मैंने मुरुगन की टीशर्ट का कालर ठीक करते हुए कहा ? चलो मूंगफली खाते हैं ....!!  दक्षिण भारत में मूंगफलियाँ सडक पर मिलती हैं ! हा हा हा ....भाई ये तो कोई बाद ना हुई ...मूंगफलियाँ उत्तर भारत के शहरों में भी सड़कों पर मिलती हैं और लोग तो इसको " गरीबों का मेवा " कहते हैं !! खैर दक्षिण में मूंगफलियों को पानी में उबाल कर सडकों पर बेचा जाता है ....मैंने और मुरुगन ने कुछ मूंगफलियाँ खरीदीं और समुद्र की तरफ मुह कर के दीवार पर बैठ गए !!
                 अब मुरुगन के चहरे पर मुस्कान थे ....उमीदों भरी ...पर मैं अब उलझन में था !! मुझे नहीं याद की मैंने उस की क्या मदद करी थी किन्तु इस बात को सोच कर उलझ गया था की .... क्या विचित्र सी बात है की स्वयं के  शहर में व्यक्ति परिचय ढूँढने को बाध्य हो जाता है और अपरिचित शहर में कैसे परिचित होने की सम्भावनाये जन्म लेती हैं !! मुरुगन मुझे मिलता है विभिन्न रूपों में आज भी सपनों में और यदाकदा उन्ही गलियों में मिटटी के दिए बेचते हुए , सुगन्धित अगरबत्ती बेचते हुए , सुन्दर से मुरझा जाने वाली मालाएं बेचते हुए ...अपने ही लोगो के बीच अपरिचित सा ...बस उसी समय जब वो स्वयं के बारे में सोचता है ....अन्यथा सब के समीप है ...सबका अपना है वो , चाय की मीठास रूंधे हुए गले के कसैलेपन को कम नहीं कर सकती !!
                हमें , स्वयं सरीखे कुछ बुत बनाने चाहियें और उनमे खुद को तलाशना चाहिए ...तब जब आपको परिचय की दरकार ना हो ....ताकि जब आप अजनबियों के बीच हों तो कम से कम स्वयं को तो स्वयं का परिचय ना देना पड़े !!  मुरुगन आज बारहवीं कर चुका है , स्वयं को स्थापित कर रहा है और मुरुगनो से परिचित होने के लिए !!!  ये तो सफ़र है , चलता ही रहेगा कभी आपसे मुआकात हो तो कृपया पहचान लीजियेगा , बिना परिचय दिए श्रीमान !! 

Saturday, November 26, 2011

" वीकेंड ज्ञान "

" वीकेंड ज्ञान " -    " हमारे गाजीयाबाद मैं एक तिराहा है .... हां ठीक से पढ़िए ...तिराहा ...जिसका नामकरण यहाँ के सुविग्य , ज्ञानी लोगो ने " अग्रसेन चौक " जी हाँ चौक रखा है ...! " फोटो कल लगता हूँ... आपकी जिज्ञासा की जो बात है !  कल रविवार है जरा देख आइयेगा !