Friday, February 21, 2014

एक कहानी : " अलविदा "

          अपने साथी डाक्टर्स के साथ हॉस्पिटल के केफेटेरिया से  " प्राचीर "  जल्दी जल्दी लॉबी से होता हुआ मेन गेट कि तरफ बढ़ रहा था ! बीच-बीच में नीचे कि तरफ बाकी डाक्टर्स कि तरफ भी देखता जाता था जो सुबह से सांकेतिक हड़ताल पर थे  और मेन गेट पर इक्कट्ठा थे !
      
अरे , आप यहाँ ?

प्राचीर ने एक ४०-४५ साल कि महिला से पुछा जो लॉबी में पड़े सरकारी लम्बे से लकड़ी के तखत पर बैठी थी !

कोई जवाब नहीं मिलने पर प्राचीर ने फिर से पुछा :

आभा दी आप यहाँ क्या कर रही हैं ? क्या हुआ है आपको ?

कोई जवाब नहीं मिला तो प्राचीर के बाकि साथियों ने भी उस महिला के पास आ कर पुछा आपको क्या तकलीफ है मैडम ?

सर , ये बोल नहीं सकती और सुनाई भी कम देता है ! पानी कि बोतल में सरकारी ठन्डे पानी को भर कर लाता हुआ एक १२ - १३ साल का लड़का बोला जो जल्दी जल्दी उनकी तरफ चला आ रहा था !

प्राचीर : तुम कौन हो ? क्या नाम ?

जी मेरा नाम अतुल है और मैं मौसी कि सहेली का बेटा हूँ ! मेरी माँ और मौसी दोनों एक ही एन जी ओ में काम करते हैं !

प्राचीर : कब से बीमार हैं आभा दी ?

अतुल : पता नहीं , मुझे तो आज माँ ने कहा कि ले जाओ हॉस्पिटल ! पर सर आप कैसे जानते हैं इनको ? क्या ये पहले भी आपके पास इलाज कर चुकी हैं ?

प्राचीर ने कुछ सम्भलते हुए अपने दूसरे साथियों से कहा : स्ट्रेचेर मगवाओ जल्दी !

अतुल और बाकि साथियों ने प्राचीर कि आभा दी को आई सी यू में पहुँचाया ! ड्यूटी पर मौजूद नर्स ने जब एडमिशन फॉर्म भरने के लिए आभा जी डिटेल्स जाननी चाही तो अतुल वहाँ नहीं था ! रुपेश ने बताया कि अतुल बोल कर गया है कि आभा दी का दुनिया में कोई नहीं है और वो अतुल और माँ  के साथ ही वो रहती थी अब वो वापस जा रहा है सुबह आएगा !

नर्स : सर आपने  बिना  किसी  इनफार्मेशन  के  इस  पेशेंट  को  एडमिट  कर  लिया  और  बेस्ट  ट्रीटमेंट भी शुरू करवा दिए हैं अब में कैसे बाकि कि फॉर्मलिटीज़ पूरी करू ?

प्राचीर : लाइए एडमिशन फॉर्म और बाकि के पेपर्स मुझे दीजिये , थोड़ी देर में मुझ से ले लीजियेगा !

शाम के ७ बज रहे थे !

सूरज कि किरणे चन्द्रमा के लिए रास्ता बुहार रहीं थी !

बाहर हवायें हलकी ठंडी हो चली थी  लेकिन आभा दी का माथा अभी भी आग उगलता था ! 

नर्स ने ब्लैक कलर का पेन प्राचीर कि तरफ बढ़ाते हुए कहा : कॉफी लेंगे सर ?

प्राचीर ने पेन लेते हुए हल्की सी मुस्कराहट से हामी भरी !

सुबह के ११ बजे से शाम के ७ बजे तक वो लगातार अपनी आभा दी के साथ था ! जहाँ जरूरत पड़ती थी स्पेशलिस्ट को बुला लेता था !

थोड़ी देर में नर्स ने दो कप कॉफी ले कर दरवाज़े पर दस्तक दी !

प्राचीर : अंदर आजाइए !

नर्स : लोजिये सर !

प्राचीर : अरे , आ खुद ले आयीं !!

नर्स ने पास पड़े एडमिशन फॉर्म और बाकि परमिशन फॉर्म्स देखे सब प्राचीर ने भर दिए थे ! 

आभा दी को अपनी बड़ी दीदी और खुद को उनका छोटा भाई बताया था ! पता अपने घर का दिया था !
रिफरेन्स में अपने पिता का नाम लिखा था ! परमिशन फॉर्म पर खुद सिग्नेचर कर थे !

प्राचीर : कुछ बाकि है सिस्टर ?

नर्स ने एक नज़र प्राचीर कि तरफ देखा और कहा नहीं सर !

दी ठीक हो जायें सब को सब बता दूंगा सिस्टर !

प्राचीर ने एक अद्र्श्य प्रश्न का उत्तर दिया !

नर्स ने अपराधबोध से अपनी गर्दन बाईं तरफ हलके से मोड़ दी !

तुम आज घर नहीं आओगे ?

प्राचीर : नहीं माँ , आभा दी को अभी होश नहीं आया है ?

आभा ? तुम कहाँ हो ? प्राचीर कि माँ ने फोन पर पुछा !

माँ अपने हॉस्पिटल में ही हूँ और आभा दी के पास ही हूँ !

ठीक है हम आते हैं , प्राचीर कि माँ बोली !

प्राचीर के आँखे डबडबाई हुई थी ! आभा दी के शरीर में कोई हलचल नहीं थी अभी भी !

सर आप भी थोडा आराम कर लीजिये हम हैं यहाँ ! प्राचीर के साथी रुपेश और जलज ने प्राचीर के कन्धों पर हाथ रखते हुए कहा !

     बस , ऑखें छलक गयी प्राचीर कि , वाशरूम कि तरफ बढ़ता हुआ लगभग रोने लगा था वो !
कुछ देर में बाहर आया तो बाकि साथी भी आ चुके थे !

जलज : सर, अभी डाक्टर बेनेर्जी आये थे और कहा है कि अगले १ घंटे में अगर कुछ डेवलपमेंट नहीं हुआ तो ट्रीटमेंट चेंज करंगे !

प्राचीर ठीक है कहता हुआ आभा के सिरहाने जा कर बैठ गया ! आभा दी का हाथ अपने हाथों में लेता हुआ बोला सिस्टर कमरे कि सारी लाइट्स ऑन कर दीजिये प्लीज़ !

डॉ.रुपेश , डॉ.जलज , डॉ.नयन , डॉ.कुणाल और सिस्टर नंदिता सब प्राचीर को देख रहे थे !

बाहर अँधेरा गहराता जाता था और कमरे के भीतर सन्नाटा !

       जब कोई ५ साल का था तब आभा दी से पहली बार मिला था मैं ! अपने घर के सामने वाले पार्क में दो ग्रे रंग के बॉक्स ले कर बैठी थी वो और पार्क के किनारे पर पीले रंग का एक कपडे का बेंनर लगा था " पल्स पोलियो रविवार " दो बूँद ज़िदगी कि !

प्राचीर अपनी आभा दी का हाथ पकडे पकडे बोलता जा रहा था !

       माँ ने मुझे और मेरे चचेरे भाई को आभा दी के पास से दो बूँद दवा पिलवाई थी  ! दीदी ने मेरी नन्ही सी छोटी उंगली पर एक नीला सा निशान लगाया था और हम दोनों को एक एक प्लास्टिक कि सीटियाँ दी थी ! दिन भर उछलते फिरे थे हम सीटियां बजाते हुए !

कमरे के सन्नाटे को जैसे हलकी सी चपेट पड़ी हो , सब के चेहरे मुस्कुरा रहे थे !

           हर महीने , दो महीने में आभा दी आ जाती थीं पार्क में और मेरी माँ मुझे हर बार दवा पिला कर लाती थी ! जब में बड़ा हुआ तो तो मैं छोटे बच्चो को दी के पास ला कर दवा पिला देता था और सीटियां बांटता था ! वैसे तो दी अपने साथ अपना लंच लाती थी लेकिन कभी कभी में माँ या चाची कभी चाय और नाश्ता मुझे देती थी दीदी को देने के लिए ! घर पर भी आकर बैठ जाया करती थी दी ! एक बार दी को मैंने साड़ी पहने देखा हाथों में भरी भरी चूड़ियाँ , मांग भरी हुई - शादी हो गयी थी दीदी कि !
         जब मैं छोटा था तब वो शायद स्कूल में पढ़ती थी तो सूट सलवार में आती थी ! फिर मेरे इंटरमीडिएट कर लेने के बाद एक रोज़ पता चला  कि आभा दी के पति का रोड एक्ससीडेंट में देहांत हो गया , दूसरी वाली आंटी ( अतुल कि माँ ) मेरी माँ से बता रही थी ! फिर उसके बाद कभी नहीं देखा दी को बस अचानक आज यहाँ मिला हूँ !

कैसी है आभा अब ? प्राचीर कि माँ ने अंदर आते हुए पुछा !

      प्राचीर सिरहाने से उठकर माँ के पास जाने लगा तो आभा कि हलकी पकड़ से वो अपना हाथ छुड़ा नहीं सका !

      जैसे गीली हो चुकी अपनेपन कि मिटटी से दूरियों का पानी निचुड़ चूका था और बंधन अपनी आभा पर था , आस यथार्थ में परिवर्तन होना चाहती थी !

डॉ.बेनेर्जी को बुलाओ दी को होश आ रहा है  : प्राचीर ने कहा !

दी आप मुझे सुन सकती हो ? प्राचीर ने आभा से पुछा !

आभा ने सर हिलाया और जैसे कहा कि तुमने जो भी कहा मैंने सब सुना बेटा !

कमरे में  चेहरों पर ख़ुशी थी !

        आभा ने सबसे पहले प्राचीर  को अपना माथा नीचे करने का इशारा किया और चूम लिया !

असीम संतोष ,  अलौकिक आनंद ,  प्रगाढ़ स्नेह ,  निःस्वार्थ समर्पण दोनों तरफ से !

    सब आनंद मूर्तियों से खड़े निःशब्द कमरे में हो रहे मंचन को देख रहे थे , जिस जीवन नाट्य के वो खुद भी पात्र थे !

आभा दी अब आप बिलकुल ठीक हो जाएंगी और फिर हमारे साथ ही रहेंगी !

         प्राचीर कि माँ सोफे पर बैठे बैठे सब देखती जाती थी , सोचती जाती थी उन्होंने तो सिर्फ एक प्राचीर को अपने पैरों पर  खड़ा किया लेकिन आभा ने तो अनगिनत बच्चो को उनके पैरों पर खड़े
रह सकने लायक बनाया और आज वो खुद सहारे कि मोहताज है ! किस ले लिए जिन्दा रही वो अब तक और आगे किस ले लिए रहेगी ?

आभा ने  प्राचीर कि माँ से मिलने के लिए इशारा किया , माँ के हाथो में हाथ ले कर रो पड़ी दोनों !

डॉ.बेनर्जी कमरे में आ चुके थे और बोले :  अब सबको बाहर जाना होगा , प्राचीर तुम अंदर ही रुको !

सब बाहर पड़े सरकारी लकड़ी के तख़्त पर बैठे थे ,कोई खड़ा था !

सब अपने को प्राचीर और आभा दी कि कहानी का एक पात्र मान खुशनुमा अंत कि और बढ़ रहे थे !

रुपेश कि नज़र कमरे के अंदर गयी और चहरे से सारी ख़ुशी काफूर !

            प्राचीर कि आभा दी जा चुकी थी और प्राचीर अपने बचपन ,किशोरावस्था की अनेकानेक
घटनाओं कि खुलती बंधती गाठों में यादों कि खुशबूओं को जीता जाता था ताकि उनकी आभा और बढे अपनी आभा दी को अलविदा कहता हुआ  !

       सही है ज़िन्दगी सिर्फ दो बूंदों कि सी ही है , जीने वाले इसे सागर में तब्दील कर लेते है, जीने के कारण तलाश कर !!

एक कहानी : अलविदा , आभा दीदी !!

Friday, February 7, 2014

एक कहानी : मोमबत्तियॉँ !!

     
        " स्कूल में छुट्टी कि घंटी बजी तो बच्चों कि आवाज़ों का सुन्दर संगीत कानों में घुलने लगा ! "

             सीमा पिछले कई सालों से रोज़ सुबह घर के रोज़मर्रा के काम निबटा कर सामने चारपाई पर बैठी दोपहर होने तक सड़क पर आने जाने वालो को तकती रहती थी ! सर्दी में धुप को साथी बना लेती तो गर्मियों में नीम के पेड़ छाँह कि बंधू हो जाती ! बारिश में पिछले साल कि  तिरपाल सहारा  होती जिसको बाउंडरी कि दीवार पर टिका कर बैठी रहती !

            सब्जी वाले , फल वाले , दूध वाले , प्रेस वाला , सिलेंडर वाला , डाकिया , कोरियर वाला और जो भी मोहल्ले में चक्कर लगता वो सीमा से राम राम कर के निकलता था ! कुछ देर उसके साथ बैठ कर चाय का आनंद भी ले लेते है कुछ लोग ! अभी पिछले बसंत कि तो बात है जब विभोर किसी काम से आया था घर तो माँ के लिए बड़ा सा फ्लास्क ले आया था , बस दिन भर कि बार बार चाय बनाने कि परेशानी से छुट्टी हो गयी थी सीमा कि !

         माँ , माँ !! दरवाजे पर किसी ने जोर से आवाज़ें लगायी !

आज सीमा घर में ही थी , बाहर नहीं बैठी थी !

सीमा : हाँ कौन है ?

मैं रोहित हूँ नानी !

१५ , १६  साल के एक लड़के ने बाहर से ज़वाब दिया !

सीमा : रुक  आती हूँ कहते हुए दरवाज़ा खोल दिया !

नानी आज आप बाहर नहीं बैठी हैं चारपाई पर ?

रोहित ने अपने साथ एक और लड़के का हाथ पकड़ते हुए सीमा से पुछा !

सीमा : मेरी कमर में दर्द है आज इस लिए चारपाई नहीं बिछा सकी !

रोहित : हम बिछा देते हैं !

सीमा ने अचानक हुए इस प्यार भरे सम्बोधन को डबडबाई आखों से स्वीकार करते हुते हामी में सर हिला दिया !

सुनेहरी धूप में उज्जवल भविष्य ढलकते बुढ़ापे को सहारा दे  रहा था , अदभुद मंजर !

रोहित : आइये नानी बैठिये !

सीमा ने दूसरे लड़के के कंधे का सहारा लेते हुए चारपाई पर खुद को टिका दिया और रोहित से कहा !

अन्दर जाओ और चाय का फ्लास्क ले आओ , भरा है और गर्म भी सम्भाल कर लाना ! दो कप भी लाना !

फिर दूसरे लड़के से बोली - भीतर पलंग पर मेरी शाल राखी है लेते आओ , ठंडक है बाहर !

रोहित : नानी कप में निकाल दूं चाय आपके लिए ?

सीमा : हाँ मुझे इस गिलास में दो और तुम दोनों कप में ले लो !

विराट : नानी लीजिये ! सीमा कि ओर शाल और तकिया बढ़ाते हुए बोला !

सीमा : आ जाओ बैठो मेरे पास और बताओ कि तुम कौन हो ? कहाँ रहते हो ? पहले तो कभी नहीं देखा इधर लेकिन तुम दोनों कि स्कूल ड्रेस तो पास वाले स्कूल कि सी हैं ?

रोहित अभी कुछ बोल पता कि स्कूल कि घंटी बज गयी !

अच्छा नानी अभी जाते हैं , कल आएँगे !

कहते कहते  दोनों हाथ हिलाते हुए जल्दी जल्दी स्कूल के गेट कि तरफ बढ़ गए !

सीमा उम्मीद कि रंग बिरंगी मोमबत्तियों को आकार लेता देख रही थी !

माँ कुछ सब्जी दे दूं आज , साग एकदम ताजा है !

सब्जी वाले ने एक गट्ठर में चने  सरसों और मेथी रख दी !

फल वाले से आज सीमा ने कुछ सेब खरीदे , अंगूर लिए और अनार भी , सब के सब ताजे कल के लिए !

दूधवाले से भी कुछ दूध ज़यादा लिया और कल कुछ पनीर लाने को कहा !

शाम को प्रेस वाले से बोल कर दो मफ़लर मंगवाए पास के ही नए खुले मॉल से चकट रंग के !

दिन बीत रहा था ,  आज भी डाकिया चिट्ठी नहीं लाया !

शाम को अपने घर लौटते हुए सीमा के पास बैठ कर भारी मन से चाय पीते हुए बोला : माँ क्या विभोर अब बिलकुल नहीं आता ?

           सीमा अंदर तक सकपका गयी ! बेटे कि कमी और बेरुखी कि मार से ज़यादा चोट पहुचाने वाली थी ये बात कि समाज में न पता चले कि सबकुछ ठीक ठाक नहीं है , जैसा कि दीखता है ! वो ऐसे दुखी और परेशान होती थी जैसे विभोर ने उसको अकेला छोड़ कर अपराध उसने नहीं खुद सीमा ने किया हो !

सीमा : नहीं ऐसा नहीं है , अभी पिछले साल ही तो आया था ! तुम चो गरम चाय के आनंद ले रहे हो अगर मेरा बेटा ये फ्लास्क ना दे जाता तो ठंडी चाय ही पिलाती तुमको !

        डाकिया एक एक शब्द सुन कर ऐसा एहसास कर रह था जैसे खौलते पानी कि भाप !
        जैसे भीतर ही भीतर असंतुष्टि कि  ज्वाला से सम्बन्ध धधक रहे हो और उनको जकड कर रखने कि कोशिश में भाव रोज़ रोज़ कर के भाप हो रहे थे ! 

अच्छा माँ अब चलता हूँ , कुछ लाना है बाजार से तो बोलिये कल लेता आउंगा !

सीमा : हाँ ये अच्छा याद दिलाया तुमने रुको दो चीज़े लानी हैं !

     कुछ रूपए डाकिये के हाथों पर रखते हुई बोली : जो अच्छा सा पेन लगे दो ले लेना और साथ में दो अच्छी वाली चाकलेट भी लेकिन ये सब मुझे कल ११ बजे से पहले चाहिए सुबह !

डाकिया अपने रस्ते चल दिया ,हाँ कहता हुआ !

       दिन भर इसके उसके आने जाने से अकेलापन पास नहीं फटकता लेकिन रात के सन्नाटे में गहराती जाती अकेलेपन कि चुभन खुद को सांस लेने से रोक लेने तक को मजबूर कर देती थी सीमा को हर रात , लेकिन आज ऐसा नहीं था , कल कि ख़ुशी में वो दोनों फिर जो आने वाले थे उसको मिलने !

अगली सुबह !
माँ आज खबर के लिए दूसरा अखबार है , वो जो आप पढ़ती हैं नहीं मिला मुझे - अखबार वाले ने आवाज लगायी सुबह सवेरे !

सीमा अंदर से ही बोली , ठीक है जो है वो ही दे दो !

आज जैसे घडी कि सुइयाँ सर्दी में काँपते बैलों जैसी हो गयी थी , आगे सरकना मानों पहाड़ चढ़ना हो गया हो ! 

चाय फ्लास्क में भरते हुए काम करने वाली ने अपनी चप्पल पहनते हुए पुछा : माँ चारपाई बहार बिछा दूं ?

सीमा : नहीं , वो आएँगे ना !

कामवाली : वो, कौन ?

सीमा मुस्कुराते हुए - रोहित और उसका दोस्त !

कामवाली ने भी हंसते हुए कहा अच्छा स्कूल के बच्चे होंगे ?

सीमा ने कहा हाँ , मुझे आशुतोष जैसे ही लगते हैं , आज वो भी इनकी ही तरह का हो गया होगा !

कामवाली ने जवाब में कहा पता नहीं माँ जब दीदी कार में बैठ रहीं थी १५ साल पहले तो मैंने ही उनकी गोद में दिया था आशुतोष को अब कहाँ पलट कर देखा उन लोगो ने हमें ! मैं चलती हूँ नहीं तो फिर परेशान हो जाओगी आप पुराणी बात सुन कर !

सीमा घडी देखती जाती थी कि कब ११ बजें और स्कूल कि आधी छुट्टी हो और वो आयें !

नानी , नानी !

हाँ अंदर आ जाओ रोहित - सीमा ने अंदर से कहा !

नहीं आप बाहर आइये - रोहित बोला !

सीमा हाथो से चश्मे को सम्भालते हुए दरवाज़े कि चौखट पर गयी और देखा तीन बच्चे खड़े थे !

रोहित उसका दोस्त जो कल भी साथ था और एक और नया साथी !

सीमा : अरे भाई बाहर क्यों खड़े हो अन्दर तो आओ !

रोहित : नानी आप ने कुछ पहचाना ?

सीमा : हाँ तुम रोहित हो और ये तुम्हारे दोस्त जिसमे से कल भी आया था !

तभी नया वाला लड़का सीमा के पास आया और अमरलता सा लिपट गया सीमा से !

सीमा स्तब्ध् !!

उसको चिपकाये चिपकाये उसने रोहित और दूसरे लकड़े को अंदर आने का इशारा किया और पलंग पर बैठ गयी पूछते हुए : क्या हुआ बेटा ?

रोहित : नानी ये आशुतोष है !

सीमा जैसे बर्फ़ कि सी हो गयी थी , ये सुन कर !

एकदम ठंडी !

एकदम जड़ !

एकदम खुश्क कोई भाव नहीं चहरे पर !

पलकें खुली कि खुली !

हाथों कि अंगुलियाँ गोद में सर रखे आशुतोष के बालों में अटकी रेह गयी थीं !  अब कुछ नहीं बाकि रहा !

नानी क्या सोच रही हैं ? रोहित ने सीमा के कन्धों पर हाथ रखते हुए पुछा !

सीमा ने अपना माथा रोहित कि छाती पर टिका दिया और हाथो से कस कर पकड़ लिया उसको कि फिर धूमिल न होने पाये रे रौशनी जो बरसों के बाद आज देखने को मिली हैं उमीदों कि मोमबत्तियों में !

आशुतोष ने गोद में सर रखे रखे ही आवाज लायी - मम्मी आप भी आ जाईये !

चोखट पर आशुतोष कि माँ ( विभा ) ने परदे को हटा कर कदम रखा ! अब सीमा के गले से आवाज़ रोके से नहीं रुक रही थी ! तेज़ आवाज़ में रो पड़ी दोनों !

लगता था जैसे कितने ही समदर, कितनी रुकी हुई नदियां बहाव का कारण तलाशते हुए सीमा के घर में आ मिले थे !

रोहित ने आशुतोष और सीमा से विदा लेने को बाय कहा !

आशुतोष ने हाथ पकड़ कर रोक लिया उसको !

सीमा ने सब कुछ रख दिया रोहित के सामने जैसे देवता को अर्पण कर रही हो !
         
            विभा कहने लगी : माँ विभोर के विदेश जाने के बाद मुझे ट्रान्सफर मिल गया यहीं केंद्रीय विद्यालय में ! क्योकि मुझे प्राइवेट स्कूल में ही पढ़ाना था आशुतोष को तो आपके घर के बगल वाले स्कूल में दाखिला दिलवाया लेकिन उसको कभी भी आपके बारे मे नहीं बताया !
         
            परसों रोहित और उसके दोस्तों ने ज़िक्र किया था आपके बारे में और कल  आपके पास आये भी थे फिर यहाँ नयी जगह पर दोस्तों के नाम पर ये दोनों ही इसके दोस्त बने और मुझ तक बात आयी और मुझे भी इतने दिन से आप सब दे दूरी ठीक नहीं लग रही थी ! इस लिए  मैंने इन दोनों और आशुतोष को आपके बारे में बताया और साथ आ गए आज आपके पास !

           सेब और अनार रखे हैं अंदर जा ले आ , डाकिया से दो चाकलेट मंगवाई थी वो भी लेती आना फ्रिज से निकाल कर ! सीमा ने रूधे गले से कहा !

           दो पेन और मफ़लर रखे हैं रोहित और उसके दोस्त के लिए !

दादी आज हम जन्मदिन मनाएंगे शाम को सब का  - आशुतोष बोला !

सीमा ने आशुतोष कि टी शर्ट के कलर को ठीक करते हुए पुछा - मोमबत्तियाँ कितनी लगाएगा ?

ढेर सारी दादी हर बिछड़े साल कि !

हम पहली बार जो मिले हैं !

तभी डाकिया ने आवाज़ लगायी ! - माँ

हाँ आऒ , अंदर ही आ जाओ !

माँ , आपकी आज भी कोई चिट्ठी नहीं आयी है !

भाई अब कोई इंतज़ार नहीं चिट्ठियों का , पर तुम शाम को आ जाना हम मोमबत्तियॉँ जलाएंगे !

अकेलापन कोने कोने अँधेरा ढूँढता जाता था और मोमबत्तियों कि  रौशनी ,  अपनापन  !!

Sunday, February 2, 2014

परछाइयों से .....

पूर्वाह्न से,
चल कर,
मध्याह्न तक,
सिमटते हैं हम,
परछाइयों से,
आस पास धधकते,
सम्बन्धों सरीखे,
खिलते,
फिर बिखरते,
सूरजों के सहारे !!

अपराह्न के,
प्रारब्ध से,
खुलती हैं गांठे,
रिश्तों कि,
फिर, बढ़ जाते हैं,
परछाइयों से,
परेशानियों सरीखे,
डूबते सूरजों के साथ,
ढलते ,
रिश्तों कि,
शामों के सहारे !! 
  

Wednesday, January 29, 2014

एक कहानी : ये आकाशवाणी है !!

                         " ये आकाशवाणी है , अब आप नवीन कुमार से समाचार सुनिये ! "

            सरकारी नौकरी ,सरकारी गाड़ी ,सरकारी ठाठ बाट और समाज में प्रतिष्ठा सब थे नवीन के पास किन्तु उसे गाहे बगाहे लगता था कि ये सब  किस काम का ? रोज़ आकाशवाणी भवन से अपने घर और घर से फिर पास के ढाबे वाले के पास जाने के रास्ते  में ये सोचता जाता था !

मैं किसके लिए हूँ ?

क्यों कर रहा हूँ ये सब ?

क्या है मेरा संसार ?   

कार में पड़े अखबार को देखता जा रहा था सोचते सोचते !

शाम के साढ़े सात बजते होंगे !

नवीन सात बजे का बुलेटिन पढ़ कर सरकारी गाड़ी से ढाबे कि तरफ चल दिया !

समाचार बाबू आज क्या खायेंगे ? ढाबे वाले सरदार जी ने बड़े अदब से कार से उतरते हुए नवीन से पुछा !

     नवीन ने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया : सरदार जी आज सर में हल्का सा दर्द है , एक कप चाय पिला दीजिये पहले , खाना फिर जो आप खिला दें ! अगला बुलेटिन रात ११ बजे पढ़ना है ,बहुत टाइम है !

हाँ हां , अभी लो  कहते हुए सरदार जी ने खुद चाय का बर्तन उठा लिया !

अमूमन उनके ढाबे में काम करने वाले बहुत से लड़के ये सब काम देखते हैं और सरदार जी केवल गल्ला सम्भालते हैं !

नवीन को प्यार जो करते हैं तब से जब वो हाफ नेकर में उनके पास तंदूरी रोटियां सिकवाने आया करता था !तकरीबन १५ सालों पहले अपनी नानी के साथ ! अब ना तो नहीं रहीं और ना माँ ! 
पिता का साया बचपन में नहीं रहा , माँ ने दूसरी शादी कर ली ! घर को किराये पर दे दिया और नवीन को पास के होस्टल में रख छोड़ा ! होस्टल का खर्च कनाडा से ही भेजती रहती थी कुछ सालों तक ! जब वो बंद हो गया तो सरदार जी ने नवीन का साथ दिया , अब भी दे रहे हैं !

जनवरी के महीने कि सर्द शाम ,हवा और धुंध के साथ सर्द हो चली थी !

तभी , दूर बैठे एक साधू ने नवीन से अपने पास आने को कहा !

नवीन : आप मुझे बुला रहे हैं बाबा ?

साधू : हाँ बेटा !

नवीन साधू के पास जा कर चारपाई पर बैठ गया और बोला : जी , बाबा !

साधू : सर में दर्द कब से है ?

नवीन : बस सुबह से ही है , आज दिन भर थोड़ी थकावट भी रही !

साधू : अरे बेटा रोज़ सवेरे तुम्हारी आवाज से हमारा दिन निकलता है ! दिन दुनिया कि खबर लगती है ! संसार में क्या चल रहा है सब पता चलता है ! चाहे कही भी रहे , यहाँ या फिर हरिद्वार , तुम से जुड़े रहते हैं ! ऐसा लगता ही नहीं कि हम किसी को नहीं जानते ! सब दुनिया हमारी है , ऐसा ही एहसास रहता है ! एक तो तुम्हारी आवाज़ इतना अपनत्व लिए है और फिर तुम समाचार ऐसे पढते हो कि हर सुनने वाले को लगता है कि उसके ही लिए पढ़ा जा रहा हो !

नवीन मुस्कुरा रहा था और बार बार अपने सर पर हाथ रखता जाता था , दर्द के कारण ! साधू बोलते जा रहे थे !

अभी कल ही मैं हरिद्वार से लौट रहा था , गाड़ी में लगे रेडिओ पर तुम्हारी आवाज़ सुनी सब संसार के समाचार मिल गए वर्ना चार दिन से गंगा किनारे धुनि रमाये कहाँ कुछ खबर थी !

नवीन ने बाबा को टोकते हुए पुछा : बाबा आप तो साधू हैं , फिर संसार कि खबर आपके किस काम कि होती होगी ?

साधू हल्का मुस्कुराते हुए बोले : बेटा जब कोई ये कहे कि मैं संसार से दूर हो रहा हूँ समझो और करीब आने कि कोशिश में है ! क्यों कि वो याद रखता है कि उसको संसार से दूर रहना है ! एक विज्ञापन भी आजकल सुना है मैंने " जितना दूर जाओगे , अपनों के उतने करीब आओगे ! "

नवीन अपना सरदर्द भूल चूका था ! चाय कि चुस्कियों का आनंद लेते साथ एफ एम् पर चले पुराने गानो कि धुन के शाम को और लम्बा होने इच्छा जगा रही थी लेकिन घडी कि सुइयां कहती थीं कि समय के साथ चलो !

ये कप ले के जाऊं नवीन भैया ? छोटे लड़के ने नवीन से पुछा !

नवीन जैसे चलती ट्रेन में अचानक लगे झटके के साथ काँप गया और बोला : हाँ हाँ , कप रख कर मेरे पास आना !

कॉलसेंटर में काम करने वाले कुछ बच्चों कि दो गाड़ियां रोज़ कि तरह ढाबे पर आ कर रुकीं !
हंसी ठहाके ,महंगे महगे मोबाइल ,टेबलेट ,लैपटॉप और सब सुख सुविधाओं वाली चीजों के साथ 
सब ५ रुपये वाली चाय का आनंद ले रहे थे ! संसार कि सारी कीमती चीजें एक तरफ और जनवरी कि सर्द शाम में ढाबे कि ५ रूपए कि चाय एक तरफ होती है लेकिन उनके लिए ही ,जिनका संसार होता है !

नवीन के लिए या सब बे मानी था !

         तीन सालों पहले हुई शादी ! संतान सुख नहीं ! पिछले ६ महीनो से वाईफ मायके में रह रही थी ! मैं और तुम का झमेला ! बस और  कुछ नहीं !
         तभी उन किशोरों में से किसी ने सरदार जी को नवीन से बात करते सुन  लिया और पहचान गए कि वो रेडियो कि आवाज़ वाला नवीन कुमार है !

        बस फिर क्या था अकेलेपन और सन्नाटे से घिरे नवीन के इर्दगिर्द रंगबिरंगे कपड़ों में अब नए लडके लड़कियां खड़े थे !

सर , हम भी आपकी बुलेटिन और दूसरे कार्यकम रेडिओ पर सुनते हैं !  

बल्कि हमारी ट्रैनिंग में कई रेडियो के सीनियर ने हमें टिप्स दिए थे !

आज आप से रूबरू होने का मौका है तो प्लीज़ हम को कुछ गाइड कीजिये !

नवीन अचानक से जैसे सन्नाटे भरी सड़क के सुनसान रस्ते से निकल कर  खचाखच लोगो से भरे गली मोहल्ले में पहुच गया था , ऐसा सोचने लगा और बोला :

देखो दोस्तों तुमलोग मुझसे क्या सीख सकते हो, मैं तो सिर्फ वो पढता हूँ जो मुझे पढ़ने को कहा जाता है लेकिन तुम लोग तो सामने वाले कि समस्या का समाधान करते हो , वो भी सुन्दर तरीके से साफ़ आवाज़ में !

ये सुनकर एक लड़का बोला :लेकिन अपने सही नाम से नहीं ,

आप को आपके नाम से सब जानते हैं सर पर हमें कोई नहीं ! फर्क है !

नवीन : तो फिर एक बात ही शेअर कर सकता हूँ कि जब आपके पास अपना कोई ना हो , हो भी तो दूरी बनाये हुए रहे तब संसार के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए ,
उनके लिए जिनको आप न जानते हों और वो जो आपको ना जानते हों ! रिश्ते जन्म लेंगे किन्तु सीमित समय और दायरे में जो अंतहीन दर्द नहीं देंगे ,

और फिर ये कशिश आपकी आवाज़ में उतरेगी जिसे हर सुनने वाला अपने लिए ,

कहा गया समझ कर आपको याद रखेगा !

नवीन कि आवाज़ सघनता से हर एक के कान में सरक रही थी !

ठंडी हवाओं के झोके एक दूसरे को और करीब ला रहे थे नवीन बोलता जा रहा था  , बे सुध निरंतर कि अचानक सरदारजी ने आवाज़ लगायी :

बच्चो आप सब को देर हो जाएगी और समाचार बाबू को भी तो रात का बुलेटिन पढ़ना है !
लो एक एक कप चाय मेरी तरफ से पियो और काम पर चलो !

नवीन का संसार कितना बड़ा था ये उसे आज खबर लगी ! एक घर ! एक स्टूडियो ! एक ढाबे के सिवाय !

वो जो उसको छोड़ कर दूर चले गए हैं उनका दुःख तो है लेकिन समय के साथ दूरियाँ करीबियत में बदलती हैं , ऐसा विश्वास है !

कुछ ही देर में नवीन स्टूडियो में था , टेक्नीशियन के ओके का इशारा मिलते साथ उसने अपनी आवाज़ का परिंदा संसार के मानस पर लिख देने को " सदैव समर्पण " माध्यम चाहे जो हो !

ये आकाशवाणी है , रात्रि के ११ बजने को हैं     , कल सबेरे फिर मुलाक़ात होगी ……… शुभरात्रि !!


Tuesday, January 21, 2014

एक कहानी : अंतिम आहूति !!



         " चन्दन " ने ओक से पानी पीते हुए पानी पिलाने वाली बूढी माँ के चेहरे कि झुर्रियों से झांकते हुए तज़ुर्बे और आँखों कि उमीदों कि और देखा , जो " और पियोगे बेटा " पूछते  हुए मुस्कुरा रहीं थी !

चन्दन , कितनी प्यास लगी है तुम्हे ? अब चलो भी !!

सरकारी गाड़ी में बैठी विभा ने अपने बेटे अनमोल को सँभालते हुए चन्दन को पुकारा !!

" नहीं माँ बस " कहते हुए चन्दन ने अपनी जेब से रुमाल निकालने कि असफल कोशिश कि , तभी बूढी माँ ने अपने आँचल को बढ़ाते हुए कहा - लो , इस से पोछ लो बेटा !

चन्दन ने हाथ पोछ कर  " बूढी माँ " को एक बार फिर से देखा और ठन्डे पानी के जार को ले कर सरकारी कार कि तरफ मुड़ गया !

बार - बार पीछे देखता जाता था ! बूढी माँ हाथ हिला कर अभिनन्दन कर रही थी , फिर से आने का निमंत्रण देते हुए !!

सरकारी गाड़ी अपने पीछे धूल और सूखे पत्ते उड़ाती हुई आगे निकल गयी !!

लगभग बीस सालों बाद !

शहर के बड़े रिहाइशी इलाके में बने बड़े बंगले में सुबह कि चाय पीते हुए चन्दन ने अनमोल से पुछा ?

किस  जगह पर कैम्प लगेगा ?

जंगल में " स्वर्णरेखा " नाम कि उसी के किनारे पापा , जगह मुझे नहीं पता ! शायद सर्कुलर में लिखा हो ! रुकिए देख कर बताता हूँ !

चन्दन ने अनमोल को रोकते हुए कहा - रहने दो , मैं जनता हूँ ! तुम जाने कि तैयारी करो !

अनमोल मुस्कुराया - आप जानते हैं , ठीक है फिर कहता हुआ मोबाईल पर आने वाली दूसरी तरफ कि आवाज़ को सुनता हुआ अपने कमरे कि तरफ बढ़ गया !

कितने दिन  के लिए  जा रहा है अनमोल ? चन्दन ने डायनिंग टेबल पर खाना परोसती हुई विभा से पुछा !

विभा ने कुछ नहीं कहा उसने प्लेट तैयार कर के चन्दन कि तरफ बढ़ा दी  !

चन्दन ने फिर से वही बात पूछी ! विभा फिर  चुप रही !

अजीब सा तनाव पसर गया था डायनिंग टेबल पर !

ख़ामोशी ने डिनर निगल लिया, लेकिन  भूख अभी भी आस में थी !

विभा ने रात के दूध के गिलास के साथ चन्दन को दवा ये बताते हुए दी कि कल से तीन दिन अनमोल घर पर नहीं है !

चन्दन :  अरे पिछले २ घंटों से ये पूछ रहा हूँ और तुम अब बता रही हो ?

विभा : हमारे क्या दर्जन भर बच्चे हैं जो  एक एक कि खबर तुम्हे नहीं ? अनमोल एक ही एक बेटा है और उसकी किसी भी बात में तुम्हे कुछ गलत नहीं दिखता ! उसकी सब बातों में तुम्हारी हाँ है ! तीन दिन वो जंगल में रहेगा अपने दोस्तों के साथ ! २२ साल के लड़के को दुनियादारी कि कोई खबर नहीं उसको तुमने ३ दिन के लिए अकेले  छोड़ दिया ! क्या रोक नहीं सकते थे ? लेकिन तुम्हे तो सब कुछ प्रेक्टिकल अप्प्रोच में करना होता है ना ? लो चाय  पियो अब जो होगा ठीक है बेटा तुम्हारा है चाहे जो करो मैं कहाँ हूँ तुम दोनों के बींच में ना माँ और ना कुछ और !

कहती हुई विभा दरवाजे कि  तरफ बढ़ गयी , नम आँखों से !

चाय कि प्याली हाथों में लिए चन्दन बिस्त्तर से उठ कर खिड़की से बहार बहते कोहरे को देखने लगा जिसके साथ गले में रुकी सघन घुटन आँखों के रस्ते बाहर टपकने लगी !

चाय ख़तम कर के चन्दन कुछ देर यू ही बाहर देखता रहा , दिशाहीन हवा और यादों के साथ ! 

विभा देर तक उसके पास नहीं आयी !

लंच अकेले ही किया चन्दन ने ये  सोचते हुए कि दोष क्या है ?

दोष किसका है ?

उपाय क्या करू ? हमेशा ऐसे ही तनाव में रहना नियति है क्या मेरी ?

दोपहर  को आँख नहीं लगी ! बिस्तर पर करवट बदलता रहा !

अनमोल ने भी एक  कोई फ़ोन नहीं किया !

कैसा है ! 

ठीक से पंहुचा कि नहीं कोई खबर नहीं !

       चन्दन ने खुद से सवाल किया : किस लिए ये सब खड़ा किया मैंने ? एक पत्नी और एक बेटे के लिए ? अपना बचपन खोया , अपने जीवन के स्वर्णिम समय को पैसा कमाने में लगाया ताकि बड़ा घर , पत्नी कि ज़रूरतें , बेटे को बड़े स्कूल में पढाई , हर छोटे बड़े खर्चे को समय से पूरा करना ! प्रोविडेंट फण्ड का पैसा रख  रखा है बेटे कि पढाई के लिए ! फिर भी सब नाराज़ ! किसी को मेरे सम्मान कि  परवाह नहीं ! अब, बेटा बड़ा हो गया है उसको उसके दोस्तों के साथ टूर पर जाने देने के लिए हाँ कहना गलत है ??  क्या गलत है इसमें मैं अब तक नहीं समझ सका !

लंच कर लो , विभा ने बेडरूम का दरवाज़ा धीरे से खोलते हुए कहा !

चन्दन को लगा जैसे कि उम्मीद कि सूखती गंगा में कटोरी भर पानी आ गिरा हो !

हाँ चलो आता हूँ ! चन्दन ने जवाब दिया !

विभा : क्या बुदबुदा रहे थे ?

चन्दन : तुमने सुना तो होगा ?

विभा : हाँ ?

चन्दन : तो फिर क्यों पूछ रही हो ?

विभा : इस लिए कि कुछ रह गया हो तो वो भी कह डालो , मैं सब सुन सकती हूँ , सेह सकती हूँ !

चन्दन : सेह सकती हूँ ? मतलब ?

विभा : मैं ५ साल तक माँ नहीं बन सकी तुमने क्या नहीं किया उसके लिए ! याद है वो जंगल वाली बूढी माँ , कब कब जाते थे तुम वहाँ , क्या मैं भूल सकती हूँ ! उनकी बेटी जिसका जिनकी बेटी का बेटा है हमारा अनमोल उसके लिए क्या नहीं किया तुमने कानूनी और सामाजिक रूप में ! आज तक किसी को नहीं मालूम कि अनमोल मेरा बियोलॉजिकल बच्चा नही है !

विभा बोलती जा रही थी : सब किया तुमने ! बस एक बात को  छोड़ कर !

चन्दन : क्या ?

विभा : पिता नहीं बने तुम ना ही मुझे माँ बनने दिया अनमोल का !

चन्दन : ओह्ह !! कैसे ?

विभा : तुम हमेशा दया भाव में क्यों रहे कि उन बूढी माँ ने तुम पर दया करी जब कि तुम सब कर चुके उनके लिए ज़रुरत से ज़यादा ! फिर क्यों डरे रहते हो ? क्यों अपने बेटे को पिता कि तरह से नहीं देखते ? क्यों नहीं डरता वो तुमसे एक बेटे कि तरह ? क्यों हर उसकी बात तुमको उसकी आज्ञा लगती है ? क्यों उसकी किसी बात को माना नहीं करते और तुम्हारा बेटा क्यों उसको नहीं मानता और जब बेटा को पिता का समर्थन हो तो माँ कहाँ रह जाती है इसमें ?

चन्दन सिर्फ सुन रहा था , डबडबी आँखों से बस सुन रहा था , सुनता ही जा रहा था !

वो विभा को पूरा बह जाने देना चाहता था ! आज कह डाले सब जो मन में है ! पिघले तो सही अंतस कि कुंठा ! क्या होगा , कह लेगी मन हल्का कर लेगी मेरे साथ !

अभी दो लोग आपस कि दूरियां ख़तम करने का प्रयास कर ही रहे थे कि अचानक पड़ोस में बैटमिंटन खेल रहे बच्चों ने जोर से आवाज लगायी ? अनमोल भैया हमारी कॉर्क दे दीजिये ?

विभा ने अंदर से जवाब दिया : अनमोल नहीं है बेटा , रुको मैं देती हूँ !

माँ आप और पापा बातें कजिये ,  मैं ही दे देता हूँ ! अनमोल कि आवाज़ आयी बाहर से !

विभा और चन्दन लगभग दौड़ते हुए बाहर आये , देखा अनमोल दीवार से लगे सोफे पर बैठा उनकी बातें सुन रहा था !

विभा और चन्दन - निःशब्द , अवाक् खड़े खड़े के खड़े रेह गए  !

चन्दन ने अनमोल के चहरे को अपने दोनों हाथों से अपनी छाती से चिपक लिया ! विभा दोनों से लिपट गयी !

फिर बह निकली अशब्द गंगा ६ आँखों से !

बाकि कुछ नहीं रहा !

सब ने सब कुछ कह डाला !

अनाम रिश्तों का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ बरसों बाद !!

चन्दन ने ड्राईवर से कहा : गाड़ी निकालिये  जंगल चलना है ,हवन में अंतिम आहूति के लिए !

चन्दन और विभा बेटे से मिलने वाले थे और अनमोल उन दोनों से !

एक कहानी : अंतिम आहूति !!

Tuesday, December 31, 2013

दोस्ती का कम्बल, अपनेपन कि वैसलीन !!

दिन से हफ्ते,
हफ्ते महीने,
महीने तिमाही,
और छमाही,
मिले तो पूरा साल हुआ !

सन्देश मिले,
आदेश मिले,
अनुबंध हुए,
प्रतिबन्ध हुए,
संपर्क किये,
विनिमर्श किये,
सफल हुए,
उत्थान मिला,
गतिमान रहे,
विफल रहे,
गतिमान रहे,
अभिमन्त्र रहे !

नव वर्ष का गुलाब,
दिन पंखुड़ियों से
गुथे गुथे,
खुश्बू खुश्बू सन्देशे।
संपर्कों कि रेवड़ियां,
आशाओं कि ताप,
संतोष के मफ़लर,
दोस्ती का कम्बल,
सम्बन्धों कि कड़क चाय,
सुर्ख होठों पर,
अपनेपन कि वैसलीन,
मुबारकबाद देती हैं,

हम आपको , सबको ,

हैप्पी न्यू ईयर !!

: मनीष सिंह 

Tuesday, December 24, 2013

बुलबुले ,संवेदनाहीन होते हैं !

बुलबुले ,
संवेदनाहीन होते हैं !
फूट जाते हैं !

समर्पण पर भी,
नमन पर भी,
आचमन पर भी,
संजोने में भी,
बिखेरने में भी,
समेटने में भी !

बुलबुले,
तलाशते हम,
सिमट जाते हैं,
रेत में,
सूखते पानी कि तरह,
आशाओं का !

बुलबुले,
संवेदनाहीन होते हैं !
फूट जाते हैं !

## मनीष सिंह ##