Friday, January 18, 2013

~~~ भीगा-भीगा सा चाँद, कल रात सोया नहीं !!

                      **** भीगा - भीगा सा चाँद , कल रात सोया नहीं !! ****

              रूई से भी ज्यादा कोमल रेशों की तकिया बनवाई थी उसके पापा ने उसके लिए जब वो छोटा था ! पूरी पूरी रात कभी कभी तो अगले दिन भी वो अपने दफ्तर नहीं जाते थे ...इस लिए की वो अपने पापा की गोद में सोता रहता था ...और वो जाग ना  इस लिए वो अपने हाथों से उसको उतारते नहीं थे , और वो सोता रहता था !   आज उसके पापा उसके साथ नहीं हैं !! वो कोमल सा तकिया भी ना जाने किस के पास है ...उसके पास नहीं है !! वो दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह " पापा की गोद " भी उसके पास नहीं है ! आज वो देखता है बस और मन की समझा कर रह जाता है की ...कोई नहीं है सब था अब नहीं है !!
               कल रात बहुत ज़ोरों की बारिश आई और लगता था की ओले भी पड़ रहे थे ...उसको अपने बचपन की ऐसी  ही रात याद हो आई ...जब जोर से बारिश आई थी और उसके पापा ने उसको अपने सीने से लगा लिया था ...सारा डर , दिसंबर की सुर्ख सर्दी और कपकपाहट सब पापा ने ले लिया था और वो सुकून से सोया था !

                अगले ही दिन उसके पापा कहीं गए और फिर कभी नहीं लौटे !! उसकी गीली आँखे आज भी उस रात की ही तरह भयभीत है ...लेकिन उस दिन  तरह आज उसके पापा नहीं हैं उसके पास जो सब अपने में समां लेते ....!! कल रात भी बारिश हुई और सब कुछ वैसा ही हुआ ...बस पापा की गोद और उनके सीने से मिलते सुकून के सिवा !!

                रात भर बारिश होती रही और रह रह कर पापा के ना होने का खालीपन उसको खाता रहा !! ये भी एहसास करता था ...आज , कल और आने वाले कल में फर्क होता है ....!
               अपने सभी भाई बहनों में वो एक चाँद है ... और आज की रात ये भीगा भीगा सा चाँद सोया नहीं ....पूरी रात बारिश भिगोती रही और अपने खालीपन और आंसुओं से चाँद खुद भीगता रहा ...बिना किसी से कुछ कहे ...और जागता रहा ....चाँद सोया नहीं ....चाँद अकेले ही रहते हैं ...हमेशा भीगते हुए ...बारिश से आंसुओं की अकेले-अकेले !!

Wednesday, January 9, 2013

........कच्ची सड़क की पक्की रोड पर ....अनवरत ,निरंतर

                    दिसम्बर महीने का दूसरा हफ्ता था वो साल 2012 का ....भारत के पूर्वी नवीनतम राज्य झारखण्ड के एक मशहूर औद्योगिक शहर " टाटानगर " से हम वापसी कर रहे थे ! सुबह के तकरीबन 6 बजे के आस पास रेल गाड़ी का समय था! एक ही रेल से और भी कई मेहमान वापस अपने अपने घरों को जाने को थे !! मामा जी ने सभी के लिए अलग अलग ऑटो का इन्तेजाम करवाया था ! 
                सवेरे के 4 बजे लगभग सभी लोग जाग गए , चाय , बिस्किट, नमकीन सब कर लिया गया ...अब शादी का घर है तो इन सब चीजों की कमी तो होती नहीं है ! धीरे धीरे सबने अपने अपने सामान समेट लिए ..सब ने स्वयं को तयार किया और सर्दी की सुबह चलने की लिए चेहेल कदमी करने लगे ....!! ऑटो की आवाज़ों  ने  देर रात को सोये नया बाज़ार को झकझोर कर उठा दिया ...!! सबने अपने अपने सामान बटोरे और पहुच  गए लोह पथ गामिनी स्थल ...!!
               कितना असहज हो जाता है ना उन्ही लोगो का कुछ देर साथ रहना रेलवे स्टेशन पर ....और ज्यादा तब मुश्किल होती है जब सब को एक ही गाड़ी में जाना हो और सीटें अलग अलग बोगी में ....रिश्ते भी अलग अलग ......सबकी अपनी अपनी पहचान अपने अपने शहर में , सबका अपना रुतबा उस मेह्मानावाज़ के यहाँ ...किन्तु टाटानगर के प्लेटफोर्म नंबर 3 पर सब जहाँ तहां बैठे कर गाड़ी का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं ..... मामा जी सब के लिए चाय का इंतज़ाम करने में लगे हैं ....सब अपने अपने में मगन ...ये सोचते हुए ...कोई कुछ पूछ ना ले ...कोई सम्मानित करने वाला सवाल नहीं ...कोई मतलब हल करने वाली सुचना ...जैसे मोबाइल नंबर ....!!
            खैर जैसे तेसे कर के 20 मिनट्स कटे ! पुरुषोत्तम एक्सप्रेस आई , हम सवार हुए और वो चलदी ....मामा जी ने सब को एक एक कर के धन्यवाद दिया और अपने यहाँ अगले कार्यक्रम में आने का निवेदन किया !! सब ने अपने अपने डब्बों से हाथ हिला कर अनुग्रह की स्वीकारोक्ति प्रदान करी ....!! 
               मिठाइयाँ मिली थीं ! खाना मैंने चलती ट्रेन में खाना परोसने वाली एक रेलवे की सेवा पर आदेशित किया और वो मुग़लसराए में आ भी गया !! इस बीच गया - हाँ जी वही स्थान जहाँ भगवान श्री महात्मा बुध को बरगद के पेड़ के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी से भारतीय नवयुवकों की टोली हमारे कोच में चढ़ गयी ... कहने को हमारा कोच तीसरे दर्जे का वातानुकूलित कोच था किन्तु सब नयी पीढ़ी के लोग आ गए उसमे ...जी हाँ को भेद भाव में विशवास नहीं रखते सब सामान हैं उनकी निगाह में !! अब सब लोगो की तो पूछिए मत क्या हालत होगयी इतनी भीड़ हो गयी की ए सी क्या सामान्य हवा भी मुश्किल थी ... !! सामान्यत वातानुकूलित कोच में सब कुलीन लोग चलते हैं ...जो किसी से बोलते नहीं ...इस लिए नहीं की वो गूंगे होते हैं ..इस लिए की कही किसी  के सामने असलियत खुल ना जाये ...बिना बोले क्लीन बने रहिये ...!! किन्तु आज वातावरण एसा नहीं था कुछ लोग चाहते थे की कोई उनको सुने ....बोलने के भूखे ...बस ....
              हमारी 6सीटों से बस एक आगे एक बड़ी ही कर्कश आवाज़ वाली एक कथित कुलीन अधेड़ उम्र की रही होंगी महिला बैठी थीं , संत , ,साधू  सद्भावनाओं की चलती  फिरती भोंपू लगी ठेली ...जिसको सुनकर सब चाहें की जल्दी से आगे निकले ...किन्तु यहाँ तो खेल बिलकुल अलग था ...बेचारे बच्चे जो किसी कारण से इस बोगी में सवार हुए थे और उनके साथ कुछ और लोग भी चढ़ गए थे ....कहीं नहीं जा सकते थे ...उनको तो सुनना ही था उस महिला को ...!! एक सरदार जी भी थे ...वो अफगानिस्तान से लौटे थे और वहां पर बोली जाने वाली भाषा की तरह से हिंदी और पंजाबी बोल रहे थे ..वो महिला , स्वित्ज़रलैंड , फ़िनलैंड , अफगानिस्तान और ना जाने कहाँ कहाँ घूम कर आइ थीं , सबसे बुरा उनको भारत ही लग रहा था फिर भी लगभग 6 घंटो से बोले जा रही थीं विषये कोई नहीं ...बस बोलने से मतलब ...ऊपर नीचे , आस , पास यहाँ वहां सब परेशान ....किसी को उनकी बात सुन्नानी ही या नहीं बस उनको बोलने से मतलब ...एक बेचारी लड़की बार बार अपनी ऊपर की सीट से नीचे उतर कर के सर पकड़ कर बैठ जाती ...फिर किन्कर्ताविमूद हो कर ऊपर चली जाती ...लेकिन ज़रा भी तरस नहीं आता उन महिला को उस पर और बस बोलते जाती ....!!
          जब गाड़ी ने मुग़ल सराय में एंट्री मारी तो मेरी सिस्टर ने अग्रेजी में जोर से कहा " विल यू आल नाव कीप क्वाइत प्लेज ? पता नहीं कितना बोलते हैं आप लोग ..आपको परवाह है की कोई सुन्ना भी चाहता है की नहीं !! अबे मैंने कमान अपने हाथो में लि ली ... सर में दर्द कर दिया भाई !  वो महिला बोली किस के सर में दर्द हो गया भगवान् के नाम लेने पर ...मैंने कहा मेरे और भगवान् दोनों के ...अब कृपा कर के चुप हो जाइये .. 7 घंटो से बोले जा रहे हो ...इंसान की जैसे जैसे उम्र होती जाये उसको गंभीर होना  चाहिए पर आप तो ...हे भगवान् ...!! वो बोली : हमने तो पहली बार सुना की बड़ो को कम बोलना चाहिए ...मैंने कहा ...आज सुन लिया ना .अब किरपा कर के चुप हो जाइये ..सर में दर्द हो गया ... और ये बेहेस कुछ 5 मिनट्स चली होगी ...और वो बोली ठीक है हम चुप हो जाते हैं ...तो मैंने कहा थैंक यू ....थैंक यू ...और कुछ 2 मिनिट्स बाद वो चुप हो गयी ...तब एसा लगा सब को जैसे " आपके सर पर कोई गिद्ध बैठा हो और वो बिना गन्दगी    जाये !"  या आपके ऊपर वाले की घर की पानी की मोटर लगातार आवाज़ करते करते बंद हो जाये , या फिर आप किसी डग्गामार बस में बैठे हो और अचानक आपको लगे की बस वाले को आप पर दया आ जाये ओर कहे की चलो आब आगे वो नयी वाली बस जाएगी ...या आप बड़ी देर से लघुशंका रोके बैठे हो और अचानक मौका मिल जाये .....इत्यादि इत्यादि ....
            दर असल हम सबने अपने अपने आस पास कच्ची पक्की दीवारें बना रखी हैं ...और सब को उनके टूट जाने का डर बना रहता है !! पहचान खो जाने का भी डर रहता है ...जबकि सचाई ये है की जब एक पहचान खोएगी तभी तो नहीं मिलेगी ...!!  हमें चलते रहना चाहिए ...कच्ची सड़क की पक्की रोड पर ...अनवरत , निरंतर  कुटुंब बढ़ता जायेगा !! 

Tuesday, January 1, 2013

मेरठ में एक दिन .....!!

            रविवार का दिन ....सर्दियों की गुलाबी सुबह , सूरज महाराज का आज जल्दी उठने का कोई मूड नहीं , कोहरे की चादार धीरे धीरे अपने आगोश में सारी रौशनी को लेती हुई ....इंडिया पाकिस्तान का वन डे मैच होना तय आज ही के दिन ....और इन सब मनोहारी परिस्थितियों में घर से मेरठ जाने की तय्यारी करते हुए , बार बार बजते घडी के अलारम को अगले 5 मिनट के लिए सेट करते हुए !!
 
           हम दोनों भाई बहन निकले सुबह सवेरे लगभग 5:30 पर बस अड्डे की तरफ उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की पहली बस में चढ़ गए ... उसी इम्तेहान को देने और भी बहुत से बच्चे पहले ही से उस बस में बैठे थे ! बस लगभग 7:30 बजे मेरठ बस अड्डे पर  पहुचे !! वहां से किसी भाई से पूछ कर मेरठ की महानगर बस सेवा की बस में सवार हुए जो की रलवे स्टेशन से मीडिकल तक का सफ़र करती हैं , तेजगढ़ी चौपले पर उतर गए , कुछ कदम चले तो लगा की आज मेरठ को हम ही जगाने आये हैं ... पूरी सड़क सुनसान !! कुछ ही देर में स्कूल आ गया जहाँ एग्जाम होना   था ,  प्लान देखा और 9 बजने का  इंतज़ार करने लगे , इस बीच एक और भाई बहन आ गए और हमारी दोस्ती हो गयी ..दो दूर के शहरों से आये हुआ अजनबियों की एक अनजाने शहर में दोस्ती ....!! हम दोनों भाइयों की बहने अब 9 बजे एग्जाम देने अन्दर चली गयीं !
 अब हम दोनों भाई दोस्त हो कर किसी चाय वाले की तलाश में स्कूल के गेट से बहार की और चल दिये !!    कोहरा अभी भी था हलकी हवाओं ने उसका रुख मोड़ ज़रूर दिया था लेकिन  ठंडक ज़रूर थी !! दो तीन चाट पकोड़ी वाले गोलगप्पे वाले , चिल्ले बनाने वाले , और एक कोने में एक छोटासा लड़का अपनी चाय की ठेली लिए खड़ा था !! एसा लगा जैसे सूखे रेगिस्तान में पानी की धार दिखाई दे जाये !!  हम दोनों लपक कर वहां पहुचे दोनों ने एक एक चाय का आर्डर किया ...खालिस दूध की चाय है बाबु जी ...10 रुपे का एक कप है ...हमने सोचा यार मिल तो रही है ना ...ठीक है दो दो ...बस हम दोनों उसके स्टोव के आस पास ही खड़े हो गए हलकी हलकी गर्माहट से ठेले के चारो तरफ लोग हाथ सकने के लिए इसे खड़े हो गए थे जैसे की बीच में एक गुड की ढेली रखी और उस पर बैठने को तयार मखियाँ भिनभिना रही हो !! 
      हमारी चाय बन कर तयार हो चुकी तो हमें ध्यान आया की आज तो वन दे क्रिकेट मैच है ...मैंने उस चाय वाले को सलाह दी की तुम एक ट्रांजिस्टर का इंतज़ाम कर लो ... लोग जो चाय के बहाने आ रहे है उनकी संख्या दो गुनी हो जाएगी .... ! उसने उसके मोबाइल पर ऍफ़ एम् रेडिओ पर मैच की फ्रिक्व्नेसी सेट कर और मैच शुरू ..एसा लगाने लगा जैसे की शक्कर में मिठास और बढ़ गयी और ...और चीनी ज्यादा मीठी हो गयी हो ....कुछ लोग जो कुछ दूर खड़े थे चाय के ठेले के और करीब आगये ... आर्डर की संख्या बढ़ने लगी , स्टोव की लौ अब और तेज़ हो गयी थी !! अब एक एक बाल पर सबका ध्यान मेच की और जाता था .... और फिर कमेंट्रेटर की कही बात बात सब अपनी अपनी राय देते है ! धीरे धीरे 1 घंटा बीत गया !! अब टिक्की खाने ली इक्चा हुयी ...लिकिन हम नहीं खा सकते थे ...औरों ने खाया और हमें उन्हें खाते हुए देखा !! 
       अब सूरज कुछ ऊँघने लगा था ... !! जैसे बड़ी देर से सोया कोई बच्चा करवट बदल है ! एक दो किरणे दिखाई दी और इसके साथ साथ दिखाई दिए कुछ और लोग / माता पिता / भाई बंधू और अपने अपने करीबियों को इम्तेहान दिलवाने लाये थे लेकिन ठंडक के कारन कही किसी कोने में चुप चाप खड़े थे ....चाय की दूकान , खालिस दूध की चाय , साथ में फेन और इंडिया पकिस्तान के मेच की क्रिकेट कमेंटरी ...और क्या चाहिए भाई ...अचानक चाय वाले की आर्डर और बढ़ गए , वो लड़का बाबूजी बाबूजी करता हुआ ...लगातार चाय बनता जा रहा था और जिस जिस को चाय मिलती जाती थे और एक किनारे खड़े हो कर चुस्कियों के साथ हलकी धुप और किरकेट कमेंटरी का मजा लेने लगता था !!
       सुबह की पली का एग्जाम ख़तम हुआ ! अचानक सब बच्चे आ गए ! चाय वाले पर बोझ  बढ़ गया ! चाय ठीक से पक नहीं पा रही की लोग ले लेते थे , किसी को 10 रूपए की एक चाय होने का दुःख नहीं था ...मुश्किल थी तो इस बात की सब को चाय सिमित समय में मिल नहीं पार रही थी ! अगला पेपर और चाय के बीच सिर्फ 1 घंटे का समय और चाय का मिलना मुश्किल ..खैर जैसे तैसे सब को चाय मिली , सब ने पी और बच्चे अगले पेपर को देने फिर से स्कूल में चले गए ! रहगये हम भाई और बंधू बहार फिर से 3 घंटो के लिए , फिर से मैच , चाय , टिक्की , और अब कुलचे छोले , बर्गर भी मिलने लगे थे !!
                                     किसी खूब सूटेड बूटेड हो कर घुमने वाले बड़े - बड़े अधिकारिओं को ऐसे समय में देखा जा सकता है विचित्र अंदाज़ में घूमते हुए , लड़कियों वाले हैण्ड बैग अपने हाथों मैं खूबसूरती से ले कर यहाँ वहा घूमते नज़र आ रहे हैं !! किसी ने किताबें पकड़ रखी हैं , किसी ने विभिन्न प्रकार के साल्व्ड क्वेश्चन पेपर पकड़ रखे हैं जिनका असल में उनके साथ दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं ....फिर भी है ...! अब तक भारतीय खिलाडियों ने अपने अपने कारनामे और एक दुसरे का साथ निभा दिया था ....5 विकेट पर 29 रन थे ... और धोनी ने आ कर कुछ काम किया और सम्मानित रन तक गए ...!!
                   एक एक कप चाय और पी हमने फिर इंतज़ार करने लगे की कब घंटी बजे और लोग बहार आये ! कुछ देर में लोग बहार आये और हम घर की और चल दिए ! रविवार का दिन रोज़ की ही तरह लगा और घर शाम की चाय पी , खाना खाया समाचार देखे और सो गए अगले दिन फिर से काम पर जाने के लिए ...!! मेरठ कभी अच्छा नहीं लगा मुझे लेकिन क्यों या भी पता किन्तु उस चाय वाले लड़के के साथ और लोगो के साथ बिताये दिन से मेरठ फिर जाने का मन करता है ...उसकी बातें और समझ व्यापार को करने की ...पुरे 6 से 7 घंटे वो चाय बनता ही रहा और जितने लोग उतनी तरह की बातें ...बोलियाँ ...लिकिन उसके माथे पर कोई शिकन नहीं ...और वोही मुस्कुराता चेहरा .... आपको अपने मानस को बदलने की ज़रुरत है ...कोई भी चीज़ अच्छी या बहुत अच्छी लगने लगेगी ...!!                    
  

Thursday, December 27, 2012

........चाय की दुकानों पर लोकल मेड बिस्कुट मिलते हैं !

           टूटे हुए रंगबिरंगे टुकड़ों को एक तिकोने से लगभग डेढ़ फुट लम्बी सी नली में दाल कर घुमाने पर बनने वाली फूलों की आकृति से मन को कितनी ख़ुशी मिलती थी , जिसकी तुलना आज के टेबलेट और एप्पल के अताय्धुनिक लेपटोप से भी नहीं होती ....जबकि सब आसानी से उप्लब्ध है !!
           जी हाँ हम और आप जो अपना बचपन 80 के दशक में बिता चुके और 90 के दशक में अपनी किशोरावाथा में जिए हैं ...को इस बात का ज्यादा अनुभव होगा !! आइये एक एक उधाहरण ले कर के यादों के शीशे पर ज़मी धूल को साफ़ करते हैं ....!!
            चाक और मिटटी के बने खिलोने, रंगबिरंगे काग़ज़ों से बने विभिन्न प्रकार के , पोस्टर्स , आकृतियाँ , चकरियां , मिटटी से बने फल , लकड़ी से बनी अलग अलग तरह की घरों में काम आने वाली चीज़ें ...जैसे रसोई का पीढ़ा , मथनि , नीबू का रस निकालने वाला सामान्य सा यंत्र , चकला - बेलन , कलछुल ,पलटा और छनौटा ....सब अपने अपने जगह पर काम की चीज़ !!  मिटटी के तेल से जलने वाले लेम्प .... कभी कभी मिटटी के तेल का बर्तन टिन का होता था ...और यदि थोड़ी आधुनिकता से देखा जाये तो वो भी कांच का ....! मुझे याद है ...मेरे नाना जी घर के दो या तीन मिटटी के तेल के लेम्पों को रोज़ शाम को सुबह के बुझे चूल्हे के उपले की राख से साफ़ करते थे ....बड़ा धीरे धीरे और प्रभावी प्रोसेस हुआ करता था वो ...में तो बड़े मज़े ले कर देखता था जैसे कोई रिसर्च चल रही हो और तय समय में परिणाम आने वाला हो ..... !! अंतिम परिणाम आता था पुराने अखबार से साफ़ करने पर ...एकदम चकमक चकमक ...और जब लेम्प उस शीशे के साथ जलता था तो पूरा कमरा रोशन रोशन ....कमाल का समय था वो ...आजकल हम कहाँ एक साल की गारंटी वाली सी ऍफ़ एल की रौशनी में वो मजा ले पाते हैं !! 
           कुछ दिनों बाद मैं दोबारा फिर उस सब्जी मंडी में जाना होगा ....जहाँ मैंने अपने बचपन का काफी लम्बा समय गुज़ारा है ...वहां नेकर में घूमता था ...नीली रंग की जुर्राब , काले जूते , सफ़ेद कमीज़ और नीली नेकर में  आलू  चाप खाते हुए .....पीली मटर की पनियल सब्जी के साथ !!
           अभी पिछ्ले हफ्ते ही वहां जाना हुआ था , एक विवाह में ! इस बार मेरे साथ मेरा परिवार था और कभी मैं वहां किसी के परिवार का हिस्सा था अपनी जगह ढूंढता हुआ ...वो तलाश अंतिम दिन तक चलती रही जब मैंने उस शहर को छोड़ा और रेल की गाड़ी ने प्लेटफोर्म को ...! आज में हूँ और मेरा परिवार है ...और वहीँ हूँ जहाँ वो समय बिताया जो नीव के पत्थरों की तरह से है ...जिनके कारन ही आज ये इमारत खड़ी है !!
            वो सब्जी का बाज़ार आज भी लगता है , वो टाटा कंपनी का नाला आज भी बहता है , रात में कभी कभी आज भी आकाश आज भी नारंगी सा दिखाई देता है ...आज भी वहां सडकों के किनारे किनारे छोटी छोटी चाय की दुकानों पर लोकल मेड बिस्कुट मिलते हैं ....जो बड़े ही सम्मान के साथ खरीद कर खाए जाते हैं .... आज भी रबर के दबा कर बजाये जाने वाले भोपू टाइप साइकल पर लगी घंटी को बजा कर इडली सांभर बेचने वाला आता है ...जिसको कभी आता और जाता देख कर अपने सक्षम ना होने पर इश्वर पर कोफ़्त होती थी और आज उसके हाइजिनिक न होने पर हम नहीं खाते ...सक्षम हम तब भी नहीं थे और आज भी नहीं हैं चाहे जैसे भी हो उस इडली को खाने के लिए !!
             

Sunday, November 18, 2012

सूर्य अस्त ज़रूर होता है , किन्तु पुनः उदय होने के लिए !!

                               सूर्य अस्त ज़रूर होता है , किन्तु पुनः उदय होने के लिए !! 

             सामान्यतः उदय होते सूर्य को नमन करने की परंपरा है किन्तु ये भारत है और यहाँ सब के लिए सम्मान की संभावनाएं हैं ..... !! एक पर्व मनाया जाता है हमारे देश के पूर्व के हिस्से में ...दीपावली के बाद छठ नाम से जिसमे सूर्य भगवान् को अर्घ देने की परमपरा है ....दो बार जिसमे पहला अर्घ डूबते हुए सूर्य को अर्घ दिया जाता है और पूरी रात नदी , सागर , ताल , तल्लिया , झील जिस के भी  किनारे रुक कर पूजा अर्चना की जा रही है दूसरा अर्घ अगले दिन उगते हुए सूर्य को देते हैं !!

             आज दिनांक 18.11.2012 को भारत के एक पश्चिमी राज्य के एक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व की अंतिम विदाई में भी लाखों लोगो ने नाम आँखों से सम्मान व्यक्त किया ! उत्थान और पतन एवं पुनः उत्थान जीवन के साथ चलने वाली पुष्पों की पौध हैं ....जो कहीं मौसम और परिवेश के अनुसार खिले मिलते हैं और कहीं छुईमुई की तरह से थोड़ी देर के लिए सिकुड़े हुए ...किन्तु जल्दी से खिल जाने की आशा लिए !!
             अब देखिये ना कुछ सालों पहले की बात होगी ...पड़ोस की भाभी जी अपने छोटे बच्चे को ले कर आई थीं मेरी बहन से पढ़ाने के लिए ...वो बच्चा खूब पढ़ा ...और अब भी सही से पढ़ रहा है .... आज उस से मुलाक़ात हुई ...कुछ परेशान था ....कारण जो उसने बताया " भैया दीदी आज मुझे एक पुराना दोस्त मिला ...और उसने मुझ से कहा की यार तुम तो पीछे रह गए ...बस इतना सुनके भाई साब परेशान ....!! "  खुद ही समझ गया वो ...जिन परिवेशों , जिन उप्लाभ्धियों और सह्योंगों के बीच में वो पला और बढ़ा है उसमे उसने जितना प्राप्त किया और कर रहा है वो तुलनातमक नहीं है , न ही हो सकता ....जो कर रहे हो  वो उत्तम है बस उसे सर्वोत्तम करने की ज़रुरत है ....न की किसी और की उपलब्धि के तुलना कर के परेशां हुआ जाये !! ये संतोष तो है ना की किसी आरक्षण की बैसाखी का सहारा तो नहीं लिया !!
           रोज़ सबेरे में टहलने जाता हूँ , रोज़ उस से मिलता हूँ ! वो ...हाँ वो जो रेलवे के फाटक के दुसरे किनारे पर सफेदे के सूखे पेड़ के किनारे एक प्लास्टिक के बोर पर अपने दोनों हाथों को अपने दोनों घुटनों के बीच में जोड़ कर सबकी सलामती की दुआ करता रहता है ....हर किसी ...की जी हाँ सही सुना सब की कोई भी व्यक्ति विशेष नहीं , कोई भी आम नहीं ...सब सामान हैं उसके लिए किसी ने कुछ दे दिया तो ज़रा और जोर से बोल देता है ...किन्तु सब की सलामती की दुआ मांगता है ....!! उसके किनारे से ना जाने कहाँ कहाँ कहाँ के लिए लोग जाते हैं ....रेल से तो एक तरफ जम्मू और दूसरी तरफ मुंबई और दिल्ली तक ... और सामने वाली सड़क से सब लोग बस चलते चले जाते हैं ...दूर दूर ...किन्तु वो वहीं रहता हैं सबको दुआ देता हुआ , अपने अपने गन्तव तक सही सलामत पहुच जाने के लिए .... वो खुद चल नहीं सकता ....और देख भी नहीं सकता बस बोल सकता है !! उसको उसके बचपन से देख रहा हूँ ... सब कुछ बदल रहा है . बदल रहा है तो बस एक चीज़ नहीं उसकी दुआ और वो ज़गह जहाँ वो है और था !! इस जीवन में क्या है , कुछ नहीं बस वो जो हमने दूसरों को दिया जिस से आप याद् किये जाओ ....अपने लिए तो वो चार टांगों वाला भी कर ही लेता है ...एसा सुना है ....!! ये हल्का तर्क है ...किन्तु कभी कभी भारी माहौल में हलकी बात वज़नदार हो ही जाती हैं !!
           गाज़ियाबाद में एक जगह है नाम है गन्दा नाला ....वहीँ पर दो दुकाने हैं जहाँ पर शहर की सबसे अच्छी इमरती और जिलेबी मिलती हैं !! बहुत अजूबे हैं ....ज़रा ठीक से टटोलिये संभवतः आपके आस पास भी कुछ लोग इसे मिलेंगे ....जो कभी परिभाषित हो ही नहीं सकते ....जो चाहते सब हो किन्तु देना कुछ नहीं ...एसे लोग अपनी पहचान कभी कर ही नहीं सकते किन्तु दुसरे लोग उन्हें ज़रूर पहचान के दूरियां बना लेते हैं ....मौकापरस्ती ज़यादा समय तक साथ नहीं देती !!
          सहारा ले कर उठाते लोग ....सूरज होते ही नहीं ....भले सवयम को परिभाषित सवयम्भू के रूप में करैं ....कूपमंडूक की तरह ...ये ही सच है !!
           

Wednesday, November 14, 2012

रिश्ते भी व्यापारिक कारणों से ही बनाते है , समर्पण के भाव ....से नहीं !!

                        व्यापारी और मौकापरस्त लोग रिश्ते भी व्यापारिक कारणों से ही बनाते है  , समर्पण के भाव ....से नहीं !! बल्कि समर्पित कभी हो ही नहीं सकते .....उन्हें स्वयं का शारीर भी अच्छे पहनने ओढ़ने के बाद ही अच्छा लगता है !! ..... इसे तरह के मानवों से बचना चाहिए ....किन्तु शर्त ये है की उनकी पहचान जल्दी हो सके .....जो की मश्किल काम है उन लोगो के लिए जो मौकापरस्त नहीं होते ...और व्यापारी भी नहीं !!

Tuesday, November 13, 2012

त्योहारों की तैय्यारी को जितना एन्जॉय कर लेते हैं उतना असल में त्यौहार मानाने को नहीं ....!!

                अब देखिये ना .आज दिवाली है ...अन्धकार से रौशनी की ओर जाने का पर्व ! अब अन्धकार किसी भी तरह से परिभाषित किया जा सकता है !!  वैचारिक , वाव्हारिक ,आलोचनातमक दृष्टिकोण इत्यादि इत्यादि ..... !

                अभी शाम के 9.30 बजे हैं और हमारे घर के सामने वाले पार्क को धुआं पूरी तरह से अपने आगोश में ले चुका है ! ठीक सामने वाले ब्लाक की रंगीन झालरें ठीक से नहीं दिखाई पद रहीं !! .... हर ब्लाक के सामने कोई ना कोई अपने अपने अंदाज़ से अपनी पहचान ज़यादा से ज़यादा पटाखे जला कर साबित करने में लगा है !! कितना अजीब है आज कल का माहौल , कल के बीते समय से बिलकुल अलग !! अभी कुछ दिनों पहले ही एक साथी हमें छोड़ कर इश्वर के पास चला गया , और साथ में चली गयीं उनकी यादें !! सब अपने अपने काम में मस्त / व्यस्त ! किसी को शयद याद भी ना आई हो ...और आई हो , तो आई हो ...दिवाली में क्या करियेगा !! दिवाली ही मनेगी !!

                 एक बार एक मित्र ने कहा था की <-> " रविवार से ज्यादा शनिवार को एन्जॉय करते हैं !" इस ख़ुशी में की कल छुट्टी है !! वैसे ही कल मुझे एहसास हो रहा था !!  रात के 10 बजे थे ...छोटी दिवाली के दिन , खाना खा कर के टहलने निकला था ...घर से पास के स्टेशन से होते हुए बसंत रोड पर निकल पड़ा ...वाह निकल गयी मुह से .... अमूमन 9:30 से 10:00 बजे सुनसान हो जाने वाली सड़क ....आज दिन के 10:00 की तरह से शबाब पर थी ...सभी दुकानें खुली थी और खरीदारी हो रही थी .... ! हाँ ये सड़क कुछ वर्षों पहले भी 9:00 और रात के 12:00 बजे गुलज़ार रहती थी ...जब " बसंत " सिनेमा हाल चला करता था .... मैंने भी उसमे एक आखिरी फिल्म देखि थी ...छोटे से अपने भाई अंकुर के साथ ...और फिल्म का नाम था " डर " !! आजकल उस जगह पर एक बहुत ही बड़ी कार बनाने वाली देसी कंपनी का शोरूम खुल गया है !! बड़े ही कुलीन लोग आते जाते हैं ...समय पर और समय पर वो बंद भी हो जाता है !! खैर हम तो सब दुकानों के खुले होने पर आश्चर्य प्रकट कर रहे थे !! मैं आधे घंटे में वापस आ गया और सोचा की क्यों ना कल की की जानेवाली खरीदारी को आज ही निबटा दिया जाये !
                 हमें एक थैला लिया , और चल पड़े बाज़ार ...रात के 10:45 पर !! मोटरसाइकल पर अब मुझे चोपला मंदिर और मोडल टाउन दिखाई देने लगा था ....बसंत रोड तो पैदल बाज़ार की लिए है ...मोटरसायकल पर तो घंटाघर और बजरिया की मार्किट बनती है ना  ......!! बसंत रोड से होते हुए ... मालीवाड़ा ...डासना गेट और फिर रमते राम रोड से आनंद चिकन ...फिर गंज से होते हुए चोपला ...वाह ...रात के 11:15 हो रहे थे और चहल पहल इस तरह की जैसे 7 तारीख के बाद पड़ने वाले किसी रविवार को होती हो !!
               खील , मीठी खील , खिलोने , बताशे , फल मोमबत्ती  , मिटटी के दिए ...रूई , तरह तरह की झालर ... रंगीन कागजों पर "  हैप्पी दिवाली " लिखा हुआ , पटाखे और ना जाने क्या क्या ....!! एक तबका तो अपनी अपनी संगिनी को ले कर के देसी घी के बने पकवान चखने में मशगुल दिखाई पद रहा था ....कंधे से कंधे टकरा जाएँ इस कदर भीड़ !! आलू की टिक्की , पानी के बताशे ( गोलगप्पे ) की ठेलियों पर तो लोग लाइन लगा लगा कर खड़े इस तरह की ...जैसे आज नहीं खाया तो ये स्वाद फिर शायद अगले साल ही नसीब हो ....!! 
               भगवान् की मूर्तियाँ ...! मोलभाव कर के खरीदते लोग अपने अपने भगवान जी को !! कम से कम भाव दे कर ख़रीदा जा सके ...खरीद लो ...कल उन्ही से जितना ज़यादा से ज़यादा माँगा जा सके !  माँ लक्ष्मी धन की देवी हैं और उन्ही को मोल भाव कर खरीद कर उन्ही से सम्पन्नता की आशा .... ये हम सब करते हैं ! अरे भाई दूकान पर तो मूर्ति बिकती हैं ...और भगवान् तो उनको हम अपने घरों में लाने के बाद बनाते हैं , तो मोल भाव करने में क्या संकोच करना ....अब ये कोई पके पकाए मिलने वाले फ़ास्ट फ़ूड की बात थोड़े ही है .की मोल भाव की संभावनाए नहीं ... !!  कल्कत्त्ता , टेराकोटा और लखनऊ की मूर्तियाँ कुछ जायदा महंगी है ...और जो लोकल मेड हैं ...वो कुछ कम दाम में उपलब्ध हैं ....पर उनको लेने वालों की कमी है ....अब घर में मंदिर को अपने आगंतुक मित्रों को दिखाएँगे क्या //// लोकल , ना जी ... ना टेराकोटा ही लेंगे भले महगी हो ...साल भर का त्यौहार होता है !! 
                  मोमबत्तियां , खील , बताशे , रूई , दिए और बाती खरीदी , एक पान खाया ( सादा ) और एक किनारे मोटरसाइकल खड़ी कर के बाज़ार की चेहेल पहल देखने लगा !! 

1. दीयों के ढेर के बगल में अम्मा जी खटोले पर बैठी थीं , शायद रात में वहीँ सोएंगी , उन दीयों के साथ जो नहीं जलेंगे ....नहीं बिकेंगे !

2. गन्नों का ढेर और उनके बगल में रखा एक तखत जिसपर उनसे जूस निकलने की मशीन लगी थी ...गुमसुम .. अब सर्दियों में गन्ने का रस कौन पीता है ...आज अगर ना बीके तो कल के लिए सोचेगा वो ...

3. मोमबत्तियों के ढेर , पेकेट और लड़ियों के बीच बैठा जुनैद .....जो बिकेंगी वो बिकेंगी नहीं तो फिर उसी अनाथ आश्रम में वापिस कर आऊंगा जहाँ से लाया था !

4. अंग्रेजी , हिंदी में लिखे हप्पी दिवाली की जुमले रंगीन कागजों पर ....अब शायद अगले साल ही कोई ले ....अगर आज नहीं बिके तो ...सोचता हुआ वसीम / तरुण मोल भाव में मगन !!

                पान का बाकि बचा हिस्सा खाया और चल दिया हनुमान जी के दर्शन करता हुआ घर की तरफ !! रस्ते में पूजा और पूजन से सम्बंधित सामग्री मिलती हुई दिखाई पड़ी ...और गर्व हुआ अपने भारतीय होने पर ...हम चाहे कितने भी आधुनिक और मॉल कल्चर के करीब क्यों ना आ जाएँ ...जब अपने संस्कारों और अपनी परम्पराओं की बात होती है तो हम ज़रूर अपने उन सभी पारंपरिक आलेखों को साफ़ कर के अपना लेते हैं जो हमारे बुजुर्गों ने हमें दिए हैं  !  एक रात को ही सही , हम सही में पारंपरिक हो जाते हैं !! कोई समझौता नहीं इसमें !! पूजा की थाल , उसमे सेब , केले , मीठे खिलोने , खील , मिठाई , चांदी का एक सिक्का , चन्दन , अगरबत्ती  , रोली , धुप , फूल माला , मिटटी के दिए , रूई की बाती , सरसों का तेल ...सब वो ही बरसों पुराना ...हम जुटा लेते हैं जैसा की हमारे और उनके माँ पिता ने बताया था !
             1812, 1912 और अब  2012 क्या कुछ नहीं बदला होगा वर्षों में बस लाल किला , ताज महल    को छोड़ दीजिये और भारत भी !! यद्यपि सब बदलता रहता है ...तथापि परिवर्तन का सामीप्य अर्थपूर्ण होना चाहिए !! ... मैं जैसे जैसे अपने घर की ओर बढ़ रहा था बजार की रौनक कम हो रही थी ... और एक अजीब सी शांति मुझे घेरने लगी थी ....रस्ते के निशाचर घूर घूर के मुझे देखने लगे थे ....अपने घर पंहुचा और सब सामान देखा ...कल की पूजन की तयारी पूरी थी !!

              आज ही वो कल वाला कल था ...मैंने अनुभव किया की हम स्वस्थ परम्पराओं और त्योहारों की तैय्यारी को जितना एन्जॉय कर लेते हैं उतना असल में त्यौहार मानाने को नहीं ....!! सहमती हो तो एन्जॉय कीजियेगा ...मुझ से शेयर कर के !! हप्पी दिवाली !! मेरा भांजा ( वासु - मृगांक ) कहता है ...हप्पी दियाली .....( दिवाली नहीं कह पता अभी ...) भवनाये और अनुभव दोनों शब्दों के मोहताज़ नहीं हैं !!