Friday, October 12, 2012

...... कम्पित , पत्ते पीपल से !!

मेरा मन ,तुम्हारा मन,


उमीदें , सपने कल के !

नयनों में ही पलते, या

अश्रु होते , अविरल से !!


स्थिरता स्वाति बूंदों की,

परिवर्तन की आस लिए,

भावावेश की आंधी में ,

कम्पित , पत्ते पीपल से !!



Sunday, October 7, 2012

...रेडियो पर कहानियों का सुनना अच्छा अनुभव है, सुन कर देखिएगा, अच्छा लगता है !!

                आज बहुत दिनों के बाद एक कहानी सुनी ...जी हाँ ठीक पढ़ा अपने " सुनी " पढ़ी नहीं !! 

               अब देखिये ना आजकल के इन्टरनेट के ज़माने में हम सब कुछ पढ़ लेते हैं ...सब कुछ , कुछ भी नहीं छूटता ; कोई पर्दा नहीं हाँ वोही पर्दा टाट का ,जो कभी इंटर में पढ़ी एक मिर्जा साहब के दरवाजे पर पड़ा होता था ...सब इज्ज़त को घर की चौखट के भीतर समेटे हुए .... और वो भी पर्दा जिसके होने पर सब है जिसके ना होने का ग़म उस से पूछिए जिसके पास अदद चौखट भी नसीब नहीं , और वो पर्दा भी जो कभी कभी कुछ लोगो की अक्ल पर पड़ जाता है तो मुश्किल होती है पर्देवालों के लिए !!
               खैर ,हम कहानी के सुननाने और सुनने की चर्चा कर रहे थे ...आइये उसी विषय पर ही सफ़र करते हैं ...कहाँ परदे वालों के बीच फंस  गए ....हमारे आप के बीच क्या पर्दा , सब अपना और जाना पहचाना है !!
             मेरे घर का टेलिविज़न अचानक ख़राब हो गया है ! हम अक्सर घर में शाम की चाय के  साथ में और मेरी प्यारी सी पत्नी " रीना " टेलिविज़न पर हो रही किसी देश से जुड़े दिन के ज्वलंत मुद्दे पर चर्चा को देखते हुए पीते हैं !! आजकल मेरी अर्धांगिनी ओने मायके में हैं ....तो शाम की चाय कुछ फीकी लगती है और उसका फीकापन कुछ तब से और बढ़ गया है जब से वो कुछ दिनों के लिए अपने मायके में है ...जबतक वो वापस आये उसकी यादों के सहारे ही चाय पीता था की टी वी भी खराब हो गया !! फिर एक सहारा मिला ...इन्टरनेट का ...फेसबुक का , ब्लॉग का , जीमेल का , याहू का , ऑनलाइन अखबारों का ....ये सब आँख गडा कर देखना होता है !! कब तक एक टक 14 इंच के लेपटोप पर मन बहलाते रहेंगे ....अब टी वी की बात कुछ और है ....वहां तो द्रश्य बदलते रहते हैं ...और यहाँ खुद तय करना होता की क्या देखना है !! कुछ  देर में मन ऊब गया ! फिर ध्यान गया अपने घर के कोने में रखे एक ऍफ़ एम् , रेडिओ , सी दी , केसेट प्लेअर पर ....रीना जब अक्सर घर में उसी को चला कर पुराने , नए गानों को सुनते हुए अपना घर का सब काम निबटती है .... उसे साफ़ सफाई खूब पसंद है और में उसके उलट ... ! सोफे के कपडे को करीने से सजा कर जाती है और में उस पर बैठ कर उसको बेतरतीब कर देता  हूँ ....! वो फिर ठीक करती है !
                     आज मैंने भी उस ऍफ़ एम् रेडियो की ओर अपना  बढाया और उस पर रखे कपडे हो हटा कर चला दिया ....थोडा वक़्त लगा किसी चेनल को  सर्च करने में ...फिर एक गाना सुनाई दिया ..." आ चल के तुझे , मैं ले के चलूँ इक इसे गगन के तले  " ये तो बस मेरे मन की बात हो गयी ...मुझे कुछ अच्छा सा सुंनं था और ये गाना सुनाई दिया जैसे मुझे सही में उस दिशा की ओर ले जा रहा था जहाँ की सब सूनापन और खालीपन काफूर हो जाये ! दर असल ये एक कहानी का हिस्स्सा था जो उस चेनल पर सिलसिलेवार सुने जा रही थी .... !!
                 याद शहर के नाम से एक शहर काल्पनिक जगह के इर्दगिर्द उद्घोषक रोज़ एक कहानी सुनाता है और उसको सिलसिलेवार क्रमशः रखने के लिए हर विराम पर उस विराम की भावनाओं से जुड़ता हुआ कोई गाना सुनाता है ....वो ही था ....!!
            अब तो घर पर नया टी वी भी आ गया है किन्तु मैं अब भी उस दिन के बाद से कोशिश करता हूँ की 9 बजे से 10 बजे के बीच उस चेनल को सुनु और कहानी सुनु ....नानी और दादी से तो स्वयं कोई कहानी सुनी नहीं ....हाँ ये सुना है की नानी और दादियाँ कहियां सुनती हैं .... !! अब तक जो भी कहानी सुनी सब उत्तम हैं !! हर कहानी के साथ हम जुड़ते चले जाते हैं ...और कभी कभी तो उद्घोषक के स्वर के उतार चढ़ाव, बोली में मिठास से एसा लगता है की सब कुछ अपने ही साथ गुजरा बीता हो ...अपने ही जीवन की बात हो ....अब देखिये ना सबसे पहली कहानी जो सुनी उसका नाम थे ...." भगत जी " ....एक ऐसे इंसान की कहानी जिसके जीवन में शादी के 30 सालों के बाद भी औलाद का सुख नहीं था ....बाढ़ में सब ख़तम हो गया था ...गाँव के ही प्राथमिक स्कूल में संस्कृत पढ़ाते थे , और शाम को घर के पास के मंदिर में देवी देवताओं की सेवा करते थे ...रिश्ते नातेदार थे तो 30  सालों से कोई  आया नहीं उनकी सुध लेने ...वो सब गाँव के घरों में जा जा कर उनके काम में बिना मांगे मदद करते थे ...और दिन बिता लेते थे ..जब एक दिन उनको पता चला की उनके भतीजे की शादी उनके ही गाँव के एक बड़े सेठ के घर तय हुई तो ये सोच कर शायद उनको बुलावा आएगा उन्होंने उधार ले कर नए कपडे , चाही के लिए साडी और जुटे खरीद ली ...पर कोई बुलावा नहीं आया ....मन मार कर घर में बैठे थे की उनको एक तरकीब सूझी ....उठे बाज़ार गए कुछ मिठाई लाये और अपनी पतनी संग मिठाई खाते हुए बोले ...पतनी जी ..कोई बुलाये ना बुलाये हम अपने घर पर तो अपने भतीजे की शादी की ख़ुशी मना  ही सकते हैं ....! सही है ...दुखी और खुश होना अपने ही हाथ में हैं !! गरीबी रिश्तो की मजबूती और अमीरी उनके ढीलेपन को परखती है !!
               दूसरी कहानी थी एक इसी लड़की की जिसने अपने परिवार के खिलाफ प्रेम विवाह किया था ....जिसको 10 साल हो गए थे ...मायके की याद आती थी ...अब उसकी बेटी भी   ननिहाल क्या होता है  पूछती थी और वो निरुत्तर हो कर रह जाती थी ! एक दिन एक पोस्ट कार्ड आया ..उसके नाम उसकी माँ का ...लिखा था ...तुझे कभी हमारी याद नहीं आती ....एक बार मिलने की कोशिश तो की होती !! ...कल तेरे पिताजी शहर आ रहे हैं !! बस इतना पढना था की वो सोचने लगी की क्या करून घर को कैसे ठीक करून की पिताजी को अच्छा लगे ...घर के खर्चे की लिए बचे 
पैसों में सिर्फ 300 रूपये बचे और बेटी के जुटे लेने थे और 5 दिन बाकी थे ....इस  उधेड़बुन में थे की शाम हुई और पिताजी नहीं आये ...बेटी का जो मन उसने मारा था उसको जुटे नहीं दिला कर ..
उसको जुटे दिलानी चल पड़ी ..क्यों की उसके पिता ने अपने परिवार को चुना था और उसको भुला दिया था ...तो आज की घटना की बाद उसने भी ठान लिए की मैं भी अपने परिवार पर ध्यान दूंगी ...ये ही मेरा परिवार है !!

           बस इस तरह से और भी दिल को छु लेनें वाली ना जाने कितनी कहानियां , जिसमे अपने  जीवन की सब झलक दिखाई देती हैं ... नेट पर काम करते हुए ये कहानी सुनता रहता हूँ ...साथ साथ में चलते गानों को भी सुनते रहता हूँ !   आजकल कहाँ समय है किसी के पास किसी की बात सुनने का ...पर जब बात कुछ ऐसी हो जो अपनी ही हो और अपने ही तरफ से कही जा रही हो तो ...ज़रूर सुनने की इक्षा होती है ...आनंद तब और बढ़ जाता है जब आप डूब जाते हैं ...शब्दों और भाव में ...
जिसका पता तब चलता है जब किसी कह जा रही बात से आप के मन के भाव आपके नयन के प्याले भर देते हैं किन्तु उनको छलकने नहीं दते ...और गला भर आता है ...और आपके  से मुह से कुछ नहीं निकलता !! स्वयं से जुड़ना कठिन है किन्तु नामुमकिन नहीं ... सहारा कहानी सुनने का लिया जा सकता है !! आगे की कहानियां अपनी पत्नी के साथ सुनूंगा जल्दी ही !!

       रेडियो  पर कहानियों का सुनना अच्छा अनुभव है ,  सुन कर देखिएगा ...अच्छा लगता है !!  

Thursday, October 4, 2012

...... और जंतर-मंतर मर गया !!

                              ....मित्रों मैं जिस रास्ते से अपने दफ्तर जाता और आता हूँ आज भी उस पर कुछ खेत मिलते हैं ... जिनमे मौसमों के आधार पर कुछ न कुछ फसल लगी रहती है .....आज कल धान लगी है , सुर्ख हरे रंगों की घान की ऊपर की और उठती एक एक पौध और उसमे अंगडाई लेती हलके पीले रंगों की बालियाँ ....जी हैं अभी बाद बनना ही शुरू हुआ है ...शाम के लगभग पौने सात बजे में उन खेतों के बीच से हो कर गुजरती हुई सड़क से गुजरता हूँ ...बस सुगन्धित बालियों से निकली हुई खुशबू मेरी नासिका को इस कदर अपनी और आकर्षित कर लेती है की बस कभी कभी तो रुक कर उस का आनंद लेता हूँ ! मुझे मालूम है की खुच महीनो के बाद से सब ख़तम हो जायेगा , बालियाँ पाक जाएंगी और खेत सूने हो जाएँगे ,,,,तेज़ लू चलेगी और सुखी धुल उड़ेगी , लेकिनं ये भी आशा है की फिर से इसमें धान लगे जाएगी इस लिए आज के होने और कल न होकर फिर से होने के मध्य का काल इतना दुःख नहीं देता जितना आज एक खबर ने दिया !!

            आइये उस खबर पर चर्चा करते हैं !! वैसे तो अखबार के माध्यम से किसी खबर पर चर्चा करना कितना उचित और न्यायसंगत है ये आपने कुछ दिनों पूर्व एक प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक प्रगतिशील संगठन के मध्य होते विवाद को देख और सुन लिया ही होगा !! फिर भी हम ये हिम्मत करेंगे की उस खबर के आधार पर चर्चा करैं और दुःख प्रकट करैं जो हमने आज पढ़ी , और साथ में जा कर उस खबर का सच भी जाना ...जो अक्षर अक्षर सच निकला ....!!
           एक अखबार में पढ़ा की दिल्ली के जंतर मंतर को वो दर्जा देने से मना कर दिया गया है जिसका वो हक़दार है !! अन्तराष्ट्रीय धरोहर का !! क्यों की उस अन्तराष्ट्रीय संस्था ने पाया की जिस विशेषता के लिए जंतर मंतर जान और पहचाना जाता है ....मौके पर उसको वैसा नहीं पाया जा सका , अतः अन्तराष्ट्रीय धरोहर नहीं कहा जा सकता !!  एक बात साफ़ कर दें की जंतर मंतर में स्वयं एसा कुछ नहीं हुआ की उसकी पहचान कम हो गयी है .... उस को जबरदस्ती ...धीरे धीरे मारा गया !! आज जंतर मंतर उस फूल की तरह हो गया है जो खिला हुआ है ...जिसमे चटक रंग भी है ...जिसमे मकरंद भी है ...परागकण भी हैं ....किन्तु उसको एक शीशे के घर में क़ैद कर दिया है जिस पर कभी तितलियाँ नहीं बैठ सकती , जिस पर कभी परागकण ले कर मधुमखियाँ अपनी मिठास की गगरी में उसका योगदान नहीं ले सकती !!
           हुआ क्या ? जैसा की हम सब जानते हैं की जंतर मंतर एक यन्त्र है जो की सूरज की किरणों के आधार पर करता है ...और गड्नाओं के आधार पर समय का पता लगाया जाता है ! भारतीय और अन्तराष्ट्रीय दोनों !! सतरहवी शताब्दी में इस का निर्माण करवाया गया था जब घड़ियाँ नहीं थी !! सूरज की किरणों के आधार पर सटीक समय की गद्नाये की जाती थी !! आज इस के यंत्रों के ऊपर सूरज की किरणे ही नहीं पहुच पाती ....चारो और ऊँची ऊँची इमारतें कड़ी हो गयी है ....जिसके करने जंतर मंतर में प्राण तो हैं किन्तु वो स्वयं संवादहीन हो गया है !!
           बचपन से सुनते आ रहे हैं ...दिल्ली में एक जंतर मंतर है ! कई बार वहां गए भी ! आनंद लिया ...उस इमारत का जिसको कितने मन से बनवाया गया है !! आज उसका गला घोट दिया गया ! कितने ही आन्दोलनों की जन्स्थाली आज स्वयं निर्जीव सी हो कर पड़ी है !! कितने ही आन्दोलनों को जीवित रखने वाला जंतर मंतर आज स्वयं मरित्श्य्या पर है !! कितने की आन्दोलनकारियों की आवाज बन्ने वाला जंतर मंतर स्वयं अपने लिए एक आवाज खोज रहा है !! 1982 के एशियाड खेलों का शुभंकर रह चूका ये ...आज अपने अशुभ समय को कोस रहा है !! आज भी कितने आन्दोलन हो रहे हैं इसकी दीवारों के इर्दगिर्द ! कितने लोगो का घर बन चुकी इस की दीवारें अपने लिए एक अदद सहर ढूंढ रही है जो इसकी आवाज़ बन कर कुछ कहे सरकार से की कुछ करिए ...मैं ही था जब समय घड़ियों में बही था ...! एसा लगता है सच में समय आगे निकल गया है ...तेज़ रफ़्तार से चली ज़िन्दगी में कहीं पीछे छूट गया है ...हमारा जंतर मंतर ....लिकिन है तो !! नै पीढ़ी जिसको इसके मायने नहीं पता ...क्या सोचेंगे इस ईमारत के बारे में ....क्या बनाया था लोगो ने टेढ़ा मेधा ...दीवंरें पूरी भी नहीं बनवाइय ....!! उनको कुछ दिशा देने वाले दिशानिर्देश क्या उम्मीद तब तक वहां रहेंगे भी की नहीं !!!!

               विदेशों में सुनते हैं की पूरी की पूरी इमारत को एक स्थान से दुसरे स्थान पर विस्थापित कर दिया जाता है !! हमरे नेता और नौकरशाह तो पूरी दुनिया में घुमते हैं ....शायद किसी को ये तरकीब सूझे जंतर मंतर के बाबत , ऐसी हैं उम्मीद करते है !!  दिल्ली के जंतर मंतर सरीखा के और जंतर मंतर है ...जयपुर में ....मैंने देखा है ...हवामहल से साफ़ साफ़ दिखाई देता है ! जी हैं अभी उसके चारो और सब साफ़ है ! ऊँची दीवारें नहीं बनी !! किसने कहा की इमारतें ऊँची हों तो ही तरक्की होती है !! एक बड़े देश की सबसे ऊँची इमारतो को गिरते देखा है हमने ,  दुनिया का सबसे विक्सित देश है ...फिर भी इमारतें गिर गयी !! धरोहर सम्हालानी चाहिए !! हमें कुछ तो मिला है पूर्वजों से , कुछ नया अपनी आने वाली पीढ़ी को दे नहीं सकते तो पाया हुआ ही संभाल कर हस्तांतरित कर दिया जाये !! 
                  अपनी विशेष पहचान और मनमोहक कलाकृति के कारण हमेशा याद किया जाता रहेगा ...किन्तु आज भी उसमे वो सब है जिसके लिए वो जाना जाता है ...बस उस तक सूरज की किरणों के  आने का इन्तेजाम करना होगा , वैसे ही जैसे हम अपने घरों में आगंतुक के लिए द्वार खोल देते हैं ....और अपनी निगाहें  द्वार पर लगा कर टकटकी कगाये उसके आने का इंतज़ार करते हैं ....आज जंतर मंतर उसी इंतज़ार में हैं ....
और सूरज की किरणे उस से दूर हो चली हैं ...बहुत दूर व्यापारिक संस्थाओं की इमारतों के पीछे ...जहाँ व्यापार
आ जाता है वहां अपनापन ...........मर ही जाता है ........ और जंतर - मंतर मर गया !!
                                                                                                                 आपका अपना - मनीष

आपकी सुविधा के लिए उस अखबार का लिंक दे रहा हूँ ....  



Saturday, September 22, 2012

..... चिंताएं सर्वदा ही परिष्कृत होती रहती है !

             याद कीजिये अपनी क्लास 2 की उस हाफ पैंट को जिसपर की कोई भी क्रीज़ नहीं होती थी और बेल्ट स्कूल के ही बिल्ले के साथ इंतनी टाईट बंधी होती थी की सुबह सुबह के खाली पेट मे भी आधा पराठा ठीक से नहीं जा पता था और इतनी सलवटें की पैंट ...पैंट कम झोला ज्यादा लगती थी ....और हम उसी में खुश थे , चिंता थी तो बस इस्कूल में प्रार्थना के शुरू होने से पहले पहुच सकें ...वरना लेट आने वाले बच्चों की लाइन में लगना पड़ेगा ....और अगर एक बार भी एसा हुआ तो फिर पहले क्लास टीचर , फिर प्रिन्सिप्ल और अंत में पूरी क्लास में छुट्टी की घन्टी बजने तक पूरी कलास के दिन भर दिए जाने वाले ताने ....बाप रे बाप कितना जुल्म था उन दिनों ....!! ये ही चिंता थी बस लेनिन उन उन् दिनों !
           समय बीता अपने पास का ज्यमितिये बक्सा और उस में का सामान पूरा होने की चिंता ...एक दो चिली हुई पेन्सिल ज्यादा रख लेते थे ताकि पिरीअड में दिक्कत ना हो ! दसवीं से समय रात दिन की पढ़ाई ....और फिर इस्कूल के रस्ते में मिलने वाली कोई .....जिसको हमारे जन्नाने में हम खूब अछे लगते थे से भेंट ...बस निगाह भर .....! जूते मोज़े सजीले होते थे , अगर तै का चलन होता तो वो हमेशा सीधी होती / या होनी चाहिए ...! फिर परिणाम की चिंता और जल्दी से परिणाम आजाये तो फिर कुछ वोकेशनल कोर्स की तलाश ...अ फिर बारहवीं में एड्मिसन की चिंता ...क्या पता कम प्रतिशत में विज्ञान मिलेगा भी की नहीं ...भले हम विज्ञान केलायक ना हों किन्तु एक दोस्त ने वो विषये चुना हो तो हम भी वो ही लेंगे ....ना मिल्पाये तो कला से ही डिग्री पा लेंगे या सोच कर कम से कालेज में दाखिला तो मिले !! कुछ और बड़े हुए तो ...जूते छोटे होगये ...बदलने की चिंता किन्तु लकी होने के कारन उन्हें छोड़ने का मोह और नए कैसे होंगे की चिंता ....! गग्रेज़ुएत हो जाएँ तो बस कोई नौकरी मिल जाने की चिंता !! नुकरी मिली तो हम दिशाहीन !! क्या ये ही सही रहेगा अपने लिए ...की चिंता !! घर को खूब सजा देंगे ...के लिए कुछ नया खरीदें लिकिन हात में अपने पैसे न होने की चिंता ....कैसे कुछ ज़यादा कमाया जाए ...की चिंता !! चलिए अब जब नौकरी मिल जाये तो जहाँ हैं वहां से और ऊपर की और की तरक्की की चिंता , चलो तरक्कि भी हो गयी ...तो वंश की चिंता .... शादी ब्याह हो जाये उसका अपना आनंद जिम्मेदारिओं का और चिंता के स्तर का , उपलब्धियों का !

            मैं यहाँ एक विशेष समय को लेकर ज्यादा केन्द्रित हूँ की ये सही है की समय , आयु और संबंधों के साथ साथ आपकी चिंताएं बदलती और घटती और बढाती रहती हैं ....जिनको समझदारी से निभाया और पूरा किया जाता है ....फिर भी एक समय होता है आपके जीवन में जब आपको कोई चिंता नहीं होती और सब आपकी चिंता करते हैं ....पर उस समय को सब लोग नहीं जी पाते ....आइये उस पर बात करते हैं .....
        
          पिता जी , माँ सब ध्यान से आपके हर सामान को जुटाने में लगे होते हैं ...और आपके सामने आते ही आप किसी ना किसी बात पर उसमे नुक्स मिकल देते हैं ... रंग अच्छा नहीं है ड्रेस का , जूते इसे नहीं वैसे वाले चाहिए थे, कल टिफिन नहीं केक ले जाने का मन है ....आज दूध नहीं पियूँगा , सेब अच्छा नहीं लगता , घिया बाप रे ये किस चीज़ की सब्जी बना कर रख दी , दाल ओहो हो ..मुझे दाल नहीं खानी ..कढी में से खट्टी खट्टी बदबू आती है ....अनार इसके दाने आपने धोये क्यों नहीं ...? कल ही तो ये टी शर्ट पहनी थी आज दूसरी दो , आप ने मेरी चाकलेट तोड़ी क्यों ? मुझे साबुत खानी है ....! टेबल का लेम्प ज्यादा रौशनी देता है ...लो वोल्ट का बल्ब लगाइए तो पढूंगा !! पेंसिल छोटी हो गई है ....दूसरी दीजिये , रबर सफ़ेद होगी तो ही स्कूल जाऊंगा !! मेरे ग्लास से दीदी , भैया ने क्यों पानी पिया ....मुझे नया ला कर दो !! पहले टीवी पर कार्टून लगाओ तब डिन्नर खाऊंगा ! पहले बोलो की कल मुझे वहां ले चलोगे तो होमे वर्क करूँगा .....और अंत में आप घोडा बनो मुझ को घुमाओ नहीं तो में सोऊंगा नहीं .....और ना जाने क्या क्या ....!!
         जिन लोगो ने ये सब या इस से भी ज्यादा सुख और करीबियत का आनंद लिया है ...उनको बधाई ...! किन्तु सब लोग इस प्रकार के सुख लायक अपने को नहीं पाते .... जो है बस वो ही है ....विकल्प नहीं ....कोई !!
         चिंताएं सर्वदा ही परिष्कृत होती रहती है ...किन्तु अवय्श्क ये है की उनको जिया जाए उनके मूल स्वरुप में , निभाया जाये , संप्रेषित किया जाए उन तक जिनको आभास तक नहीं उनका ...किन्तु संवेदना के साथ , विनय के साथ , आभार के साथ ....समर्पण के साथ ....!!

Wednesday, September 19, 2012

..... हम सब एक सफ़र पर ही तो हैं !! ....यात्रा और मेरी भावनात्मक उपलब्धि !!

               हम सब ....जी हाँ ...हम सब अपनी अपनी सभी भौतिक उपलब्धियों के विषय में जब भी मौका मिलता है ज़रूर अपने अपनों के साथ चर्चा करते हैं !!

                  आइये में आज अपनी भवनात्मक और स्नेहात्मक उपलब्धि के विषय में आपसे बातें करता हूँ ......!! ये कोई 8 दिनों पहले की बात है ...दोपहर के कोई सवा तीन बजे का वक़्त हो रहा था मैं और मेरे एक सहयोगी अधिकारिक कार्य से कलकत्ता जाने की तय्यारी में थे ...वो ग्रेटर नॉएडा से और में गाज़ियाबाद से दिल्ली के इंदिरा गाँधी अन्तरराष्ट्रीये हवाई अड्डे पर पहुचे ! अपने उड़नखटोले में पहुचने तक जो भी नियमावली के अनुसार काम करना होता है हमने किया और लाइन लगा कर अपने उड़नखटोले में सवार हो गए ! 
               उड़ान थी इंडिगो की 6इ - 365 और हमारी सीट थे 2बी और 2सी , मैं किनारे वाली सीट पर बैठ गया ! एक एक कर के हमारे साथ कलकत्ता के लिए उड़ने वाले लोग आ रहे थे और अपने अपने नियत स्थान पर विराज रहे थे ! कितना अनोखा और नित नवीन नज़ारा होता है वो ....मैं तो हमेशा पूरी यात्रा का बस वो समय ही जीता हूँ जब मैं अपनी सीट पर बैठ कर आने वाले सब लोगो को देखता हूँ ....सच में अनोखा अनुभव होता है ! विभिन्नं प्रकार के पोषकों में , विभिन्न तरह के केश सवारे हुए , हर एक के चहरे पर अलग अलग तरह की भावनाए और गरिमा का मिश्रित तेज़ ....होता है ... वायुयान में सफ़र करना कम से कम भारत में तो अभी 2012 तक का सबसे महंगा सार्वजनिक सफ़र है ....इस लिए भी ...किन्तु जब आगंतुक दरवाज़े पर आ कर देखता है की उस से पहले से कई लोग वहां बैठे हैं तो वो नवीनता
और अपने को विशेष स्तर का समझने का भाव गुल होजाता है और चहरे पर कुछ मिश्रित भाव निर्मित होते हैं !!

            में अपनी सीट आर बैठ कर सब को देख रहा था की अचानक मुझे लगा की ये चेहरा मैंने पहले भी कभी देखा है .....मैं सोच में पड़ गया .....एक साधारण सी महिला ...सफ़ेद बालों की लम्बी चोटी बनाये हुए , माथे पर चन्दन का तिलक , हाथ में सोने का कंगन , और दुसरे हाथ में सुनहरी घडी , मुह में पान .... खाते हुए धीरे धीरे मेरी और बढ़ी ...और मेरे से अगली सीट पर बैठ गयीं ....उनके हाथ में एक पर्स भी था ...क्रीम रंग का ! उनके साथ एक और युवती थीं !
             मैं इस उधेड़बुन में लग गया की इनको कहाँ देखा है और मुझे वो याद क्यों नहीं आ रहा ...की अचानक याद आया ...मैंने अपने साथी से कहा ...ये मशहूर शाश्त्रीय गाइका श्रध्ये गिरिजा देवी जी हैं और में उनका आशीर्वाद लेना चाहता हूँ ...! मैं अपने को रोक नहीं सक रहा था ! मैंने उनके साथ की युवती से आखिरकार पूछ ही लिया ...ये वो ही हैं ना ? उन्होंने मुस्कुराते हुए हां में अपना सर हिला दिया ....बस फिर क्या था ....मैंने  गिरिजा जी के चरण स्पर्श किये और आग्रह किया की उनके साथ एक चित्र लेना चाहता हूँ ....उन्होंने अनुमति दे दी ...और मैं उनके चरणों में बैठ गया ...और उस युवती से ही चित्र लेने को कहा ...और बस हो गया !! वो चित्र आपके लिए संलंग्न है इस ब्लॉग के साथ !! गिरिजा जी के विषये में बहुत सी जानकारियां नेट पर उपलब्ध हैं ! एक लिंक आप के लिए !  Girija Devi - Wikipedia, the free encyclopedia

           फिर वो 2.30 घंटो का सफ़र इतना उर्जा भरा रहा की ...थकान काफूर हो गयी और हैं उत्साहित होते गए ...गिरिजा जी का सानिध्य पा कर ! एक गरिमावान एवं आदरणीयों का साथ अपनों भी सही दिशा की और अग्रसर करता है , जैसे जो कुछ गंधी दे नहीं हो हूँ बास सू बास !! खुशबू रखने वाले का साथ भर हो तो भी आप स्वयं को खुशबू के वातावरण में ही पाते हैं !!

        ये मेरी भावनात्मक उपलब्धि थी !! यात्रा संस्मरण लिखता रहूँगा और यात्राएं करता रहूँगा .......हम सब एक सफ़र पर ही तो हैं !!
                                                                    -- ::  आपका मनीष

Sunday, September 2, 2012

मौन की बूंदों की आवाजें, सन्नाटों का हल्का शोर !

...................................   नमस्कार ......!!

कुछ दिनों के अंतराल के बाद फिर मुखातिब हूँ , नवीनतम के साथ ... ।

मौन की बूंदों की आवाजें,    सन्नाटों का हल्का शोर !


स्वयं से मिलना ऐसा जेसे, नदिया के दो अपने छोर !!

                                                                                      - मनीष

Wednesday, August 15, 2012

जैसे , अधिक काफी की मात्रा ,कड़क ना हो कर कडुवी जाती है !

                  ये ही कोई मध्यरात्री के बाद कुछ एक घंटा बीता होगा ....मैंने घडी देखी हो रात के लगभग एक बज रहे थे .....और मेरी गाड़ी तमिलनाडु में " के कामराज " हवाई अड्डे से पोंडिचेरी ( पुद्दुचेरी ) के लिए निकल रही थी ! सफ़ेद रंग की एम्बेसेडर नोवा गाड़ी थी ....साथ में सफ़ेद रंग के ही परदे लगे थे , एक शानदार और सुहाना सफ़र होने वाला था चेन्ने से पोंद्य्चेरी तक का !!   वैसे तो कई बार गया हूँ वह किन्तु इस् बार का सफ़र रात , नहीं नहीं देर रात का था ! मेरा यान लगभग 2 घंटे विलंबित हो गया था , बंगलुरु में ही एक घंटा रुक गया था !!
                  उस सडक को जिस पर से हमें हो कर गुजरना था को ईस्ट कोस्ट रोड बोलते हैं .....क्यों की वो भारत के सुदूर पूर्वी किनारे - किनारे से गुजरती है ....एक तरफ कभी-कभी अथाह जल लिए समुद्र होता है और दूसरी तरफ सपाट धरातल जिसमे अधिकतर समय धान की बालियाँ लहलहाती मिलती हैं ....सुर्ख हरे रंग में , किन्तु आज में उनके दर्शन नहीं कर सकूंगा क्यों की रात में चन्द्रमा ने अपनी चांदनी से उस सुर्ख हरे रंग को एक अनोखे रंग में तब्दील कर दिया है ....!!
                 तमिलनाडु में आपको स्वयं कोई ना कोई बहाना मिल जायेगा जिस से की आप की धार्मिक आस्था को और बल मिले और आप उनका निर्वहन कर सकें !!  थोड़े थोड़े अंतराल पर आपको नमन करने का अवसर मिल ही जायगा , कही कोई बड़ी ही विशेष कारीगरी और चटक रंगों से बने छोटे बड़े मंदिर मिल जायंगे , अनोखे किन्तु सरल तरीके के गिरजाघर और भी अन्य धार्मिक स्थानों के दर्शन हो जायेंगे ! एक मंदिर तो विशेषतः इस रस्ते पर सिर्फ ड्राईवर लोगो के लिए ही है , वो देवता सब ड्राईवर लोगो के लिए बड़े ही श्रधेय हैं ! पुरे रस्ते पर आपको कच्चे नारियल के तुकडे मिल जायेंगे ...जो की एक ही बार में फोड़े गए होते हैं देवता के सामने !
              लगभग रात के 2 बज चुके थे और मुझे भूख लग रही थी ....मैंने अपने ड्राईवर से कहा " कुछ खिला दीजिये " बोला " सर - आपके लायक इस रोड पर पोंडिचेरी से पहले कोई खाने का स्थान नहीं है .....मैंने कहा भाई कोई ढाबा भी हो तो रोक लेना .....हम आस लगाये आगे बढ़ रहे थे की एक गाँव जैसा रौशनी वाला कुछ दिखाई दिया ....और फिर एक छोटी सी दूकान दिखाई दी जो की रात के 2 बजे भी चल रही थी ....कुछ लोग टेबल पर बैठे थे और चुल्लेह के ऊपर रखे तवे पर से भाप उठती दिखाई दे रही थी !
                  हमने रुक कर पुछा तो पता लगा की डोसा और इडली मिल सकते हैं ....और कहेंगे तो काफी भी मिल जाएगी ....जैसे किसी तपते रेगिस्तान में किसी को कोई ठन्डे पानी के लिए पूछ ले और कहे की कुछ मीठा भी कहेंगे तो कैसी फीलिंग होगी ....बस वैसा ही महसूस किया मैंने और हामी भर दी !! उतर कर हाथ धोये और छोटी सी झोपड़ी नुमा दूकान के भीतर सर झुका कर घुस गए ....सर इस लिए झुकाना पड़ा क्योंकि वी छप्पर इस तरह से बना था की किसी भी 5 फुट के इंसान को झुकाना ही पड़े ....ये सब बारिश और कड़कती धुप से बचने के लिए किया जाता है ...भले ही रात में ये ज्यादा व्यावहारिक ना लगे किन्तु दिन के और बारिश के समय ये ही अतिआवश्यक है ! अन्दर गए - ऑर्डर किया - डोसा ...और काफी ! तमिलनाडु में दरअसल में डोसा नहीं बोला जाता ....वो डोसा को डोसाई बोलते हैं ...छोटे छोटे दो डोसे मेरे सामने थे चटनी और साम्भर के साथ ! कुछ लग सा स्वाद था ! अमूमन हम दिल्ली या उत्तर भारत के शहरों में जिस तरह के डोसे , इडली या साम्भर खाते हैं वो कुछ अलग तरह से होता है ....किन्तु वहां जहाँ पर उसका मूल है , वहां का स्वाद कुछ अलग मिला ....ज्यादा खट्टा , तीखा , कम तेल , चटनी में नारियल और दाल का अधिक्क्य और साथ में एक लाल रंग ली तीखी चटनी ! इडली भी खाई , काफी भी पी , कुछ विशेष बर्तन थे वो ! एक बड़ी कटोरी में उल्टा रखा हुआ गिलास और कटोरी में डाली गयी काफी !! दरअसल ठंडा कर के पीने में आसानी होती हैं इस तरह के बर्तनों में ! खा पी कर आगे चले  , और कुछ पौन घंटे में पुदुचेरी की गलियों में आ गए .....!

          रात के तीन बज रहे थे , यकीन मानिये सड़कों पर सफाई कर्मचारी सफाई कर रहे थे ! पूरी की पूरी सड़कों पर सफाई का काम चल रहा था !! मुझे लगा शायद कल कोई बड़ा नेता या अधिकारी आने वाला होगा तो ये सब हो रहा होगा , किन्तु जब सत्यता पता लगी तो यकीन ही नहीं हुआ !! दरअसल पोंद्य्चेरी में आज भी कुछ नियम पुराने समय के चल रहे हैं ....ये एसा मानिये जो नियम पुराने समय में अच्छे थे को वहां के नगर निगम ने वसा का वैसा ही स्वीकार कर लिया है !!  दरअसल पांडिचेरी में पुराने समय से ही रात में सडकों की सफाई हो जाती थी और आज भारत और पोंडिचेरी के आज़ाद होने के भी भी वोही चल रहा है ....रात में सड़कों पर करीने से सफाई होती है , पानी  छिड़का जाता है , कूड़ा उठाया जाता है ...ताकि जब आप सुबह को अपने अपने गंतव्य की तरफ जाएँ तो आपको एक स्फूर्ति भरा वातावरण मिले ! सुगन्धित वातावरण मिले !  ये उन सफाई कर्मचारियों के लिए भी ज़रूरी और अच्छा है , उनको रात में किसी भी प्रकार से ट्रेफिक का सामना नहीं करना होता और नागरिकों को धुल मिटटी , दुर्गन्ध से सामना नहीं करना होता !  मुझे ये बहुत ही मनभावन लगा ! हमारे अन्य शहरों को भी कुछ इस तरह के इन्तेजाम करने की सम्भावनाये सोचनी चाहिए !! जो अधिकारी नए नए अपने अपने पदभार संभाल रहे हैं उनको कुछ अच्छी सोच को प्रयोगात्मक रूप में पहल / चलन में लाना चाहिए !!

संवेदनशीलता ,जबतक प्रायोगिक ना हो परिभाषित नहीं करी जा सकती !                                           

अधिक  प्रयोगात्मकता , संवेदनहीनता का उदाहरण बन भी सकती है !! 

जैसे , अधिक काफी की मात्रा ,कड़क ना हो कर कडुवी जाती है !