Friday, July 20, 2012

मिलते रहीए , रुधिर में अपनापन तथा मिनिरल बने रहेंगे , आसूत जल नहीं बनेगा ये रुधिर !!

             हम गुणवत्ता से किसी भी तरह का समझोता नहीं करते ! सही है भाई जब हम पैसे खरे खरे देते हैं तो मिलने वाली वास्तु क्यों स्तर से नीचे हो या उसके समतुल्य क्यों न हो जो हमें मिलना चाहिए जिसके एवज में हमने  धन दिया है !!
             ये तो हुई एक सामान्य सी बात ,  लेकिन ये मेरा ब्लॉग सामान्य और विशेष के बीच की मध्यमा है ....तो आज बात करते हैं सामान्य सी चाहत और परिवर्तन की .... !!  मेरे और आपके , उसके , इसके हम सब के तन में धमनियां हैं और उनमे रुधिर बहता है , जिसमे नाजाने कितने प्रकार के गुण हैं , जो इश्वर ने सब को एक सामान दिए हैं ....किन्तु कालांतर में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों में इधर उधर हो जाते हैं ...बात उस इधर उधर की नहीं है जो प्राकर्तिक हों ...हम बात करेंगे उन परिवर्तनों की जो प्राकर्तिक नहीं मानव के विशेष परिवर्तन पर हों ...जो अपने आस पास घटने वाली घटनाओ पर आधारित हों ...

आइये बतियाते हैं :-

           जब सड़क पर चलते हुए किसी दुर्घटना पर तड़पते हुए किसी इंसान को देख भी अपने गंतव्य पर पहुचने की जल्दी में जब हम ये देखने की ज़हमत नहीं उठाते की प्राण हैं भी की नहीं ....तब परिवर्तन महसूस होता है ....रुधिर में !
           जब किसी पिज्जा के चटकारे लेते हुए अचानक कोई आधे कपड़ों में कोई बच्चा दिखाई दे तो कोशिश करते हैं की जीतनी जल्दी हो सके तो वो अपने पास से किसी और के पास चला जाए ....खाने के मजा किरकिरा हो रहा है ....तब परिवर्तन महसुस होता है !
           जब रेलगाड़ी में अचानक से आपके जूतों को हटा कर छोटे से झाडू से आपकी और सब की सीट के नीचे का कचरा साफ़ करता हुआ कोई अपाहिज दिखाई देता है तो उसकी और इशारा कर के बड़ी सहजता से कहते हैं " अरे, जरा इधर से भी ले लेना ...." और फिर जब वो आपसे कुछ उम्मीद करता है तो कहते है , उन भाई साहब ने दिया ना ...एक रुपया ....तब रुधिर में परिवर्तन महसूस होता है !
            जब किसी पहचान वाले की अंतिम कियाक्र्म में जब वहां जाते हैं जहाँ सब को एक दिन जाना है तो मन सब कुछ होते हुए भी ये सोचता है : " अब जब ये हो ही गया तो देर किस बात की हैं , जल्दी क्यों नहीं करते " , घर से फोन आते हैं , आप हाथ मत लगाना , और रस्ते में कुछ खाना मत .....तब परिवर्तन महसूस होता है रुधिर में ....!! कुछ लोगों ने तो शमशान देखि भी नहीं होगी ...परिवार में छोटे हैं तो ये सब बड़े करते हैं मेरे ....कह कर कभी नहीं जाते !!
          जब बस अड्डे पर किसी भुट्टा बेचने वाले को एक भुट्टा भूनने के लिए कह कर हम किनारे खड़े खड़े हो जाते हैं ....ठंडी हवा से बचने के लिए ....और जब भुट्टा भुन जाये तो देख कर कहते हैं ...यार इसमें तो दाने ठीक नहीं हैं ....कोई और भून दो ....उसके ना नुकुर करने पर आप किसी और के पास चल देते हैं ...बिना ये सोचे की उसकी उस पूंजी का क्या होगा जो अपने नकार दी ....तब परिवर्तन महसुसू होता है रुधिर में !
         आस पड़ोस में किसी के घर में घटी किसी घटना पर घर में बात करते हुए सब सीमाए लांघ देते हैं ....ये सोचे बिना की शायद आपके बारे में भी कोई इस से भी बुरा सोचता होगा !!....तब रुधिर में परिवर्तन महसूस होता है !!
         कल तक जिनको साथ आप रहने देने में सुरक्षित महसूस करते हैं एक रोज़ आप खुद को उनसे दूर करने की कोशिश करते हैं ये समझ कर की आपका स्तर थोडा अलग हो गया है किन्तु ये भूल जाते हैं की वहां तन जाने का रास्ता किस ने दिखाया ..... परिवर्तन ...रुधिर में महसूस होता है !!
          में अपने उन दिनों को याद करता हूँ जब हम अपने कालेज की प्रयोगशाला में एक प्रयोग करते थे .... " आसूत जल " बनाने का .... एक बड़े से कांच के सांचे में सामान्य सा जल लेते थे और उसको खूब गरम करते थे ....तपिश देते थे ....और विभिन्न नालियों से उजरते हुए बाद में भाप बनते हुए जल को हल्का ठंडा करते हुए एक बीकर में इकठा करते थे .....इसे " आसूत जल " कहते थे .... जी हाँ इस के बनाने से पूर्व का पानी मानव के पीने योग्य होता है लेकिन इतनी तपिश के बाद बना जल मानव के पिने योग्य नहीं रह जाता उसमे किसी भी तरह का स्वाद नहीं रह जाता किन्तु जल ज़रूर रहता है .... बस आजकल हमारा सब का रुधिर भी विभिन्न प्रकार की तपिश सहता हुआ रुधिर तो रहता है किन्तु ...सब कुछ करने लायक नहीं .... ये बात असामान्य नहीं हो सकती हाँ इस को समझने के लिए हमें सामान्य होना होगा और बहार आना होगा अपने असामान्य से ओढे आवरण से ...अन्यथा अनजान खोखलापन लिए ये तपिश हम सब की रुधिर को और आसूत से और परिष्कृत आसूत  की ओर  ले जायगी !
             मिलते रहीए , रुधिर में अपनापन तथा मिनिरल बने रहेंगे , आसूत जल  नहीं बनेगा ये रुधिर  !


        
    

Monday, July 16, 2012

.......पोस्टकार्ड , अंतर्देशिये पत्र , रिश्ते और ...... यादों को प्रणाम !!

           हमारे स्कूल की  पूरी छुट्टी लगभग 3 बजे हुआ करती थी, और तब तक स्कूल की दीवार से सटा पोस्ट ऑफिस बंद हो जाता था ...इस लिए में आधी छुट्टी में जल्दी जल्दी से खाना खा कर कोशिश करता था की पोस्ट ऑफिस से पोस्ट कार्ड और अंतर्देशिये पत्र ले कर लौट आऊँ ! लेकिन इस गणित में भी एक पेच था ....हमारे प्रधानाचार्य महोदय श्री आर ए गुप्ता जी उसी समय मुख्य द्वार पर आ कर खड़े हो जाते थे ये अवलोकन करने के लिए की कौन कितना देर से आ रहा है ...और पकडे जाने पर उनके हाथ में एक लगभग 2.5 फुट का लकड़ी का डंडा होता था बस .....अब आप आगे समझ ही गए होंगे की क्या होता होगा !! मुझे ये सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ कभी .....! 
               ये कुछ 1992 से 1995 के बीच की बात होगी , हम उन दिनो मोबाईल फोन से परिचित नहीं थे ...हाँ ये जानते थे की कुछ वायर लेस जैसे चीज़ होती है ...बहुत बड़े बड़े लोगो के पास होती थी ! जिसमे बात करने का बड़ा ही खर्चा आत है !  तो भाई हम क्या बहुत लोग भारतीय डाक वयवस्था की सेवायें लेते थे ....और सब से कम खर्चे का पोस्टकार्ड उपयोग आधिक्य में होता था !! में भी करता था ! हमारे सब सर्व सम्मानित रिश्ते के लोग दूर दूर रहते हैं ...कोई मुंबई , कोई टाटानगर कोई वाराणसी , और कई मित्र भी दूर दूर रहते थे ....जैसे कोई पढने के लिए रुड़की चला गया था तो कोई वाराणसी में पढ़ रहा था , अब इनसे संपर्क हो तो हो कैसे ....और मुझे सबसे संपर्क में रहना अच्छा लगता था , और आ भी लगता है ....किन्तु यदि जब किसी चीज़ का अधिक्क्य होजाता है ना तो वो विष समानं हो जाती है ....और अधिकतर उए हुआ भी , कम से कम मेरे मामले में तो .....!
               में पोस्ट कार्ड लिखता था !! श्रीमान पोस्टकार्ड लिखना कोई आसान काम नहीं ...छोटे से तुकडे पर आप कितना अधिक लिख सकें और वो एसा की जो पढ़ा जा सके .....और सब अहम् विषयों को कवर कर ले ....स्याही किस तरह की प्रयोग में लानी है किस पोस्टकार्ड के सफ़र में कहीं कोई मौसमी ग्रहण न लग जाये और गंतव्य तक पहुचते पहुचते सिर्फ सपाट मैदान हो ....इस लिए में बाल पॉइंट से लिखा करता था !! लगभग 15 से 30 दिनों की सब बड़ी छोटी घटनाये , जो मेरे साथ घटी हों, उनका हाल चाल , कोई नवीनतम कविता लिखी हो तो उसकी कुछ पंक्तियाँ, कोई बीमार हो तो उसके बारे में दो शब्द , इन दिनों मौसम कैसा रहा , कहीं घूमने गया क्या , इत्यादि इत्यादि !!  मुझे परे कई बार परेशानी होती थी की पाने वाले का पता जब कुछ ज्यादा बड़ा होता था .....मन में खीज होती थे की अब इतना बड़ा पता रखने की क्या ज़रुरत थी ...बात पूरी नहीं लिख पता था !!  तो उनके लिए मुझे थोड़े से ज्यादा पैसे खर्च कर के अंतर्देशीय प्रयोग करना पड़ता था !! किन्तु ये बहुत सही है की मुझे अंतर्देशिये पत्र पर मैं पानी बात खुच पूरे सलीके से लिख पाता था !!
             शब्द जो तब लिखे जाते थे ...आज तो सुनने को भी नहीं मिलते ...
1. आदरणीये ........... को प्रणाम !
2. हम सब यहाँ कुशल है .....
3. आपका पत्र मिला ...समाचार मिले ...
4. आगे समाचार ये हैं की ...
5. अब समाप्त करता हूँ ....
6. लौटती डाक से पत्रोत्त्तर दीजियेगा ....
7. सादर ....
8. सप्रेम ,
इत्यादि इत्यादि ...

     हलके पीले रंग का पोस्ट कार्ड , हलके नीले रंग का अंतर्देशिये पत्र ... आप और हम जिन्होंने उन दिनों को जिया है कुछ याद कीजिये ....खूब कड़कती दोपहर में अचानक से डाकिया अंकल जी आवाज़ लगते थे ...हाँ भाई 6 नंबर ...( मेरे मकान का नंबर ) ...मैं ये मेरी बहने भाग कर जाती थे और जो भी आया ले कर आते और पढते थे .... ! लगभग 10 से 15 दिनों पुरानी खबर कितनी नवीन लगती थीं , सब की सब ताज़ा....तभी मन में ये होने लगता था की जितना जल्दी हो सके इस का जवाब दे सकूं !! रात को बिना लाइट के , लालटेन जला कर चिठ्ठी का जवाब लिखने का मजा , आज के एस एम् एस लिखने में नहीं .... क्यों ....पता नहीं किन्तु इतना ज़रूर है की तेज़ चलना जीवन में ज़रूरी है किन्तु किसी रिश्ते को गाढ़ा और मज़बूत होने के लिए भावों की हलकी आंच और समझदारी का सहज उद्वेलन ज़रूरी है .... जैसे खीर पकती है !!  
           चिट्ठियां माध्यम थीं अपनों को समय देने का ....आज भी हैं ....अब देखिये ना कम से कम हम अपने घरों में होने वाले किसी मुख्य कार्यकर्म में शामिल होने के लिए कार्ड छपवाते हैं ....!!

         आज भी पोस्ट ऑफिस हैं , लिकिन में मुझे याद नहीं की मैं वहां कितने सालों से नही गया , ज़रूरत तो है किन्तु बस मानव मन ...आसान तरिका ....मोबाइल जो है !  ये मोबाइल और मोबाइल से निभाये जाने वाले रिश्ते उस ही तरह से हैं ... जैसे की बरसाती नदी ...अचानक से उफनती हुई और थोड़ी ही देर में बिलकुल सूखा ! पोस्टकार्ड और हाथ से लिखी गयीं चिट्ठियाँ पहाड़ी जंगलों की नदियों जैसी ....बारिश के समय में पहाड़ और उनके पत्ते , पेड़ पानी को अपने में सोख कर रखते हैं और फिर धीरे धीरे पुरे वर्ष भर थोडा थोडा पानी नदी में बना रहता है ...कभी सूखता नहीं .....!!
      में अमित कंसल को खूब लिखता था ! में अपने बड़े पिता जी को लिखता था ! अपनी बड़ी मासी को लिखता था ! नाना जी नानी जी लिखता था ! कुछ लोग आज भी हैं लेकिन नहीं लिख पाता , चाहता तो हूँ ...बहुत कुछ चाहने और कर लेने में फर्क है ...जो रहेगा लेकिन यादों के साथ साथ , हमें जीवित जो रहना हैं .....भावनाओं के साथ , उमीदों में की रिश्ते बने रहें !!

                        .............. यादों को  प्रणाम !!



Saturday, July 14, 2012

विषय स्वयं परिष्कृत होते जाते हैं और सामीप्य आकार लेता है !!

           आज बतियाने का मन तो है किन्तु विषयों में से किसी एक पर केन्द्रित नहीं हो पा रहा ......!! किसी भी चीज़ का आधिक्य भी जीवन को उलझन में डाल देता है ...आज एसा ही मुझे भी  लग रहा है ....! 
             यद्यपि चयन करना कोई मुश्किल कार्य नहीं तथापि चयन के उपरान्त कितनी चर्चा हो सकेगी 
उसपर ये चिंता का विषय है !  चलिए फिर भी चर्चा करते हैं ....संभवतः हम न्याय कर सकें ......!!
            ये उन दिनों की बात है जब मेरी बहन जी कई तरह की परिक्छायें दे रही थी ...और अधिकतर उनके एजाम का दिन रविवार और स्थान दिल्ली में कही पर होता था ....अब घर पर में ही था तो उनको एजाम दिलवाने ले जाया करता था ! गाजियाबाद से हम मोटरसाइकल से मेट्रो स्टेशन तक जाते थे और फिर वहां से आगे मेट्रो से ! ये मेट्रो सेवा सही में आपके जीवन को आनंदित करने वाली सेवा है ...आप स्वयं को एक स्तारिये मानव मान सकते हैं उस में सफ़र कर के ...सामान्यतः सभी के पास तो मोटर गाडी होती नहीं वो भी वातानुकूलित ( ए सी ) किन्तु मेट्रो में आप अपना लम्बा सा सफ़र कुछ रूपए चूका कर आप तय कर सकते हैं , आनादित होते हुए !
          उनका एजाम कुछ 9 या 10 से आरम्भ होता था सामान्यतः तो हम सुबह सुबह पहली मेट्रो पकड़ कर गन्तव तक पहुच जाते थे ....और वहां पर वो स्कूल देख कर उनका स्थान देख लेते थे ....उसके बाद एजाम शुरू होने के बीच के समय में कुछ नाश्ता करते थे !! अब जब एजाम शुरू हो जाता उसके बाद कुल 3 घंटों का समय होता मेरे पास की में इंतज़ार करून और जब ख़तम हो तो उनको ले कर घर वापस लौटूं !!
          आज का विषय ये ही है की में उन तीन घन्टों में करता क्या था !!
अब देखिये ना ये तो तय हो गया की पूरी दिल्ली में सामान्यतः हर एक जगह मेट्रो है ...और हर सेण्टर लगभग मेट्रो के पास होता था। तो में मेट्रो की सेवा लेता था ...कैसे आइये ...सिलसिलेवार लिखता हूँ ....

1. चांदनी चौक - नई सड़क : मेट्रो पकड़ कर में आ जाता था चांदनी चौक और फिर वहीँ पर नई सड़क है , किताबों के लिए मशहूर , लेकिन में वहां कोई किताब पढ़ने के लिए नहीं जाता था ! दरअसल मेरे स्कूल के समय में  मैं अपने दोस्तों के साथ यहाँ आया था और वहां पर एक बार कुलचे छोले खाए थे , बस उसी की तलाश में आता था ! वो एक अधेड़ उम्र का शःक्स , आज भी हैं अपने छोटे से व्यापारिक प्रतिष्ठान पर जो उसने अपनी साईकिल / ठेले पर सजा रखा था ले कर एक निश्चित सी जगह पर खड़ा रहता है , आप वहां जाकर छोले कुलचे का आनंद ले सकते हैं ! उसके बाद में वही कुछ दुरी पर है एक कंचे वाली बोतल में कोल्ड द्रिकं वाला , वो पीता था और फिर वापस उसी जगह जहाँ से बहन को लेना होता था !

2. मोती मस्जिद : अक्सर में यहाँ आज जाया करता था , लगभग 2 से 2.30 घंटे यहाँ बिताने के बाद , बाहर निकल कर कुछ खाता और मुझे याद है जब भी में मोती मस्जिद गया तब मैंने .... लच्छेदार फालुदे खाए , ठन्डे ठन्डे , कुल्फी खाई !!

3. गुरुद्वारा सीसगंज : कभी कभी गुरुद्वारा सीसगंज साहब जाया करता था ....! वहां पर बाहर ही हाथ पैर धोने और पानी पीने की जगह बनी हुई है ...सफ़ेद संगेमरमर लगा है ...अर्धगोलाकार एक मंच सा बना हुआ है और उस पर रंग बिरंगे गिलासों में एक से दो सेवादार पानी भर कर रखते जाते हैं और दूसरी तरफ कुछ सेवादार उन इतेमाल किये गए गिलासों को धो धो कर रखते जाते हैं ...कितना सामीप्य लगता है सब के बीच !

4. फूल बाज़ार : मैं घंटों इस फूल बाज़ार में घूमता रहता था ....ना आखें थकती और ना ही मन भरता ! विभिन्न फूलों की मिली जुली खुशबू ....शब्दों में नहीं बयां करी जा सकती !! उस से ही सामने लाजपत राय मार्केट हैं , वहीँ एक बड़ा सा पीपल का पेड़ है , उसी के पास एक छोले भठूरे वाला बैठता है , जब भी फूल बाज़ार गया तो छोले भठूरे ज़रूर खाए !!

5. पुराना किला / मटका पीर : अधितर मैं यहाँ ही जाया करता था , और वापसी के समय मटका पीर जाया करता था ! पुराना किला के बाहर ही कुछ शिकंजी  वालों के दुकान हैं , बस वहां पर वो पीता था और कच्चा नारियल खाता था , आलू की चाट और खीरे खाया करता था !! मटका पीर पर भी माथा टेकने जाया करता था ...जो मथुरा रोड पर है ....इतनी चलती सड़क है , सड़क पर खड़े हो जाइए आपको अपनी ही आवाज़ मुश्किल से सुनाई देगी , किन्तु वही पर यदि आप मटका पीर की सीढियां चढिये आप अपने से मिलने लगते हैं , एकदम शांत वातावरण और बस आप और वो ...और कोई नहीं ...इबादत का माहौल जिसमे सब मेरा होता है ....!!

6. मजनू का टीला / चोर बाज़ार : कई बार यहाँ भी गया , बस घूमने , समय बिताने !
7. शाहदरा / दरियागंज : रविवार को यहाँ पर पुरानी किताबों का बाज़ार लगता है ...कई बार याहं पर आपको वो सब भी मिल सकता है जिसकी उम्मीद नहीं हो , पुराने से पुराना किसी किताब का अंक , पुराने से पुराने किसी अखबार के कुछ अवशेष इत्यादि !
8. फतेहपुरी : यहाँ तो जाया करता था बस सूखे मेवे देखने के लिए !

            और मेरा सबसे पसंदीदा विषय पुराने सिक्कों का संकलन , चांदनी चौक पर आपको छोटे छोटे बसते लिए कुछ लोग दिखाई पद जायेंगे और आपकी मदद के लिए बैठे होते हैं ....आपके पास यदि कोई खोटा सिक्का हो , पुराना नोट हो, फटा नोट हो तो आप उनके बट्टे पर बदल सकते हैं !! पर सबसे उम्न्दा बात ये होती है की उनके पास कुछ पुराने और बहुत पुराने ज़माने के सिक्के होते है जिनको पाना बहुत बड़े बात होती है ...अधिक से अधिक दाम चूका कर उनको ले लेने का मान करता है ....में भी किया करता था ....!!
           हाँ एक बात तो बताना रह ही गयी , में चांदनी चौक पर अक्सर पराठे वाली गली भी जाया करता था .... लेकिन अकेले वहां जा कर बैठ कर पराठे खाने और फिर साथ में कुल्ह्हड़ में लस्सी पीने का मजा नहीं है ...वहां यदि आपको अगर जाना हो तो अपने किसी घनिष्ठ मित्र को ज़रूर साथ ले जाइए .....कुछ चीजें अकेले आनंद नहीं देती हैं !! सफदरजंग अस्पताल के पास एक पराठे वाले भैया हैं , वो अंड्डा पराठा बनाते हैं , कई बार वो भी खाया ! वहीँ पास में खुली सड़क पर एक शख्स अपनी रिक्शा के साथ रहता है , उसको कई बार देखा , उसकी विशेषता ये है की वो कही भी पड़ी लावारिस लाश की अंतेष्टि करता है , बिना किसी की मदत के !

   मीना बाज़ार भी देखता था किन्तु दिन के समय उसकी रौनक उतनी नहीं होती थी !!

        आनंद लेने के लिए आपका आनंदित होना भी आवयशक है , विषय स्वयं परिष्कृत होते जाते हैं और सामीप्य आकार लेता है !!
                
                                                           नमस्कार !!
  















Thursday, July 12, 2012

क्या चलन में है .... चयनित या फिर सरकारी अक्छेपित !

             अभी कुछ दिन हुए हमारे प्रदेश उत्तर प्रदेश में निकाय ( नगर निगम ) चुनाव संपन्न हुए ! अब आप तो जानते ही हैं भारत में चुनाव का होना मतलब एक उत्सव का माहौल , सब तरफ छुट्टी और मस्ती का वातावरण और सब उत्साह से भरे हुए ....जैसा की मेले में होता है .....और इस सब के बीच कोई कोई आ कर सावधानी बरतने की नसीहत दे कर जाता , ज़रा संभल कर, कोई झगडा लड़ाई हो तो सावधान रहना !!
             एक विशेष सूचनापट लगा था एक वार्ड के मुख द्वार पर ,जिस पर कुछ जन उपयोगी सूचनाएं लिखीं थी इस चुनाव के सम्बन्ध में , जो वोट देने वालों को अपने अधिकारों का प्रयोग सही तरह से करने को मार्गदर्शित करता था !! उस पर लिखे सब वाक्यों को मेने पढ़ा किन्तु याद सिर्फ एक है जो की ग्रेषम के एक नियम जैसा लगता था ....किन्तु उतना उपयोगी भी है ये सोचने की और देखने की बात है.. आइये कुछ समझते हैं इस को नियम और उसकी आज के परिपेछ में ....!
               ग्रेषम कहते हैं की " पुराने सिक्के नए सिक्कों को चलन से बाहर  कर देते हैं ! "
और उस सुचना पट पर लिखा था - आइये अपना वोट समझदारी से दें  ताकि खोटे और बेकार नेता चलन से बाहर हो जाएँ !! बात तो सही है की गलत और बेकार चीज़ें बाहर तो होनी ही चाहियें किन्तु नियम तो नियम हैं ....और वो सिद्ध भी हैं ... खोट सिक्के तो नए सिक्कों को बाहर करते हैं ....नए उनको नहीं .....!!  किन्तु सम्भावनाये तो किसी भी चीज़ की तो सकती हैं ....!! अब देखिये ना सरकार की नीतियों के चलते कुछ लोग ऐसे उच्च पदों पर आसीन हो गए हैं जहा पर यदि वो सामान्यतः  प्रयास करते तो शायद नहीं ही पहुच सकते थे ....तो ये फिर से सिद्ध हो गया की नए और योग्य लोग चलन से बाहर ही रहते हैं ....! कभी कभी योग्यता का चयन हो भी जाये तो सरकारी डंडा फिर से आ जाता है उनको चलन में लेन के लिए ....!!
            चुनाव तो हो गए और लोग चुने भी गए किन्तु अब ये तो कुछ दिनों के बाद पता ....चलेगा चयन कैसा था ...और क्या चलन में है .... चयनित या फिर सरकारी अक्छेपित .... संभवतः .... बी चांस  बहुचलित !!

...पिंजरों के सब पंछी सोये , सपनों संग आज़ाद हुए !

" ओस की बूंदे , जुगनू , तारे सबने साथी ढूंढ लिया ,
        दिनभर तपती धरती को भी चंदा ने स्पर्श किया !
                  पिंजरों के सब पंछी सोये , सपनों संग आज़ाद हुए ,
                           कल की उमीदों को हम भी अब पलकों में बो जाएँ , सो जाएँ !! "

Wednesday, July 11, 2012

...... आजकल नहीं मिलते जीवट वाले जीवित लोग !!

पत्थरों से बात करी है कभी ?  हाँ भाई बोलते हैं वो भी ....!
कभी अजंता एलोरा या खजुराहो जाने का मौका मिले तो तजुर्बा कर लीजियेगा ! 

                  आज ये विषय नहीं की हम किस से बात कर रहे हैं ....किसी पाषाण से या फिर किसी जीवित से जिसमे जीवट हो ......!  हाँ जी शब्दों पर धयान दे कर सही करा आपने जीवित और जीवट .....सब लोग जीवित तो होते हैं जिनकी सांसे चलती हैं ....किन्तु ये ज़रूरी नहीं की उन सब में जीवट भी हो , आज विषय ये है ...जीवट वाले लोग कैसे होते हैं !!

                 कुछ दिनों पहले में एक व्यक्तिगत यात्रा पर था ...वाराणसी की ओर , लौह पथगामिनी के माध्यम से ....! एक रथ है उसी का सहारा लिया ....गरीबो का रथ , जी हैं सही बात हैं वो है तो रथ सा ...आप अपने को चोर जैसा महसूस करते हैं ...भारत में सरकारी प्रतिवेंदन और अनुमोदन के अनुसार 30 से 36 रूपए कमाने / खर्च करने वाला गरीब नहीं है ... तो में और आप जो इन्टरनेट का प्रयोग कर के ब्लॉग लिख और पढ़ रहे हैं निश्चित रूप से गरीब नहीं हैं ...और अगर हम लोग इस गरीब रथ में सफ़र करेंगे तो क्या किसी और के हक़ को क्या नहीं मार रहे ....ना ना  कर रहे हैं ....कमेन्ट करियेगा यदि कुछ सही और मन का लिखा हो तो !!....

            खैर हम जीवट वालों की बात कर रहे थे ...यात्रा में एक नोजवान मिला जिस से पहली ही मुलाक़ात में एसा लगा की इस की सोच में कुछ अलग और समाज के प्रति करने का ज़ाज़बा है ....बड़ी बड़ी बातें करी उसने ...अपने को समाज के प्रति समर्पित होने का भी उदहारण दिया ....बस इन्टरनेट के माध्यम से ....मुझे लगा की भाई इस लडके में कुछ विशेष है ....में पूरी तरह से उसके प्रति समर्पित हो गया .....क्यों न हो ...समाज के प्रति जो कुछ कर ने की इक्चा रखता हो अपने जीवन के सवार्निम समय में वो समाज के प्रति सोच रहा है ....समाज में बेरोजगार लोगो को रोजगार मिले , उसके प्रति उनको जागरूक कर रहा था, संसाधन उपलब्ध करा रहा था ....और भी पता नहीं क्या क्या .....!! सामान्य रूप से चल रही रेल गाड़ी अचानक से रुक गयी ...लगभग अँधेरा हो रहा था ...और पता करने पे पता चल गया की आगे दुर्घटना घाट गई है ...दो लोगो के ऊपर से रेल चली गयी है ....किन्तु वो जीवित हैं .....मैंने जल्दी जल्दी वहां जाने का मन किया ...में गया ....मुझ से पूर्व और लोग भी गए थे ....सुनसान इलाका ...गाड़ी में उन लोगो को रख कर अगले स्टेशन पर ले जाया गया... और बाद में पता चल गया की उनकी जान बच गयी ...भले उनके कुछ अंगों को नहीं बचाया जा सका ....इस घटना के बाद मुझे उस समाज के प्रति समर्पित नव युवक के एक और पहलु का पता चला ...की उसमे जीवट नहीं है ....वो बस परजीवी है ...सवयम कुछ नहीं कर सकता ...हर वक़्त सहारे की ज़रुरत है ....!

             वो भाई उस दुर्घटना स्थल पर नहीं गया , मैंने वापस आ कर पुछा तो भाई का उत्तर सुन कर मुझे बहुत अजीब और दुर्भाग्यपूर्ण लगा ...बोलता है ...में तो जाना चाहता था लेकिन मेरी मम्मी ने वहां जाने से मना कर दिया ....!! मेने पुछा भाई इस सफ़र में तो अकेले हो माँ कहाँ है तुम्हारी और कब मना कर गयीं ??? बोला में फ़ोन कर के पुछा था !!  वाह  रे समाज सेवक !!

            एक और से मिल चूका हूँ ...वो तो पूछने से पहले बोले में नहीं जाऊँगा ...मम्मी नहीं जाने देंगी ...... वाह भाई वाह !! परजीवी कभी जीवित होने का दावा ज़रूर कर लें किन्तु होते नहीं ....सिर्फ सांस लेते हैं और मर जाते हैं ....जीवट वाले जीवित भी रहते हैं और कभी नहीं मरते ....!! कोई ना मिलने वाला पद  जब मिल जाए चाहे किसी कारण से मिला हो ,  पर होते हुए सेवा की भावना आना संभव तो है ...किन्तु निभा पाना जीवट वाले के बस की ही बात है !!

                             ...... आजकल नहीं मिलते जीवट वाले जीवित लोग !!
  



Tuesday, July 10, 2012

.... जीवन का स्वर्णिम समय !!

                          ना तो ठंडक थी ना ही गर्मी का एहसास.....ये ही कोई सातवीं या आठवीं में पढता था तब मैं ....और आब आप समझ सकते हैं की इस समय क्या उम्र रही होगी ....सुबह के कोई चार बजे थे और मेरी आँख खुल गयी ....पुरे दिन का उत्साह और आने वाले चार या पांच दिनों में खूब घूमने का मन मुझे सोने नहीं से रहा था ...पूरी रात करवटें बदलते हुए कटी ....कुछ समय के लिए आँख लगी भी तो चार बजे खुल गयी ....और कानो में कुछ कुछ सुनाई पड़ने लगा .....

                    में उन दिनों अपने बड़े मामा जी के पास रहता था , जमशेदपुर में ...उनको दफ्तर की और से रहने को मकान मिला था ...एग्रिको में ....वो नेशनल मेत्रोलौगिकल लैब ( NML ) में वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत थे ....बड़ा सा घर चार बड़े बड़े कमरे , एक बड़ा सा वरामदा सब बड़ा बड़ा .....जहाँ पर घर की बालकोनी हटी बस ठीक उस से सटी एक पेड़ की डाली मिलती थी  , जिस पर खूब मीठे मीठे फल आते थे ....जिसको जंगल जिलेबे कहते हैं ....हम कभी भी उस पेड़ के पास नहीं गए ...बस ऊपर से ही हाथ गया तो तोड़ कर खा ली ....!! वो एक पूरी की पूरी कालोनी थी ...जिसमे सब प्रकार के लोग रहते थे ... पुरे कालोनी में एक खुला थियेटर था , एक दुर्गापूजा के लिए मंच था , एक फूटबाल मैदान था , एक डिस्पेंसरी थी, एक और मैदान था ....घूमने के लिए ....दो बहुत बड़े बड़े बंगले थे ....निदेशक लेवल के लोगो के लिए ....जिसके अहाते में कई विशेष प्रकार के पेड़ पौधे थे ....जिनमे से एक कदम का पेड़ भी था ....जी हाँ वो ही कदम का पेड़ जिसका ज़िक्र सुभद्रा कुमारी चोहान ने अपनी कविता में किया है ....!!
              में चार बजे उठा कर बैठ गया ...पड़ोस के ही फ्लैट से डॉ झिंगन के घर से झगड़े की आवाजे आ रही थी , वो हमेशा झगड़ते रहते थे , अब दोनों लोग डॉ थे को किसी में ज्ञान की कमी तो थी नहीं तो कैसे कोई किसी की बात मान ले ....खैर छोडिये ...में अपनी बात बत्ताता हूँ....वो दिन दुर्गा पूजा का सप्तमी का दिन था ....सब लोग नहा धो कर अच्छा अच्छा पहन कर इधर उधर घूमने लगे थे ...स्कूल की तो छुट्टी पद गयी थे , छोटे , बड़े, किशोर , युवा , जवान , बुजुर्ग सब कोई दुर्गा पूजा के पंडाल के आस पास ही विचरण करने लगा था ..किसी कोई कोई काम करते नहीं देखा किन्तु सब व्यस्त ....क्या होता है न वो वातावरण .....!!
           मेरे पास पांच जोड़ी नए कपडे थे ...हर दिन के लिए एक जोड़ी ...!! में सब से अधिक खुश ....में षष्ठी से ही नोतून जामा ( नए कपडे ) पहनुगा !! भसान के दिन तक ...! एक नानी जी ने दिया , कुछ मामा जी ने दिलवाया , एक मसि जी ने दिया , एक माँ ने भेजा दिल्ली से , सेक और भी किसी अच्छे से रिश्तेदार ने दिया ....!!  हमें मामा जी अपने विजय सुपर स्कूटर पर दुर्गापूजा दिखने ले जाते थे ....कैसे अब में आपके सामने शब्द चित्र रखता हूँ आप देखिये :
                     उनका विजय सुपर स्कूटर ...रंग गाढ़ा पीला .....हेन्देल के पास मामाजी बेटी कड़ी होती , राजा बाबु बन कर, फिर मामा जी, फिर दूसरी बेटी , फिर मामी जी, फिर बाद में विशेष प्रकार से लगाईं गयी स्टेपनी पर में बैठता था सब से आराम दायक सीट थी मेरी ! शाम के पांच बजे निलकते थे ...तो रात को 11 - 11.30 तक वापस आते थे ....टेल्को एरिया , अग्रिको एरिया , सिट गोरा एरिया , जुगसलाई एरिया , बर्मा माइंस एरिया और आज तो मुझे याद भी नहीं की कहा कहाँ जाते थे .....लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा ...मामा जी हम सब को खूब बैलेंस कर के चलते थे , मुझे तो रुक कर पंडाल देखने से ज्यादा स्कूटर पर चलते रहने में आनंद आता था ....वो ही 40 से 45 की स्पीड और रास्ते भर हम सब को सब कुछ बताते चलते थे मामा जी ! एक बार हम जुगसलाई से एग्रिको जा रहे थे .....रेलवे के पुल पर चढे ...किनारे किनारे सब्जियों की दूकान है ...हम रुके ...कुछ लिया और फिर चलने लगे तो स्कूटर ने चलने से मन कर दिया ....रात के 8 बज रहे थे , और जमशेदपुर में 8 के बाद रात होने लगती है ....जबकि दिल्ली और मुंबई में 8 के बाद ही दिन का एहसास होता है ...सब अपने लिए रात कके 8 के बाद ही समय निकलते हैं ....दिन भर तो कंपनी मालिक का होता है .....खैर स्कूटर हो पुल के पार तक धक्का लगा कर आये ....मकेनिक मिला , ठीक करवाया , इस समय में मामी जी और बच्चे डॉ खुदियार के घर रुके जो पास में ही था, वो हिमियोपेथी के डाक्टर थे ....छोटी मोती समस्या वो हो हल कर देते थे हमारी ....उनको में इस लिए याद कर रहा हूँ क्यों की उनके पास एक 1930 की मोडल के कार थी , भूरे रंग की , जिसमे एक ही दरवाज़ा था ....और आगे की सीट को थोडा झुका कर पीछे सवारी बैठती थी, पीछे बैठने के बाद ही आगे कोई बैठ पाता  था ...मैंने एक बार सवारी करी थे उसकी ....राजसी ठाठ लगते हैं उसमे बैठ कर !! स्कूटर ठीक हुआ , हम घर चले , कालोनी में पहुचे तो देखा के दुर्गा पूजा पुरे रंग पर थी  ...प्रसाद खाया और हम भी वही रुक गए ...रात के 1 बजे घर गए !!
             अगले दिन षष्ठी थी सबसे बड़ा दिन सबसे अधिक उत्साह का दिन, समर्पण का दिन , मिलन का दिन !!  कहीं चनाचूर , कहीं झाल मूढ़ी , कहीं आलूचाप , कहीं चौमीन , कहीं सिंघाड़ा ( समोसे ) कहीं पुचकी ( गोल गप्पे ) कहीं , डोसा , कहीं इडली, कहीं चिले , कहीं पूरा का पूरा खाना बिक रहा होता है ....जैसे की उत्तर भारत में दशेहरे में रौनक होती हैं उसी तरह की रौनक दुर्गापूजा में वहां होती है ....!!
                में अपने उन दिनों को याद करता हूँ तो बस याद ही करता रह जाता हूँ ....कई बातें फिर नहीं आ सकती ज़िन्दगी में ....और ये भी सच है की मैं अगर वहां नहीं गया होता तो कई बातें नहीं आ सकती थी ज़िन्दगी में ....!! किस भी बात से आहात नहीं हों ...किन्तु जीवन का स्वर्णिम समय बीत चूका है ...अब तो उसको सहेजने के प्रयास करने चाहिए ....और आगे की ज़िन्दगी को आनंदित करना चाहिए ....!! वो बीता समय फिर नहीं आएगा , किन्तु साथ रहे यादों में का प्यास करते रहना भी जीवन है !!