Friday, July 6, 2012

....छोटी छोटी चीजों को सहेजने का नाम भी जीवन है !!

               " आज अचानक किसी से कुछ बात करते हुए किशोरावस्था की कुछ बातें याद हो आई !!  सही है की उन बातों का , उन वस्तुओं का , उन संपर्कों का आज के परिपेक्ष में चाहे उतना महत्त्व न हो किन्तु वो चीजें हर एक व्यक्ति के जीवन में नीव के  पत्थरों का सा महत्त्व रखते हैं ....! "
               बारह से चौदह वर्ष के बीच की उम्र रही होगी .... उन दिनों घर में गुल्लक में पैसे जमा करने का कुछ ज्यादा ही चलन था ....तो हम भी दुनिया से अलग थोड़े ही थे ...हम भी किया करते थे कुछ बचे हुए पैसे .....अच्छा यहाँ खुलासा करना ज़रूरी है की जब हम कुछ कमाते नहीं थे तो पैसे आते कहाँ से थे .....तो पढ़िए सोर्स ऑफ़ इनकम ..... मैं अपने मामा का घर रहता था ....कभी कभी सब्जी , कुछ अचानक ज़रुरत का सामान , कोई मेहमान आ गया तो उसके लिए बिस्किट , नमकीन इत्यादि लेन के लिए हमरी सेवाएँ ली जाती थी ...बस उस में से बचे कुछ खुले पैसे वापस कहाँ जाते थे ....वो तो गुल्लक के हवाले ! मेरे एक मौसा जी हैं वो बनारस में रहते हैं ...पान के शौक़ीन , बस उनका आना हुआ और हमारी गुल्लक की कमाई बढ़ जाती थी ....ये सब के साथ होता है ...हाँ किन्तु निम्न माध्यम वर्गीय घरों में अधिक ....!

          नया नया क्लास नौमी में आया था ....ज्यामिति का विषय हमें बहुत प्यारा लगता है ....तो शौक हुआ की एक नया ज्यामिति बाक्स लेना चाहिए ....इक्चा नानी जी के सामने ज़ाहिर करी ....तो सुझाव मिला की देखो कही पुरानी चीजों में तुम्हारे छोटे मामा का पुराना ज्यामिति बाक्स रखा होगा ...उसी से काम चला लो ...दो सालों की ही तो बात है .....मेरा मन उदास .होगया ...फिर से पुरानी चीज़ से काम चलाना होगा .....सब दोस्त नए नए सामन ले का आयेंगे और में पुराने सामन से काम चलाऊंगा ....मेरा मन उदास हो गया ....सुबह के चाए नहीं ,पी ये कह कर की मन नहीं है ....नानी जी समझ गयी थीं .....!!
                    जब दोपहर को वापस आया तो देखा की नाना जी एक छोटे से बाक्स पर हरे रंग से पेंट कर रहे हैं .....उतावले मन से देखा तो वही पुराना सा मामा जी का ज्यामिति बाक्स था ....उसका सामन भी साफ़ कर के एक तरफ रखे हुए थे ...मैंने बुझे मन से उनको देखा और फिर हाथ पैर धो कर खाना खाने बैठ गया ..... !! खाने में उस दिन क्या पका था मुझे आज भी याद है ....क्यों की वो एक यादगार दिन था मेरे लिए ....सब को नसीब नहीं ....!!!!   अरहर की दाल, आलू का चोखा , लाल भरवा मिर्च का अचार , चावल और एक विशेष सब्जी ......सीताफल ( कोहड़ा ) के पत्तों की भुजिया ....ये सब नानी जी ने पकाया था .....कोयले के चूल्हे पर ...घर पर गेस थी किन्तु नाना जी को चूल्हे का पका खाना अच्छा लगता है तो नानी जी ...उसी पर पकती थीं ....
               मैंने खाना खाया और कुछ पढाई कर से सो गया ...! शाम को नाना जी ने मुझे वो हरे रंग का बाक्स दिया और कहा ये तुम्हारे मामा जी ने प्रोयोग किया था और आज तुम करो ...सब सामन अच्छा है ....! मैंने बिना उसको खोल कर देखे अपने बसते में रख लिए ....मन में ये उधेड़ बुन चल रही थी कि आज अगर मेरे माँ और पिता जी के घर पर में होता तो क्या वो लोग भी मुझे पुराणी चीज़ से काम चलने को कहते ....कभी नहीं ...नया सामान ला कर देते ....पर क्या करून कुछ नहीं कर सकता ........शाम का खाना खाया , कुछ पढ़ा और फिर ये सब सोचते सोचते सो गया ....सुबह .हुई ..सब कुछ वैसा ही ....मन में उत्साह नहीं ....पहला दिन था ज्यामिति बाक्स के इतेमाल का और मेरे पास पुरानी चीज़ें थीं .....अनमने मन से इस्कूल की और चल दिया ....रास्ते में रोहित अगरवाल के घर से उसको पुकार का बुलाया ...और उसके पूछने पर की ज्यामिति बाक्स है क्या ....कह दिया ...की पता नहीं देखना पड़ेगा ........! वो तो चेहेक कर बोला मेरे पापा ने मुझे कल ही नया बाक्स दिलाया है ....उसने उसी वक़्त अपना बाक्स निकाल कर दिखया ....कमलिन का था ...कितना .सुन्दर अन्दर से सब सामन चमचमाते हुए ....स्टील के .....वाह .....! ये सब देखते देखते स्कूल आ गया ....प्रार्थना हुई ...राष्टगान हुआ ...सब अपनी अपनी क्लास में चल दिए ....पहला घंटा हिंदी , दूसरा इंग्लिश , तीसरा गणित .....और अब बारी आई ज्यामिति बाक्स के इतेमाल की ....बस सब अपना अपना बाक्स खोल कर देखने दिखाने  लगे ...किसी का " राजकमल " का था , किसी  का " कैमिलिन "  का था , किसी का स्थानीय किसी कंपनी का कोई लाया ही नहीं था ..
                   सब ने मेरा मुह देखा मनीष अपना बाक्स दिखाओ ....में कुछ बोलता अगरवाल ने मेरे बसते से हरे रंग का बाक्स निकाल लिया ....सबसे अलग रंग ...सब जोर से हंस दिए ....में झेप गया ....अब बारी अन्दर के सामान को देखने की थी ....उसने बाक्स खोला ...और अचानक माहौल बदल गया ...सब कुछ मेरे हक में होगया ......सब ने कहा कितने सुन्दर हैं ये सब .....और सब बारी बारी से देखने लगे ...30 से 40 लोग थे क्लास में ...और सब ने देखा ...और मुझे आ कर सलामी दी और कहा मनीष सब से अच्छा बाक्स और इंस्ट्रूमेंट तुम्हारे ही हैं .....काया कभी कभी हमें भी प्रयोग ले लिए दोगे .....में कुछ समझ नहीं पा रहा था ...अब ठीक से सामान को देखने की बारी मेरी थी ...और मेरे देखने के बाद मेरा मन भर आया ....नाना जी और नानी जी के प्रति श्रद्धा और बढ़ गयी .....क्या देखा मैंने ....  उस बाक्स में सब सामान पीतल का था ...चम्चामता हुआ , एक एक सम्मान इतना भारी  और सुन्दर की बस देखते रहने का मन करे .....        पीतल  वैसे भी सुन्दर लगता है ...और सब बच्चों के तो सामान लगभग एक जैसे थे लेकिन मेरे सामान का तो कहना ही क्या ....
एकदम अलग ...सब से अलग ...मेरे नाना जी ने सब को कोयले की राख से चमकाया था मेरे लिए ...बरसों पहले मेरे मामा जी ने
कभी प्रयोग किया होगा ...अब में कर रहा हूँ !! सारी उदासी ख़तम , सब से अलग सामान के कारन में क्लास में लगभग राजा जैसा ....सब किसी न किसी तरह से मेरे पास आ कर उस बाक्स को छूने का प्रयास
कर रहे थे, मुझ से मिलने की कोशिश कर रहे थे ....काया दिन था वो।...पुरे दिन मन उल्हास और आत्मविश्वास से भरा रहा ....और जब घर आया तो नाना जी नानी जी को बताया की सब कैसा था तो वो बहुत खुश हुए ...इस लिए की मैंने पुरानी  चीज़ को स्वीकार कर लिया ...में अपने मन में सोच रहा था की अगर मुझे नया मिलता तो शायद में भी आक क्लास में सामान्य ही रहता ...किन्तु इस के कारण विशेष हो गया हूँ !!....    आज मेरे नाना जी नहीं नानी जी नहीं हैं ...वो बाक्स भी जान से प्यारा था किन्तु मेरे टाटानगर छोड़ देने के बाद जाने कहाँ खो गया ....पर उसकी यादें हैं ...जो जीवन भर मेरे साथ रहेंगी ....!!
                जब में दिल्ली से टाटानगर जा रहा था तो अपने साथ रेलवे लाइन के किनारे के पत्थर ले कर गया था ...और जब वहां से वापस आया तो अपने साथ ना जाने कितनी कितनी यादें लाया ...कुछ भी सपना नहीं था सब यथार्थ ....वस्तुएं और मानव .....हमेशा एक दुसरे से जुड़े रहते हैं ...किन्तु सामयिक घटित होने वाली घटनाये उनको विशेष और यादगार बना देते हैं ...जो जीवन भर साथ रहते हैं , आनंद और अवसाद दोनों ही  समय...! छोटी छोटी चीजों को सहेजने का नाम भी जीवन है ....जो आप जीवति हैं तथा स्वयं से जुड़े हुए हैं ....प्रतिवेदित करता रहता है !!
               

Wednesday, July 4, 2012

रिश्तों के नामांकन वाली, अनुमानित सब परिभाषाएं !!

रोज़ दीये की बाती जैसी,
सुलझी - सुलझी आशाएं !
रिश्तों के  नामांकन वाली,
अनुमानित सब परिभाषाएं!!

नयनो से अब वंचित होता,
सम्मानित और अपनापन !
रंगोली को रंग प्रतीक्षित ,
खुशबु ढूंढ रहा चन्दन !!

    ****  सुप्रभात *****


Wednesday, June 27, 2012

.... बीमित होने का दर्द ...और सुख ...!

                       एक सज्जन अपने सफ़ेद रंग के थैले में कुछ सब्जियां ले कर अपने घर की और चले जा रहे थे ....! हलके सफ़ेद बालों में सरसों का तेल लगा कर सलीके से कंघी करी हुयी थी उन्होंने ! सफ़ेद रंग का ढीला ढाला कुर्ता , उल्टे हाथ में एक जलती हुई सिगरेट ! सब्जियों में उन्होंने अपने मन पसंद की खरीदारी करी थी ......... छोटे वाले कलौंजी वाले बैंगन , कुछ पकी हुई सहजन जिसको की सरसों के पिसे मसालों में पकाया जाता है ....उनको उसको चबा चबा कर खाने में आनंद आता था , कुछ खीरे ,टमाटर, प्याज , हरी ,मिर्च  नीबू , अदरक , शलगम और भी कुछ ....!!

        खैर हम उनकी सब्जियां थोड़े ही गिन रहे थे ...में तो देख रहा था एक इंसान की रिटायर होने के बाद की ज़िन्दगी और उसमे खुशियाँ और मन बहलाने के बहाने ढूंढते हुए दिन गुजारते शारीर !!...
                   सुबह के कुछ 6 बजे नहीं की वो सज्जन अपने रोज़मर्रा के कार्य से निवृत्त हो कर के अखबार पढ़ते हुए चाय की चुस्की लेते और नाहन कर के दफ्तर के लिए निकल जाते !! संताने हैं सब के विवाह हो चुके हैं  ! अपने छोटे बेटे के साथ में आजकल रिटायर होने के बाद में रहते हैं ...! बड़े बेटे के नौकरी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में है तो वो विदेश में रहता है ....मज़बूरी है की उनको अपने साथ नहीं रख ..सकता .! छोटा बेटा किसी निजी कम्पनी में काम करता है ...आमदनी इतनी नहीं है की खूब खुला हो कर खर्चा कर सके , किन्तु दिन ठीक ठाक कट रहे हैं ...!

                    ये सज्जन अपने बीमित होने पर दुखी भी हैं और खुश भी ...! इनके बेटों और संतानों ने इनकी देखभाल करने की तब मानी  जब इन्होने अपने बीमित होने का खुलासा ..किया .आज सब इनको अपने साथ रखना चाहते हैं , ताकि किसी अनहोनी या फिर अंतिम समय में वो जिसके भी पास रहे उसको बिमा की रकम मिल सके !! जिसकी वज़ह से इनकी खूबदखभाल हो रही है !! इनको दुःख है की संतानों ने इनके पिता या माता होने के कारण इनकी देखरेख करने की नहीं ठानी ...बल्कि बिमा के रकम की वजह से .....!!
                    भावावेश में आकर कभी कभी अपनी ये बात वो बोल भी देते हैं ....उस दिन पुरे घर में तनाव रहता है ....किन्तु शाम होते होते सब ठीक हो जाता है ....बिमा जो है .इनका ...सबको उसका लालच है ....! अपनी सलाह है ...यदि आपको लगता है की आप अपने रिटायर्मेंट के बाद भी जीवित रहेंगे और अपना जीवन यापन ठीक से करवाना चाहते हैं ....सेवा के साथ तो आपको बिमा करवाना .चाहिए ..रोटी .सब्जी ...घी लगा कर .मिलेगी ..और ,प्यार  स्नेह की बात नहीं करनी .चाहिए ...कोई किसी का नहीं ...! बस बिमा ही आपका और उसके कारन सब आपके ...!! शत प्रतिशत सही है भाई ....अब कबूतर आँख बंद कर ले तो सही बात झुठलाई तो नहीं जा सकती ना !! बिमा करवाइए और आनंद ....लीजिये !!

Saturday, June 23, 2012

.....समय और समझ का प्रतिवेदन !!

              " कुछ सूखी पत्तियों और फूलों की पंखुड़ियों को अपने मुट्ठी में दबाये एक सुन्दर सा बच्चा अपने घर की तरफ भगा चला जा रहा था ,,,,,इतना परेशां की अगर किसी ने उसको घर पहुचने से पहले देख लिया , रोक लिया और पूछ लिया की उसके हाथों में क्या है तो सारा भेद  खुल जायेगा ....उसको सब बताना पड़ेगा ...कितना कीमती सामान है वो जिसको किसी के भी साथ नहीं बांटना चाहता....!."
              "कुछ एसा ही करते हैं हम ....अपने आप ही अपने लिए किसी भी एक या दो या फिर उस से भी ज्यादा सामान को कीमती , महत्वपूर्ण बना लेते हैं .....अपना अपना दृष्टिकोण है .. या फिर समय और समझ का प्रतिवेदन जिसके कारण ये सब होता है .... !!
             किसी भी चीज़ की महत्तता उसके प्रयोग पर निर्भर नहीं करती जितना की हम उसे प्रयोग के लायक समझते हैं .....! अब संग्रहालयों में रखी वस्तुओं को ही देख लीजिये ....कितना प्रयोग में आती हैं ...किन्तु महतवपूर्ण हैं !! इसी प्रकार से रिश्ते होते हैं , सामान्य और महत्वपूर्ण !!  भोतिक वस्तुओं और रिश्तों में सिर्फ इतना अंतर है ....एक सिर्फ एक के उठाए कदम पर महतवपूर्ण होता है और रिश्ते दोनों और के उठाये क़दमों की महत्ता एवं गंभीरता पर निर्भर करते हैं .......!!



Thursday, June 21, 2012

" आजकल वो नहीं है ...... !! "

" ....आजकल वो नहीं है ....... !! "

                मेरे घर के आँगन के बिलकुल पीछे से भारतीय रेल गुजरती है ....हाँ कुछ एक ठहरती भी हैं , लोहपथगामिनी विश्राम स्थल भी तो है ....बस उसके ही किनारे किनारे पेड़ लगे हुए हैं ....जिनमे से एक बूढा बरगद है ...जो हमारे ब्लोक के मकान संख्या 3 में रहने वाली एक बुजुर्ग ने लगाया था ...जिन्हें हम नानी कह कर संबोधित करते थे ....और उनके अंतिम समय तक करते रहे .....!! "
               बूढे बरगद पर एक दो या कुछ एक कोयल रहती हैं सुबह सवेरे हमलोगों के जागने से पहले जाग कर 
अपने होने के हस्ताक्षर कर देती थी, अपने सुरीले स्वर के कुहू कुहू कर के ..... !
अहाते में कुछ गौरैयों का झुण्ड अपने चु चू के स्वरों से अगले अहाते में चलने का  कार्यक्रम बनाता हुआ जल्दी जल्दी से दाना चुगने में ...मस्त .दिखाई पड़ता था ....!!

                  कोयल सुबह सवेरे बोलती थी उसके पीछे पीछे मैं भी कोशिश करता था उसके सुर से सुर मिलाने की , जब वो बोलती तो में भी बोलता था.....फिर वो बोलती , फिर में बोलता , फिर मैं बोलता .....फिर वो , फिर में .....फिर में हार जाता था ....और वो जीत जाती थी !! इसी तरह से गौरैया के झुण्ड से में हार जाता था ....कितनी बार कोशिश करी की उनकी एक फोटो निकाल लूं किन्तु एसा कभी हो ही नहीं सका की सब की एक साथ निकाल पाया हूँ .....कभी कोई कभी कोई ...कैमरे की हद से बाहर निकल जाती थी !! फिर भी अच्छा लगता था ये लुकाछिपी का खेल ....कोई था तो खेलने के लिए ...अब तो कोई नहीं है .....!!
              
             आजकल ना तो कोयल और ना ही गौरया ही दीख पड़ते हैं !! आवाजें भी सुने नहीं देती ...वो कहाँ हैं नहीं पता हाँ हम हैं अकेलापन लिए हुए .... !! रोज़ रेलगाड़ी आती हैं जाती हैं , नानी नहीं हैं , एक समान्तर दीवार खड़ी है रेल की पटरियों के सहारे ....हम बंधन में हैं या वो पता नहीं .... किन्तु कुछ तो है जो छूट सा गया है ....या धीरे धीरे छूट रहा है ...जिसके कारण हम बौने होते जा रहे हैं ....कद में नहीं ...अपनेपन में , सहयोग में , विचारों में , संबंधों में और ना जाने किस किस में ....आजकल वो नहीं है ..सूनापन है ...अकेलापन है ....सबके होते हुए भी वो सब नहीं है ....जो था किन्तु आज है तो खोखलापन और खालीपन किये हुए ! एक बड़ा सा कमरा सा होगया है जीवन -जहाँ कभी चहल पहल थी और आज निर्वात सा कायम है ....आशा है वो फिर से गाएगी बरगद पर की ये सन्नाटा ख़तम हो और मन का बनवास समाप्त हो जो किसी सीमा के लिए नहीं है एसा जान पड़ता है !!  चलिए अब सोते हैं कल सवेरे उसकी आवाज़ की उम्मीद में ....की जीवन चले !! "

       

         

Sunday, June 17, 2012

.......सारांश के बाद की पंक्तियाँ !!!!!

                " कोई  भी वृतांत , यात्रा , कहानी , शब्दचित्र , वार्ता  दो तरह से कहा  या पढ़ा  जाता  है ....एक पुर्णतः  अक्षर-अक्षर और एक सिर्फ सारांश में ..... ! "

                    मेरे कुछ निजी जीवन के अनुभव मुझे कुछ और भी सोचने  को बाध्य एवें प्रेरित करते हैं .....बाध्य इसलिए की जो सुना उस पर विशवास कर पाना कभी कभी आसान नहीं होता और प्रेरित इस लिए की जो सुना और कहा गया है संभवतः उस के शाब्दिक अर्थ वो ही हों जो सुने किन्तु उनके भावो के अर्थ और भी प्रेरणादायक हो सकते हैं .....! पूरी कहानी के बाद उसका सारांश पढ़ लीजिये आनंद आएगा ....किन्तु मैं आज आपको सारांश से आगे सोचने और पढ़ने की और दिग्दर्शित करने के चेष्टा और प्रयास करूँगा !!
                    मेरा एक मित्र है , था इस लिए नहीं लिख रहा क्योकि अभी वो है ....और में उसको मित्र मानता हूं।... जैसा की सर्व विदित है ...मित्रता में कोई सीमा नहीं होती , रंग, जात ,धर्म , लिंग, आयु आदि आदि .....हम दोस्त हुए , कभी कभी भाई कह कर भी एक दुसरे को संबोधित कर देते थे ...अच्छा लगता था ....किन्तु खोखलापन होता थे उस उच्चारण में ....जो की आज समझ में आया मुझे ....! कई विषयों पर अछि पकड़ थी उसकी , कम उम्र में बहुत कुछ कर लिए था और बहुत कुछ कर सकने की हिम्मत रखता था .....मैं इसी बात से उससे प्रभावित था ....!
                   मित्रता में व्यापार या मौकापरस्ती का कोई स्थान नहीं होता ....इस बात को आप इसे कहें इन दो लोगो के बीच एक सम्बन्ध बना ....जो मित्रता का है , एक अपनी पूरी ज़िम्मेदारी से उसका पालन कर रहा है , निश्छल , निर्बाध और  कई जगहों पर ये दिख भी रहा है की और भी एसा कर रहा ही ....किन्तु अपना भला देखते हुए .....जहाँ उसको एसा लगता है की उसको किसी भी तरह से आर्थिक , सामाजिक , पारिवारिक यू व्यापारिक नुक्सान की सम्भावना है वो आपको मझधार में छोड़ कर ये कहता हुआ निकल जाता है " मम्मी , पापा , चाचा से पूछ कर करूंगा !!  
                   किसी घटना के / कहानी के / मित्रता के या सम्बन्ध  के पुर्णतः सारांश में कहा जा सकने की पूरी संभावना होती है किन्तु मेरा अनुभव ये कहता है की सारांश के  बाद शब्द असल में किसी कथानक को पूरण करते है , यथार्थ के साथ .......हर चमकने वाली चीज अपने आप में तीखापन भी लिए होती है .....सम्बन्ध या मित्रता जब स्वार्थ की नीव पर बने हों तो अधिक विश्वासी व्यक्ति को धोखा होता है क्योकि विश्वासघाती तो अपना मतलब सिद्ध कर के किसी और को अपना नया मतलब साधने के लिए मित्र बनाए जाने के लिए निलकल चूका होता है ....
               अतः यदि संभव हो तो कहानी के सारांश के बाद की अतिरिक्त पंक्तियों पर ज्यादा गौर कीजियेगा ....ताकि धोखा ना हो !! श्रीमान चाहे जो भी हो गए हों किन्तु मेरी निगाह में ........ ..... ... ... .........खैर जाने दीजिये !!
                     सारांश के बाद की   पंक्तियाँ , उन रिक्तियों को स्थान देती हैं जो उचित निर्णय लेने में सहायक होते हैं ....और आपको बताती हैं की आप का किसी को  सहारा किस हद तक होना .चाहिए ...वर्ना दिया गया सहारा आपके ही सर पर चढ़ कर ज्ञान बांटने से बाज़ नहीं आएगा !! ये ख़ुशी की बात होगी की आपका सहारा कुछ मुकाम हासिल कर रहा है ... वो सब किन्तु बदतमीज़ी और ठसक से नहीं होना चाहिए जिसमे से एहसानफ़रामोशी की बू आती हो !!
       

Saturday, June 16, 2012

STORY WRITTEN BY MRIGANKK ( VASU ) my sis son ....4 yrs Old

A SHORT BUT FUNNY STORY WRITTEN BY MRIGANKK ( VASU ) my sis son ....4 yrs Old only...


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" Ek baar ek bear jangle main khel raha tha , fir use bahoot sundar flower dikhai dete hain fir wo unke pass jakar dekhta hai to wo bahoot sundar hote hain , fir bear un flowers ko smell karne lagta hai , jaise hi wo un flowers ko sunghta hai... bahoot sare keede uski nose main chipak jate hain aur use katne lag...te hain , wo chhilata hai help help, are koi to mujhe bachaoo bhai , fir wo dr. ke pass jata hai to pata hai kya hota hai, dr. bear ki jhaadu se bahoot pitai lagata hai, bahoot pitai lagata hai, maine vasu se puchha ki dr. bear ki pitai kyun lagata hai , to vasu bola ki nahi dr. bear ko thode hi maar raha tha wo to uski nose par chipke keedon ko maar raha tha , sath main bear ki bhi pitai ho gai. aur fir bear kahta hai ki aree dr. mujhe tumhari help nahi chhahiye main to bhaag raha hun yahan se " ha ha ha :) ...