Wednesday, March 12, 2014

एक कहानी : " छावनी " .

           ऑफिसर्स मेस से जल्दी जल्दी रात का खाना खा कर विक्रम विशेष परमिशन पर  छावनी के बाहर अपने एक और साथी के साथ निकला ही था कि हलकी बूंदा बांदी शुरू हो गयी और उन्हें बेग़म पुल के दूसरे छोर पर एक चाय कि दूकान पर रुकना पड़ा !

निशांत वर्मा : चाय लोगे केप्टन ?

विक्रम : मैं रात को चाय नहीं पीता !

निशांत : ये भी कोई स्कूल कि घंटी है जो रात में नहीं बजती , चल आज पी कर देख !

विक्रम : यार कुछ चीज़ों में मुझे जबरदस्ती पसंद नहीं और तू ये जनता है !

निशांत : ठीक है दोस्त , चाय के बहाने पुरानी यादें ताज़ा हो जाती , सोचा था !

विक्रम स्टूल को अपनी और खीचते हुए चाय वाले से बोला : भैया जी , दो कप अच्छी चाय बनाइये !

चायवाला : अदरक दाल दूं सर ?

विक्रम और निशांत ने एक दूसरे कि तरफ देखते हुए जैसे कुछ याद किया और गले मिले !

चायवाले ने अदरक वाली अच्छी सी चाय बनाई   मिटटी के कुल्हड़ में को सेना के नोजवान अधिकारियों कि तरफ बढ़ा दी !

            छत  पर पड़ी नीले रंग कि तिरपाल बार बार हलकी हवा से उड जाती थी और बारिश कि बूंदे दूकान के भीतर झाँक लेती थी ! कभी विक्रम कि पलकों पर तो कभी निशांत के बाँहों पर !

सड़क पूरी भीग चुकी थी !

बेग़म पुल पर एक किनारे से दूसरे किनारे पर सायकल , रिक्शा , बस , ट्रक और ठेले सब आते जाते थे !

विक्रम और निशांत के लिए नया नहीं था ये सब देखना हाँ समय और उम्र ज़यादा हो गयी थी ये नज़ारा देखे !

विक्रम तूने देखा वो गवर्नेंट कॉलेज के पीछे वाले गेट का नीम का पेड़ कितना घना हो गया है ! : निशांत ने ट्रक कि मैं लाइट से रोशन हुए नीम के पेड़ कि तरफ इशारा करते हुए कहा !

निशांत भाई सब कोलगेट जो करने लगे हैं , हमारे बचपन जैसे दातुन करते तो देखते इतना घना कैसे होता ये ! विक्रम ने चाय कि आखरी घुट लेते हुए जवाब दिया

चल भाई देर होने को आई , परमिट भी ओवर होने वाली है !

दोनों लौट आये छावनी में , अपने अपने कमरों में !

       बारिश रात भर होती रही ! हवाएँ शहर के इस कोने से उस कोने तक तेज़ चाल से टहलती रहीं ! छावनी के कोने कोने पर जवान अपने अधिकारियों कि रक्षा में रात भर पहरा देते रहे !  रात भर बेगम पुल से धीमे , तेज़ हॉर्न कि आवाज़ें आती रहीं ! फिर रोज़ कि तरह ये रात भी बीत गयी जैसे पास कि काली नदी कि गहराइयों में बारिश का पानी समां गया  , अगली बारिश के आने तक !

गुड मॉर्निंग निशांत : विक्रम ने कैम्पस के ग्राउंड में बड़े से झूले पर सर के पसीने को सफ़ेद तौलिये से पोछते हुए कहा !

निशांत : गुड मॉर्निंग दोस्त , कैसी लगी कैंटोनमेंट में पहली रात ?

विक्रम : रात भर सो न सका !

निशांत : क्यों भाई ?

विक्रम : तुम अगर आज फिर मेरे साथ उसी चायवाले भैया के पास चलो तो बताऊंगा !!

निशांत : नॉट ए बिग डील , ठीक है फिर शाम को छेः बजे शार्प मैं गेट पर मिलो !

विक्रम : ओ के !

मेन गेट से कुछ कदम कि दूरी पर के चोराहे से होते हुए बेगम पुल कि तरफ निशांत और विक्रम बढे ही थे कि किसी ने पीछे से आवाज़ लगायी !

साब एक बात पूछूं ? करीब १५ - १६ साल का लड़का हाथों में रजनीगंधा के फूलों के गुलदस्ते लिए खड़ा पूछ रहा था !

सेना कि वर्दी में रौबीले दो अधिकारीयों से एक आम लड़का ऐसे कैसे कुछ पूछ सकता है ! सामान्यतः ऐसा हो होता है ! पुलिस , सेना ही आम आदमी से सवाल करते हैं , पर आज कुछ उल्टा था !

विक्रम ने अपनी चाल कुछ कम करते हुए लडके के पुछा :  तुमने हमसे कुछ कहा ?

लड़का : जी  , मैं आपसे ही कुछ पूछना चाहता हूँ !

निशांत : हाँ बोलो, क्या बात है ?

लड़का पहले आप ज़रा किनारे हो जाइये , यहाँ पुल पर कम जगह है तो इस लिए गाड़ियों से बचना पड़ता है !

निशांत  , विक्रम : तुम जल्दी पूछो क्या काम है हमसे ?

लड़का : साब आप दोनों मेरठ कि ही हैं ना ?

निशांत और विक्रम : हाँ , तो ?

लड़का : साब ये आपके १०० रूपये बाबा बाबा ने दिए थे और कहा था कि अगर कभी आप लोग मिले तो लौटने को !

निशांत , विक्रम ने एक दूसरे को जैसे सवाल करते हुए देखा और बोले : ये क्या है भाई ?

लड़का : साब , अब मैं चलता हूँ !

विक्रम ने थोडा भारी  आवाज़ में लड़के से पुछा : देखो लड़के हम  तुम्हे नहीं जानते और ये कैसे रूपये है हमें नहीं पता लो ये वापस लो और हमें जाने दो !

लड़का : नहीं साब ये आपके ही रुपये है और ये काग़ज़ भी है मेरे पास जिसमे आपने बाबा को इस के बारे में कुछ लिखा था !

कहते हुए लड़के ने एक पीले पड़ चुके लिफाफे को विक्रम कि तरफ बढ़ा दिया !

            लिफाफे को देखते ही जैसे विक्रम और निशान्त अपने आप में नहीं रहे ! किनारे कि दीवार का सहारा ले कर कुछ देर खड़े रहे ! आँखे दब डबडबा रहीं थी और उनमे १० सालों पहले कि यादें काग़ज़ कि नावों कि तरह हिचकोले खा रहीं थी ! मन था कि कहता था कि सब अनोखा है और सच नहीं है लेकिन आखें थीं कि कहती थीं कि सब सच है और यथार्थ है !

       हम असमय मिली चीज़ों के लिए उतने उत्साहित नहीं होते जितना समय से पहले मिल जाने  वाली चीजो के लिए रहते हैं , किन्तु सहेजने कि आदत जब तक आती है तब तक समय निकल जाता है और प्राप्त चीज़ों का अर्थ सामयिक एवं तर्कसंगत नहीं रेह जाता !

दस साल पहले !

     नौचंदी में इस बार नई सर्कस आई है तू चलेगा  , निशांत ने विक्रम से कॉलेज से वापस लौटते हुए पुछा !

विक्रम सायकल से उतर गया और निशांत भी क्यों कि घर पास में ही था और रास्ता सायकल से जल्दी कट जाता फिर मौका कहाँ मिलता है इन सब बातों का !

विक्रम : हाँ , जाने का मन तो है लेकिन पैसे कहाँ हैं !

निशांत : ये ही तो परेशानी है !

विक्रम : फिर नौचंदी और सर्कस भूल जा , चल घर चल !

बेटा अगर तुम मेरा एक काम करो तो मैं तुम्हारे लिए नौचंदी का इंतेजाम कर सकता हूँ ! पास के चायवाले ने दोनों कि बातें सुन कर कहा !

वो कैसे ? : निशांत और विक्रम दोनों एक साथ बोले !

        दो दिन बाद जो इलेक्शन है ना उसमे अधिकारीयों को चाय देने का काम है सिर्फ एक दिन का काम है और वो भी चार फेरों का , तुम दोनों उस दिन मेरा या काम करो तो मैं दोनों को ५० ५० रुपए दूंगा !

विक्रम ने एक पल में हाँ केह दी निशांत ने अगले दिन अपनी माँ से पूछ कर हामी भरी !

         अगले दिन चाय वाले ने दोनों से एक सादे पेज़ पर लिखवाया कि " चाय के गिलास के टूटने पर कीमत हमारे तय मेहताने ५० रुपयों में से काट ली जाये ! "

इलेक्शन के दिन के बाद अगले दिन आने को कहा था चायवाले ने पर दुकान पर नहीं मिला , गाँव चला गया था शायद !

कॉलेज और फिर सेना कि भर्ती परीक्षा दोनों अच्छे से पास करी दोनों ने ! जीवन में कुछ बन जाने कि धुन में कुछ याद नहीं रहा !

सेना में भर्ती , फिर ट्रैनिंग , फिर दूर दूर कि पोस्टिंग्स !

मेरठ जैसे ख्याल में ही नहीं आया ! 
विक्रम  का तो कोई था नहीं खून के रिश्ते में मेरठ में ,अनाथाश्रम के मालिक और इंचार्ज से बीच बीच 
में ख़त लिख कर हाल ले लेता था और निशांत के माँ के देहांत के बाद उसने भी मेरठ से मुह मोड़ लिया था !

लेकिन आज सब कुछ अपना अपना सा लगने लगा था !

मेरठ कि छावनी में पोस्टिंग के दो दिन के समय में दोनों को कभी अपने बचपन कि याद नहीं आयी , पर सब आखों के सामने था ! दोनों दोबारा जी लेना चाहते थे वो ज़िन्दगी !

किन्तु , बीता समय नहीं आता ! 

कहाँ हैं तुम्हारे बाबा : निशांत ने  रूंधे गले से कहाँ !   

लड़का : वो तो बेगम पुल के उस किनारे पर ही तो दूकान है हमारी चाय कि !

निशांत और विक्रम चल दिए अपने पहले मालिक के पास जिसने

कर्मठ नौजवानो का मेहनताना सम्भाल कर रखा और उम्मीद 

जगाई अपने बेटे कि आँखों में कि

   संपर्क निशचल किन्तु भावपूर्ण होने चाहिए ताकि उनके गर्भ में स्वस्थ एवं सम्मानीय भविष्य पल सके !

छावनी के गेट पर हूटर ने आवाज़ लगायी !

निशांत और विक्रम तेज़ कदमो से वापस लौट चले !

एक दम निशब्द !  दोनों के मन बातें करते थे !

मानस अशब्द संवाद समझते थे और आखें भविष्य देखती थी !

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एक कहानी : छावनी  !!             ~~   मनीष सिंह

Tuesday, March 11, 2014

पुराना बूढा पेड़ , सूख गया !

मोहल्ले का,
एक और ,
पुराना बूढा पेड़,
सूख गया !

नगरनिगम के ,
टूटे नल से ,लगातार,
पानी मिलता था ,
फिर भी सूख गया !

कभी-कभी ,
ज़यादा एवं असमय,
कि गयी देखभाल,
ज़हर सरीखी,
हो जाती है !

देखिये ना ,
पानी मिला ,
फिर भी ,
बूढा पेड़ ,
सूख गया !
  

Wednesday, February 26, 2014

एक कहानी : " अबीर "

सर , शुगर कितनी लेंगे ?  

होटल के कमरा नंबर ४०१ में घुटने के बल बैठते हुए वेटर ने पुछा !  

आप ऐसे ही रख दीजिये मैं खुद ले लूंगा  !  

                     शिखित ने खिड़की से आती धुप से आँखे बचाते हुए कहा ,फिर सफ़ेद दूधिया रंग कि मलमली जयपुरी रजाई कंधों तक खीच ली !

       अरे उठिए सर साढ़े आठ बज गए हैं ! चाय भी ठंडी हो गयी आज , रोज़ तो ६ बजे से अब तक २ कप हो जाती थी आपकी ! नहा कर निकले शिखित के जूनियर कुमार ने अपने बालों पर सफ़ेद तौलिया मलते हुए शिखित को उठाने कि असफल कोशिश करी !

       शिखित में कोई हलचल नहीं , बिस्तर पर औंधा पड़ा बाँहों में चेहरा छुपाये सोता रहा !  कुमार ब्रेकफास्ट करने के लिए दूसरे आर्टिकल्स के साथ होटल के बड़े हॉल कि तरफ बढ़ गया जहाँ होटल कि तरफ से कम्प्लीमेंट्री ब्रेकफास्ट अरेंज्ड था ! जाते-जाते वंशिका ने दरवाजे कि आड़ से जल्दी से शिखित को सोते हुए  एक नज़र देख लिया था , जिसे कुमार ने नोटिस किया था !

       दो दिनों पहले ही दिल्ली कि एक बड़ी चार्टेड ऑकउंटेंसी कि कंपनी कि तरफ से शिखित अपने तीन जूनियर्स के साथ यहाँ जयपुर में एक बड़ी कंपनी के ऑडिट पर आया था !उसका ये लास्ट सेमिस्टर था ,इस लिए वो इस टीम का टीमलीडर था !  उसकी इस  टीम में आर्टिकल कुमार ,वंशिका और अरुणिमा थे !

आज तो मेरा फ़ास्ट है , फ़ास्ट का कुछ मिलेगा यहाँ ! वंशिका ने कुमार से बड़ी असहजता से पुछा !

कुमार : हाँ , रुको पुछ लेता हूँ कहता हुआ कुमार मेनेजर कि तरफ बढ़ गया !

तभी वंशिका कि फ़ोन कि बेल बजी !

अरे , शिखित सर कि कॉल : हाँ सर गुड मॉर्निंग ! : वंशिका बोली !

शिखित : वंशिका ,मैंने तुम्हारे आज के फ़ास्ट के लिए मेनेजर से कल ही बोल दिया था , उसने अरेंजमेंट किया है तुम उसके पास चले जाना या कुमार को भेज दो !

वंशिका : ओ , थैंक यू सो मच सर , कुमार मेनेजर के पास ही गया है ! वैसे आपको कैसे पता कि मेरा आज फ़ास्ट है ?

शिखित : ठीक फिर मैं थोड़ी देर में आता हूँ फ्रेश हो कर  , कुछ अच्छी चीज़ हो तो बचा कर रख लेना मेरे लिए ! बाय !

वंशिका ने मुस्कुराते हुए बाय कहा !

कुमार : अरे वंशिका जी आपके लिए तो विशेष वयवस्था है , शिखित सर ने होटल वालों से कल ही बोल दिया था और लो ये देखो सब फ़ास्ट वालों का खाना आ गया ! तुम्हारा खास ध्यान रख रहे हैं इस बार शिखित सर !

वंशिका : अच्छा जी , वैसे भी शिखित सर सब का ख्याल रखते हैं !

कुमार : पांच साल से तो मैं उनके साथ हूँ , तो तुम ज़यादा जानती हो कि मैं , लड़कियों के बारे में तो कभी इतना ख्याली नहीं देखा उनको जितना तेरे बारे में हैं !

      सब गोल टेबल पर रखी नास्ते कि प्लेटों पर पकौड़ियों कि खुश्बुओं के साथ अनोखे आनंद से सराबोर हो चले थे जिसमे मानसिक तौर पर शामिल कोई और होता है और आनंद किसी और के हिस्से में आता है !

दोस्तों , आप समझ रहे हैं ना ? मैं समझ रह हूँ कि आब सब अच्छे से समझ रहे हैं !

कुछ बचा है कि सब ख़तम कर दिया ! शिखित ने कुमार के कंधे पर हाथ रखते हुए पुछा !

आइये सर , सब कुछ है ! अरुणिमा ने कहा !

सर, ये फ़ास्ट वाली चीज़ें तो इतनी सारी हैं थोड़ी शेयर कीजिये मेरे साथ ! वंशिका बोली !

अच्छा जी हम दोनों को तो छूने भी नहीं दिया था और शिखित सर को शेयर वहा वाह भाई वाह : कुमार ने चुटकी ली !

शिखित और वंशिका ने कोई ज़वाब नहीं दिया मुस्कुराते हुए नाश्ता फिनिश किया फिर सब चल दिए काम पर !

दिन भर काम का सिलसिला चलता रहा ! बीच बीच में सब ने नोटिस किया कि शिखित वंशिका के प्रति ज़यादा सचेत था  ! खाने में , पीने में , ऑडिट के लिए जाते समय वो किस के साथ है , कहाँ क्या देखना है का ख़याल खुद रख रहा था ! 

       ऑफिस ले लौटते समय देर शाम को हवाएं सर्द हो चली थीं ! कंपनी कि टैक्सी से सब होटल कि तरफ चल दिए रस्ते में वंशिका ने बताया इस चोराहे के दूसरी तरफ कि गली में मेरे ताऊ जी का मकान है !

कुमार : ओह, छुपी रुस्तम तीन दिन से हमारे साथ जयपुर में है यहीं से आती जाती है और आज बता रही है कि तेरे ताऊ जी रहते हैं यहाँ !

अरुणिमा : ये ठीक नहीं है वंशिका !

कुमार : चलो आज इसके ताऊ जी को सरप्राइज़ देते हैं !

वंशिखा : नहीं !

शिखित : क्यों ?

वंशिखा : पापा को अच्छा नहीं लगेगा !

अरुणिमा : क्यों क्या हुआ ?

शिखित : ठीक है , चलो जाने दो फॅमिली इशू होगा हमें नहीं डिस्टरब करना चाहिए !

ओके : कुमार और अरुणिमा ने अपनी सहमति दी !

वंशिखा शायद चाहती थी कि इस  सब्जेक्ट पर आगे बात बढे पर अपने सिनिअर के सामने कुछ मौका नहीं था !

टैक्सी होटल के आगे रुकी शिखित  और कुमार ने उतरते हुए वंशिखा और अरुणिमा से   पुछा  तुम्हारे लिए कुछ लाना है हम  ज़रा अभी आते हैं सामने वाली शॉप से !

नहीं आप हो आइये ! अरुणिमा बोली और रेसेप्शन कि तरफ बढ़ गयी !

डिनर के लिए एक ही टेबल पर इकठ्ठा हुए फॉर्मल ड्रेस में  चारो होटल के बेसमेंट में बने बड़े से हॉल में !

हलकी आवाज़ में पियानो कि धुन बज रही थी ! सब एकदम शांत शांत ! नीली रौशनी में नहाते चमचमते शीशे के गिलास ! सलीके से रखी चम्मच और फोर्क !

यहाँ बैठते हैं एक कोने कि टेबल कि तरफ इशारा करते हुए वंशिका बोली !

हाँ हाँ जहाँ बोलो ! अरुणिमा और कुमार एक तरफ और वंशिखा और शिखित एक तरफ बैठे !

हलके फुल्के मौहोल में खाना ख़तम हुआ !

सौफ खाते हुए सब रेसेप्शन कि तरफ बढ़ रहे थे कि होटल मेनेजर ने आ कर रिक्वेस्ट करी :

सर मैडम कल होली है ! क्योकि कल हम होटल बंद रखते है लेकिन आप सब गेस्ट के लिए हम में से कुछ लोगों को आना होगा लेकिन जो नहीं आ सकेंगे उनके लिए हमने छोटा सा प्रोग्राम रख है आप लोग भी इनवाइटेड हैं , प्लीज़ १० मिनिट्स का समय दीजिये !

वंशिखा ने सब कि तरफ देखा और सब कि हाँ थी !

दर असल ऑफिस में शिखित टीम लीडर होता था पर बाकि समय वंशिखा क्यों ? ये आप खूब समझ रहे हैं !

होली का माहौल ! सुन्दर सुन्दर लोग ! साफ़ साफ़ कपड़ों में बैठे थे  !

इन मौकों पर रिश्ते जिन पर कोई रंग नहीं चढ़ा होता , सुर्ख रहते हैं उनको अवसर मिलता है !

रंगीन हो जाने का , तृप्त हो जाने का !

रिश्तों के बंधन का और सुलझन का भी !

दो टेबल्स पर अबीर और गुलाल काँच कि प्लेट्स में सजा कर रखे थे !

मेनेजर ने सब के माथे पर अबीर  लगा कर होली कि शुभकामना दी !

कुमार और अरुणिमा ने एक दूसरे को अबीर लगाया शिखित को वंशिखा ने अबीर लगाया !

रिश्तों अनाम , अनकहे शब्द में  रंगीन हो चले ! 

             दूरियों के द्वार पर करीबियत गुलाल और अबीर के माध्यम से आवाज़ लगाती थी , दूसरी तरफ दोनों के भीतर बैठा आगंतुक रास्ता तकता था कि कब निमंत्रण मिले !

        होली के गुलाबी अबीर कि खुशबू और कोमल सपर्श ने सब कितना  आसान कर दिया, सम्माननीय और विनयपूर्ण तरीके से !

कल ताउजी के घर चलेंगे हम सब : वंशिखा ने कहा , शिखित जैसे उछल पड़ा !

बहुत कठिन है मन मुताबिक चित्र उतार पाना जीवन के सफ़ेद कैनवास पर , होली के गुलाल और अबीर कभी कभी साथ दे जाते हैं , रंगीन रहने के संदेशे के साथ !

सब एक रंग के अबीर में रंगे दूरियाँ मिटाती होली में मशगूल थे !

            दिन कि बढती मलमली धूप में शिखित जीवन के नये रंगों के आनंद में था और उसके हाथों पर लगा अबीर सुर्ख होकर रिश्तों में तरलता ढूँढ रहा था ,तो  वंशिखा  गुलाल - अबीर में लिपटी अपनी अंगुलियों से  दो दिनों के अनुभवों में दोनों का रंगीन भविष्य तलाशती  थी !!

अबीर और गुलाल चेहरों से दूरियों के नक़ाब हटाने में मशगुल थे , हाथों हाथ सफ़र करते हुए   !!


आपका : मनीष सिंह

Friday, February 21, 2014

एक कहानी : " अलविदा "

          अपने साथी डाक्टर्स के साथ हॉस्पिटल के केफेटेरिया से  " प्राचीर "  जल्दी जल्दी लॉबी से होता हुआ मेन गेट कि तरफ बढ़ रहा था ! बीच-बीच में नीचे कि तरफ बाकी डाक्टर्स कि तरफ भी देखता जाता था जो सुबह से सांकेतिक हड़ताल पर थे  और मेन गेट पर इक्कट्ठा थे !
      
अरे , आप यहाँ ?

प्राचीर ने एक ४०-४५ साल कि महिला से पुछा जो लॉबी में पड़े सरकारी लम्बे से लकड़ी के तखत पर बैठी थी !

कोई जवाब नहीं मिलने पर प्राचीर ने फिर से पुछा :

आभा दी आप यहाँ क्या कर रही हैं ? क्या हुआ है आपको ?

कोई जवाब नहीं मिला तो प्राचीर के बाकि साथियों ने भी उस महिला के पास आ कर पुछा आपको क्या तकलीफ है मैडम ?

सर , ये बोल नहीं सकती और सुनाई भी कम देता है ! पानी कि बोतल में सरकारी ठन्डे पानी को भर कर लाता हुआ एक १२ - १३ साल का लड़का बोला जो जल्दी जल्दी उनकी तरफ चला आ रहा था !

प्राचीर : तुम कौन हो ? क्या नाम ?

जी मेरा नाम अतुल है और मैं मौसी कि सहेली का बेटा हूँ ! मेरी माँ और मौसी दोनों एक ही एन जी ओ में काम करते हैं !

प्राचीर : कब से बीमार हैं आभा दी ?

अतुल : पता नहीं , मुझे तो आज माँ ने कहा कि ले जाओ हॉस्पिटल ! पर सर आप कैसे जानते हैं इनको ? क्या ये पहले भी आपके पास इलाज कर चुकी हैं ?

प्राचीर ने कुछ सम्भलते हुए अपने दूसरे साथियों से कहा : स्ट्रेचेर मगवाओ जल्दी !

अतुल और बाकि साथियों ने प्राचीर कि आभा दी को आई सी यू में पहुँचाया ! ड्यूटी पर मौजूद नर्स ने जब एडमिशन फॉर्म भरने के लिए आभा जी डिटेल्स जाननी चाही तो अतुल वहाँ नहीं था ! रुपेश ने बताया कि अतुल बोल कर गया है कि आभा दी का दुनिया में कोई नहीं है और वो अतुल और माँ  के साथ ही वो रहती थी अब वो वापस जा रहा है सुबह आएगा !

नर्स : सर आपने  बिना  किसी  इनफार्मेशन  के  इस  पेशेंट  को  एडमिट  कर  लिया  और  बेस्ट  ट्रीटमेंट भी शुरू करवा दिए हैं अब में कैसे बाकि कि फॉर्मलिटीज़ पूरी करू ?

प्राचीर : लाइए एडमिशन फॉर्म और बाकि के पेपर्स मुझे दीजिये , थोड़ी देर में मुझ से ले लीजियेगा !

शाम के ७ बज रहे थे !

सूरज कि किरणे चन्द्रमा के लिए रास्ता बुहार रहीं थी !

बाहर हवायें हलकी ठंडी हो चली थी  लेकिन आभा दी का माथा अभी भी आग उगलता था ! 

नर्स ने ब्लैक कलर का पेन प्राचीर कि तरफ बढ़ाते हुए कहा : कॉफी लेंगे सर ?

प्राचीर ने पेन लेते हुए हल्की सी मुस्कराहट से हामी भरी !

सुबह के ११ बजे से शाम के ७ बजे तक वो लगातार अपनी आभा दी के साथ था ! जहाँ जरूरत पड़ती थी स्पेशलिस्ट को बुला लेता था !

थोड़ी देर में नर्स ने दो कप कॉफी ले कर दरवाज़े पर दस्तक दी !

प्राचीर : अंदर आजाइए !

नर्स : लोजिये सर !

प्राचीर : अरे , आ खुद ले आयीं !!

नर्स ने पास पड़े एडमिशन फॉर्म और बाकि परमिशन फॉर्म्स देखे सब प्राचीर ने भर दिए थे ! 

आभा दी को अपनी बड़ी दीदी और खुद को उनका छोटा भाई बताया था ! पता अपने घर का दिया था !
रिफरेन्स में अपने पिता का नाम लिखा था ! परमिशन फॉर्म पर खुद सिग्नेचर कर थे !

प्राचीर : कुछ बाकि है सिस्टर ?

नर्स ने एक नज़र प्राचीर कि तरफ देखा और कहा नहीं सर !

दी ठीक हो जायें सब को सब बता दूंगा सिस्टर !

प्राचीर ने एक अद्र्श्य प्रश्न का उत्तर दिया !

नर्स ने अपराधबोध से अपनी गर्दन बाईं तरफ हलके से मोड़ दी !

तुम आज घर नहीं आओगे ?

प्राचीर : नहीं माँ , आभा दी को अभी होश नहीं आया है ?

आभा ? तुम कहाँ हो ? प्राचीर कि माँ ने फोन पर पुछा !

माँ अपने हॉस्पिटल में ही हूँ और आभा दी के पास ही हूँ !

ठीक है हम आते हैं , प्राचीर कि माँ बोली !

प्राचीर के आँखे डबडबाई हुई थी ! आभा दी के शरीर में कोई हलचल नहीं थी अभी भी !

सर आप भी थोडा आराम कर लीजिये हम हैं यहाँ ! प्राचीर के साथी रुपेश और जलज ने प्राचीर के कन्धों पर हाथ रखते हुए कहा !

     बस , ऑखें छलक गयी प्राचीर कि , वाशरूम कि तरफ बढ़ता हुआ लगभग रोने लगा था वो !
कुछ देर में बाहर आया तो बाकि साथी भी आ चुके थे !

जलज : सर, अभी डाक्टर बेनेर्जी आये थे और कहा है कि अगले १ घंटे में अगर कुछ डेवलपमेंट नहीं हुआ तो ट्रीटमेंट चेंज करंगे !

प्राचीर ठीक है कहता हुआ आभा के सिरहाने जा कर बैठ गया ! आभा दी का हाथ अपने हाथों में लेता हुआ बोला सिस्टर कमरे कि सारी लाइट्स ऑन कर दीजिये प्लीज़ !

डॉ.रुपेश , डॉ.जलज , डॉ.नयन , डॉ.कुणाल और सिस्टर नंदिता सब प्राचीर को देख रहे थे !

बाहर अँधेरा गहराता जाता था और कमरे के भीतर सन्नाटा !

       जब कोई ५ साल का था तब आभा दी से पहली बार मिला था मैं ! अपने घर के सामने वाले पार्क में दो ग्रे रंग के बॉक्स ले कर बैठी थी वो और पार्क के किनारे पर पीले रंग का एक कपडे का बेंनर लगा था " पल्स पोलियो रविवार " दो बूँद ज़िदगी कि !

प्राचीर अपनी आभा दी का हाथ पकडे पकडे बोलता जा रहा था !

       माँ ने मुझे और मेरे चचेरे भाई को आभा दी के पास से दो बूँद दवा पिलवाई थी  ! दीदी ने मेरी नन्ही सी छोटी उंगली पर एक नीला सा निशान लगाया था और हम दोनों को एक एक प्लास्टिक कि सीटियाँ दी थी ! दिन भर उछलते फिरे थे हम सीटियां बजाते हुए !

कमरे के सन्नाटे को जैसे हलकी सी चपेट पड़ी हो , सब के चेहरे मुस्कुरा रहे थे !

           हर महीने , दो महीने में आभा दी आ जाती थीं पार्क में और मेरी माँ मुझे हर बार दवा पिला कर लाती थी ! जब में बड़ा हुआ तो तो मैं छोटे बच्चो को दी के पास ला कर दवा पिला देता था और सीटियां बांटता था ! वैसे तो दी अपने साथ अपना लंच लाती थी लेकिन कभी कभी में माँ या चाची कभी चाय और नाश्ता मुझे देती थी दीदी को देने के लिए ! घर पर भी आकर बैठ जाया करती थी दी ! एक बार दी को मैंने साड़ी पहने देखा हाथों में भरी भरी चूड़ियाँ , मांग भरी हुई - शादी हो गयी थी दीदी कि !
         जब मैं छोटा था तब वो शायद स्कूल में पढ़ती थी तो सूट सलवार में आती थी ! फिर मेरे इंटरमीडिएट कर लेने के बाद एक रोज़ पता चला  कि आभा दी के पति का रोड एक्ससीडेंट में देहांत हो गया , दूसरी वाली आंटी ( अतुल कि माँ ) मेरी माँ से बता रही थी ! फिर उसके बाद कभी नहीं देखा दी को बस अचानक आज यहाँ मिला हूँ !

कैसी है आभा अब ? प्राचीर कि माँ ने अंदर आते हुए पुछा !

      प्राचीर सिरहाने से उठकर माँ के पास जाने लगा तो आभा कि हलकी पकड़ से वो अपना हाथ छुड़ा नहीं सका !

      जैसे गीली हो चुकी अपनेपन कि मिटटी से दूरियों का पानी निचुड़ चूका था और बंधन अपनी आभा पर था , आस यथार्थ में परिवर्तन होना चाहती थी !

डॉ.बेनेर्जी को बुलाओ दी को होश आ रहा है  : प्राचीर ने कहा !

दी आप मुझे सुन सकती हो ? प्राचीर ने आभा से पुछा !

आभा ने सर हिलाया और जैसे कहा कि तुमने जो भी कहा मैंने सब सुना बेटा !

कमरे में  चेहरों पर ख़ुशी थी !

        आभा ने सबसे पहले प्राचीर  को अपना माथा नीचे करने का इशारा किया और चूम लिया !

असीम संतोष ,  अलौकिक आनंद ,  प्रगाढ़ स्नेह ,  निःस्वार्थ समर्पण दोनों तरफ से !

    सब आनंद मूर्तियों से खड़े निःशब्द कमरे में हो रहे मंचन को देख रहे थे , जिस जीवन नाट्य के वो खुद भी पात्र थे !

आभा दी अब आप बिलकुल ठीक हो जाएंगी और फिर हमारे साथ ही रहेंगी !

         प्राचीर कि माँ सोफे पर बैठे बैठे सब देखती जाती थी , सोचती जाती थी उन्होंने तो सिर्फ एक प्राचीर को अपने पैरों पर  खड़ा किया लेकिन आभा ने तो अनगिनत बच्चो को उनके पैरों पर खड़े
रह सकने लायक बनाया और आज वो खुद सहारे कि मोहताज है ! किस ले लिए जिन्दा रही वो अब तक और आगे किस ले लिए रहेगी ?

आभा ने  प्राचीर कि माँ से मिलने के लिए इशारा किया , माँ के हाथो में हाथ ले कर रो पड़ी दोनों !

डॉ.बेनर्जी कमरे में आ चुके थे और बोले :  अब सबको बाहर जाना होगा , प्राचीर तुम अंदर ही रुको !

सब बाहर पड़े सरकारी लकड़ी के तख़्त पर बैठे थे ,कोई खड़ा था !

सब अपने को प्राचीर और आभा दी कि कहानी का एक पात्र मान खुशनुमा अंत कि और बढ़ रहे थे !

रुपेश कि नज़र कमरे के अंदर गयी और चहरे से सारी ख़ुशी काफूर !

            प्राचीर कि आभा दी जा चुकी थी और प्राचीर अपने बचपन ,किशोरावस्था की अनेकानेक
घटनाओं कि खुलती बंधती गाठों में यादों कि खुशबूओं को जीता जाता था ताकि उनकी आभा और बढे अपनी आभा दी को अलविदा कहता हुआ  !

       सही है ज़िन्दगी सिर्फ दो बूंदों कि सी ही है , जीने वाले इसे सागर में तब्दील कर लेते है, जीने के कारण तलाश कर !!

एक कहानी : अलविदा , आभा दीदी !!

Friday, February 7, 2014

एक कहानी : मोमबत्तियॉँ !!

     
        " स्कूल में छुट्टी कि घंटी बजी तो बच्चों कि आवाज़ों का सुन्दर संगीत कानों में घुलने लगा ! "

             सीमा पिछले कई सालों से रोज़ सुबह घर के रोज़मर्रा के काम निबटा कर सामने चारपाई पर बैठी दोपहर होने तक सड़क पर आने जाने वालो को तकती रहती थी ! सर्दी में धुप को साथी बना लेती तो गर्मियों में नीम के पेड़ छाँह कि बंधू हो जाती ! बारिश में पिछले साल कि  तिरपाल सहारा  होती जिसको बाउंडरी कि दीवार पर टिका कर बैठी रहती !

            सब्जी वाले , फल वाले , दूध वाले , प्रेस वाला , सिलेंडर वाला , डाकिया , कोरियर वाला और जो भी मोहल्ले में चक्कर लगता वो सीमा से राम राम कर के निकलता था ! कुछ देर उसके साथ बैठ कर चाय का आनंद भी ले लेते है कुछ लोग ! अभी पिछले बसंत कि तो बात है जब विभोर किसी काम से आया था घर तो माँ के लिए बड़ा सा फ्लास्क ले आया था , बस दिन भर कि बार बार चाय बनाने कि परेशानी से छुट्टी हो गयी थी सीमा कि !

         माँ , माँ !! दरवाजे पर किसी ने जोर से आवाज़ें लगायी !

आज सीमा घर में ही थी , बाहर नहीं बैठी थी !

सीमा : हाँ कौन है ?

मैं रोहित हूँ नानी !

१५ , १६  साल के एक लड़के ने बाहर से ज़वाब दिया !

सीमा : रुक  आती हूँ कहते हुए दरवाज़ा खोल दिया !

नानी आज आप बाहर नहीं बैठी हैं चारपाई पर ?

रोहित ने अपने साथ एक और लड़के का हाथ पकड़ते हुए सीमा से पुछा !

सीमा : मेरी कमर में दर्द है आज इस लिए चारपाई नहीं बिछा सकी !

रोहित : हम बिछा देते हैं !

सीमा ने अचानक हुए इस प्यार भरे सम्बोधन को डबडबाई आखों से स्वीकार करते हुते हामी में सर हिला दिया !

सुनेहरी धूप में उज्जवल भविष्य ढलकते बुढ़ापे को सहारा दे  रहा था , अदभुद मंजर !

रोहित : आइये नानी बैठिये !

सीमा ने दूसरे लड़के के कंधे का सहारा लेते हुए चारपाई पर खुद को टिका दिया और रोहित से कहा !

अन्दर जाओ और चाय का फ्लास्क ले आओ , भरा है और गर्म भी सम्भाल कर लाना ! दो कप भी लाना !

फिर दूसरे लड़के से बोली - भीतर पलंग पर मेरी शाल राखी है लेते आओ , ठंडक है बाहर !

रोहित : नानी कप में निकाल दूं चाय आपके लिए ?

सीमा : हाँ मुझे इस गिलास में दो और तुम दोनों कप में ले लो !

विराट : नानी लीजिये ! सीमा कि ओर शाल और तकिया बढ़ाते हुए बोला !

सीमा : आ जाओ बैठो मेरे पास और बताओ कि तुम कौन हो ? कहाँ रहते हो ? पहले तो कभी नहीं देखा इधर लेकिन तुम दोनों कि स्कूल ड्रेस तो पास वाले स्कूल कि सी हैं ?

रोहित अभी कुछ बोल पता कि स्कूल कि घंटी बज गयी !

अच्छा नानी अभी जाते हैं , कल आएँगे !

कहते कहते  दोनों हाथ हिलाते हुए जल्दी जल्दी स्कूल के गेट कि तरफ बढ़ गए !

सीमा उम्मीद कि रंग बिरंगी मोमबत्तियों को आकार लेता देख रही थी !

माँ कुछ सब्जी दे दूं आज , साग एकदम ताजा है !

सब्जी वाले ने एक गट्ठर में चने  सरसों और मेथी रख दी !

फल वाले से आज सीमा ने कुछ सेब खरीदे , अंगूर लिए और अनार भी , सब के सब ताजे कल के लिए !

दूधवाले से भी कुछ दूध ज़यादा लिया और कल कुछ पनीर लाने को कहा !

शाम को प्रेस वाले से बोल कर दो मफ़लर मंगवाए पास के ही नए खुले मॉल से चकट रंग के !

दिन बीत रहा था ,  आज भी डाकिया चिट्ठी नहीं लाया !

शाम को अपने घर लौटते हुए सीमा के पास बैठ कर भारी मन से चाय पीते हुए बोला : माँ क्या विभोर अब बिलकुल नहीं आता ?

           सीमा अंदर तक सकपका गयी ! बेटे कि कमी और बेरुखी कि मार से ज़यादा चोट पहुचाने वाली थी ये बात कि समाज में न पता चले कि सबकुछ ठीक ठाक नहीं है , जैसा कि दीखता है ! वो ऐसे दुखी और परेशान होती थी जैसे विभोर ने उसको अकेला छोड़ कर अपराध उसने नहीं खुद सीमा ने किया हो !

सीमा : नहीं ऐसा नहीं है , अभी पिछले साल ही तो आया था ! तुम चो गरम चाय के आनंद ले रहे हो अगर मेरा बेटा ये फ्लास्क ना दे जाता तो ठंडी चाय ही पिलाती तुमको !

        डाकिया एक एक शब्द सुन कर ऐसा एहसास कर रह था जैसे खौलते पानी कि भाप !
        जैसे भीतर ही भीतर असंतुष्टि कि  ज्वाला से सम्बन्ध धधक रहे हो और उनको जकड कर रखने कि कोशिश में भाव रोज़ रोज़ कर के भाप हो रहे थे ! 

अच्छा माँ अब चलता हूँ , कुछ लाना है बाजार से तो बोलिये कल लेता आउंगा !

सीमा : हाँ ये अच्छा याद दिलाया तुमने रुको दो चीज़े लानी हैं !

     कुछ रूपए डाकिये के हाथों पर रखते हुई बोली : जो अच्छा सा पेन लगे दो ले लेना और साथ में दो अच्छी वाली चाकलेट भी लेकिन ये सब मुझे कल ११ बजे से पहले चाहिए सुबह !

डाकिया अपने रस्ते चल दिया ,हाँ कहता हुआ !

       दिन भर इसके उसके आने जाने से अकेलापन पास नहीं फटकता लेकिन रात के सन्नाटे में गहराती जाती अकेलेपन कि चुभन खुद को सांस लेने से रोक लेने तक को मजबूर कर देती थी सीमा को हर रात , लेकिन आज ऐसा नहीं था , कल कि ख़ुशी में वो दोनों फिर जो आने वाले थे उसको मिलने !

अगली सुबह !
माँ आज खबर के लिए दूसरा अखबार है , वो जो आप पढ़ती हैं नहीं मिला मुझे - अखबार वाले ने आवाज लगायी सुबह सवेरे !

सीमा अंदर से ही बोली , ठीक है जो है वो ही दे दो !

आज जैसे घडी कि सुइयाँ सर्दी में काँपते बैलों जैसी हो गयी थी , आगे सरकना मानों पहाड़ चढ़ना हो गया हो ! 

चाय फ्लास्क में भरते हुए काम करने वाली ने अपनी चप्पल पहनते हुए पुछा : माँ चारपाई बहार बिछा दूं ?

सीमा : नहीं , वो आएँगे ना !

कामवाली : वो, कौन ?

सीमा मुस्कुराते हुए - रोहित और उसका दोस्त !

कामवाली ने भी हंसते हुए कहा अच्छा स्कूल के बच्चे होंगे ?

सीमा ने कहा हाँ , मुझे आशुतोष जैसे ही लगते हैं , आज वो भी इनकी ही तरह का हो गया होगा !

कामवाली ने जवाब में कहा पता नहीं माँ जब दीदी कार में बैठ रहीं थी १५ साल पहले तो मैंने ही उनकी गोद में दिया था आशुतोष को अब कहाँ पलट कर देखा उन लोगो ने हमें ! मैं चलती हूँ नहीं तो फिर परेशान हो जाओगी आप पुराणी बात सुन कर !

सीमा घडी देखती जाती थी कि कब ११ बजें और स्कूल कि आधी छुट्टी हो और वो आयें !

नानी , नानी !

हाँ अंदर आ जाओ रोहित - सीमा ने अंदर से कहा !

नहीं आप बाहर आइये - रोहित बोला !

सीमा हाथो से चश्मे को सम्भालते हुए दरवाज़े कि चौखट पर गयी और देखा तीन बच्चे खड़े थे !

रोहित उसका दोस्त जो कल भी साथ था और एक और नया साथी !

सीमा : अरे भाई बाहर क्यों खड़े हो अन्दर तो आओ !

रोहित : नानी आप ने कुछ पहचाना ?

सीमा : हाँ तुम रोहित हो और ये तुम्हारे दोस्त जिसमे से कल भी आया था !

तभी नया वाला लड़का सीमा के पास आया और अमरलता सा लिपट गया सीमा से !

सीमा स्तब्ध् !!

उसको चिपकाये चिपकाये उसने रोहित और दूसरे लकड़े को अंदर आने का इशारा किया और पलंग पर बैठ गयी पूछते हुए : क्या हुआ बेटा ?

रोहित : नानी ये आशुतोष है !

सीमा जैसे बर्फ़ कि सी हो गयी थी , ये सुन कर !

एकदम ठंडी !

एकदम जड़ !

एकदम खुश्क कोई भाव नहीं चहरे पर !

पलकें खुली कि खुली !

हाथों कि अंगुलियाँ गोद में सर रखे आशुतोष के बालों में अटकी रेह गयी थीं !  अब कुछ नहीं बाकि रहा !

नानी क्या सोच रही हैं ? रोहित ने सीमा के कन्धों पर हाथ रखते हुए पुछा !

सीमा ने अपना माथा रोहित कि छाती पर टिका दिया और हाथो से कस कर पकड़ लिया उसको कि फिर धूमिल न होने पाये रे रौशनी जो बरसों के बाद आज देखने को मिली हैं उमीदों कि मोमबत्तियों में !

आशुतोष ने गोद में सर रखे रखे ही आवाज लायी - मम्मी आप भी आ जाईये !

चोखट पर आशुतोष कि माँ ( विभा ) ने परदे को हटा कर कदम रखा ! अब सीमा के गले से आवाज़ रोके से नहीं रुक रही थी ! तेज़ आवाज़ में रो पड़ी दोनों !

लगता था जैसे कितने ही समदर, कितनी रुकी हुई नदियां बहाव का कारण तलाशते हुए सीमा के घर में आ मिले थे !

रोहित ने आशुतोष और सीमा से विदा लेने को बाय कहा !

आशुतोष ने हाथ पकड़ कर रोक लिया उसको !

सीमा ने सब कुछ रख दिया रोहित के सामने जैसे देवता को अर्पण कर रही हो !
         
            विभा कहने लगी : माँ विभोर के विदेश जाने के बाद मुझे ट्रान्सफर मिल गया यहीं केंद्रीय विद्यालय में ! क्योकि मुझे प्राइवेट स्कूल में ही पढ़ाना था आशुतोष को तो आपके घर के बगल वाले स्कूल में दाखिला दिलवाया लेकिन उसको कभी भी आपके बारे मे नहीं बताया !
         
            परसों रोहित और उसके दोस्तों ने ज़िक्र किया था आपके बारे में और कल  आपके पास आये भी थे फिर यहाँ नयी जगह पर दोस्तों के नाम पर ये दोनों ही इसके दोस्त बने और मुझ तक बात आयी और मुझे भी इतने दिन से आप सब दे दूरी ठीक नहीं लग रही थी ! इस लिए  मैंने इन दोनों और आशुतोष को आपके बारे में बताया और साथ आ गए आज आपके पास !

           सेब और अनार रखे हैं अंदर जा ले आ , डाकिया से दो चाकलेट मंगवाई थी वो भी लेती आना फ्रिज से निकाल कर ! सीमा ने रूधे गले से कहा !

           दो पेन और मफ़लर रखे हैं रोहित और उसके दोस्त के लिए !

दादी आज हम जन्मदिन मनाएंगे शाम को सब का  - आशुतोष बोला !

सीमा ने आशुतोष कि टी शर्ट के कलर को ठीक करते हुए पुछा - मोमबत्तियाँ कितनी लगाएगा ?

ढेर सारी दादी हर बिछड़े साल कि !

हम पहली बार जो मिले हैं !

तभी डाकिया ने आवाज़ लगायी ! - माँ

हाँ आऒ , अंदर ही आ जाओ !

माँ , आपकी आज भी कोई चिट्ठी नहीं आयी है !

भाई अब कोई इंतज़ार नहीं चिट्ठियों का , पर तुम शाम को आ जाना हम मोमबत्तियॉँ जलाएंगे !

अकेलापन कोने कोने अँधेरा ढूँढता जाता था और मोमबत्तियों कि  रौशनी ,  अपनापन  !!

Sunday, February 2, 2014

परछाइयों से .....

पूर्वाह्न से,
चल कर,
मध्याह्न तक,
सिमटते हैं हम,
परछाइयों से,
आस पास धधकते,
सम्बन्धों सरीखे,
खिलते,
फिर बिखरते,
सूरजों के सहारे !!

अपराह्न के,
प्रारब्ध से,
खुलती हैं गांठे,
रिश्तों कि,
फिर, बढ़ जाते हैं,
परछाइयों से,
परेशानियों सरीखे,
डूबते सूरजों के साथ,
ढलते ,
रिश्तों कि,
शामों के सहारे !! 
  

Wednesday, January 29, 2014

एक कहानी : ये आकाशवाणी है !!

                         " ये आकाशवाणी है , अब आप नवीन कुमार से समाचार सुनिये ! "

            सरकारी नौकरी ,सरकारी गाड़ी ,सरकारी ठाठ बाट और समाज में प्रतिष्ठा सब थे नवीन के पास किन्तु उसे गाहे बगाहे लगता था कि ये सब  किस काम का ? रोज़ आकाशवाणी भवन से अपने घर और घर से फिर पास के ढाबे वाले के पास जाने के रास्ते  में ये सोचता जाता था !

मैं किसके लिए हूँ ?

क्यों कर रहा हूँ ये सब ?

क्या है मेरा संसार ?   

कार में पड़े अखबार को देखता जा रहा था सोचते सोचते !

शाम के साढ़े सात बजते होंगे !

नवीन सात बजे का बुलेटिन पढ़ कर सरकारी गाड़ी से ढाबे कि तरफ चल दिया !

समाचार बाबू आज क्या खायेंगे ? ढाबे वाले सरदार जी ने बड़े अदब से कार से उतरते हुए नवीन से पुछा !

     नवीन ने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया : सरदार जी आज सर में हल्का सा दर्द है , एक कप चाय पिला दीजिये पहले , खाना फिर जो आप खिला दें ! अगला बुलेटिन रात ११ बजे पढ़ना है ,बहुत टाइम है !

हाँ हां , अभी लो  कहते हुए सरदार जी ने खुद चाय का बर्तन उठा लिया !

अमूमन उनके ढाबे में काम करने वाले बहुत से लड़के ये सब काम देखते हैं और सरदार जी केवल गल्ला सम्भालते हैं !

नवीन को प्यार जो करते हैं तब से जब वो हाफ नेकर में उनके पास तंदूरी रोटियां सिकवाने आया करता था !तकरीबन १५ सालों पहले अपनी नानी के साथ ! अब ना तो नहीं रहीं और ना माँ ! 
पिता का साया बचपन में नहीं रहा , माँ ने दूसरी शादी कर ली ! घर को किराये पर दे दिया और नवीन को पास के होस्टल में रख छोड़ा ! होस्टल का खर्च कनाडा से ही भेजती रहती थी कुछ सालों तक ! जब वो बंद हो गया तो सरदार जी ने नवीन का साथ दिया , अब भी दे रहे हैं !

जनवरी के महीने कि सर्द शाम ,हवा और धुंध के साथ सर्द हो चली थी !

तभी , दूर बैठे एक साधू ने नवीन से अपने पास आने को कहा !

नवीन : आप मुझे बुला रहे हैं बाबा ?

साधू : हाँ बेटा !

नवीन साधू के पास जा कर चारपाई पर बैठ गया और बोला : जी , बाबा !

साधू : सर में दर्द कब से है ?

नवीन : बस सुबह से ही है , आज दिन भर थोड़ी थकावट भी रही !

साधू : अरे बेटा रोज़ सवेरे तुम्हारी आवाज से हमारा दिन निकलता है ! दिन दुनिया कि खबर लगती है ! संसार में क्या चल रहा है सब पता चलता है ! चाहे कही भी रहे , यहाँ या फिर हरिद्वार , तुम से जुड़े रहते हैं ! ऐसा लगता ही नहीं कि हम किसी को नहीं जानते ! सब दुनिया हमारी है , ऐसा ही एहसास रहता है ! एक तो तुम्हारी आवाज़ इतना अपनत्व लिए है और फिर तुम समाचार ऐसे पढते हो कि हर सुनने वाले को लगता है कि उसके ही लिए पढ़ा जा रहा हो !

नवीन मुस्कुरा रहा था और बार बार अपने सर पर हाथ रखता जाता था , दर्द के कारण ! साधू बोलते जा रहे थे !

अभी कल ही मैं हरिद्वार से लौट रहा था , गाड़ी में लगे रेडिओ पर तुम्हारी आवाज़ सुनी सब संसार के समाचार मिल गए वर्ना चार दिन से गंगा किनारे धुनि रमाये कहाँ कुछ खबर थी !

नवीन ने बाबा को टोकते हुए पुछा : बाबा आप तो साधू हैं , फिर संसार कि खबर आपके किस काम कि होती होगी ?

साधू हल्का मुस्कुराते हुए बोले : बेटा जब कोई ये कहे कि मैं संसार से दूर हो रहा हूँ समझो और करीब आने कि कोशिश में है ! क्यों कि वो याद रखता है कि उसको संसार से दूर रहना है ! एक विज्ञापन भी आजकल सुना है मैंने " जितना दूर जाओगे , अपनों के उतने करीब आओगे ! "

नवीन अपना सरदर्द भूल चूका था ! चाय कि चुस्कियों का आनंद लेते साथ एफ एम् पर चले पुराने गानो कि धुन के शाम को और लम्बा होने इच्छा जगा रही थी लेकिन घडी कि सुइयां कहती थीं कि समय के साथ चलो !

ये कप ले के जाऊं नवीन भैया ? छोटे लड़के ने नवीन से पुछा !

नवीन जैसे चलती ट्रेन में अचानक लगे झटके के साथ काँप गया और बोला : हाँ हाँ , कप रख कर मेरे पास आना !

कॉलसेंटर में काम करने वाले कुछ बच्चों कि दो गाड़ियां रोज़ कि तरह ढाबे पर आ कर रुकीं !
हंसी ठहाके ,महंगे महगे मोबाइल ,टेबलेट ,लैपटॉप और सब सुख सुविधाओं वाली चीजों के साथ 
सब ५ रुपये वाली चाय का आनंद ले रहे थे ! संसार कि सारी कीमती चीजें एक तरफ और जनवरी कि सर्द शाम में ढाबे कि ५ रूपए कि चाय एक तरफ होती है लेकिन उनके लिए ही ,जिनका संसार होता है !

नवीन के लिए या सब बे मानी था !

         तीन सालों पहले हुई शादी ! संतान सुख नहीं ! पिछले ६ महीनो से वाईफ मायके में रह रही थी ! मैं और तुम का झमेला ! बस और  कुछ नहीं !
         तभी उन किशोरों में से किसी ने सरदार जी को नवीन से बात करते सुन  लिया और पहचान गए कि वो रेडियो कि आवाज़ वाला नवीन कुमार है !

        बस फिर क्या था अकेलेपन और सन्नाटे से घिरे नवीन के इर्दगिर्द रंगबिरंगे कपड़ों में अब नए लडके लड़कियां खड़े थे !

सर , हम भी आपकी बुलेटिन और दूसरे कार्यकम रेडिओ पर सुनते हैं !  

बल्कि हमारी ट्रैनिंग में कई रेडियो के सीनियर ने हमें टिप्स दिए थे !

आज आप से रूबरू होने का मौका है तो प्लीज़ हम को कुछ गाइड कीजिये !

नवीन अचानक से जैसे सन्नाटे भरी सड़क के सुनसान रस्ते से निकल कर  खचाखच लोगो से भरे गली मोहल्ले में पहुच गया था , ऐसा सोचने लगा और बोला :

देखो दोस्तों तुमलोग मुझसे क्या सीख सकते हो, मैं तो सिर्फ वो पढता हूँ जो मुझे पढ़ने को कहा जाता है लेकिन तुम लोग तो सामने वाले कि समस्या का समाधान करते हो , वो भी सुन्दर तरीके से साफ़ आवाज़ में !

ये सुनकर एक लड़का बोला :लेकिन अपने सही नाम से नहीं ,

आप को आपके नाम से सब जानते हैं सर पर हमें कोई नहीं ! फर्क है !

नवीन : तो फिर एक बात ही शेअर कर सकता हूँ कि जब आपके पास अपना कोई ना हो , हो भी तो दूरी बनाये हुए रहे तब संसार के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए ,
उनके लिए जिनको आप न जानते हों और वो जो आपको ना जानते हों ! रिश्ते जन्म लेंगे किन्तु सीमित समय और दायरे में जो अंतहीन दर्द नहीं देंगे ,

और फिर ये कशिश आपकी आवाज़ में उतरेगी जिसे हर सुनने वाला अपने लिए ,

कहा गया समझ कर आपको याद रखेगा !

नवीन कि आवाज़ सघनता से हर एक के कान में सरक रही थी !

ठंडी हवाओं के झोके एक दूसरे को और करीब ला रहे थे नवीन बोलता जा रहा था  , बे सुध निरंतर कि अचानक सरदारजी ने आवाज़ लगायी :

बच्चो आप सब को देर हो जाएगी और समाचार बाबू को भी तो रात का बुलेटिन पढ़ना है !
लो एक एक कप चाय मेरी तरफ से पियो और काम पर चलो !

नवीन का संसार कितना बड़ा था ये उसे आज खबर लगी ! एक घर ! एक स्टूडियो ! एक ढाबे के सिवाय !

वो जो उसको छोड़ कर दूर चले गए हैं उनका दुःख तो है लेकिन समय के साथ दूरियाँ करीबियत में बदलती हैं , ऐसा विश्वास है !

कुछ ही देर में नवीन स्टूडियो में था , टेक्नीशियन के ओके का इशारा मिलते साथ उसने अपनी आवाज़ का परिंदा संसार के मानस पर लिख देने को " सदैव समर्पण " माध्यम चाहे जो हो !

ये आकाशवाणी है , रात्रि के ११ बजने को हैं     , कल सबेरे फिर मुलाक़ात होगी ……… शुभरात्रि !!