Tuesday, September 3, 2013

बच्चों की हथेलियों में !!

बचपन ,
चला गया,
जैसे हरश्रिंगार,
बिखर जाता है ,
ओस संग,
धरती पर !

महक रह जाती है,
देर तक ,
स्कूल जाते,
बच्चों की हथेलियों में !

वो रास्ते पर,
खड़ा पेड़,
याद रहता है,
दिन बा दिन,
वयस्क होते हुए !

Saturday, August 24, 2013

... संबंधों की सीपियाँ !!

घंटों ,दिनों 
महीनो में,
निरंतर ,
घटता जा रहा हूँ ,मैं,
 और शायद,
तुम भी !

वर्ष दर वर्ष,
जन्मदिवस,
सालगिरह,
याद रखते हैं,
हमारी इस ,
गतिशीलता को !

जैसे 
संबंधों की सीपियाँ,
सहेजती हैं,
नवजीवन,
स्वयं को,
घटाते हुए,
खुल कर,
 बिखर जाने तक !!

                                                                                                             :: मनीष सिंह 

Thursday, August 15, 2013

उधार पर लिए, तिरंगे बेच कर !

आज के लिए,
वो कल,
जल्दी सोया,
भूखा ही !

विकास पथ पर,
लाल बत्ती पर,
चौक के,
फास्ट फ़ूड के पास !
हम सब ने,
उसे देखा,
अनदेखा ,
करते हुए !

उधार पर लिए,
तिरंगे बेच कर,
जीवित रखने के लिए
स्वतंत्रता को ,
प्रयासरत !

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं !

: मनीष सिंह 

Sunday, August 4, 2013

संभावनाओं पर, पीढ़ियों के लिए !!

संम्पन,
होते जीवन,
निभाते हुए,
सभी , दायित्व !

प्रश्नचिन्ह , 
छोड़ जाते हैं, 
संभावनाओं पर,
पीढ़ियों के लिए !

आगामी,
जनमते, दायित्त्वों,
के सुगम ,
निर्वहन पर !


Friday, August 2, 2013

... आपकी उन्नति में बाधक हो सकता है !!

       मैंने ,आपने और सबने अपने मोहल्ले , गाँव , शहर में कहीं न कहीं जरूर देखा होगा ! तो ज़रूर कभी अपने अपनी छोटी बड़ी , लम्बी , बहुत लम्बी यात्राओं में कहीं देखा होगा ! 

     कभी आप घूमने जा रहे होंगे तो रस्ते में ठंडा पानी , गरम चाय पीने के लिए कभी रस्ते में रुके होंगे तो ज़रूर देखा होगा !  एक बड़ा बरगद का पेड़ ! 

     जिसकी छाया में सब अपनी अपनी जगह पाते हैं ! दूकान वाला अपनी दूकान चलता है ! कोने में लगे सरकारी टेलीफोन से लोग अपनों को फोन कर लेते हैं ! चलते चलते थक चुके लोग कुछ पल आराम कर के आगे की यात्रा की शुरुआत करते हैं ! 

      बड़े बरगद की छाया में सब लोग अपने लिए कुछ ना कुछ पाते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं और तरक्की होती है किन्तु एक सत्य ये भी है की बड़े और छायादार बरगद / पेड़ के नीचे लगाया गया  कोई पौधा ठीक से पनप नहीं पाता ! उसकी स्वयं की तरक्की कमतर ही रहती है, बनिस्बत इसके की वो उस छाया की परिधि से बाहर  लगा हो ! 

    अतएव, ये भी सत्य है की अधिकाधिक छाया और संरक्षण भी उत्थान , उन्नति , सही दिशा लेने में अवरोध सरीखे ही होते हैं !!

   आपके सिनिअर्स का आपके प्रति कम बेरुखी से पेश आना भी  आपकी उन्नति में बाधक हो सकता है ! 

     इस  पंक्ति को दोबारा से पढ़िए , कुछ प्रायोगिक ( प्रक्टिकल ) सा लगेगा , किन्तु ये शत प्रतिशत सत्य नहीं है ! किन्तु ऐसा है ही नहीं ये भी कहना खुद को झुठलाना होगा !

Saturday, July 27, 2013

एक कहानी : धुप को किसने बाँधा !!

                                            तेज़ बारिश से सडकें लबालब हो चुकी थीं !

               आबिद बार - बार दीवार से लटकी पुरानी घडी जो उसके अब्बा उसके जनम से पहले लाए थे, को देखता हुआ सड़क पर आती जाती गाड़ियों में अपनी टैक्सी तलाश रहा था !  चार घंटों बाद उसकी फ्लाईट थी चेन्नै के "कामराज एयरपोर्ट"  से पोर्टब्लेयर के लिए और बारिश रुक नहीं रही थी !

              अब्बा सोफे पर चुपचाप बैठे थे ! बिजली नहीं थी ! अब्बा ने आबिद को इन्वर्टर पर ही  पुरे घर की लाईट जला देने को कहा था ! आज भरा पूरा घर आबिद के भी चले जाने के बाद बिलकुल सूना हो जायेगा ! घर में रौशनी तो थी लेकिन गुमसुम और उदास उदास !
        
          कोई सात आठ सालों पहले की  रही होगी ! आबिद ने बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था ! होस्टल में दो महीने बिताने का बाद " रमजान " के महीने में घर लौटा था !

दिन भर कोलेज के नए नए दोस्तों से बातें !

भविष्य में कुछ बन जाने के सपने !

              ज़िन्दगी में कुछ कर गुजरने की इमानदार ख्वाहिशों से लबरेज़ मन ले कर किशोर आबिद शाम को अपने अब्बा के दफ्तर से आने के इंतज़ार करता था ! बचपन में नुक्कड़ की दूकान से गरम गुलाब जामुन , गर्म समोसे और ब्रेड पकोड़े लाते थे अब्बा , छोटा होने के कारण अपने हिस्से के आलावा और सब बड़ों का भी हिस्सा उसे मिलता था ! नुक्कड़ की दूकान ज्यादा दूर तो नहीं थी लेकिन अब्बा के लाये सामान में जो सुरक्षा कवच होता था वो से खुद खरीद कर खाने में नहीं !  
            कालेज के दोस्तों से बातें  ख़तम होने के बाद वो इंतज़ार करता की कब अब्बा आयें और फिर शाम की इफ्तार की तय्यारी करी जाये ! अब्बा आते थे ! बहुत सा सामान लाते ! आबिद , अम्मा , बड़े दो भाई , भाभी , बहन और जीजा जी सब  इफ्तार में शरीक होते !

            अब आबिद किशोर हो चला था ! फिर भी घर के सब बड़ों में वो छोटा ही तो था ! कहीं अम्मा  कुछ काम बता देतीं तो कभी भाभी , सब के काम ख़ुशी ख़ुशी कर लेता ! अम्मा से मोबाइल रिचार्ज के पैसे मिलते तो भाभी से नेट पैक के ! बहन से नया मोबाइल का वादा ! सब ख़ुशी ख़ुशी चल रहा था !

        बड़े भाई ने अपना काम दिल्ली में कर लिया तो वो पुरे परिवार के साथ दिल्ली चले गए ! बीच वाले भाई की सरकारी नौकरी में ट्रान्सफर हुआ तो वो भी रुखसत हो गए ! बहन चेन्नई में ही रहती थीं लेकिन उनका भी तो अपना परिवार है ! अम्मा का सब सोच सोच कर ब्लड प्रेशेर हाई हुआ और एक रात उन्होंने भी साथ छोड़ दिया !

        अम्मा के गम में शिरकत करने लोग आये और चले गए ! भाभियाँ , भैया महिना दो महिना रहे फिर चले गए ! बस अब तो हफ्ते बहन ही आ जाती हैं !

      घर पर आबिद और अब्बा अकेले रह गए !  अब्बा ने  समोसे लाना बंद कर दिया ! नौकरी से रिटायर हो चुके थे ! आबिद कालेज से आने के बाद पास के ही इंस्टिट्यूट में पढ़ाने लगा था ! पैसों की कमी नहीं थे ! खालीपन था ! उम्र कम थी लेकिन समझ ठीक थी ! अब्बा से जितना लगाव था बचपन में उतना अब नहीं रहा ! वो खुद भी सोचता था की ऐसा क्यों है लेकिन कुछ सवाल बिना जवाब के होते हैं !  कभी कभी उलझन होती थी उसको , अब्बा जब कालेज से लौटने पर उसको घर के बाहर घुमते नज़र आते थे ,जबकि उसको ऐसा सोचने का कोई अधिकार नहीं थी !

आबिद के अब्बा मौसम विभाग में बड़े अधिकारी थे हो कर रिटायर हुए थे !  आबिद उनके साथ सब से ज्यादा समय रहा और सब भाइयों बहनों से ज्यादा उसको उनका प्यार मिला और आज वो उनके बारे में ऐसा सोचता है ! स्वार्थ रिश्तों और जिम्मेदारियों को जला देता है और उस की तपिश से खुद भी झुलसता है !

अब्बा :   आबिद , आज खाना बनाने वाली नहीं आयगी , हमें बाहर ही जाना होगा !

आबिद : जी , अच्छा !

अब्बा : आज घर साफ़ करने वाली भी नहीं आई तो मैंने खुद ही साफ़ किया लेकिन इतना बड़ा घर कहाँ साफ़ होता है मुझ से !

आबिद : कोई बात नहीं मैं देख लूँगा !

अब्बा : आज तुम्हारे पासपोर्ट के लिए वेरिफिकेशन के लिए पुलिस वाले आये थे , मैंने सब करा दिया !

आबिद : मुझे फ़ोन कर दिया होता !

अब्बा : क्यों मैंने करा दिया तो कुछ गलती हुयी ?

आबिद : अब्बा आप भी जरा सी बार से नाराज़ होते हैं !

अब्बा : ज़रा सी बात , मैं इतनी देर से तुमसे कुछ ना कुछ बोल कर बात करने की कोशिश कर रहा हूँ और तुम हो की हाँ और ना में ज़वाब दे कर बात ख़तम कर रहे हो !

आबिद : तो क्या करू ?

अब्बा कुछ नहीं कहते हुए चाय बनाने चले गए ! आबिद अपने कमरे में चला गया ! इक्कीस साल का आबिद नौकरी की तलाश में था ! कालेज के कम्पस में जो सिलेक्शन हुआ था वो उअको पसंद नहीं थी सो नहीं करी और अब बाहर कहीं मिल नहीं रही !  परेशान था ! अम्मा की फोटो देखता और रोने लगता ! बहन के बच्चों की बातें सुनता की उसको मल्टी नेशनल में ४ लाख के पकेज पर नौकरी मिली है तो और परेशान होता !

दरवाज़ा धीरे से खोलते हुए अब्बा ने बाहर से ही चाय का कप आबिद की तरफ बढ़ा दिया !

आबिद ने उनकी  तरफ देखा भी नहीं , और कहा रख दीजिये !

अब्बा को दुःख हुआ पर वो कुछ बोले नहीं और कप रख कर चले गए !

आबिद ये समझता था की उसके अब्बा ने उसके बड़े भाइयों और बहन के लिए उनके बच्चों के लिए बहुत कुछ किया  ! सिफारिशें कर के उनको फायदा करवाया लेकिन उसके लिए कुछ नहीं किया इस लिए उसको आज तक पढाई के बाद भी नौकरी नहीं मिली !

अगले दिन कालेज से लौटा तो ड्राइंग रूम के सेण्टर टेबल पर एक सरकारी लिफाफा रखा था आबिद के नाम से !

मौसम विभाग से उसको इंटरव्यू काल था !

आबिद : ये कैसे हुआ ?

आस पास कोई नहीं था उसके सवाल का जवाब देने के लिए !

आबिद ने लिफाफा खोल और पढ़ा अगले हफ्ते ही जाना था चेन्नै में !

आबिद ने अब्बा से पुछा तो अब्बा ने हां में जवाब दिया और सलाह दी की वह दफ्तर में जा कर श्री अन्यांगार जी से मिल लेना मेरे सिनिअर रहे हैं !

शाम को आबिद ढेर सी  मिठाइयाँ ले कर घर आया ! अब्बा बहार टहलते मिले ! आज आबिद को उनके ऐसे टहलने पर कोई रंज नहीं था ! अब्बा मिठाई खाइए ! अब्बा को शुगर होने के बावजूद भी उन्होंने एक सुखी पाक खाई ! चालीस दिन की  हुई और अब उसकी पहली पोस्टिंग पोर्टब्लेयर  की गयी ही थी !

अब्बा सोफे से  उठे और बालकनी की तरफ चल दिए !

आबिद अभी भी सड़क की तरफ देख रहा था की अचानक टैक्सी का हॉर्न सुनाई दिया  !

अब्बा : आबिद टैक्सी आ गयी !

आबिद : जी अब्बा !

दो ऐयर बैग और एक लैपटॉप !

ठीक है अब्बा अपना ख्याल रखियेगा मैं फ़ोन करता रहूँगा ! दो महीने बाद आने की बात तो करी है देखते हैं ! खाना और दवाइयां टाइम से लीजियेगा ! रुखसाना दी आती जाती रहेंगी ! आज आने वाली थीं लेकिन बारिश की वज़ह से नहीं आई !

अब्बा : ठीक है बेटा तुम जाओ और खुश रहो ! मैं ठीक हूँ !

          टैक्सी बारिश की फुहारों के बीच ओझल हो गयी ! अब्बा ने मैं दरवाज़ा बाद किया और घर के अन्दर आ गए और मैं गेट के चौकीदार से अन्दर आने और चाय बनाने को कहा ! चौकीदार फिचले दरवाज़े से अन्दर आया ! सब सुना सुना ! इतना बड़ा घर ! कितने मन से बनवाया था रहमान जी ने सब कटाने को दौड़ता है ! तीन बच्चे ! तीन जगह ! वाइफ़ अल्लाह के पास ! सब अपने अपने हिस्से का साथ निभा कर चले गए ! आबिद भी कब लौटे क्या पता !

साहब शुगर की गोलियां कितनी डालूँ चाय में : चौकीदार ने पुछा !

रहमान साहब : आज फीकी ही दे दो , ज़िन्दगी के तजुर्बों की मिठास और कडवाहट का ही स्वाद बहुत है आज !

        चौकीदार ने चाय की प्याली रहमान साहब की तरफ बढ़ा दी और बहार की तरफ चल दिया !

पुरे बंगले में अब बस एक प्याली चाय , सेंटर टेबल पर हलकी नीली जलती लाईट दीवार पर लटकी पुरानी रोमन अंक और पेंडुलम वाली घडी और ऍफ़ एम् रेडिओ पर "रफ़ी" का एक पुराना बजता गाना रह गया था !

" उतना ही उपकार समझ कोई , जितना साथ निभा दे " कोई ना संग मरे …. मन रे तू कहे न धीर धरे …………। ! "

आबिद की फलाईट उड़ चुकी थी ! उड़ने से पहले आबिद ने कई बार कोशिश कर की अब्बा से बात हो जाये लेकिन बारिश के कारण  नेटवर्क नहीं मिला … अब्बा के मन में कोई खटास नहीं थी इस बात को लेकर !

सबेरा होने को था अब्बा आज लेट हो गए थे मोर्निंगवाक के लिए  जल्दी जल्दी चाय पी कर निकले की कहीं किसी की याद हाथ पकड़ कर रोक ना ले …….लेकिन धुप को कौन बाँध सका है अब्बा तो धुप की तरह बढ़ चले अपने साये को पीछे छोड़ते हुए ! 

                                                                                                                     
                                                                                                                 : मनीष सिंह

Thursday, July 11, 2013

एक कहानी : " अजनबी, कौन हो तुम ...."

                          अभिनव करीब पंद्रह सालों बाद जोधपुर वापस लौट रहा था !
         बचपन और किशोरावस्था के बाद सेना की नौकरी  जोधपुर की गलियों से कब उसको शहर और फिर वहां के ट्रेनिंग केम्प से पुरे देश में कब ले गयी, उसको पता ही नहीं चला ! घर में पिता के बाद बड़ा होने के नाते सेना की नौकरी उसको मिली ! आज पंद्रह सालों के बाद अपने घर आना हो रहा था  ! ऐसा नहीं की सेना ने उसको छुट्टियाँ नहीं दी अपने घर जाने के लिए ! बस अपनी दूर दूर की पोस्टिंग्स के कारण आ ही नहीं सका !

             अब उसने सोच लिया है था की कहीं नहीं जाएगा अपनों को छोड़ कर ! यहीं रहेगा अपनी माँ , बहन और छोटे भाई जयंत के साथ , परिवार के साथ !

             ट्रेन ने एक लम्बी सीटी लगाई ! रफ़्तार कुछ धीमी हो गयी थी ट्रेन की ! अभिनव ने अपनी खिड़की से झुकते हुए बाहर झाँका ! वो ही रेलवे का फाटक दिखाई दिया ! जिसके किनारे खड़े ठेली वालों से चुरन , खीरे , समोसे , बाटी खाया करते थे अपने दोस्तों के साथ स्कूल से लौटते समय ! कितने कम पैसों में कितना सारा सामान मिलता था ! कोई चिंता नहीं ! किनारे पर आज भी वो जामुन का पेड़ हैं ! फाटक बाबु के लाख मना करने के बावजूद उनसे आँखे चुरा कर जामुन खा ही लिया करते थे ! कुछ कम डालियाँ रह गई हैं अब ! फाटक बाबु भी ढल चुके हैं ! फाटक से ट्रेन गुजर रही थी ! गाँव के सरकारी स्कूल में नई पीढ़ियों की कतारें वैसे ही लगी थीं   ! हाफ नेकर और हाफ कमीज़ में चप्पल में ही दौड़ आता था अभिनव स्कूल वही खाकी नेकर और नीली कमीज़ का रंग , वैसा ही है ! पुरे  भारत में इन्ही रंगों के सहारे देश की भावी पीढ़ी में उन्नति के रंग भरता है हमारा सरकारी तंत्र !
                     ट्रेन प्लेटफोर्म पर लग चुकी थी ! पूरा कम्पार्टमेंट लगभग ज़ल्दी उतरने की होड़ में दरवाज़े पर जमा हो चूका था ! अभिनव को कोई ज़ल्दी नहीं थी ! पद्रह सालों की  अपने शहर में लौटने की   आस ऐसी थी जैसे हलकी होती बारिश से  भीगती कच्चे घरों की दीवारों  में रिसता पानी !  नए जोधपुर के सारे नज़ारे आँखों में भर लेना चाहता था वो ! 

भैया : जयंत ने पुकारा !

अभिनव ने गहरी सांस लेते हुए जयंत को हाथ का इशारा किया !

जयंत ने अभिनव के पैर छुए और उसका सामान ले कर प्लेटफोर्म  उतर गया !

अभिनव : और जयंत कैसे हो ?

जयंत : एकदम फिट और खुश  भैय्या !

अभिनव ने जयंत का जवाब नहीं सुना ! उसका ध्यान तो एकाएक प्लेटफोर्म पर ही एक लैंप पोस्ट के सहारे से बैठे परिवार की तरफ चला गया था ! लगभग चार साल का एक बच्चा पास ही बैठे मिटटी के खिलोने वाले से मिटटी की सारंगी लेने की जिद कर रहा था और उसके माँ बाप न जाने उस दस रूपए की चीज़ के न लेन के लिए उसको मनाने में जुटे थे !
            वो खिलोने वाले के पास गया और एक सारंगी ले कर बच्चे की तरफ बढ़ा ये सोच कर की उसको चुप करा कर कुछ खुशियाँ दे सके ! माहौल बदल गया ! बच्चे ने सारंगी नहीं ली और पीछे की और सरकता हुआ अपनी माँ के आँचल में छुप सा गया ! ये सच है की समर्पण ख़रीदा नहीं जा सकता भले बाध्य कर दिया जाये किन्तु आनंद बाध्यता में नहीं निष्काम समर्पण में ही होता है !        अभिनव मूर्त रूप सा झुक हुआ अपने को असहाय महसूस कर रहा था ! एक छोटे बच्चे ने उसे कितना छोटा कर दिया था ! सैकड़ों रंगरूटों को नियंत्रण में रखने वाला आज अदभुद रूप से  असहाय था ! जयंत ये सब देख रहा था ! हाथो में दो कप चाय लिए !
                 माँ के इशारे पर बच्चे ने सारंगी धीरे से पकड़ ली ! अभिनव के लिए वो छोटे छोटे हाथ जैसे उसके मानस से सैकड़ों टन वजनी हो चुकी सारंगी का वज़न उतार रहे थे ! इस अनोखी घटना के बाद , हलकी मुस्कराहट के साथ अभिनव जयंत की तरफ बढ़ चला ! रेलवे की टी स्टाल के  पारंपरिक चीनी मिटटी के कप में चाय पी और स्टेशन से बहार की और चल दिया ! उसने ध्यान दिया की चाय वाले ने चलते समय जयंत को नमस्कार किया लेकिन उसकी तरफ कोई तव्वज्जो नहीं दी ! जयंत से उसने पैसे भी नहीं लिए !
               स्टेशन के बाहर खड़े एक ऑटो पर जयंत ने सामान रखा और अभिनव को इशारे से कहा बैठने के लिए ! पूरा ऑटो घर के लिए रिसर्व कर लिया था जयंत ने ताकि भाई को कोई परेशानी नहीं हो !  दोनों भाई घर की तरफ चल दिए !

            अभी कुछ दूर ही गए थे की सड़क के किनारे खड़े एक बाइक वाले ने हाथ दिखा कर ओटो को रोक लिया ! जयंत ने भी ओटो को रुकने की सहमति दी !

बाइक वाला : भैया जी , कल आपके घर गया था !

जयंत ने अपनी जेब से कुछ रूपये निकाले और बोला : काका ,आपको तो मालूम है बहन की शादी है तो यहाँ वहां जाता रहता हूँ ! लीजिये ये आपके पैसे जो टेंट मेंहदी वाले दिन अपने लगाया था उसके लिए और कुछ एडवांस भी रखिये शादी के दिन के लिए बाकि हिसाब बाद में होता रहेगा !

अभिनव ओटो के अन्दर से सब देख रहा था ! जयंत ने बाइक वाले से अभिनव का परिचय कराया तो उसने अभिनव को नमस्कार किया और आगे शाम को घर आने की बात कह कर आगे बढ़ गया !

जयंत : भैय्या , आप बैठिये मैं ज़रा पास के हलवाई से शाम के महिला संगीत के लिए दिए बताशों के आर्डर का पता करता हूँ ! अगर बन गए होंगे तो लेते चलेंगे नहीं तो शाम को  से ओटो का खर्चा होगा !

अभिनव बस मुस्कुरा दिया ! जयंत दस किलो बताशे ले आया ! ऑटो आगे बढ़ा ! कुछ दूरी पर एक फल वाले के सामने जयंत ने ओटो को रुकने का इशारा किया !

जयंत : भाई बस एक मिनट में आता हूँ !

अभिनव सब देख रहा था ! जयंत ने कुछ रुपये फल वाले को भी दिए और दो दिन बाद के लिए फलों का आर्डर दे कर कन्फर्म कर दिया ! ओटो फिर आगे बढ़ा ! एक ज्वेलर की दूकान पर रुका ! यहाँ पर जयंत ने अभिनव से अपने  आने को कहा ! वो बहन के लिए दिए गए गहनों के आर्डर को  अभिनव को दिखाना  चाहता था ! अभिनव दूकान के अन्दर गया ! दूकान में वो  सिर्फ देखता रहा ! जयंत ने सारे गहने एक एक कर के मंगवाए और अभिनव को दिखाए ! सब तैयार था लेकिन घर पर शादी वाले दिन ही जायेगा ऐसा  माँ ने कहा है ! इस सब के बीच वो अभिनव का परिचय दूकान के मालिक से करवाना भूल गया था ! 

जयंत : सेठ जी ये मेरे बड़े भाई हैं , अभिनव !

सेठ जी : अच्छा ! आप जोधपुर में कम रहते हैं ?

अभिनव : जी में सेना में था , इस लिए बहार ही रहा पर अब यहीं पर रहूँगा !

सेठ जी : अच्छी बात है !

जयंत : अब चलें भैया ?

अभिनव : हाँ चलो !

जयंत और अभिनव ओटो में बैठे ही थे की किसी ने पीछे से पुकारा :

भैय्या जी जरा सुनिए ! एक दूध वाले की आवाज़ थी !

जयंत ने ओटो को रुकने को कहा !

जयंत : हाँ भैया ?

दूध वाला : पनीर आपके घर छोड़ कर आया हूँ ! दूध को मना कर दिया माँ ने आज के लिए ! परसों के लिए कुछ पैसे दे देते तो ठीक रहता !

जयंत ने कुछ रुपे उसको भी निकाल कर दिए और पनीर , दूध और देसी घी की सही समय पर पहुच जाने की बात कही ! दूध वाला हामी भरता हुआ वहां से चला गया !

अभिनव ये सब देख कर हैरान और परेशान था !

अभी जयंत ने दसवीं भी नहीं पास कर करी है और पुरे घर को देख रहा है !

कितने सही तरह से पूरी जिम्मेदारी निभा रहा है बहन की शादी की !

पूरी तय्यारी कर रखी है इसने !

मैं तो सिर्फ पैसे भेजता रहा ताकि घर का खर्च चल सके !

खेती बाड़ी अपनी पढ़ाई और फिर ये सब कैसे कर लेता है ये सोलह साल का लड़का ! आश्चर्य है !  

          स्टेशन से घर की दुरी केवल पांच किलोमीटर की थी लेकिन शादी के सारे छोटे मोटे काम निबटाते हुए जैसे :

सुबह स्टेशन जाते ही दाल देता गया था पीसने के लिए ! वो ली वापसी में ! सब्जी वाले से सूखी सब्जियों की बोरियां ओटो में रख ली ! बताशे ! मसालों के छोटे छोटे पेकेट ! शादी के दिन के लिए खाने बनाने का राशन ! बारातियों के रुकने वाले होटल वाले से बातचीत ! बीच बीच में आते फ़ोन पर लोगो को विभिन्न निर्देश देता हुआ जयंत घर का सबसे बड़ा सदस्य लग रहा था !

अभिनव बड़ा था लेकिन उम्र से किसी को बड़ा नहीं बनाती !  

जयंत ने पूरी शादी का फंग्शन व्यवस्थित कर दिया था ! सब अपना अपना काम कर रहे थे ! 

ओटो घर के सामने रुक गया ! 

जयंत ने कुछ पास के लड़कों को पुकारा : चलो भाई छोटे लोगो मेरी मदद  करो  सामान उतारने में !

उसकी एक आवाज़ में गली में खेलते सब लड़कों ने ऑटो का सामान उतार दिया !

ओटो अपनी राह चला गया !

अभिनव चुपचाप खड़ा था अपने ही घर के सामने इस इंतज़ार में की कोई कहे की घर के भीतर आओ !

शादी के घरों में सब व्यस्त रहते हैं !

किसी को किसी की सुध नहीं रहती ! तभी जयंत का ध्यान अभिनव की तरफ गया !

जयंत : अरे भैया आप बाहर ही खड़े हैं ? अन्दर जाइये !

अभिनव :  भाई ले चलोगे तो चलों !

जयंत और अभिनव अन्दर गए !

अन्दर का वातावरण एकदम  वैसा ही
जैसा भारतीय शादी के घरों में होता है ! 

रंगबिरंगे कपड़ों में काम में व्यस्त लोग !
कुछ लोग  काम के ही व्यस्त !
मीठे और नमकीन की मिक्स खुशबु !

घर के आँगन में पारंपरिक टेंट और  मेहँदी तो कहीं महावर लगाती नाउन ! 

अरे अभिनव : बड़ी चाची ने  आवाज़ में कहा !

सब अपना अपना काम काम छोड़ कर अभिनव के पास आ गए ! जिनसे अभिनव बड़ा था उन्होंने उसके पाँव छुए और जहाँ ज़रूरी था उनके अभिनव ने पाँव छुए ! अगले पांच दस मिनट तो सब अभिनव के आस पास रहे फिर सब अपने अपने काम में लग गए ! 

माँ : अभिनव तू नहा कर तयार हो जा , फिर गुड्डी खाना लगा देगी फिर खा कर थोडा सो जाना ! 

अभिनव : जी माँ !

माँ : जयंत , वो भीतर के बड़े कमरे की चाभी देना , अभिनव उसमे ही सो जायेगा बाकि तो सब जगह शोर है !

जयंत : लो माँ !

अभिनव इतने लोगो के बीच अपने को अकेला ही पा रहा था ! सारा घर अपने अपने काम में था ! उसको नहाने के बाद सुला दिया गया ! फिर शाम को चाय नाश्ता दे कर आराम करने को कहा गया ! फिर रात में सब लेडीज़ संगीत में व्यस्त थे ! बड़ा होने के कारन वहां भी नहीं जा सका ! वहीँ जयंत पुरे काम भी कर रहा था ! लेडीज़ संगीत में भी  नाच किया उसने ! खाना भी सब के साथ खाया अभिनव की तरह एक कमरे में नहीं ! 

रात के करीब एक बजे अभिनव इसी उधेड़बुन में करवटें बदल रहा था की कुछ आवाज़ सुनाई दी ! वो उठा और गलियारे में निकला और देखा जयंत बाहर रखे टेबल कुर्सी पर कुछ लिख रहा था ! वो सीढ़ियों से होता हुआ उसके पास पंहुचा और उसके सर पर हाथ रेख कर बोला : क्या हो रहा है छोटे ?

जयंत : अरे भैया आप ? बस दिन भर का हिसाब लिख रहा था ! 

अभिनव : कुछ मुझे भी काम दो !

जयंत : भैया ये सब का के कारन ही तो हो रहा है ! आप अपना काम कर चुके अब मैं अपना काम सही से कर सकूं बस ये देखते रहिये और जहाँ गलती तो सुधार दीजिये !

अभिनव हल्का सा मुस्कुराया ! गलती तो तुम्हारे काम में  से भी नहीं मिलेगी !

जयंत : हा हा हा ! दसवी में अगर अच्छे नंबर नहीं आये तो आप क्या मुझे छोड़ेंगे ! अगले महीने ही एक्साम हैं !

अभिनव : हम्म !

जयंत : ठीक है भैया ! मैंने सारा हिसाब लिख दिया है ! माँ कह रही थी की आपको सब समझा दूं !

अभिनव : समझा दूं मतलब ?

जयंत : माँ ने कहा की आपको सब खर्चा बता दू और पैसे का हिसाब दे दूं !

अभिनव : मुझे कुछ नहीं समझना और हिसाब तू ही रख बस इतना बता दे की और कितना पैसा और चाहिए !

जयंत : नहीं भैया ! और कुछ नहीं चाहिए सब हो गया है ! बल्कि माँ के दिए पैसे हैं मेरे पास और कुछ अभी बैंक में हैं ! 

अभिनव : और मैंने जो पैसे भेजे थे गुड्डी की शादी के लिए ?

जयंत : वो तो वैसे के वैसे ही आपके अकाउंट में जमा करा दिए थे मैंने ! एक भी रुपया नहीं निकाला !

अभिनव : क्यों ?

जयंत : बस जब घर के पैसे पुरे पड़  गए तो ज़रुरत नहीं पड़ी !

               अभिनव सुबह से अपने मन में एक बात सोचे बैठा था ! सारा घर का खर्च वो उठा रहा है ! शादी में भी पूरा खर्च उसने भेजा  है,  फिर भी लोग उस से दूर दूर हैं ! उसकी बहन जिसकी शादी है वो दिन में सिर्फ एक बार उसके सामने आई वो भी माँ के कहने पर खाना देने ! घर के बड़े लोग कुछ भी बात नहीं छेड़ते उसके साथ ! हर काम में जयंत ! हाँ जयंत ने उसके साथ हमेशा बड़े भाई मान दिया ! 

               अभिनव जयंत को नीचे ही गद्दों पर सोता छोड़ कर अपने कमरे में सीढ़ियों के सहारे जाते हुए ये सब सोचने लगा ! सुबह के चार बज रहे थे ! गलियारे में एक कमरा वो भी था जिसमे बहन को दिया जाने वाला सामान रखा था !  सटे हुए दरवाज़े से अन्दर रखे चमचमाते बर्तन पर उसका ध्यान गया ! दरवाज़ा खोल कर अन्दर की लाईट  जला कर देखने लगा ! कपडे , फर्नीचर , बर्तन , फ़्रिज ,  मशीन , डबल बेड , लोहे की अलमारी , कूलर और सब से किनारे रखा ड्रेसिंग टेबल जिसके बड़े से शीशे में अभिनव ने अपने पुरे कद को देखा !

उसकी आँखे उसे खुद पूछ रहीं थीं " अजनबी, कौन हो तुम ? " आज से पहले तो कभी तुमको नहीं देखा !  स्वयं से किया गया ये सवाल अभिनव के पुरे दिन के अनुभव का उत्तर था !

माँ ने पुकारा : अभिनव उठा नहीं अभी ? जा जल्दी से चाचा जी के साथ जा कर बांस ले कर आ खेतों से !

जयंत : मां भैया को कहाँ भेज रही हो , एक कप चाय दो मैं बस उठ गया हूँ चल जाता हूँ उन्हें सोने दो !

माँ : नहीं , कल पूरा दिन आराम करने दिया ना ...अब तू कुछ और काम देख और वो कुछ और अकेले कर ही रहा है ना एक महीने से !

अभिनव : हाँ माँ बस अभी आया , गुड्डी चाय लाना मझे चाचा जी के साथ जाना है !

गुड्डी : जी भैया !

सब सामान्य , वातावरण जितना उलझन भरा होता है उतनी ही उसमे सम्भावना होती है सुलझाने की बस तरकीब आनी चाहिए उस सुल्झन वाले किनारे की डोर को पहचान कर खीचने की ! यहाँ माँ ने सब सुलझा दिया था , सब अपने थे कोई अब अजनबी नहीं !!
                                                                                                          
 :: मनीष सिंह ::