Thursday, July 11, 2013

एक कहानी : " अजनबी, कौन हो तुम ...."

                          अभिनव करीब पंद्रह सालों बाद जोधपुर वापस लौट रहा था !
         बचपन और किशोरावस्था के बाद सेना की नौकरी  जोधपुर की गलियों से कब उसको शहर और फिर वहां के ट्रेनिंग केम्प से पुरे देश में कब ले गयी, उसको पता ही नहीं चला ! घर में पिता के बाद बड़ा होने के नाते सेना की नौकरी उसको मिली ! आज पंद्रह सालों के बाद अपने घर आना हो रहा था  ! ऐसा नहीं की सेना ने उसको छुट्टियाँ नहीं दी अपने घर जाने के लिए ! बस अपनी दूर दूर की पोस्टिंग्स के कारण आ ही नहीं सका !

             अब उसने सोच लिया है था की कहीं नहीं जाएगा अपनों को छोड़ कर ! यहीं रहेगा अपनी माँ , बहन और छोटे भाई जयंत के साथ , परिवार के साथ !

             ट्रेन ने एक लम्बी सीटी लगाई ! रफ़्तार कुछ धीमी हो गयी थी ट्रेन की ! अभिनव ने अपनी खिड़की से झुकते हुए बाहर झाँका ! वो ही रेलवे का फाटक दिखाई दिया ! जिसके किनारे खड़े ठेली वालों से चुरन , खीरे , समोसे , बाटी खाया करते थे अपने दोस्तों के साथ स्कूल से लौटते समय ! कितने कम पैसों में कितना सारा सामान मिलता था ! कोई चिंता नहीं ! किनारे पर आज भी वो जामुन का पेड़ हैं ! फाटक बाबु के लाख मना करने के बावजूद उनसे आँखे चुरा कर जामुन खा ही लिया करते थे ! कुछ कम डालियाँ रह गई हैं अब ! फाटक बाबु भी ढल चुके हैं ! फाटक से ट्रेन गुजर रही थी ! गाँव के सरकारी स्कूल में नई पीढ़ियों की कतारें वैसे ही लगी थीं   ! हाफ नेकर और हाफ कमीज़ में चप्पल में ही दौड़ आता था अभिनव स्कूल वही खाकी नेकर और नीली कमीज़ का रंग , वैसा ही है ! पुरे  भारत में इन्ही रंगों के सहारे देश की भावी पीढ़ी में उन्नति के रंग भरता है हमारा सरकारी तंत्र !
                     ट्रेन प्लेटफोर्म पर लग चुकी थी ! पूरा कम्पार्टमेंट लगभग ज़ल्दी उतरने की होड़ में दरवाज़े पर जमा हो चूका था ! अभिनव को कोई ज़ल्दी नहीं थी ! पद्रह सालों की  अपने शहर में लौटने की   आस ऐसी थी जैसे हलकी होती बारिश से  भीगती कच्चे घरों की दीवारों  में रिसता पानी !  नए जोधपुर के सारे नज़ारे आँखों में भर लेना चाहता था वो ! 

भैया : जयंत ने पुकारा !

अभिनव ने गहरी सांस लेते हुए जयंत को हाथ का इशारा किया !

जयंत ने अभिनव के पैर छुए और उसका सामान ले कर प्लेटफोर्म  उतर गया !

अभिनव : और जयंत कैसे हो ?

जयंत : एकदम फिट और खुश  भैय्या !

अभिनव ने जयंत का जवाब नहीं सुना ! उसका ध्यान तो एकाएक प्लेटफोर्म पर ही एक लैंप पोस्ट के सहारे से बैठे परिवार की तरफ चला गया था ! लगभग चार साल का एक बच्चा पास ही बैठे मिटटी के खिलोने वाले से मिटटी की सारंगी लेने की जिद कर रहा था और उसके माँ बाप न जाने उस दस रूपए की चीज़ के न लेन के लिए उसको मनाने में जुटे थे !
            वो खिलोने वाले के पास गया और एक सारंगी ले कर बच्चे की तरफ बढ़ा ये सोच कर की उसको चुप करा कर कुछ खुशियाँ दे सके ! माहौल बदल गया ! बच्चे ने सारंगी नहीं ली और पीछे की और सरकता हुआ अपनी माँ के आँचल में छुप सा गया ! ये सच है की समर्पण ख़रीदा नहीं जा सकता भले बाध्य कर दिया जाये किन्तु आनंद बाध्यता में नहीं निष्काम समर्पण में ही होता है !        अभिनव मूर्त रूप सा झुक हुआ अपने को असहाय महसूस कर रहा था ! एक छोटे बच्चे ने उसे कितना छोटा कर दिया था ! सैकड़ों रंगरूटों को नियंत्रण में रखने वाला आज अदभुद रूप से  असहाय था ! जयंत ये सब देख रहा था ! हाथो में दो कप चाय लिए !
                 माँ के इशारे पर बच्चे ने सारंगी धीरे से पकड़ ली ! अभिनव के लिए वो छोटे छोटे हाथ जैसे उसके मानस से सैकड़ों टन वजनी हो चुकी सारंगी का वज़न उतार रहे थे ! इस अनोखी घटना के बाद , हलकी मुस्कराहट के साथ अभिनव जयंत की तरफ बढ़ चला ! रेलवे की टी स्टाल के  पारंपरिक चीनी मिटटी के कप में चाय पी और स्टेशन से बहार की और चल दिया ! उसने ध्यान दिया की चाय वाले ने चलते समय जयंत को नमस्कार किया लेकिन उसकी तरफ कोई तव्वज्जो नहीं दी ! जयंत से उसने पैसे भी नहीं लिए !
               स्टेशन के बाहर खड़े एक ऑटो पर जयंत ने सामान रखा और अभिनव को इशारे से कहा बैठने के लिए ! पूरा ऑटो घर के लिए रिसर्व कर लिया था जयंत ने ताकि भाई को कोई परेशानी नहीं हो !  दोनों भाई घर की तरफ चल दिए !

            अभी कुछ दूर ही गए थे की सड़क के किनारे खड़े एक बाइक वाले ने हाथ दिखा कर ओटो को रोक लिया ! जयंत ने भी ओटो को रुकने की सहमति दी !

बाइक वाला : भैया जी , कल आपके घर गया था !

जयंत ने अपनी जेब से कुछ रूपये निकाले और बोला : काका ,आपको तो मालूम है बहन की शादी है तो यहाँ वहां जाता रहता हूँ ! लीजिये ये आपके पैसे जो टेंट मेंहदी वाले दिन अपने लगाया था उसके लिए और कुछ एडवांस भी रखिये शादी के दिन के लिए बाकि हिसाब बाद में होता रहेगा !

अभिनव ओटो के अन्दर से सब देख रहा था ! जयंत ने बाइक वाले से अभिनव का परिचय कराया तो उसने अभिनव को नमस्कार किया और आगे शाम को घर आने की बात कह कर आगे बढ़ गया !

जयंत : भैय्या , आप बैठिये मैं ज़रा पास के हलवाई से शाम के महिला संगीत के लिए दिए बताशों के आर्डर का पता करता हूँ ! अगर बन गए होंगे तो लेते चलेंगे नहीं तो शाम को  से ओटो का खर्चा होगा !

अभिनव बस मुस्कुरा दिया ! जयंत दस किलो बताशे ले आया ! ऑटो आगे बढ़ा ! कुछ दूरी पर एक फल वाले के सामने जयंत ने ओटो को रुकने का इशारा किया !

जयंत : भाई बस एक मिनट में आता हूँ !

अभिनव सब देख रहा था ! जयंत ने कुछ रुपये फल वाले को भी दिए और दो दिन बाद के लिए फलों का आर्डर दे कर कन्फर्म कर दिया ! ओटो फिर आगे बढ़ा ! एक ज्वेलर की दूकान पर रुका ! यहाँ पर जयंत ने अभिनव से अपने  आने को कहा ! वो बहन के लिए दिए गए गहनों के आर्डर को  अभिनव को दिखाना  चाहता था ! अभिनव दूकान के अन्दर गया ! दूकान में वो  सिर्फ देखता रहा ! जयंत ने सारे गहने एक एक कर के मंगवाए और अभिनव को दिखाए ! सब तैयार था लेकिन घर पर शादी वाले दिन ही जायेगा ऐसा  माँ ने कहा है ! इस सब के बीच वो अभिनव का परिचय दूकान के मालिक से करवाना भूल गया था ! 

जयंत : सेठ जी ये मेरे बड़े भाई हैं , अभिनव !

सेठ जी : अच्छा ! आप जोधपुर में कम रहते हैं ?

अभिनव : जी में सेना में था , इस लिए बहार ही रहा पर अब यहीं पर रहूँगा !

सेठ जी : अच्छी बात है !

जयंत : अब चलें भैया ?

अभिनव : हाँ चलो !

जयंत और अभिनव ओटो में बैठे ही थे की किसी ने पीछे से पुकारा :

भैय्या जी जरा सुनिए ! एक दूध वाले की आवाज़ थी !

जयंत ने ओटो को रुकने को कहा !

जयंत : हाँ भैया ?

दूध वाला : पनीर आपके घर छोड़ कर आया हूँ ! दूध को मना कर दिया माँ ने आज के लिए ! परसों के लिए कुछ पैसे दे देते तो ठीक रहता !

जयंत ने कुछ रुपे उसको भी निकाल कर दिए और पनीर , दूध और देसी घी की सही समय पर पहुच जाने की बात कही ! दूध वाला हामी भरता हुआ वहां से चला गया !

अभिनव ये सब देख कर हैरान और परेशान था !

अभी जयंत ने दसवीं भी नहीं पास कर करी है और पुरे घर को देख रहा है !

कितने सही तरह से पूरी जिम्मेदारी निभा रहा है बहन की शादी की !

पूरी तय्यारी कर रखी है इसने !

मैं तो सिर्फ पैसे भेजता रहा ताकि घर का खर्च चल सके !

खेती बाड़ी अपनी पढ़ाई और फिर ये सब कैसे कर लेता है ये सोलह साल का लड़का ! आश्चर्य है !  

          स्टेशन से घर की दुरी केवल पांच किलोमीटर की थी लेकिन शादी के सारे छोटे मोटे काम निबटाते हुए जैसे :

सुबह स्टेशन जाते ही दाल देता गया था पीसने के लिए ! वो ली वापसी में ! सब्जी वाले से सूखी सब्जियों की बोरियां ओटो में रख ली ! बताशे ! मसालों के छोटे छोटे पेकेट ! शादी के दिन के लिए खाने बनाने का राशन ! बारातियों के रुकने वाले होटल वाले से बातचीत ! बीच बीच में आते फ़ोन पर लोगो को विभिन्न निर्देश देता हुआ जयंत घर का सबसे बड़ा सदस्य लग रहा था !

अभिनव बड़ा था लेकिन उम्र से किसी को बड़ा नहीं बनाती !  

जयंत ने पूरी शादी का फंग्शन व्यवस्थित कर दिया था ! सब अपना अपना काम कर रहे थे ! 

ओटो घर के सामने रुक गया ! 

जयंत ने कुछ पास के लड़कों को पुकारा : चलो भाई छोटे लोगो मेरी मदद  करो  सामान उतारने में !

उसकी एक आवाज़ में गली में खेलते सब लड़कों ने ऑटो का सामान उतार दिया !

ओटो अपनी राह चला गया !

अभिनव चुपचाप खड़ा था अपने ही घर के सामने इस इंतज़ार में की कोई कहे की घर के भीतर आओ !

शादी के घरों में सब व्यस्त रहते हैं !

किसी को किसी की सुध नहीं रहती ! तभी जयंत का ध्यान अभिनव की तरफ गया !

जयंत : अरे भैया आप बाहर ही खड़े हैं ? अन्दर जाइये !

अभिनव :  भाई ले चलोगे तो चलों !

जयंत और अभिनव अन्दर गए !

अन्दर का वातावरण एकदम  वैसा ही
जैसा भारतीय शादी के घरों में होता है ! 

रंगबिरंगे कपड़ों में काम में व्यस्त लोग !
कुछ लोग  काम के ही व्यस्त !
मीठे और नमकीन की मिक्स खुशबु !

घर के आँगन में पारंपरिक टेंट और  मेहँदी तो कहीं महावर लगाती नाउन ! 

अरे अभिनव : बड़ी चाची ने  आवाज़ में कहा !

सब अपना अपना काम काम छोड़ कर अभिनव के पास आ गए ! जिनसे अभिनव बड़ा था उन्होंने उसके पाँव छुए और जहाँ ज़रूरी था उनके अभिनव ने पाँव छुए ! अगले पांच दस मिनट तो सब अभिनव के आस पास रहे फिर सब अपने अपने काम में लग गए ! 

माँ : अभिनव तू नहा कर तयार हो जा , फिर गुड्डी खाना लगा देगी फिर खा कर थोडा सो जाना ! 

अभिनव : जी माँ !

माँ : जयंत , वो भीतर के बड़े कमरे की चाभी देना , अभिनव उसमे ही सो जायेगा बाकि तो सब जगह शोर है !

जयंत : लो माँ !

अभिनव इतने लोगो के बीच अपने को अकेला ही पा रहा था ! सारा घर अपने अपने काम में था ! उसको नहाने के बाद सुला दिया गया ! फिर शाम को चाय नाश्ता दे कर आराम करने को कहा गया ! फिर रात में सब लेडीज़ संगीत में व्यस्त थे ! बड़ा होने के कारन वहां भी नहीं जा सका ! वहीँ जयंत पुरे काम भी कर रहा था ! लेडीज़ संगीत में भी  नाच किया उसने ! खाना भी सब के साथ खाया अभिनव की तरह एक कमरे में नहीं ! 

रात के करीब एक बजे अभिनव इसी उधेड़बुन में करवटें बदल रहा था की कुछ आवाज़ सुनाई दी ! वो उठा और गलियारे में निकला और देखा जयंत बाहर रखे टेबल कुर्सी पर कुछ लिख रहा था ! वो सीढ़ियों से होता हुआ उसके पास पंहुचा और उसके सर पर हाथ रेख कर बोला : क्या हो रहा है छोटे ?

जयंत : अरे भैया आप ? बस दिन भर का हिसाब लिख रहा था ! 

अभिनव : कुछ मुझे भी काम दो !

जयंत : भैया ये सब का के कारन ही तो हो रहा है ! आप अपना काम कर चुके अब मैं अपना काम सही से कर सकूं बस ये देखते रहिये और जहाँ गलती तो सुधार दीजिये !

अभिनव हल्का सा मुस्कुराया ! गलती तो तुम्हारे काम में  से भी नहीं मिलेगी !

जयंत : हा हा हा ! दसवी में अगर अच्छे नंबर नहीं आये तो आप क्या मुझे छोड़ेंगे ! अगले महीने ही एक्साम हैं !

अभिनव : हम्म !

जयंत : ठीक है भैया ! मैंने सारा हिसाब लिख दिया है ! माँ कह रही थी की आपको सब समझा दूं !

अभिनव : समझा दूं मतलब ?

जयंत : माँ ने कहा की आपको सब खर्चा बता दू और पैसे का हिसाब दे दूं !

अभिनव : मुझे कुछ नहीं समझना और हिसाब तू ही रख बस इतना बता दे की और कितना पैसा और चाहिए !

जयंत : नहीं भैया ! और कुछ नहीं चाहिए सब हो गया है ! बल्कि माँ के दिए पैसे हैं मेरे पास और कुछ अभी बैंक में हैं ! 

अभिनव : और मैंने जो पैसे भेजे थे गुड्डी की शादी के लिए ?

जयंत : वो तो वैसे के वैसे ही आपके अकाउंट में जमा करा दिए थे मैंने ! एक भी रुपया नहीं निकाला !

अभिनव : क्यों ?

जयंत : बस जब घर के पैसे पुरे पड़  गए तो ज़रुरत नहीं पड़ी !

               अभिनव सुबह से अपने मन में एक बात सोचे बैठा था ! सारा घर का खर्च वो उठा रहा है ! शादी में भी पूरा खर्च उसने भेजा  है,  फिर भी लोग उस से दूर दूर हैं ! उसकी बहन जिसकी शादी है वो दिन में सिर्फ एक बार उसके सामने आई वो भी माँ के कहने पर खाना देने ! घर के बड़े लोग कुछ भी बात नहीं छेड़ते उसके साथ ! हर काम में जयंत ! हाँ जयंत ने उसके साथ हमेशा बड़े भाई मान दिया ! 

               अभिनव जयंत को नीचे ही गद्दों पर सोता छोड़ कर अपने कमरे में सीढ़ियों के सहारे जाते हुए ये सब सोचने लगा ! सुबह के चार बज रहे थे ! गलियारे में एक कमरा वो भी था जिसमे बहन को दिया जाने वाला सामान रखा था !  सटे हुए दरवाज़े से अन्दर रखे चमचमाते बर्तन पर उसका ध्यान गया ! दरवाज़ा खोल कर अन्दर की लाईट  जला कर देखने लगा ! कपडे , फर्नीचर , बर्तन , फ़्रिज ,  मशीन , डबल बेड , लोहे की अलमारी , कूलर और सब से किनारे रखा ड्रेसिंग टेबल जिसके बड़े से शीशे में अभिनव ने अपने पुरे कद को देखा !

उसकी आँखे उसे खुद पूछ रहीं थीं " अजनबी, कौन हो तुम ? " आज से पहले तो कभी तुमको नहीं देखा !  स्वयं से किया गया ये सवाल अभिनव के पुरे दिन के अनुभव का उत्तर था !

माँ ने पुकारा : अभिनव उठा नहीं अभी ? जा जल्दी से चाचा जी के साथ जा कर बांस ले कर आ खेतों से !

जयंत : मां भैया को कहाँ भेज रही हो , एक कप चाय दो मैं बस उठ गया हूँ चल जाता हूँ उन्हें सोने दो !

माँ : नहीं , कल पूरा दिन आराम करने दिया ना ...अब तू कुछ और काम देख और वो कुछ और अकेले कर ही रहा है ना एक महीने से !

अभिनव : हाँ माँ बस अभी आया , गुड्डी चाय लाना मझे चाचा जी के साथ जाना है !

गुड्डी : जी भैया !

सब सामान्य , वातावरण जितना उलझन भरा होता है उतनी ही उसमे सम्भावना होती है सुलझाने की बस तरकीब आनी चाहिए उस सुल्झन वाले किनारे की डोर को पहचान कर खीचने की ! यहाँ माँ ने सब सुलझा दिया था , सब अपने थे कोई अब अजनबी नहीं !!
                                                                                                          
 :: मनीष सिंह ::

Thursday, June 27, 2013

एक कहानी : हाईवे !!

                                तेज़ हवाओं और धूल का दौर अभी अभी ख़तम हुआ था !

         हलकी बूंदा बांदी होने लगी थी ! करण अपनी 2nd हैण्ड मारुती 800 के सामने वाले शीशे को साफ़ करने के लिए हाई वे के किनारे रुक कर कपड़ा ढूँढने लगा ! कपडा  डेशबोर्ड में मिला !
शीशा साफ़ कर के चलने को हुआ की पीछे से एक १६  - १८ साल के लड़के ने उसे पुकारा :

Excuse me सर !

करण ने पीछे मुड़ कर देखा : कौन ?

सर , मैं अनिरुद्ध हूँ !

करण : ओके, मुझ से क्या चाहते हो ?

अनिरुद्ध : सर अगर पुणे तक जा रहे हों तो मुझे भी बस पुणे के एंट्री पर ड्राप कर दें तो मेहेरबानी होगी ! मैं किराया दे सकता हूँ सर लेकिन मौसम खराब होने के कारण कोई बस नहीं आ रही और मेरे पास ये एक ही ड्रेस है जो गन्दी हो सकती है , काम पर पहुचने तक !

वो सब कह गया एक सांस में !

करण हलकी सी मुस्कुराहट के साथ सब सुनता रहा !

करण ने बिना एक मिनट लगाये उसको कहा : ठीक है अन्दर आ जाओ !

और  दूसरी तरफ का दरवाज़ा खोल दिया ! 

अनिरुद्ध अन्दर बैठ गया !

            बहार का मौसम काफी खराब हो चूका था ! तेज़ बारिश और हवा के करण कार चलाना मुश्किल हो रहा था ! कुछ भी साफ़ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था !

अनिरुद्ध शांत लेकिन बेचैन सा सावधान सा बैठा था !

कभी वो करण को देखता तो कभी बहार सामने पड़ने वाली बारिश की बूंदों को !

बीच बीच में बगल से बड़े बड़े ट्रक और गाड़िया तेज़ रफ़्तार से निकल जाती थी ! 

संतोष और बेचैनी का अजीब सा सन्नाटे वाला समय था उन दोनों के लिए कार के अन्दर !

       करण ने ऍफ़ एम् का कोई स्टेशन ट्यून करने की कोशिश करी ! मौसम के कारण सिर्फ घरघराहट के कुछ भी सुनाई नहीं देता था ! काफी कोशिश के बाद उसने कोशिश बंद कर दी और हंसते हुए अनिरुद्ध की तरफ देखा ! दोनों मुस्कुरा दिए ! कार अपनी धीमी रफ़्तार से पुणे की और बढ़ रही थी !
      लगभग 15 मिनट की ख़ामोशी के बाद करण ने अनिरुद्ध से पुछा : कहाँ रहते हो ?

अनिरुद्ध : सर, बस जहाँ से आपके साथ हूँ वह्नी हाई वे से नीचे की तरफ कोई २ किलोमीटर पगडंडी के रस्ते पर मेरा गाँव है !

करन : वहां सड़क नहीं है ?

अनिरुद्ध : है सर , लेकिन सड़क से कुछ दूरी बढ़ जाती है तो बाइक और पैदल सब लोग ईसिस रस्ते से जाते हैं !

करण : हम्म !! क्या करते हो ?

अनिरुद्ध :  सर , ओपन यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएसन कर रहा हूँ ! सब्जेक्ट इकोनोमिक्स हैं !

करण : अच्छी बात है ! अब कहाँ जा रहे हो !

अनिरुद्ध जैसे ही  बोलने को हुआ करन का मोबाईल बज उठा !

करण  : हाँ बोलो भाई !

कारन की पत्नी थी दूसरी तरफ से ! करण को उसकी वाइफ़ ने बताया की आगे पुणे हाई वे पर एक बड़ा सा हादसा हुआ है इस लिए जाम लग गया है !

करण  की वाइफ़ : तुम कहाँ हो इस वक़्त ?

करण : अब पता नहीं चल रहा , रुको देखता हूँ गाड़ी रोक कर !

करण ने अनिरुद्ध को बताया की उसकी वाईफ ने खबर दी है की आगे जाम है और हम शायद फंस चुके हैं जाम में ! आगे जाम और पीछे से गाड़ियों का रेला , कार मोड़ कर वापस जाने का कोई चांस नहीं !  बस चलते रहना होगा !

करण अपनी वाइफ़ से बोला : हमें अभी जाम नहीं मिला है और पीछे हम जा नहीं सकते ...इस लिए अब जो भी हो पुणे तो पहुचना ही होगा , तुम चिंता मत करो , और बार बार फ़ोन मत करना मैं वहां पहुच कर खुद कन्फर्म कर दूंगा , चलो बाय !

करण के चहरे पर थोड़ी शिकन आ चुकी थी ! शायद मीटिंग में देर से या फिर न पहुचने की शंका थी ! इधर अनिरुद्ध भी परेशान था ! सबरे जल्दी निकला था की 8 बजे की शिफ्ट पर टाइम पर पहुच जाएगा तो एक दिन की तनख्वाह नहीं कटेगी , लेकिन शायद ये भी संभव नहीं दिखाई दे रहा था उसको भी !

कार में फिर से ख़ामोशी !  शीशों पर पड़ती बारिश की बूंदों की आवाजें आज अच्छी नहीं लग रही थी ! गर्मी से तपते वातावरण में खुशनुमा सुगंध तो थी लेकिन दोनों का मानस चिंता में था !उलझन में था ! 

अब कार की गति और धीमी हो चुकी थी ! आगे सब रुके थे जो इनको तेजी से पीछे छोड़ कर आगे निकल गए थे वो भी कशमकश में थे !

करण ने अनिरुद्ध को देखा और दोनों फिर से मुस्कुरा दिए ! जैसे कह रहे हों भाई अब तो साथ पुणे तक है ही चाहे जो हो !

तभी अचानक करण को जैसे कुछ याद हो आया हो और अनिरुद्ध से बोला : तुमने बताया नहीं की कहाँ जा रहे हो ?

अनिरुद्ध : सर पुणे में एक तीन स्टार होटल में सर्विस बॉय का काम करता हूँ , सबेरे आठ बजे से शाम के आठ बजे तक !

करण : ने अपनी कलाई की घडी की तरफ देखा और बोला : अरे आज तो तुम समय से नहीं पहुच सकोगे  ! देखो 10 तो यहीं बज गए और पता नहीं कब तक रुकना पड़े !

अनिरुद्ध : हाँ सर आज तो हम दोनों परेशान हो गए !

करण : तुम्हे आज की सेलेरी नहीं मिलेगी ?

अनिरुद्ध कुछ नहीं बोला बस सर झुका लिया !

कार की छत पर बारिश की आवाज़ तेज़ हो चली थी  ! अन्दर भी जोर दे कर बोलना पद रहा था !

करण  : घर पर कौन है तुम्हारे ?  वैसे अब हम दोस्त हो गए हैं तो ये जान सकते हैं ! संकोच हो तो कोई बात नहीं !

अनिरुद्ध : अरे नहीं सर , अब हम दोस्त हैं और सफ़र लम्बा होगया है ! एक दुसरे को जान लेना लाज़मी हो गया है अब ! मेरे घर पर एक छोटी बहन है , पिता जी हैं और दादी है ! माँ नहीं है ! हम सब साथ रहते हैं ! पिता जी शुरू से ही घर पर रहे और खेतीबाड़ी का काम देखा और हम भी इसी कारण गाँव में , गाँव की रफ़्तार से ही प्रगति कर सके ! बाकि चाचा लोग बहार शहर में रहते हैं और सब ठीक ठाक हैं !

करण  सब सुन रहा था , अनमने ढंग से जैसे उसको तो बस रास्ता ख़तम होने की चिंता थी ! लेकिन अनिरुद्ध सब सही सही बता रहा है !

करण  : अच्छा !

अनिरुद्ध : सर आप क्या करते हैं और आपके घर पर ......!!

करण हलकी मुस्कान से अनिरुद्ध को देखते हुए बोलने लगा ! : हम बेसिकली चंडीगढ़ से हैं ! मुंबई में अपना घर है और मैं काम भी वहीँ करता हूँ ! एक मल्टीनेशनल कंपनी में ! ये मारुती तो हमारे सर्वेंट की है वो सब्जी और घर के काम के लिए इस्तेमाल करता है ! हमारे पास तीन बड़ी गाड़ियाँ हैं !

अनिरुद्ध ध्यान से सब सुन रहा था ! बारिश कम थी इस लिए आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी ! कभी कभी बीच बीच में सड़क पर देख लेते थे की रास्ता खुला की नहीं ! कारन बोलता जा रहा था !

करण : आज तीनो गाड़ियाँ सर्विस पर दी हैं और मुझे अर्जेंट यहाँ पुणे एक मीटिंग में आना था इस लिए ये ले आया !  घर पर एक माँ और पत्नी है ! पिता जी का देहांत हो चूका है ! रेलवे में बड़े अधिकारी थे ! 25 हज़ार रुपया माँ को उनकी पेंशन आती है !

अनिरुद्ध सोच रहा था और सुन रहा था ! उसने  ने बहार झाँक कर देखा तो घुमावदार सड़क पर रिमझिम बारिश में उनकी कार के पीछे और आगे अनगिनत गाड़ियाँ खड़ी थी ! एक राई के भी बराबर आगे पीछे खासकने की जगह नहीं थी !  आधुनिकता की पराकाष्ठा ये की एक नियत जगह से पहले कोई चाय , बिस्किट वाला नहीं मिलेगा इन हाई वे पर !

दोपहर के २ बज चुके थे !

करण  : भूख लग रही है ! कुछ खाने का भी नहीं रखा इस कार में ! बड़ी गाड़ी में तो सब रहता है ! सुबह हल्का नाश्ता ही किया था ये पता नहीं कब हम पुणे न सही कम से कम किसी ढाबे तक तो पहुचे!

अनिरुद्ध ने संकोच के साथ कहा : सर मेरे पास लंच है , आइये दोनों मिल कर खाते हैं !

करण : अरे नहीं ! तुम खाओ ! लो ये पानी की बोतल ले लो !

कुछ अच्छा नहीं लगा अनिरुद्ध को करण  का ऐसे मना कर देना ! फिर हिम्मत भी नहीं हुई दोबारा से पूछने की ! कितने बड़े घर से हैं करण , उनको कहाँ अच्छे लगेंगे उसकी बहन की हाथ की रोटियां और अचार !  अनिरुद्ध बस चुप चाप बैठ गया ! 

कभी रेडियो , कभी कार का शीशा , कभी बहार खड़े हो कर पड़ोस वाले कार वाले से बतियालेने में समय गुजर रहा था ! धीरे धीरे शाम के 4 बज गए ! करन को अब भूख बर्दाशत नहीं हो रही थी और ट्रेफिक था की टस से मस नहीं हो रहा था ! करण  से रहा नहीं गया और अनिरुद्ध से बोला : चलो अब लंच कर ही लेते हैं और अनिरुद्ध की तरफ हाथ बढ़ा दिया ! अनिरुद्ध सकते में था !

आनन् फानन में अपनी पेंट की जेब से एक पोलिथीन में लपेटे हुए पेकेट को करण की तरफ बढ़ा दिया !

करण  ने पेकेट खोल कर दो रोटियां अनिरुद्ध को दी और दो खुद ली एक एक अचार की फांक भी बाँट ली और खाना शुरू किया ! खाते समय दोनों कुछ नहीं बोले ! पानी पिया और सुकून लिया ! जैसे अगले 4 घंटो के लिए जान आ गयी हो !

अब दोनों को नींद आने लगी थी ! तभी अनिरुद्ध की तरफ किसी ने ठक ठक किया !

अनिरुद्ध : हाँ , क्या है ?

बाहर 10 साल के आस पास का एक लड़का मूंगफली बेच रहा था !

करण  ने 4 पेकेट ख़रीदे !

अब कार और दूसरी गाड़ियाँ आगे को सरक रही थी ! जाम खुल चूका था ! शाम के ५ बजे का समय था ! पुणे आने वाला था !

अनिरुद्ध बोला : सर आप मुझे यहीं ड्राप कर दीजिये मैं वापसी की बस ले लूँगा , अब होटल का तो समय रहा नहीं !

करण : नहीं तुम मेरे साथ चलो !

करण  अपने साथ उसको अपने पुणे के ऑफिस ले आया ! ऑफिस में चाय , काफी और समोसे भजिया का लुत्फ़ ले रहे थे सब !

करण  : हेलो !

कोई चार पांच लोग एक साथ करण का जवाब दे रहे थे : हेलो , अरे कहा थे भाई ?

बस हाय वे के जाम में था ! करण  एक काफी अनिरुद्ध की तरफ बढ़ाते हुए बोला !

भाई मीटिंग तो कल के लिए पोस्टपोन हो गयी है !

अब क्या वापस जाएगा मुंबई !

यही गेस्ट हॉउस में रुक जाओ कल मीटिंग अटेंड कर के चले जाना एच आर में हम बोल देते हैं !

करण  : हाँ वो कोई बात नहीं है !

आज रात मेरे साथ ये मेरा दोस्त अनिरुद्ध भी रुकेगा ! 

हम दोनों हाई वे के साथी हैं अपनी कंपनी में इसके लिए काम देखना हैं बस !

अनिरुद्ध को काम मिल गया !  ऑफिस  का काम ! सुबह ९ बजे से शाम ५:३० बजे तक का ! अब वो अपनी पढ़ाई ठीक से कर सकता था !

करण के फ़ोन से अनिरुद्ध ने अपने घर फोन कर दिया की और कल शाम को आयेगा !

उस रात बड़े बड़े लोगो के साथ उसने एक बड़े होटल में डिनर किया !

वैसे ये डिनर  उसके लिए नया नहीं था ! बस फर्क इतना था आज की वो टेबल के इस तरफ था !

करण  ने मीटिंग अटेंड कर ली !

  अनिरुद्ध ने पुणे के तीन स्टार होटल में जा कर उस दिन का काम संभाला और अपना रिजाइन दिया सब कुछ सही सही बताते हुए ! उसको सम्मान के साथ विदाई मिली ! 

शाम को एक आइसक्रीम की दूकान पर वो करण से मिला जहाँ कारन ने उसको आने को कहा था और
दोनों वापस मुंबई की तरफ चल दिए !

रस्ते में अनिरुद्ध को उसके गाँव के पास छोड़ कर करण आगे चल दिया !

करण   का मोबाइल नंबर अनिरुद्ध के पास था ,आगे किसी भी बात के लिए !

बॉम्बे पुणे हाई-वे के साथी दूर - दूर हो चले ,  लेकिन अब एक ही कंपनी में साथ- साथ थे ! 

साथ संबंधों में प्रगाढ़ता लाता है , और दूरियां परिपक्कवता !!

                                                                                                 :: ~~ :: मनीष सिंह

Saturday, June 22, 2013

एक कहानी : फिर मिले , ना मिले !!

                     हल्की हल्की धूप में धुधली दिखती अपनी ही परछाई को देखता हुआ विप्लव मोहल्ले के नुक्कड़ की दूकान की और चला जा रहा था ! हाफ पेंट हाफ कमीज़ और सफ़ेद हाफ स्वेटर जो उसकी माँ ने बुना था पिछले साल पेहेन रखा था ! ठंडक थोड़ी कम थी इस लिए माँ ने भी नहीं टोका की फुल पेंट पेहेन लेने को ! पार्क के बीचों बीच से विप्लव अपनी धुन में चला जा रहा था सुई लेने को की अचानक किसी ने उसको पुकारा !

कहाँ भाई !! दुसरे कोने पर खड़ा अर्पण उसको पूछ रहा था !

विप्लव : सुई लेने जा रहा हूँ !

अर्पण : ठीक है , बाद में यहाँ आना !

विप्लव : पता नहीं माँ आने देगी की नहीं !

अर्पण : पूछ कर तो देखना !

विप्लव : ठीक है , तुम वहीँ रुको !

              जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए दूकान में घुसा ! पहले से ही बहुत भीड़ ! अभी अभी कोने के स्कूल की सेकण्ड शिफ्ट की छुट्टी हुई थी तो सब बच्चे अपने अपने पसंद की चीज़ें खरीद रहे थे , तो अंकल को विप्लव की तरफ धयान देने का मौका ही नहीं मिल पा रहा था ! बहुत परेशान ! अगर जल्दी नहीं गया तो शाम हो जाएगी और फिर तो माँ बिलकुल नहीं आने देगी बाहर खेलने को ! इसी परेशानी में उसने जोर से बोला :

अंकल से सुई दे दीजिये :

अंकल : ज़रा रुको , अन्दर से लानी होगी और अभी भीड़ है , थोड़ी देर में देता हूँ !

विप्लव : अरे मुझे भी जल्दी हो सकती है !

अंकल : हाँ लिकिन यहाँ मेरी मदद को कोई नहीं है , इसलिए बोल रहा हूं !

विप्लव : आप तो कुछ नहीं समझते !

अंकल : ज़रा सा रुको अभी देता हूं , लो तब तक ये टॉफी खाओ - एक ऑरेंज वाली टॉफी विप्लव की तरफ बढ़ाते हुए बोला !

विप्लव : ठीक है , दीजिये ! विप्लव टाफी खाने लगा और भीड़ के छटने का इंतज़ार करने लगा !

आधा घंटा हो गया ! बच्चे कम हो गए थे !  एक दो बड़े  बच्चे कुछ बड़ी बड़ी बातों में लगे थे और छोटे बच्चे अपने घर जा चुके थे ! इसी बीच अर्पण भी विप्लव को देखने वहां दूकान पर ही आ गया !

अर्पण : यार सो गए क्या !

विप्लव : नहीं बस भीड़ थी तो अंकल अभी सुई निकाल कर लाये !

अर्पण : तो चलो फिर , अब क्या देर है ?

विप्लव ने कोने में खड़े तो बड़े बच्चो की तरफ इशारा करते हुए कहा सुनो वो भैया क्या बातें कर रहे हैं ! अर्पण को भी कुछ अच्छा लगा और वो भी वहीँ बैठ गया , साइड में रखे स्टूल पर !  देर तक वो उनकी  सुनते रहे !  वो दोनों भी इस बात से बे परवाह की कोई उनको सुन रहा है , बातें करते रहे ! हलकी बारिश शुरू हो चुकी थी बाहर !

अंकल ने उन दोनों बड़े बच्चो को कहा - बेटा बहुत देर हो गयी है आप अपने घर जाओ ! आपके पेरेंट्स परेशान होते होंगे !

अंकल की आवाज़ सुन कर इन दोनों अर्पण और विप्लव का भी ध्यान टूटा ! क्यों की ये दोनों नीचे की तरफ बैठे थे तो काउंटर के कारण अंकल को दिखाई नहीं दे रहे थे ! दोनों उठे और चलने को  हुए की  तभी विप्लव की माँ की आवाज़ सुनाई दी !

भाईसाब विप्लव आया था यहाँ ?

अंकल कुछ बोल पाते की विप्लव और अर्पण दोनों माँ के सामने खड़े दिखाई दिए !

माँ : इतनी देर से क्या कर रहे हो दोनों यहाँ ?

विप्लव : भैया की बातें सुन रहे थे !

माँ : क्या ?

अर्पण : हां आंटी जी हम बड़े भैय्या जी की बातें सुन रहे थे  !

माँ ने कुछ रिएक्शन नहीं दिया और बोल : अच्छा अब चलो घर , अर्पण तुम भी अपने घर जाओ !

शाम ढल चुकी थे ! सर्दियों में शाम जल्दी हो जाती है ! हलकी बारिश ने मौसम चाय और पकोड़ियों वाला कर दिया था ! अंकल ने अन्दर और बहार का बल्ब जलाया! और बहार जा कर देखा की कुछ भीग तो नहीं रहा ! बाहर वो दोनों बड़े बच्चे अभी भी स्कूल यूनिफार्म में खड़े कुछ बतिया रहे थे ! धीरे धीरे ! बारहवीं क्लास के बच्चे क्या बात करते होंगे इस उम्र में ! अंकल ने सोचा और उनके पास जा कर कहा , कल स्कूल नहीं आना है क्या ?

ना अंकल : कल के बाद शायद हम फिर ना मिलें ! मेरे पेरेंट मुझे रूस भेज रहे हैं और इसके फादर इसको आय आय टी मुंबई में दाखिले के लिए ले जा रहे हैं ! इस लिए हम ज्यादा से ज्याद टाइम एक दुसरे को देना चाहते हैं ! अंकल ने हलके से मुस्कुराते हुए कहा अच्छा बेटे , ठण्ड हो गयी है दूकान के अन्दर आ जाओ ! दोनों अन्दर आ गए !

शाम को दूकान में चेहेल पहेल बढ़ गयी ! लोग आ रहे थे , जा रहे थे!  आंटी दो बार चाय  कर अंकल को दे चुकी थी ! अब खाने के लिए बुलाने आयीं ! एक रायते की बूंदी का पेकेट देना और अब दूकान बंद  करो मैं खाना लगाने जा रही हूँ !  अब उन दोनों को बिछड़ना ही होगा ! दोनों अपने हाथों में हाथ डाले बाहर के पार्क की और चल दिए  और अंकल की आँखों से ओझल हो गए ! कोहरा पड़ने लगा था !

अंकल ने बाहर रखे दूकान के सामान को अन्दर करना शुरू किया ! बीच बीच में वो पार्क की सीट पर बैठे उन दोनों को देख लेते थे ! पता क्या बतियाते होंगे वो ! किस बात को बार बार सोचते होने ! 
बस रात के १० बज चुके थे ! विप्लव और अर्पण सो चुके थे ! अंकल खाना खा कर टहलने के लिए पार्क की तरफ चले ! वो दोनों वहीँ थे ! अंकल ने अब जोर से कहा ! अब तुम दोनों को घर  जाना ही चाहिए ! ठीक है अंकल कहते हुए दोनों घर चल दिए ! अगले मोहल्ले में ही उनके घर थे !

दिन बीते , महीने गुजरे ,साल बदले ! अंकल रोज़ अपनी दूकान लगते और शाम को बंद कर देते ! दिन भर पास के स्कूल के बच्चो की चेहेल पहेल और सुबह शाम बड़े लोगों की ज़रुरत की चीजों को लेने का ज़मावड़ा लगा रहता ! उनके अपने बच्चे थे नहीं ! इस लिए कमाने की हाय तौबा नहीं थी !  जैसा चल रहा था बहुत अच्छा था ! अंकल ने आंटी के लिए इलेक्ट्रिक ओवन ला कर रख दिया था ! अब वो ज्यादा देर तक कड़ी हो कर खाना  नहीं पाती थी ! ओवन दे आराम हो गया था !

दोपहर के २ बजे एक चमचमाती हुई बड़ी सी गाड़ी से दो लोग उतर कर अंकल की दूकान पर आये और बोले : अंकल दो पेटीज दीजिये !

अंकल ने सोचा इतनी बड़ी गाड़ी , इतने बड़े लोग ये तो पड़ोस के डोमिनोस में भी जा कर खा सकते थे ! इनको कैसे पता की यहाँ पेटीज भी मिलती हैं ! मेरी दूकान का तो पिचले दस साल से पेंट भी नहीं हुआ !

अंकल हो सके तो आंटी जी से कह कर गर्म करवा दीजियेगा !

हाँ बेटे , बस  पांच मिनट रुको ! अंकल अपनी उम्र से ज्यादा तेज़ चाल से अन्दर की तरफ चल दिए कहते हुए : हाँ ये दो पेटीज ओवन में रखना !

तभी दो लड़के दूकान में और दाखिल हुए ! अरे आज अंकल को अपनी दूकान की चिंता नहीं ! काउंटर एकदम खाली !

ये सुन कर पहले वाले गाड़ी वाले दो लड़कों ने कहा ! अभी आ रहे हैं , अन्दर तक गए हैं !

इन नए लड़कों ने उन दोनों को देखा और मुस्कुराये !

कार वाले लड़कों ने कुछ सोचा और इन के पास आये और बोले : क्यों भाई क्या हुआ ?

अर्पण और विप्लव ये दोनों आज बारहवीं में थे और वो दोनों कार वाले लड़के वो ही लड़के थे और कुछ साल पहले इसी दूकान में खड़े देर रात तक बतियाते रहे थे !

अर्पण और विप्लव फिर से मुस्कुराये और बोले ! भैया आप दोनों वो ही हो ना जो स्कूल ख़तम होने के बाद यहाँ आ कर खूब बातें करते थे और उस दिन तो अलग अलग सी बात कर रहे थे ! हमने सब सुना था !

इतना सुन कर कर वाले लड़कों ने अपना हाथ अर्पण और विप्लव की और बढ़ा कर अपने गले से लगा लिया ! जैसे कितने पुराने दोस्त फिर से मिल गए हों !

उन कार वाले लड़कों के लिए अंकल जी दो पेटीज अलग अलग डिस्पोज़ल प्लेट में सॉस का पाउच रख कर लाये  और बोले : ये लो बेटा !

कार वाले लड़कों में से एक बोला : अंकल जी दो और चाहिए !

अंकल : हाँ हाँ , तुम्हारी आंटी ने पहले से ही दो और गर्म कर रखे हैं , अभी लाता हूँ !

तब तक आंटी बहार आ गयी दोनों बचे पेटीज को ले कर ! लो बेटा !

लो भाई दोस्तों : कार वाले लड़कों ने अर्पण और विप्लव की और इशारा करते हुए कहा !

अंकल ने आश्चर्य से पूछा : तुम जाने तो अर्पण इनको ?

अर्पण : अंकल आप भी जानते हैं इनको !

अंकल : कैसे ?

विप्लव : याद कीजिये , कुछ साल पहले मैं तो अर्पण आपकी दूकान में देर तक बैठे रहे थे और दो बड़े भैया की बात सुन रहे थे !

अंकल : हाँ याद आया , तो ?

अर्पण : ये भैया दोनों वो ही तो हैं !

दोनों कार वाले लड़कों ने अंकल और आंटी की तरफ देखा और हाथ जोड़ कर नमस्कार किया ! जी हम वो ही हैं ! मैं आपके जिले का फ़ूड सप्लाई देखता हूँ और ये आपके पडोसी जिले का मुख्य सवास्थ्य अधिकारी है ! आज हम आपसे ही मिलने आये थे ये सोच कर की आप हमें पहचान पाते हैं की नहीं ! लेकिन आज हमें दो और पुराने दोस्त मिल गए !

अंकल और आंटी एक दुसरे को देख रहे थे !

आंटी बोली ! बेटा वैसे हो हम आप के बराबर नहीं हैं फिर भी अगर आज रात का खाना आप हमारे साथ करो तो ये समय और यादगार हो जायेगा !

C M O बोला : ये ही तो हम भी कहने वाले थे की आज रात का खाना हम सब साथ खाएँगे !

अर्पण और विप्लव तुम दोनों घर पर बोल कर  आ जाओ जल्दी से ,हम डिनर के लिए बाहर  चल रहे हैं !

विप्लव और अर्पण , आंटी और अंकल और दो पुराने दोस्त एक बड़े होटल के रेस्टोरेंट में दाखिल हुए और देर रात तक फिर से आनंद में खो गए अगली मुलाक़ात के लिए ! 

अंकल और आंटी की आँखें डबडबा रही थीं सोचते हुए की सब तय होता है !

मिलना और बिछड़ना और फिर से मिलना !

क्या पता , फिर मिले ना मिले !!                                                                                                    

बचपन अब यादों में !

                                                                                                                              :: -- :: मनीष सिंह


Thursday, June 6, 2013

एक कहानी : वेटिंगरूम के हमसफ़र !

             कुंदन उसको स्टेशन पर छोड़ कर अपने ऑफिस जा चुका था ! नाईट शिफ्ट जो थी उसकी ! लखनऊ हो कर दिल्ली जाने वाली ट्रेन आज काफी लेट थी ! वाणी और कुंदन के सोचा था की २ घंटे की तो बात है , ऐ सी वेटिंग रूम में निकल जाएँगे ! वाणी सीढ़ियों से होते हुए प्लेटफोर्म नंबर एक पर बने ऐ सी वेटिंग रूम में दाखिल हुई ! गेट पर बैठी एक नीली सी साड़ी में महिला ने वाणी को अपनी पहचान और अपनी करंट टिकेट डिटेल वहां रखे रजिस्टर में भरने को कहा !

वाणी : ये कब से शुरू हो गया ?

महिला कर्मचारी : मेडम जी ये सिस्टम तो शुरू से है !

वाणी : ओह्ह हाँ मैं ही पहली बार किसी स्टेशन के वेटिंग रूम ने रुक रही हूँ ना इस लिए ऐसा पूछ लिया !

महिला कर्मचारी : जी कोई बात नहीं ! आप ये सब कालम भर दीजिये !

वाणी: हाँ ज़रूर , लाइए !

वाणी ने सब कुछ लिख कर अपने छोटे सिग्नेचर किये !

महिला कर्मचारी ने रजिस्टर अपनी तरफ घुमाते हुए हलके से कहा : दिल्ली जा रही हैं ?

वाणी अपने एअर बैग को सरकाते हुए मुस्कुराते हुए बोली : जी हैं , माँ के पास !

महिला कर्मचारी : अच्छी बात, माँ से तो मिलना ही चाहिए !

           वाणी ने कुछ नहीं बोल कर उनकी हाँ में हाँ मिलाई और वेटिंग रूम में बैठने के लिए जगह देखने लगी ! वैसे तो पूरा वेटिंग रूम जनरल वेटिंग रूम की तुलना में खाली खाली था , फिर भी बैठने के लिए एकांत चाहिए था इसलिए उसने महिला कर्मचारी से कुछ दूरी पर ही खाली पड़े तीन कुर्सियों के सेट पर अपना एयर बैग और लैपटॉप बैग रखा और खुद बैठ गयी ! क्योकि वो सीट दरवाज़े के पास थी इसलिए अन्दर का हर कोना वहाँ से दिखाई दे रहा था !
          
           वाणी ने अपने हैण्ड बैग से दो दिन पहले ही कुंदन का गिफ्ट किया हुआ सफ़ेद रंग का एप्पल iPod निकला और पुराने गानों का फोल्डर सर्च करने लगी !

            तभी रेलवे की एनाउंसमेंट होने लगी : यात्रीगण कृपया ध्यान दें , हावड़ा से चलकर लखनऊ होते हुए नई दिल्ली जाने वाली ट्रेन  ४ घंटे देरी से आने की सब्भावना है ! यात्रियों को हुई असुविधा के लिए हमें खेद है ! रात के सवा ग्यारह बज रहे थे ! चार घंटे लेट यानि सुबह के तीन बजे लगभग ! वाणी ने गहरी सांस ली ! iPhone  पर लता मंगेशकर का एक पुराना गाना चलने लगा था ! अब तो अगले ४ घंटो तक वो वेटिंग रूम ही साथी था ! वाणी ने एक सरसरी निगाह पुरे वेटिंग रूम के हर कोने पर डाली ! कोई ६ सात लोग ही थे !
            थोड़ी देर पहले सब अपने अपने में व्यस्त लेकिन जैसे ही एनाउंसमेंट हुई सब ने एक दुसरे को बड़ी ही अतामियता से देखा !
             जैसे कह रहे हों कोई बात नहीं हम आप के साथ साथ हैं ! एक दुसरे से बिना शब्दों के ही बात कर ली ! दो अधेड़ उम्र के शख्स साथी बन गए और अपना सामान वहीँ रख कर चाय पान करने को चल दिए ! दो लोग जो चालीस के नीचे रहे होंगे भी बाते करने लगे : आयिए सर बहार लहेल आते हैं , नींद तो कहाँ आयगी अभी ! चलिए कह कर वो लोग भी वेटिंग रूम के बहार चल दिए और महिला कर्मचारी से इशारों में अपने सामान की देख भला के लिए कह दिया !
   अब वेटिंग रूम में  यात्रियों के नाम पर बस वाणी एक संत जो चुपचाप अपनी सीट पर सो रहे थे और एक सोलह सत्रह साल का लड़का रह गए थे !   
        अगले दस मिनट तक किसी ने किसी जो नहीं देखा ! थोड़ी देर के बाद वाणी ने समझा की वो लड़का कुछ देर से वाणी को देख रहा है , जैसे कुछ पूछना चाहता हो !

तभी तेज़ बारिश शुरू हो गयी !

    महिला कर्मचारी बडबड करने लगी : बस इसकी ही  कमी थी ! इतनी ठंडक वैसे ही है ऊपर से यस बारिश ! भगवान् भी नहीं सोचते की कितने परेशान होते होंगे वो लोग जिनको गरमा कपडे नहीं है !  

              वाणी और उस लड़के का ध्यान उधर गया ! वाणी ने अपने कान से इयरफोन निकाल दिया और बारिश की आवाज़ सुनने लगी ! सुनसान प्लेटफार्म ! बहुत कम लोग ! वज़न तोलने वाली मशीन के भीतर जलते बुझते बल्बों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी , जो वेटिंग रूम के पास ही लगा था !  अपनी टोकरी में कुछ जामुन रखे जल्दी जल्दी अपने घर लौट रहा था ! दिन के समय कंधे से कंधे टकराने वाली भीड़ और इस समय एक भयावह सन्नाटा पसरा पड़ा था प्लेटफोर्म पर !  दूर तक इक्का दुक्का आदमी किसी कोने की तलाश में भटकते दीख पड़ते थे ! प्लेटफार्म की केन्टीन भी वेटिंग रूम से कुछ दूरी पर थी! दिन का समय होता तो कोई बात नहीं लेकिन रात के बारह बजे वाणी को चाय की ज़रुरत के बावजूद वो कंटीन बहुत दूर लग रही थी !

हिम्मत नहीं पड़ी की बाहर निकले !  दूर बैठा वो लड़का शायद ये भांप गया ! उसने अपना लेपटोप का बैग उठाया और वेटिंग रूम के दरवाज़े के पास आ कर खड़ा हो गया ! ठंडी हवा थी ! सिर्फ एक टी शर्ट और जींस में था वो !

महिला कर्मचारी ने लगभग डांटते हुए कहा :  स्वेटर नहीं है आपके पास ?
लड़का : जी अपने मुझ से कुछ कहा ?

महिला : हाँ जी , स्वेटर नहीं है आपके पास ?

लड़का : है तो !

महिला : पेहेन क्यों नहीं लेते ?

लड़का : हाँ शायद पहनना ही पड़ेगा !

महिला : पड़ेगा ? पेहेनिये अभी ! ठण्ड लग गई ना तो आपको कुछ नहीं आपके माता पिता को मुश्किल होगी !

लड़का गंभीर हो गया ! वाणी के एयरबैग पर अपना पिट्ठू बैग रख कर उसने स्वेटर निकल कर पहना!
महिला मुस्कुराई और बोली : चाय पीने जा रहे हो ?

लड़का : जी हाँ :

महिला : ठीक है जाओ , बैग चाहो तो  रख दो , मैं हूँ यहाँ रात भर !

लडके ने अपना बैग वाणी के एयरबैग के बगल में रख कर बाहर की तरफ चल दिया !

वाणी ये सब देख और सुन रही थी ! लड़के को पीछे से बुलाने के लिए उसने महिला को इशारा
किया ! महिला ने लड़के को कहाँ वो बुला रही है तुमको ! जैसे इसी समय का इंतज़ार था !
लड़के ने मुड कर वाणी को देखा और बोल : जी कहिये ?

वाणी : एक चाय मेरे लिए भी लेते आयेंगे प्लीज़ ?

लड़का : अरे उसमे क्या है , बिलकुल !
वाणी में अपने पर्स में से पचास रुपए का नोट निकला और छोटा थरमस आगे बढ़ाते हुए लड़के को थैंक्स कहा !
लड़का थोड़ी देर में चाय और मीठे बिस्किट के पेकेट ले आया  ! तीन प्लास्टिक के गिलास भी  लाया था !

लीजिये : लड़का वाणी से बोला !

वाणी : ये सब  क्या ?

लड़का : अब रात के साढ़े बारह बज रहे हैं और चाय के साथ समोसे तो मिले नहीं इस लिए बिस्किट ले आया ! और हाँ आपका पचास का नोट लिया नहीं उसने , ये लीजिये !

वाणी : अरे क्या ये नकली है , क्यों नहीं लिया ?

लड़का : खुले नहीं थे भाई उसके पास !

वाणी , लड़का और महिला सब हलके से मुस्कुराये ! माहौल में हलकी गर्माहट आ गयी थी !
लड़के ने एक एक कर के थरमस से चाय महिला , वाणी और खुद ली ! सब तेज़ बरसते पानी में झूमती हवा की ठंडक के बीच रात के बारह के बाद रेलवे प्लैटफार्म पर चाय और बिस्किट का आनंद ले रहे थे ! कोई किसी को नहीं जनता ! लेकिन केवल तीन घंटो में एक रिश्ता बन गया था ! जिसकी कोई परिभाषा नहीं !

लड़का : आपका iPhone  बहुत सुन्दर है !

वाणी : हाँ मेरे हसबेंड ने दो दिन पहले ही गिफ्ट किया है मुझे हमारी फर्स्ट वेडिंग एनिवेर्सेरी पर !
वाणी बोलती रही : अच्छा तुम्हारा नाम क्या है ?


लड़का : जी , अविरल , आप मुझे अवि कहे सकती हैं ! आपका नाम ?

वाणी : मेरा नाम वाणी है , अब तो श्रीमती वाणी हो गयी हूँ !

अवि : हल्का सा मुस्कुराया !

अविरल और वाणी के बीच ५ सालों के उम्र का फर्क होगा !

वाणी : क्या करते हो अवि ?

अवि : फिलहाल तो घूम फिर रहा हूँ ! कभी किसी रिश्तेदार के घर तो कभी किसी दोस्त के घर ! जस्ट इन्टर पास किया है 9 0  परसेंट से ! 

वाणी : गुड ,कहाँ के रहने वाले हो ?

अवि अभी कुछ बोल पाता की एक माल गाड़ी की लम्बी सीटी ने माहौल में झन्नाहट ला दी !  उसने सब को ५ मिनट के लिए चुप कर दिया ! इस बीच अवि ने वाणी के iPhone  को अपने हाथों ने ले लिया !

वाणी तुम्हे पसंद आया ?

अवि : बहुत !

वाणी : रख लो !

अवि : जी , क्या ?

वाणी : तुम्हे पसंद है तो रख लो !

अवि : इतना मेहेंगा सामान आप ऐसे ही मुझे गिफ्ट कर देंगी ?

वाणी : तुम्हे पसंद है और मैं तुम्हे दे रही हूँ बस ये ही बात इम्पोर्टेंट है !

अवि : जी थैंक्स लेकिन एक और बात इम्पोर्टेंट है !

वाणी : वो क्या ?

अवि : किसी के दिए गिफ्ट को किसी और को नहीं दिया जाता !

वाणी : ये भी सही है ! तो फिर किया क्या जाये ?

अवि : कुछ नहीं मुझे थोड़ी देर इस पर गाने सुनने दीजिये ! मैं भी खुश और आप भी !

वाणी : ठीक है ,सुन लो !

बारिश और तेज़ हो चुकि थी ! रात के सवा से डेढ़ का समय होगा ! वाणी वाशरूम जाना चाहती थी ! उसने महिला कर्मचारी को कहा  मेरे साथ चलिए ! और दोनों सब कुछ अवि के भरोसे चले गए !

वाणी का मोबाईल बज उठा ! अवि ने देखा कुंदन का नाम से काल आ रही थी? कुछ देर इंतज़ार करने के बाद लगातार बजते फोन को उठा लिया और जवाब  दिया : हेलो सर !

कुंदन : हेलो , कौन ?
अपनी पत्नी के फ़ोन पर किसी और की आवाज़ और वो भी लडके की ! रात के समय ! तेज़ बारिश ! पता नहीं क्या क्या किस किस सीमा था सोचने लगा वो !

अवि : जी मैं अविरल राणा !
कुंदन : अविरल ? कौन अविरल ? और वाणी कहाँ है ?

अवि : जी वो वाशरूम गयीं हैं !

कुंदन : ओके , आपके पास फ़ोन क्यों है और आप हैं कौन ?

अवि सोचने लगा की क्या समझाऊं , क्य़ा  बताऊँ।

अवि : जी मैं वाणी जी की ही ट्रेन का हमसफ़र हूँ और ट्रेन लेट होने के कारण  हम साथ में ही वेटिंग रूम में रुके हैं ! मुझे फ़ोन अच्छा लगा इस लिए सोंग्स सुनने के लिए दिया है उन्होंने !

कुंदन : अच्छा ये बात है ! नो इस्शु वाणी के वापस आने पर कहियेगा मुझ से बात कर ले !
अवि : जी अच्छा !

और दूसरी तरफ से कुंदन ने फोन दिस्कंनेट कर दिया !

अविरल सोचने लगा क्या कुछ हो गया न इन तीन घंटो में ! कितना करीब करीब से हो गए हम सब ! जिस बात को ले कर घरों में क्या क्या ना हो जाये ये सब इतना आसानी से सुलझ गया ! तभी वाणी आती दिखाई दी ! अविरल रुक न सका ! जल्दी जल्दी बोलने लगा : आपके कुंदन जी का फ़ोन आया था ! आप उनको कॉल बक कर लीजिये !

वाणी : हलके से मुस्कुराई और बोली : ओके , अभी करती हूँ !

अवि ने कहा : आप तुरंत कीजिये !

वाणी : ठीक है लाओ फ़ोन दो !

अवि ने फ़ोन उसके हाथों में दे दिया !

वाणी : हाँ जी बोलिए !

उधर से कुछ पुछा कुंदन ने !

वाणी ने अवि से पुछा : तुम कितने साल के हो ?

अवि : जी इस साल अट्ठारह में लगूंगा !

वाणी : सुन लिया ?

कुंदन : हा हा हा !

वाणी : कैसे फ़ोन किया था ?

कुंदन : बस पूछने के लिए कहाँ तक पहुची ?

वाणी : घर पहुच कर फोन कर दूंगी , अब रखती हूँ, सब की नींद खराब हो रही है हमारी बात चीत से !

अवि को ये सब ज़रा अटपटा सा लगा !

अवि के पूछने से पहले वाणी ने कहा : हमारा कल ही डिवोर्स हो गया है !

अवि और वो महिला कर्मचारी सन्न रह गए ये सुन कर !

वाणी बोलती रही : कल ही कन्फर्म पेपर मिल गए हैं और अब मैं अपने ताऊ जी के घर अपनी माँ के पास जा रही हूँ ! शायद दूसरी शादी होगी , लेकिन इस बार एंगगेज़ेद ! कुंदन और मेरी लव मैरिज थी!
अवि अभी शायद छोटा था इन सब बातों के लिए लेकिन समझ सब रहा था और उसने पूछ लिया !

अवि : क्यों हुआ आपका डायवोर्स ?
तभी रेलवे की अनाउन्समेंट हुई की दिल्ली की गाड़ी एक घंटे में आने वाली है !!

वाणी : अवि , ये तो मुझे भी अभी तक नहीं समझ में आया !

अवि : एक साल साथ रहने के बाद !

वाणी : हाँ ! परिवार के खिलाफ हमें शादी का फैसला किया था ! क्लास 9th से हम साथ थे !
मेरे ताऊ जी के दोस्त का बेटा है वो !  स्कूल में , कालेज में सब जगह मेरा खूब ख्याल रखता था वो ! एक बार तो प्रिंसिपल मेम से मेरे लिए उसने पिटाई खायी थी ! लंच में बाहर जाना allowed  नहीं था और बाहर की चीज़  तो  बिलकुल नहीं ! एक  दिन मैंने कुंदन को शरीफा लाने  को कहा वो गार्ड से बात कर के बाहर गया और ले आया ! शाम को प्रिंसिपल ने खूब धुनाई करी हीरो की !
अवि सब सुन रहा था और बोल पड़ा : आप फिर भी इनसे दूर होना चाहती हैं ?

वाणी : आजकल वो सिर्फ काम काम पर ध्यान देते हैं !

दिन मैं सोते हैं और रात में काम ! कितनी बार तो दस दस दिनों के लिए बाहर रहते हैं  ! मुझ पर कुछ ध्यान नहीं ! क्या करती मैंने और कुंदन ने ये फैसला लिया की जब हम एक दुसरे को समय दे ही नहीं सकते तो फिर ऐसे बंधन का फायदा ही क्या !

अवि  यहाँ थोडा असहमत लगा ! उसने वाणी से उसका फ़ोन माँगा !

वाणी बोली : क्या हुआ ?

अवि दीजिये तो सही ! उसकी बोली में हक़ से गंभीरता थी!

वाणी के फ़ोन से उसने कुंदन को फ़ोन किया :

कुंदन : हाँ वाणी बोलो !

अवि : भैय्या मैं अवि बोल रहा हूँ !

कुंदन : हाँ जी हमसफ़र भाई  , बोलिए !

अवि : भैय्या , आप अभी स्टेशन आ सकते हैं ?

वाणी भी  बोली क्यों ?

कुंदन : क्यों क्या हुआ ?

अवि :  हो गया है , फ़ोन पर नहीं बता  सकता !

कुंदन : वाणी को फ़ोन दो !

अवि : नहीं , आप आइये पहले !

कुंदन : ठीक है , १/२ घंटे में पहुच रहा हूँ !

अवि : ओके एंड थैंक्स भैया !

वाणी : क्यों बुलाया उसको ?

अवि : बस आने दीजिये !

वाणी : ट्रेन आने वाली है और तुमने उसको बुला लिया !

अवि : ट्रेन तो रोज़ आती हैं , कल फिर आयगी !

वाणी : मतलब ?

अवि ने मोबाईल वाणी की तरफ बढ़ाते हुए कहा, बस अभी आया !
महिला कर्मचारी चुप चाप सब देख रही थी और शायद अवि की मंशा समझ भी रही थी !

अविरल केन्टीन की और चल दिया ! सोचते हुए ये ही कारण था की इतना महंगा iPod मुझे देने लगी थी वो ! कितनी अच्छी तो है ! इन्हें एक साथ होना चाहिए !


थोड़ी देर में कुंदन आता हुआ दिखाई दिया !

हाथों में हेलमेट देख कर अविरल ने उसे पहचान लिया और कंधे पर हाथ रखते हुए बोला : कुंदन भैया ?

कुंदन को जैसे मालूम था : हां हमसफ़र , कुंदन !

अवि : ने गले से लगा लिया कुंदन को !

कुंदन ने भी गले से लगा लिया उसको ! अनोखा नज़ारा रात के ढाई बजे रेलवे स्टेशन पर !
कुछ समोसे , पेस्ट्री और कोक की के कंटेनर ले कर दोनों वेटिंग रूम में पहुचे !

कुंदन : हेलो वाणी ! कैसी कट रही है ये बारिश की  रात वाटिंग रूम में ?

वाणी : कुछ नहीं बोली !

अविरल ने मोर्चा संभाला :  आज कोई कहीं नहीं जा रहा ! हम यहाँ आपकी दूसरी शादी की पार्टी कर रहे हैं !

कुंदन और वाणी दोनों अवाक हो कर अविरल को देख रहे थे !

उसने ये सब कुछ इतना जल्दी और बिना किसी भूमिका के कह दिया था की दोनों निःशब्द !

अवि : चलिए भाई मेरे इस रेड पेन से वाणी दीदी की मांग भरिये !

कुंदन : जरा समझो यार !

वाणी : अवि , ये सब क्या है ?

अवि : आप दोनों अलग नहीं हो रहे बस ये है सब !

कुंदन ने वाणी की तरफ लालसा भाई निगाहों से देखा ! वाणी भी शायद ऐसा कुछ चाहती थी !
दोनों गले मिले ! कुंदन ने मांग भरी लाल इंक से और सब ने तालियाँ बजाई !

वाणी के ही iPhone  से फोटो निकली गयीं बस  तभी दिल्ली वाली ट्रेन के प्लेटफोर्म पर लगने का अनाउन्समेंट हुआ !

कुंदन : कोई कहीं नहीं जा रहा !

वाणी : हाँ ये अवि भी कही नहीं जा रहा !

अवि : अरे दीदी , अरे भैया कल से मेरी क्लास शुरू हो रही हैं दिल्ली में  !

कुंदन और वाणी दोनों एक साथ बोले : हमारी क्लास यहाँ लगा कर तुम दिल्ली जाओगे !! शांत रहो और चलो हमारे साथ !

          पूरा वेटिंग रूम महकने लगा था , बंधन की खुलती गाँठ के फिर से बंधने की प्रक्रिया से ! कोक समोसे और पेस्ट्री सब के साथ चाय वाले ने चाय देनी शुरू कर दी थी !  लोग बधाई दे रहे थे और अवि iPhone पर गाने सुनता हुआ सवेरा होने का इंतज़ार करता हुआ दिल्ली की और सरकती हुई ट्रेन को देख रहा था !
             चलो भाई हमसफ़र , कुंदन और वाणी ने अवि को  पुकारा और सब घर की तरफ चल दिए !
                                                                                                                                 :: मनीष सिंह ::

Monday, June 3, 2013

एक कहानी : वो सफ़ेद शंख !!

               सब अपने अपनों की शुभयात्रा के  लिए शुभकामनाये स्वीकार कर रहे थे !
         कोई किसी को छोड़ने आया था तो कोई किसी कोई मोबाइल पर ही विदा कर रहा था ! कोई किसी के लिए खाने के पेकेट और ठंडा पानी ले कर आया था तो किसी के फ्रेंड्स अपने घर जाते हुए दोस्तों को फ़ास्ट फ़ूड की भेंट दे रहे थे , कोल्ड ड्रिंक्स के साथ साथ !
             रात के कोई दस बज कर पेंतीस ( १०:३० ) हो रहे थे और ओडिशा के पुरी के लिए जाने वाली एक प्रसिद्ध ट्रेन पुरुषोत्तम एक्स्प्रेक्स नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म से धीरे धीरे सरक रही थी ! प्लेटफोर्म की रौशनी धीरे धीरे कम हो चली थी ! आस पास बैठे लोग अब एक दूसरों में अगले लगभग तीस घंटों के लिए साथी की तलाश  करने लगे थे  जो अब तक दूर दूर थे ! एस वन ( S 1 ) की चौंतीस नंबर की बर्थ पर वो बैठा था ! खामोश ! बिना किसी के साथ ! एक तक खिड़की से बाहर देखते हुए ! बाहर बिलकुल घुप अँधेरा हो चुका , वो अब भी वैसे ही बाहर देख रहा था  !
           आधी रात के आस  पास का समय था ! कुछ लोग खाना घर से खा कर आये थे उन्होंने अपने अपने बिस्तर लगा लिए थे  ! कुछ नई उम्र के लोगो की सुबह अब हुई थी ! फेसबुक , चैटिंग सब शुरू हो चूका था , लेकिन वो भी मजबूरन सोने जा रहे थे ! इन्टरनेट का सिग्नल ठीक से नहीं मिलने के कारण ! धीरे धीरे एक के कर के ट्रेन के अन्दर की लाइट्स बंद होने लगी थी ! कोई अपने साथ चादर लाया था तो किसी को वैसे ही बर्थ अच्छी लग रही थी !

बच्चे सो रहे थे !

बड़े बच्चे एस मस एस (S M S -S M S ) खेल रहे थे !  

थोड़े और बड़े लोग बस लेटे थे और ऊँघ रहे थे , !

      लेकिन वो अब भी एक टक खिड़की से बाहर देख रहा था ! उसका हाथ अब उसके गालों पर था  ! कुछ सोचने की मुद्रा में !

ट्रेन ने अलीगढ क्रास कर रही थी ! एक छोटी बच्ची दिल्ली से  ही उस लडके को देख रही थी ! 

नीली रौशनी में रात की ख़ामोशी को उस बच्ची की मासूम आवाज़ ने तोडा !

भैया आपको छोड़ने कोई नहीं आया , आप लिए उदास हैं ?  -- बच्ची ने मासूमियत से पुछा ।

            सबका ध्यान उधर गया और सब से ज्यादा उस लकड़े की तरफ जो सब से अलग सब से दूर बैठा था ! हालाँकि सब ये मालूम तो करना चाहते तो थे की वो है कौन और सब से अलग क्यों बैठा था लेकिन कोई पहल नहीं कर पा रहा था ; उस बच्ची ने सब का प्रतिनिधितव किया !

          वो लड़का जिसकी उम्र लगभग बाईस साल के आस पास होगी : गेहेरे नीले रंग की टी शर्ट और महंगी जींस , मेहेंगे मोबाइल फ़ोन और मेहेंगे एयर बैग और महंगे लैपटॉप बैग के साथ अपनी सीट पर बैठा था ! उदास था शायद ! कुछ तलाश में था ! या फिर कुछ बहुत ही करीब का खो गया था !

बच्ची ने फिर पुछा : आप क्यों खामोश हैं भैय्या ?
किरण आप सो जाओ : बच्ची के पिता ने कहा !

बच्ची : ना ,पहले भैया से पूछो , कोई बात करो उनसे !

पिता : अच्छा मैं बात करता हूँ , तुम सो जाओ !

बच्ची : ठीक है !
और फिर बच्ची के पिता उसको चादर ओढा कर उस लडके के पास जा कर बैठते हुए बोले !
कहाँ जा रहे हो दोस्त ? क्या नाम है आपका ?

जी , मेरा नाम अनमोल है !

नाम भी आपकी ही तरह बिलकुल अलग है : वो सज्जन बोले !

अनमोल हल्का सा मुस्कुराया ! पिछले  तीन घंटों में पहली बार उसके चहरे पर कोई नया भाव आया था ! बच्ची भी मुस्कुराई और चादर ओढ़ कर करवट बदल कर सो गयी ! ऐसे जैसे कोई माँ अपने नन्हे से बेटे को सुला कर सोने जाती है ये तसाल्ली कर के की अब उसका लाडला सुकून से है !

सज्जन : कहाँ जा रहे हो ?
अनमोल : जी , पुरी , और आप लोग ?
सज्जन : हम भी वहीँ जा रहे हैं !
अनमोल : अच्छी बात है !
सज्जन : वहीँ के हो ?
अनमोल : नहीं जी , मैं बेसीकलि जमशेदपुर से हूँ ! वहां कुछ काम है !
सज्जन : काम , क्या काम करते हों ?
अनमोल : जी आय आय टी खडकपुर में केमिकल इंजीयरिंग का थर्ड इयर का स्टूडेंट हूँ !
सज्जन : अरे वाह ! दिल्ली कैसे ये थे ? कोई रिश्तेदार है यहाँ ?
अनमोल : नहीं जी बस किसी से मिलने आया था !
सज्जन : मिले ?
अनमोल : हाँ जी मिला !
सज्जन : पता नहीं लेकिन मुझे लग रहा ही की कुछ अच्छी नही रही तुम्हारी ये मुलाक़ात !!
अनमोल ने अपनी पलकें झुका ली !   ऐसा  लगा जैसे अनमोल कितनी देर से ये चाहता था की कोई उस से पूछे की क्या हुआ है !
सज्जन : वैसे जिस उम्र में तुम हो बहुत सी बातों का कुछ ज्यादा महत्व नहीं होता लेकिन कई बात बहुत  महतवपूर्ण हो जाती है ! कभी कभी तो संभाला नहीं जाये तो बात बिगड़ जाती है ! अगर हमारी इंतनी देर की बातों से तुम्हे सही लगे तो तुम मुझ से अपनी बात बता सकते हो ! मेरे भी दो बेटे हैं , जो कालेज गोइंग हैं और ये मेरी सब से छोटी बेटी है जिसे हम कभी किरण और कभी ज्योत्सना कहते हैं , जो तुमको पुकार रही थी !
अनमोल : जी ऐसा कुछ जयादा तो नहीं है , लेकिन सब ठीक भी नहीं है !
सज्जन : क्या हुआ ?

                  अब अनमोल उनके कुछ करीब आ गया था ! सज्जन ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा , बताओ हो सकता है मन हल्का हो जाये ! ट्रेन कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर रुक चुकी थी ! एक चाय वाले ने कुल्हड़ भर के दो चाय उन दोनों की तरफ बढ़ा दी ! अनमोल ने अपने बेग से बिस्किट निकाले और सज्जन जी दो देते हुए खाए ! कानपूर पीछे छूट रहा था !

अनमोल बोलने लगा !
अंकल एक दोस्त को छोड़ने आया था दिल्ली मैं ! मेरे साथ ही पढ़ती है खड़गपुर में ! बेच मेट हैं हम ! उसी को दिल्ली उसके घर छोड़ने के बाद वापस जा रहा हूँ !
सज्जन : वो तो ठीक है , तुम उदास क्यों हो ?
अनमोल : वो मेरी सब से अच्छी दोस्त है !
सज्जन :  अच्छा !
अनमोल : हम सब बात एक दुसरे को बताते हैं ! मैंने  भी सब बताया ! अपने बारे में ! असल में मैं एक अनाथालय में पल कर बड़ा हुआ और कम्पटीशन से दाखिला मिला ! हमारी दोस्ती हुई ! तीन साल से सब ठीक चल रहा है ! हम दोनों ने कई बार कई मौकों पर एक साथ देश विदेश में अपने कालेज को भी रिप्रेसेन्ट किया ! हमारी केमिस्ट्री मशहूर थी ! कई ख्वाब देखे हम दोनों ने !
सज्जन : फिर आज तुम अकेले वापस क्यों जा रहे हो ?

अनमोल : आज उसको मरी ज़रुरत नहीं !

सज्जन : क्यों ?

अनमोल : असल में कभी भी उसको मेरी ज़रुरत नहीं थी ! ऐसा मुझे ही लगता था की उसे मेरी ज़रुरत है !
सज्जन : हुआ क्या ?

अनमोल : परसों उसको मैं उसके घर ले कर उसके घर गया !  इमरजेंसी में बुलाया था उसके फादर ने , अपनी तबियत की  का बहाना कर के ! असल में उसकी सगाई करनी थी उनको !
सज्जन बड़ी तल्लीनता से उसकी बात सुन रहे थे !

अनमोल बोलता जा रहा था ! उसको तो ट्रेन में ही पता था इस बात का लेकिन उसने मुझे नहीं बताया ! मैं पुरे समर्पण के साथ उसके साथ उसके घर गया ! उसके फादर ने सिर्फ उसका सामान निकल कर मुझे जाने को कह दिया ! ऐसा तो  तो मैं सोच भी नहीं सकता था ! उसने भी नहीं कुछ कहा, सिर्फ रस्ते में रखवाला बना कर लाइ थे मुझे वो  ! दिल्ली में मुझे कोई नहीं जनता था ! कहाँ जाता ! होटल के लिए पैसे नहीं थे ! वापसी का टिकट लिया और पूरा दिन वेटिंग रूम में बिताया !  ये सोचता रहा की ऐसा क्यों किया उसने ? नहीं रहना था मेरे साथ तो मना कर दिया होता ! कॊइ ज़बरदस्ती  के  दोस्त तो थे नहीं हम !
सज्जन : मैं समझ सकता हूँ !

रात के एक बज चले थे ! आंटी जी ने धीरे  से कहा : कुछ बातें कल रात में कर लीजियगा ,अब सो जाने दीजिये अनमोल को !

हाँ हाँ ये ही ठीक रहेगा : सज्जन बोले !

अनमोल ने पुछा : आपका नाम क्या है सर ?

सज्जन : तुम अंकल बुला सकते हो ! वैसे मुझे अनिल चक्रवर्ती कहते हैं ! मेरे बड़े बेटे का नाम सोरोदीप और छोटे का काम चन्द्रदीप है , और ऊपर सो रही बिटिया का नाम ज्योत्स्ना है , घर पर किरण भी पुकारते हैं !

अनमोल मुस्कुराया !

मिस्टर अनिल ने अपने बैग से एक पेकेट  निकाल कर अनमोल की तरफ बढ़ा दिया ये कहते हुए की : तुमने शाम से कुछ नहीं खाया , ये चार पुड़ियाँ और आलू की भुजिया है अचार के साथ ! तुम्हारी आंटी किसी भी सफ़र पर ऐसे छोटे छोटे पेकेट बना कर रख लेती है  सबको आसानी होती है ! 

अनमोल माना नहीं कर सका ! उसने चारो पुड़ी खाई और पानी पी कर अपने बैग से हवा वाला तकिया निकाल कर धीरे धीरे नीचे की और सरकता हुआ सो गया !

         ट्रेन मुगलसराय स्टेशन के आस पास थी!  सर नाश्ता का ऑर्डर देंगे ? किसी ने अनमोल के कंधे पर धीरे से हाथ रखते हुए पुछा तो अनमोल की आँख खुली !

अनमोल : क्या है नाश्ते में  ?

वेंडर : उपमा , ब्रेड रोल , वेज कटलेट और आमलेट हैं !

अनमोल अभी कुछ बोलने वाला था की उसकी निगाह मिस्टर अनिल की तरफ गयी !

अनमोल : गुड मोर्निग सर !

मिस्टर अनिल : वैरी गुड मोर्निंग यंग मन ! कैसे हो ? रात अच्छी नींद आई ?

अनमोल : आप से बातें कर के मन हल्का हो गया ओर मैं अभी तक सोता रहा ! थैंक यू वैरी मच सर !

मिस्टर अनिल : कितने फॉर्मल हो यार ! ये सब चलता रहता है ज़िन्दगी में ! रात के बाद सवेरा !

रात को ही ढोते नहीं रहना चाहिए !

अनमोल : जी !

वेंडर : सर क्या लेंगे ?

अनमोल : सर आप नाश्ता कर चुके हैं ?

मिस्टर अनिल : यस डिअर !

अनमोल : एक ब्रेड आमलेट ले आओ , एक पानी की बोतल भी लाना !

वेंडर : सौ रूपए दे दीजिये !

अनमोल : ओके लो !

        ज्योत्स्ना उठ चुकी थी ! मिस्टर अनिल उसको ले कर ब्रश करवाने के लिए बाथरूम की तरफ चले! अनमोल भी फ्रेश हो कर अपनी बर्थ पर लौट चूका था ! एक मिटटी के कुल्हड़ में चाय ले कर अनमोल बाहर की तरफ देख रहा था ! मुगलसराय स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर तीन पर ट्रेन लग रही थी ! ट्रेन के रुकते ही कितने ही तरह के खाने पीने के सामान बेचने वाले कम्पार्टमेंट में चढ़ गए ! ज्योत्सना फलों की चाट के लिए जिद करने लगी !
        खुले में रखे सामान को दिलवाने की इक्छा बिलकुल नहीं थी मिस्टर अनिल की लेकिन ज्योत्सना रोये जा रही थी ! ट्रेन ने लम्बी सीटी दी और प्लेटफार्म से सरकने लगी ! अनमोल ने ज्योत्सना को अपने गोद में ले लिया और कम्पार्टमेंट में घुमाने लगा ! उसका ध्यान चाट से हटाने के लिए ! अच्छा ज्योत्सना ये बताओ तुम्हारे क्लास में तुम्हारा सबसे अच्छा फ्रेंड कौन है !

ज्योत्सना : विपुल !

अनमोल को लगा शायद अब ये बात काम कर जाये ! ओके वैरी गुड , तो आप अपने साथ उसको क्यों नहीं लाइ ?

ज्योत्सना : कहाँ ?

अनमोल : दिल्ली ?

ज्योत्सना : वो आया ही नहीं !

अभी ये दोनों बात कर ही रहे थे की झालमुढ़ी बेचने वाल आ गया !

ज्योत्सना अब झालमूढ़ी खाने की जिद करने लगी !

मिस्टर अनिल ने रोक लिया आन्मोल को खरीदने से : नहीं अनमोल पता नहीं कैसा तेल रहता है सरसों का इसमें !

अनमोल ने अपना हाथ पीछे खीच लिया सोचते हुए : माँ बाप कितना ध्यान रखते हैं ना अपने बच्चों के  बुरे  का ! क्या खाना है , क्या पेहेनना है , कहाँ जाना है , किस के साथ रहना है ...और पता नहीं क्या क्या !

ज्योत्सना फिर से रोने लगी :

अनमोल ने पुछा : आप एप्पल खाते हो ?

ज्योत्सना : हाँ , लेकिन ट्रेन में एप्पल तो नहीं मिलता ! हैरानी भरी आवाज़ में उसने कहा !

अनमोल : हमारे पास है !

ज्योत्सना : खूब खुश हो गयी !

               अनमोल ने अपने लेपटोप के बैग की पहली चेन से एक पेकेट निकला ! वो एप्पल नहीं था ! उस पेकेट को देख कर अनमोल फिर से उदास हो गया ! हालाँकि दूसरी बार में उसने एप्पल निकाल कर ज्योत्सना को दिया लेकिन वो पहले पेकेट के लिए जिद करने लगी !
अनमोल ने उसको वो दे दिया ! उस पेक्ट में एक " सफ़ेद शंख " था ! देख कर ज्योत्सना खूब ज़ोर से चिल्लाई : ये तो दादी के जैसा है ! मिस्टर अनिल और उसकी माँ  का ध्यान उस तरफ गया ! दोनों ने शंख देखा और अनमोल के फिर से उदास होने की बात समझ गए !

मिस्टर अनिल ने वातावरण में फिर से छाई ख़ामोशी और अनमोल की चुप्पी तो तोडा !

ज्योत्सना , बेटा वो भैय्या को दो !

ज्योत्सना : ना !
            मिस्टर अनिल ने ज्योत्सना से वो शंख लगभग छीनते हुए अनिल की तरफ बढ़ा दिया ! उस पर दो नाम लिखे थे "  अनमोल और विशाखा " !  अनमोल शंख और ज्योत्सना के बीच चल रहे खीच  - तान से दूर दो बरस पहले अपने और विशाखा के साथ वो घूमना फिरना याद करने लगा था ! ट्रेन में बस शरीर था उसका , वो खुद पुरी के समुद्र के किनारे टहल रहा था अपने उस समय को याद करते हुए ज उसने साथ बिताया था !

         एक  साल के अन्दर अन्दर दोनों अच्छे हो गए थे! क्लोज़ फ्रेंड्स ! फर्स्ट इयर कम्प्लीट करने के बाद उनका फ्रेड ग्रुप पुरी के लिए गघूमने गया था ! भगवान जग्गनाथ के दर्शन के बाद समुद्र तट पर घुमते हुए विशाखा ने एक शंख की दूकान पर चलने को कहा ! बाकि दोस्तों ने मना  कर दिया लेकिन मैं गया उसको ले कर ! एक सफेद शंख उठा लिया उसने !

विशाखा : कितने का है ?

जी : आठ सौ का !

विशाखा : अनमोल मुझे ये चाहिए !

मैंने बिना कुछ पूछे अपने स्कोलरशिप के एक हज़ार रुपए में से आठ दो रुपए दुकानदार को दे दिए !

विशाखा : मुझे इसपर अपना नाम और तुम्हारा नाम लिखवाना है !

दुकानदार बोला  वैसे तो सौ रुपए लगते हैं क्यों की हम परमानेंट इंक से लिखते हैं लेकिन आपने कोई मोल भाव नहीं किया इस लिए आपको फ्री में लिख कर देंगे !

अनमोल ने धन्यवाद दिया !

            मेरा और विशाखा का नाम उस सफ़ेद शंख पर गेहेरे लाल नीले रंग से उकेर दिया गया उस चितेरे  द्वारा ! पुरे तीन साल अपने पास रखा था उस ने वो शंख पर कल मुझे वापस कर दिया बड़ी बेरुखी से ! उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था की ऐसा हुआ क्यों , फिर से अनमोल इसी उधेड़बुन में लग गया !
            ट्रेन टाटानगर स्टेशन पर रुकी हुई थी ! उसका अनाथालय यहीं था ! कोई नहीं आया था उसको मिलने !  कुछ लोग नए आये थे कम्पार्टमेंट में और कुछ पुराने उतर गए थे !
               मिस्टर अनिल ने अनमोल से कहा ! बस ये कहूँगा अनमोल तुम उसको एक छोटे सफ़र का अस्थाई साथ समझ कर भूल सको तो अच्छा  होगा ! किसी और के लिए खाली करी गयी बर्थ पर आने वाले का स्वागत करो , कल कालेज पहुचने के बाद ! अनमोल को बात अब सीधे सीधे समझ में आ गयी ! उसने देखा  ज्योत्सना " शंख" को अपने नन्हे - नन्हे हाथो में ले कर सो गयी थी ! जैसे वक़्त को अपनी गिरफ्त में कर लिया हो उसने  , लेकिन ये समय पिछले समय को भुला कर नए शंखों की तलाश का था अनमोल के लिए  ! 
         
मिस्टर अनिल ने सबका बिस्तर लगा दिया था ,रात के खाने के बाद  !

अनमोल भी आज जल्दी सो चुका  था !

कल की तलाश में !

शंख ज्योत्सना को के पास ही था ...उसके पास ही रहेगा अब हमेशा !
                                                                                                                  :: मनीष सिंह ::