Monday, June 3, 2013

एक कहानी : वो सफ़ेद शंख !!

               सब अपने अपनों की शुभयात्रा के  लिए शुभकामनाये स्वीकार कर रहे थे !
         कोई किसी को छोड़ने आया था तो कोई किसी कोई मोबाइल पर ही विदा कर रहा था ! कोई किसी के लिए खाने के पेकेट और ठंडा पानी ले कर आया था तो किसी के फ्रेंड्स अपने घर जाते हुए दोस्तों को फ़ास्ट फ़ूड की भेंट दे रहे थे , कोल्ड ड्रिंक्स के साथ साथ !
             रात के कोई दस बज कर पेंतीस ( १०:३० ) हो रहे थे और ओडिशा के पुरी के लिए जाने वाली एक प्रसिद्ध ट्रेन पुरुषोत्तम एक्स्प्रेक्स नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म से धीरे धीरे सरक रही थी ! प्लेटफोर्म की रौशनी धीरे धीरे कम हो चली थी ! आस पास बैठे लोग अब एक दूसरों में अगले लगभग तीस घंटों के लिए साथी की तलाश  करने लगे थे  जो अब तक दूर दूर थे ! एस वन ( S 1 ) की चौंतीस नंबर की बर्थ पर वो बैठा था ! खामोश ! बिना किसी के साथ ! एक तक खिड़की से बाहर देखते हुए ! बाहर बिलकुल घुप अँधेरा हो चुका , वो अब भी वैसे ही बाहर देख रहा था  !
           आधी रात के आस  पास का समय था ! कुछ लोग खाना घर से खा कर आये थे उन्होंने अपने अपने बिस्तर लगा लिए थे  ! कुछ नई उम्र के लोगो की सुबह अब हुई थी ! फेसबुक , चैटिंग सब शुरू हो चूका था , लेकिन वो भी मजबूरन सोने जा रहे थे ! इन्टरनेट का सिग्नल ठीक से नहीं मिलने के कारण ! धीरे धीरे एक के कर के ट्रेन के अन्दर की लाइट्स बंद होने लगी थी ! कोई अपने साथ चादर लाया था तो किसी को वैसे ही बर्थ अच्छी लग रही थी !

बच्चे सो रहे थे !

बड़े बच्चे एस मस एस (S M S -S M S ) खेल रहे थे !  

थोड़े और बड़े लोग बस लेटे थे और ऊँघ रहे थे , !

      लेकिन वो अब भी एक टक खिड़की से बाहर देख रहा था ! उसका हाथ अब उसके गालों पर था  ! कुछ सोचने की मुद्रा में !

ट्रेन ने अलीगढ क्रास कर रही थी ! एक छोटी बच्ची दिल्ली से  ही उस लडके को देख रही थी ! 

नीली रौशनी में रात की ख़ामोशी को उस बच्ची की मासूम आवाज़ ने तोडा !

भैया आपको छोड़ने कोई नहीं आया , आप लिए उदास हैं ?  -- बच्ची ने मासूमियत से पुछा ।

            सबका ध्यान उधर गया और सब से ज्यादा उस लकड़े की तरफ जो सब से अलग सब से दूर बैठा था ! हालाँकि सब ये मालूम तो करना चाहते तो थे की वो है कौन और सब से अलग क्यों बैठा था लेकिन कोई पहल नहीं कर पा रहा था ; उस बच्ची ने सब का प्रतिनिधितव किया !

          वो लड़का जिसकी उम्र लगभग बाईस साल के आस पास होगी : गेहेरे नीले रंग की टी शर्ट और महंगी जींस , मेहेंगे मोबाइल फ़ोन और मेहेंगे एयर बैग और महंगे लैपटॉप बैग के साथ अपनी सीट पर बैठा था ! उदास था शायद ! कुछ तलाश में था ! या फिर कुछ बहुत ही करीब का खो गया था !

बच्ची ने फिर पुछा : आप क्यों खामोश हैं भैय्या ?
किरण आप सो जाओ : बच्ची के पिता ने कहा !

बच्ची : ना ,पहले भैया से पूछो , कोई बात करो उनसे !

पिता : अच्छा मैं बात करता हूँ , तुम सो जाओ !

बच्ची : ठीक है !
और फिर बच्ची के पिता उसको चादर ओढा कर उस लडके के पास जा कर बैठते हुए बोले !
कहाँ जा रहे हो दोस्त ? क्या नाम है आपका ?

जी , मेरा नाम अनमोल है !

नाम भी आपकी ही तरह बिलकुल अलग है : वो सज्जन बोले !

अनमोल हल्का सा मुस्कुराया ! पिछले  तीन घंटों में पहली बार उसके चहरे पर कोई नया भाव आया था ! बच्ची भी मुस्कुराई और चादर ओढ़ कर करवट बदल कर सो गयी ! ऐसे जैसे कोई माँ अपने नन्हे से बेटे को सुला कर सोने जाती है ये तसाल्ली कर के की अब उसका लाडला सुकून से है !

सज्जन : कहाँ जा रहे हो ?
अनमोल : जी , पुरी , और आप लोग ?
सज्जन : हम भी वहीँ जा रहे हैं !
अनमोल : अच्छी बात है !
सज्जन : वहीँ के हो ?
अनमोल : नहीं जी , मैं बेसीकलि जमशेदपुर से हूँ ! वहां कुछ काम है !
सज्जन : काम , क्या काम करते हों ?
अनमोल : जी आय आय टी खडकपुर में केमिकल इंजीयरिंग का थर्ड इयर का स्टूडेंट हूँ !
सज्जन : अरे वाह ! दिल्ली कैसे ये थे ? कोई रिश्तेदार है यहाँ ?
अनमोल : नहीं जी बस किसी से मिलने आया था !
सज्जन : मिले ?
अनमोल : हाँ जी मिला !
सज्जन : पता नहीं लेकिन मुझे लग रहा ही की कुछ अच्छी नही रही तुम्हारी ये मुलाक़ात !!
अनमोल ने अपनी पलकें झुका ली !   ऐसा  लगा जैसे अनमोल कितनी देर से ये चाहता था की कोई उस से पूछे की क्या हुआ है !
सज्जन : वैसे जिस उम्र में तुम हो बहुत सी बातों का कुछ ज्यादा महत्व नहीं होता लेकिन कई बात बहुत  महतवपूर्ण हो जाती है ! कभी कभी तो संभाला नहीं जाये तो बात बिगड़ जाती है ! अगर हमारी इंतनी देर की बातों से तुम्हे सही लगे तो तुम मुझ से अपनी बात बता सकते हो ! मेरे भी दो बेटे हैं , जो कालेज गोइंग हैं और ये मेरी सब से छोटी बेटी है जिसे हम कभी किरण और कभी ज्योत्सना कहते हैं , जो तुमको पुकार रही थी !
अनमोल : जी ऐसा कुछ जयादा तो नहीं है , लेकिन सब ठीक भी नहीं है !
सज्जन : क्या हुआ ?

                  अब अनमोल उनके कुछ करीब आ गया था ! सज्जन ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा , बताओ हो सकता है मन हल्का हो जाये ! ट्रेन कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर रुक चुकी थी ! एक चाय वाले ने कुल्हड़ भर के दो चाय उन दोनों की तरफ बढ़ा दी ! अनमोल ने अपने बेग से बिस्किट निकाले और सज्जन जी दो देते हुए खाए ! कानपूर पीछे छूट रहा था !

अनमोल बोलने लगा !
अंकल एक दोस्त को छोड़ने आया था दिल्ली मैं ! मेरे साथ ही पढ़ती है खड़गपुर में ! बेच मेट हैं हम ! उसी को दिल्ली उसके घर छोड़ने के बाद वापस जा रहा हूँ !
सज्जन : वो तो ठीक है , तुम उदास क्यों हो ?
अनमोल : वो मेरी सब से अच्छी दोस्त है !
सज्जन :  अच्छा !
अनमोल : हम सब बात एक दुसरे को बताते हैं ! मैंने  भी सब बताया ! अपने बारे में ! असल में मैं एक अनाथालय में पल कर बड़ा हुआ और कम्पटीशन से दाखिला मिला ! हमारी दोस्ती हुई ! तीन साल से सब ठीक चल रहा है ! हम दोनों ने कई बार कई मौकों पर एक साथ देश विदेश में अपने कालेज को भी रिप्रेसेन्ट किया ! हमारी केमिस्ट्री मशहूर थी ! कई ख्वाब देखे हम दोनों ने !
सज्जन : फिर आज तुम अकेले वापस क्यों जा रहे हो ?

अनमोल : आज उसको मरी ज़रुरत नहीं !

सज्जन : क्यों ?

अनमोल : असल में कभी भी उसको मेरी ज़रुरत नहीं थी ! ऐसा मुझे ही लगता था की उसे मेरी ज़रुरत है !
सज्जन : हुआ क्या ?

अनमोल : परसों उसको मैं उसके घर ले कर उसके घर गया !  इमरजेंसी में बुलाया था उसके फादर ने , अपनी तबियत की  का बहाना कर के ! असल में उसकी सगाई करनी थी उनको !
सज्जन बड़ी तल्लीनता से उसकी बात सुन रहे थे !

अनमोल बोलता जा रहा था ! उसको तो ट्रेन में ही पता था इस बात का लेकिन उसने मुझे नहीं बताया ! मैं पुरे समर्पण के साथ उसके साथ उसके घर गया ! उसके फादर ने सिर्फ उसका सामान निकल कर मुझे जाने को कह दिया ! ऐसा तो  तो मैं सोच भी नहीं सकता था ! उसने भी नहीं कुछ कहा, सिर्फ रस्ते में रखवाला बना कर लाइ थे मुझे वो  ! दिल्ली में मुझे कोई नहीं जनता था ! कहाँ जाता ! होटल के लिए पैसे नहीं थे ! वापसी का टिकट लिया और पूरा दिन वेटिंग रूम में बिताया !  ये सोचता रहा की ऐसा क्यों किया उसने ? नहीं रहना था मेरे साथ तो मना कर दिया होता ! कॊइ ज़बरदस्ती  के  दोस्त तो थे नहीं हम !
सज्जन : मैं समझ सकता हूँ !

रात के एक बज चले थे ! आंटी जी ने धीरे  से कहा : कुछ बातें कल रात में कर लीजियगा ,अब सो जाने दीजिये अनमोल को !

हाँ हाँ ये ही ठीक रहेगा : सज्जन बोले !

अनमोल ने पुछा : आपका नाम क्या है सर ?

सज्जन : तुम अंकल बुला सकते हो ! वैसे मुझे अनिल चक्रवर्ती कहते हैं ! मेरे बड़े बेटे का नाम सोरोदीप और छोटे का काम चन्द्रदीप है , और ऊपर सो रही बिटिया का नाम ज्योत्स्ना है , घर पर किरण भी पुकारते हैं !

अनमोल मुस्कुराया !

मिस्टर अनिल ने अपने बैग से एक पेकेट  निकाल कर अनमोल की तरफ बढ़ा दिया ये कहते हुए की : तुमने शाम से कुछ नहीं खाया , ये चार पुड़ियाँ और आलू की भुजिया है अचार के साथ ! तुम्हारी आंटी किसी भी सफ़र पर ऐसे छोटे छोटे पेकेट बना कर रख लेती है  सबको आसानी होती है ! 

अनमोल माना नहीं कर सका ! उसने चारो पुड़ी खाई और पानी पी कर अपने बैग से हवा वाला तकिया निकाल कर धीरे धीरे नीचे की और सरकता हुआ सो गया !

         ट्रेन मुगलसराय स्टेशन के आस पास थी!  सर नाश्ता का ऑर्डर देंगे ? किसी ने अनमोल के कंधे पर धीरे से हाथ रखते हुए पुछा तो अनमोल की आँख खुली !

अनमोल : क्या है नाश्ते में  ?

वेंडर : उपमा , ब्रेड रोल , वेज कटलेट और आमलेट हैं !

अनमोल अभी कुछ बोलने वाला था की उसकी निगाह मिस्टर अनिल की तरफ गयी !

अनमोल : गुड मोर्निग सर !

मिस्टर अनिल : वैरी गुड मोर्निंग यंग मन ! कैसे हो ? रात अच्छी नींद आई ?

अनमोल : आप से बातें कर के मन हल्का हो गया ओर मैं अभी तक सोता रहा ! थैंक यू वैरी मच सर !

मिस्टर अनिल : कितने फॉर्मल हो यार ! ये सब चलता रहता है ज़िन्दगी में ! रात के बाद सवेरा !

रात को ही ढोते नहीं रहना चाहिए !

अनमोल : जी !

वेंडर : सर क्या लेंगे ?

अनमोल : सर आप नाश्ता कर चुके हैं ?

मिस्टर अनिल : यस डिअर !

अनमोल : एक ब्रेड आमलेट ले आओ , एक पानी की बोतल भी लाना !

वेंडर : सौ रूपए दे दीजिये !

अनमोल : ओके लो !

        ज्योत्स्ना उठ चुकी थी ! मिस्टर अनिल उसको ले कर ब्रश करवाने के लिए बाथरूम की तरफ चले! अनमोल भी फ्रेश हो कर अपनी बर्थ पर लौट चूका था ! एक मिटटी के कुल्हड़ में चाय ले कर अनमोल बाहर की तरफ देख रहा था ! मुगलसराय स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर तीन पर ट्रेन लग रही थी ! ट्रेन के रुकते ही कितने ही तरह के खाने पीने के सामान बेचने वाले कम्पार्टमेंट में चढ़ गए ! ज्योत्सना फलों की चाट के लिए जिद करने लगी !
        खुले में रखे सामान को दिलवाने की इक्छा बिलकुल नहीं थी मिस्टर अनिल की लेकिन ज्योत्सना रोये जा रही थी ! ट्रेन ने लम्बी सीटी दी और प्लेटफार्म से सरकने लगी ! अनमोल ने ज्योत्सना को अपने गोद में ले लिया और कम्पार्टमेंट में घुमाने लगा ! उसका ध्यान चाट से हटाने के लिए ! अच्छा ज्योत्सना ये बताओ तुम्हारे क्लास में तुम्हारा सबसे अच्छा फ्रेंड कौन है !

ज्योत्सना : विपुल !

अनमोल को लगा शायद अब ये बात काम कर जाये ! ओके वैरी गुड , तो आप अपने साथ उसको क्यों नहीं लाइ ?

ज्योत्सना : कहाँ ?

अनमोल : दिल्ली ?

ज्योत्सना : वो आया ही नहीं !

अभी ये दोनों बात कर ही रहे थे की झालमुढ़ी बेचने वाल आ गया !

ज्योत्सना अब झालमूढ़ी खाने की जिद करने लगी !

मिस्टर अनिल ने रोक लिया आन्मोल को खरीदने से : नहीं अनमोल पता नहीं कैसा तेल रहता है सरसों का इसमें !

अनमोल ने अपना हाथ पीछे खीच लिया सोचते हुए : माँ बाप कितना ध्यान रखते हैं ना अपने बच्चों के  बुरे  का ! क्या खाना है , क्या पेहेनना है , कहाँ जाना है , किस के साथ रहना है ...और पता नहीं क्या क्या !

ज्योत्सना फिर से रोने लगी :

अनमोल ने पुछा : आप एप्पल खाते हो ?

ज्योत्सना : हाँ , लेकिन ट्रेन में एप्पल तो नहीं मिलता ! हैरानी भरी आवाज़ में उसने कहा !

अनमोल : हमारे पास है !

ज्योत्सना : खूब खुश हो गयी !

               अनमोल ने अपने लेपटोप के बैग की पहली चेन से एक पेकेट निकला ! वो एप्पल नहीं था ! उस पेकेट को देख कर अनमोल फिर से उदास हो गया ! हालाँकि दूसरी बार में उसने एप्पल निकाल कर ज्योत्सना को दिया लेकिन वो पहले पेकेट के लिए जिद करने लगी !
अनमोल ने उसको वो दे दिया ! उस पेक्ट में एक " सफ़ेद शंख " था ! देख कर ज्योत्सना खूब ज़ोर से चिल्लाई : ये तो दादी के जैसा है ! मिस्टर अनिल और उसकी माँ  का ध्यान उस तरफ गया ! दोनों ने शंख देखा और अनमोल के फिर से उदास होने की बात समझ गए !

मिस्टर अनिल ने वातावरण में फिर से छाई ख़ामोशी और अनमोल की चुप्पी तो तोडा !

ज्योत्सना , बेटा वो भैय्या को दो !

ज्योत्सना : ना !
            मिस्टर अनिल ने ज्योत्सना से वो शंख लगभग छीनते हुए अनिल की तरफ बढ़ा दिया ! उस पर दो नाम लिखे थे "  अनमोल और विशाखा " !  अनमोल शंख और ज्योत्सना के बीच चल रहे खीच  - तान से दूर दो बरस पहले अपने और विशाखा के साथ वो घूमना फिरना याद करने लगा था ! ट्रेन में बस शरीर था उसका , वो खुद पुरी के समुद्र के किनारे टहल रहा था अपने उस समय को याद करते हुए ज उसने साथ बिताया था !

         एक  साल के अन्दर अन्दर दोनों अच्छे हो गए थे! क्लोज़ फ्रेंड्स ! फर्स्ट इयर कम्प्लीट करने के बाद उनका फ्रेड ग्रुप पुरी के लिए गघूमने गया था ! भगवान जग्गनाथ के दर्शन के बाद समुद्र तट पर घुमते हुए विशाखा ने एक शंख की दूकान पर चलने को कहा ! बाकि दोस्तों ने मना  कर दिया लेकिन मैं गया उसको ले कर ! एक सफेद शंख उठा लिया उसने !

विशाखा : कितने का है ?

जी : आठ सौ का !

विशाखा : अनमोल मुझे ये चाहिए !

मैंने बिना कुछ पूछे अपने स्कोलरशिप के एक हज़ार रुपए में से आठ दो रुपए दुकानदार को दे दिए !

विशाखा : मुझे इसपर अपना नाम और तुम्हारा नाम लिखवाना है !

दुकानदार बोला  वैसे तो सौ रुपए लगते हैं क्यों की हम परमानेंट इंक से लिखते हैं लेकिन आपने कोई मोल भाव नहीं किया इस लिए आपको फ्री में लिख कर देंगे !

अनमोल ने धन्यवाद दिया !

            मेरा और विशाखा का नाम उस सफ़ेद शंख पर गेहेरे लाल नीले रंग से उकेर दिया गया उस चितेरे  द्वारा ! पुरे तीन साल अपने पास रखा था उस ने वो शंख पर कल मुझे वापस कर दिया बड़ी बेरुखी से ! उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था की ऐसा हुआ क्यों , फिर से अनमोल इसी उधेड़बुन में लग गया !
            ट्रेन टाटानगर स्टेशन पर रुकी हुई थी ! उसका अनाथालय यहीं था ! कोई नहीं आया था उसको मिलने !  कुछ लोग नए आये थे कम्पार्टमेंट में और कुछ पुराने उतर गए थे !
               मिस्टर अनिल ने अनमोल से कहा ! बस ये कहूँगा अनमोल तुम उसको एक छोटे सफ़र का अस्थाई साथ समझ कर भूल सको तो अच्छा  होगा ! किसी और के लिए खाली करी गयी बर्थ पर आने वाले का स्वागत करो , कल कालेज पहुचने के बाद ! अनमोल को बात अब सीधे सीधे समझ में आ गयी ! उसने देखा  ज्योत्सना " शंख" को अपने नन्हे - नन्हे हाथो में ले कर सो गयी थी ! जैसे वक़्त को अपनी गिरफ्त में कर लिया हो उसने  , लेकिन ये समय पिछले समय को भुला कर नए शंखों की तलाश का था अनमोल के लिए  ! 
         
मिस्टर अनिल ने सबका बिस्तर लगा दिया था ,रात के खाने के बाद  !

अनमोल भी आज जल्दी सो चुका  था !

कल की तलाश में !

शंख ज्योत्सना को के पास ही था ...उसके पास ही रहेगा अब हमेशा !
                                                                                                                  :: मनीष सिंह ::    




Saturday, June 1, 2013

एक कहानी : कांच के चार गिलास !!

          सुबह के पांच बज रहे थे ...कालका मेल धीरे धीरे कालका स्टेशन के प्लेटफार्म पर लग रही थी !   सब की  जानी पहचानी आवाज चाय चाय चाय  सुनाई देने लगी थी ! सब सुकून से बैठे थे !
किसी को जल्दी नहीं थी ट्रेन से उतरने की ! यहाँ के बाद अगली ट्रेन कोई तीन घंटो के बाद थी !
          तीस लोगो का ग्रुप था ! दिल्ली से कालका होते हुए शिमला के लिए निकला था ! उज्जवल ने सारा इन्तेजाम किया था अपनी शादी की ख़ुशी में ! दोस्तों ,रिश्तेदारों को ले कर घूमने निकला था !
सब अपने अपने सामान के साथ कालका के प्लेटफोर्म पर ठाकाहे लगा रहे थे ! आने जाने वाले उनको देख देख कर अपने ज़माने को याद कर रहे थे ...जब वो ऐसे मजा करते थे !  फिर उम्र और जिम्मेदारियों के साथ साथ सब पिघल गया जीवन की मोमबत्ती की तरह !

उज्जवल ने सबका धयान अपनी और खीचा :हाँ भाई लोग कौन कोन समोसे खायगा और
कौन कौन ब्रेड पकोड़े और कौन कौन ये दोनों खायेगा जल्दी बोलो , आर्डर करना है !

सब एक साथ बोल रहे थे ! किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था !

उज्जवल : ठीक है सब के लिए सब ले लेता हूँ !

दूर खड़ा रवि ये सब देख रहा था !

रवि हाँ वहीँ की एक बड़ी मिठाई की दूकान पर काम करता है ! उज्जवल ने उसे ही बुलाया था अपने ग्रुप के लिए नाश्ते का इंतज़ाम करने के लिए !

उज्जवल : देख रवि तू देख ही रहा है यहाँ कुछ भी क्लियर नहीं है तो तू एसा  कर तीस समोसे , तीस ब्रेड पकोड़े और पचास कप चाय का इन्तेजाम कर दे ! ये पकड़ दो हज़ार रुपे बाकि हिसाब बाद में करता हूँ !

रवि : ठीक है जी ! आधा घंटा लगेगा !

उज्जवल : हाँ कोई बात नहीं ! वैसे भी ये लोग वेटिंग रूम में फ्रेश होने में इस से कम समय कहाँ लेंगे ! जा तू  जल्दी से शुरू हो जा !

रवि मुस्कुराता हुआ दूकान की और लपका !

अभी अभी दूकान पर आये फ़िरोज़ भाई रवि को और उज्जवल को देर से देख रहे थे !

रवि : भाई साब बड़ा आर्डर मिला है ...और एक सांस में उज्जवल का पूरा ऑर्डर उसने फ़िरोज़ भाई को बता दिया !

फ़िरोज़ भाई : चल तो फिर चाय तुम देख लो बाकि मैं करवा लेता हूँ !

एक चाय देना : एक रोज़ के ग्राहक ने उन दोनों की वार्ता को विराम लगाया !

रवि : सर आधे घंटे के बाद दे सकूँगा !

ग्राहक : क्यों ?

रवि : बस दूकान अभी अभी खोली है ना ...ज़रा संभाल लूं फिर देता हूँ !

ग्राहक : ठीक है !

दर असल रवि उज्जवल के ऑर्डर को पूरा करने की ख़ुशी में था !

सबेरे के छे बजे पूरी दूकान के लोग काम पर लगे थे ! कोई बेसन ! कोई आलू ! कोई मैदा ! कोई तेल और कोई चाय के साथ उलझा हुआ था !

फ़िरोज़ भाई समोसे तल रहे थे बीच बीच में उज्जवल की तरफ देख लेते थे ! कुछ तलाश रहे थे वो उज्जवल में ,  शायद !

उज्जवल भी इधर उधर घूमता फिरता नाश्ते की खबर ले लेता था और वो भी फ़िरोज़ भाई को छुपी निगाह से देख लेता था ....कुछ वो भी तलाश रहा था उनमे शायद !

गरमा गरम समोसे , ब्रेड पकोड़े और चाय  से  उठती भाप ,  कालका स्टेशन की हवा में  नरम हलकी नारंगी धुप में प्रकृति का अनोखा आनंद दे रही थी !

सब अपने अपने अनुभव एक दुसरे से साँझा करते हुए आनंद ले रहे थे ! इस बीच उज्जवल ने एक समोसा दूर पोल से सहारे खड़े रवि की और बढ़ा दिया एक कप चाय के साथ ! कितना अपनत्व , कितनी निकटता , कितना समर्पण ...!

उज्जवल ऐसा ही है शुरू से ! फ़िरोज़ भाई के मुह से धीरे से निकल गया !

रवि को वो फ़िरोज़ भाई की आवाज़ सुनाई दे गयी !

आप , आप जानते हैं इनको ? रवि ने जैसे अपनी गति से चलती हुई रहस्यमय पुरानी फिल्म का अंत सबको इंटरवेल से पहले बता दिया हो !

सबका धयान रवि और फ़िरोज़ भाई की तरफ गया !

याकूब बोला : उज्जवल भाई कोई पुराना रिश्ता लगता है तुम्हारा इस जगह से ! अब बता भी दो भाई !

        इसी बीच फ़िरोज़ भाई धीरे धीरे चलते हुए ग्रुप के बीच आ गए थे !  पांच वक़्त के नमाज़ी ! चौड़ा माथा ! मेहदी लगे बाल ! ढीले ढाले  कुर्ते पायजामे में एक गंभीर वयकतितव !  सब ने उनको बैठने के लिए जगह दी !

              फ़िरोज़ भाई एक बड़े से काले संदूक पर बैठ गए और उनके घुटनों के सहारे से ज़मीन पर उज्जवल भी बैठ गया ! ऐसे जैसे बरसों से अनाम , अनजान और अनिश्चित दूर मंजिल की और बढ़ता हुआ कोई मुसाफिर  बीच राह में बैठ जाता है !
          अब तक फ़िरोज़ भाई और उज्जवल एक दुसरे को पहचान चुके थे ! कोई संवाद नहीं हुआ एक दुसरे से फिर भी दोनों ने एक दुसरे को बधाई दी और ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया की आज मिला ही दिया !

फ़िरोज़ भाई : क्यों भाई जवान कोई ग्लानी तो नहीं होगी ना मेरे यहाँ तुम्हारे दोस्तों के बीच में आ जाने से ?

उज्जवल : क्या भाई आप कैसी बात कर रहे हैं ?

याकूब : सर आप कैसे जानते हैं हमारे उज्जवल सर को ?

फ़िरोज़ भाई ने अपना दाहिना हाथ उज्जवल के बालों पर फेरते हुए कहा : छोटे मिया क्या कहते हो सब बता दूं ये थोडा थोडा ?

उज्जवल : सब !

फ़िरोज़ भाई : सब कुछ ?

उज्जवल : हाँ एक एक बात !

फ़िरोज़ भाई : तू सच बोल रहा है ना ?

उज्जवल : जी बिलकुल - उज्जवल की ऑंखें नाम थीं !

बाकि के समोसे और चाय अपनी बारी का इन्तेजार कर रहे थे की कोई उनका लुत्फ़ के लेकिन यहाँ तो कुछ और ही खुलासा होने वाला था , सब उसका इंतज़ार कर रहे थे !

                   उज्जवल आज एक बड़ी कंपनी के एक बड़े औहदे पर था ! उसने सारी पढाई दिल्ली से की थी ! अपने बल बूते पर ! फ़िरोज़ भाई बोल रहे थे !
                 बात कोई बीस बरस पहले की है ! एक सुन्दर सा हाफ नेकर में गुलाबी गालों वाला लड़का जिसने पास के ही सरकारी स्कूल की ड्रेस पहनी हुई थी मेरी दूकान पर आया सुबह के कोई दस बजे का समय था और बोला: मुझे चाय दीजिये मैं छोटी गाड़ी में सब से पहले बीच दूंगा !
मैंने उसे बिना कुछ पूछे एक केतली में चार कप चाय दी और दो गिलास  दिए ! वो आधे घंटे  में सब बेच का आगया !  फिर चार कप ले गया और फिर वापस आ गया सिर्फ बीस मिनट में !  इतने सारे लोगो के बीच उसका अंदाज़ निराला था और लोग बाकि को छोड़ कर उससे ही चाय ले कर पीते थे ! ये सिलसिला रोज़ का हो गया ! एक दिन दो में से एक ग्लास टूट गया ! मैंने उसके पेसे उस के उस दिन के मेहनताने से काट लिए ! इस लिए नहीं की मुझे नुक्सान हुआ बल्कि इस लिए की इस को मेहनत का और भी अंदाज़ा हो !
              दो दिनों बाद ये अपने बचाए हए पैसों से चाल कांच के गिलास  ले आया ! बड़े ही सुन्दर थे वो ! अब मुझ से बस चाय लेता था ! गिलास  नहीं ! अब वो दिन में चार केतली चाय बेच लेता था ! दादा और दादी के गुजरने के बाद मैंने इसको दिल्ली के एक पहचानवाले के पास भेज दिया ! ये सोच कर की चाय बेच कर सिर्फ ये अपनी ज़िन्दगी चलाएगा जब की मुझे इस में दुनिया को दिशा देने की काबिलियत दिखती थी ! फिर धीरे धीरे ये अपनी पढाई और वहां के एक बड़े अखबार के साथ मस्त हो गया और फिर मुझ से दूर ...और मैं इस से दूर ! आज फिर से करीब हैं !

             सब लोग अपनी सांस रोके फ़िरोज़ भाई के एक एक शब्दों को सुन रहे थे ! उज्जवल आज कितना काबिल है ! उसने कभी अपनी पिचलि ज़न्दगी के ज़िक्र किसी से नहीं किया और सब का ख्याल रखा ! आज भी सब का गार्जियन बना हुआ है ! कितने अनाथ बच्चों की देख रेख का खर्च उठता है वो , सब को पता है ! 

फ़िरोज़ भाई बोले :  उज्जवल मिया छोटी गाड़ी आ गयी है , शिमला नहीं जाओगे ?

उज्जवल : हाँ , जाऊंगा तो पर आज नहीं !

फ़िरोज़ भाई : तो आज का क्या करोगे ?

उज्जवल : कांच के गिलास खरीदूंगा !

फ़िरोज़ भाई : वो क्यों ?

उज्जवल : ताकि फिर बीस बरस अपनों से दूरी न रहे !

फ़िरोज़ भाई मुस्कुराते हुए अपनी सुरमे वाली आँखों का पानी पोछ रहे थे और उज्जवल उनके कुर्ते की जेब से अपना वो ही एक बचा हुआ कांच  का गिलास निकाल कर छु कर अपना बचपन याद कर  रहा था !

वातावरण में ख़ामोशी  थी !

सब चुप चाप छोटी टॉय ट्रेन मे अपनी अपनी सीट पर बैठ गए थे !

सूरज पूरे तौर पर निकल चूका था ! चुभन वाली बर्फीली हवाएं कब की जा चुकी थी !

गार्ड ने एक लम्बी सीटी मारी ! ट्रेन ने भी जोर से आवाज लगायी ! उज्जवल का ध्यान गया की ट्रेन  सरक रही है ! वो ट्रेन पर चढ़ गया ! जसे बीस बरस पहले चढ़ गया था ....तब ना आने के लिए ...और आज जल्दी से लौट आने के लिए !

        नए कांच के गिलास महंगे हो गए हैं लेकिन वो एक बचा कांच का गिलास  सब से मूल्यवान है जो आज फ़िरोज़ भाई ने उज्जवल को दिया .....ट्रेन गहरे लकड़ी के पुल से गुजर रही थी और खिड़की के सहारे से बैठा उज्जवल अपनी बचपन की कमाई का पहला सौदा निहार रहा था बचपन के सब कुछ उसके सामने था जैसे कल ही की बात हो  ......!!

ट्रेन की रफ़्तार धीमी हो चली थी .... शिमला आने वाला था !
::मनीष सिंह ::

Wednesday, May 22, 2013

एक कहानी : तमांग, शशांक और सायकल !!

           शिलाँग  की गलियों की एक बेहद सर्द सुबह थी वो जिसमे शशांक ने अपने बचपन की यादों की गरमाहट महसूस कर ली थी , जोज़फ़ की चाय की चुस्कियां लेते हुए !!
          अगर शताब्दी निकल गयी तो फिर समझ लेना की गोहाटी की ये दूरी ५ दिन की हो जायगी - तमांग ने लगभग चिल्लाते हुए शशांक और अपने सभी बेच मेट्स से कहा ! तमांग को ही लीडर ऑफ़ दा बेच बना कर भेज गया था ! यहीं शिलोंग का ही तो रहने वाला है वो ! दिल्ली में रह कर अपनी सी ऐ की पढाई कर रहा है अपने बाकि साथियों के साथ ! तीन सालों के बाद एक बड़ी चाय की कंपनी का ऑडिट करने का जिम्मा तमांग एंड दोस्तों को दिया था उनकी ऑडिट कम्पनी ने ! उसका मुख्यालय शिलांग में ही है ! बिलकुल तमांग के घर के नज़दीक !!
           बाकि के लोगों के साथ तमांग शिलांग पंहुचा ! रात के ८ बज रहे थे ! पहाड़ी इलाकों में रात के आठ बजना मतलब लगभग आधी रात का हो जाना होता है , क्योकि सूरज की पहली किरण भी वहां सुबह के ४ : ३० बजे पद ही जाती हैं !
           चोराहे के पास में एक तीन सितारा ( ३ स्टार ) होटल बुक था ! सब ने कडकती ठण्ड में स्ट्रांग काफी का आर्डर किया ऑमलेट के साथ ! तमांग और शशांक अच्छे दोस्त हो चले थे इन ३ सालो में इस लिए तमांग शशांक को अपने साथ अपने घर ले आया ! होटल में नहीं रुकने दिया उसको दुसरे साथियों के साथ ! तमांग के घर में उसकी माँ , पिता जी , एक छोटी बहन और एक छोटा भाई था ! एक और था " रूद्र " ! पहाड़ी नहीं था वो लेकिन उनके साथ ही रहता था !  १२ साल का रहा होगा रूद्र ! रात का सुकून भरा वातावरण ! माँ पिता का साथ ! घर का खाना और फिर बचपन की फोटो के साथ चुस्कियां लेती आधी रात कब निकल गयी , किसी को अंदाज़ा ही नहीं लगा !!
         आंगन से गाय की रंभाने की आवाज़ से सबकी आँखे खुली ! सब तरफ सूरज अपनी बाहें पसार चुका था ! हर तरफ उजाला हो चूका था ! शशांक के लिए ये सब अजूबा था ...सबेरे के ४ बजे इतना उजाला ...कहाँ देखने को मिलता है अपनी दिल्ली में !!  ५ बजते बजते सब ने अपने अपने को फ्री कर लिया और घर के आंगन में बने ज़मीन से सिर्फ डेढ़ फुट ऊँचे फिक्स गोल टेबल के  चारो तरफ बैठ गए ...सबके लिए एक एक गरम शाल रखी थी! सब एक ही तरीके से बैठ गए ...घुटने पीछे की तरफ को मोड़ते हुए !! शशांक के ऐसा एक जापानी फिल्म में देख था ! तमांग उसके बगल में ही था ! सबको खुले से प्याले में चाय परोसी गयी ! हरे से रंग की थी ! सफ़ेद प्यालों में वो हरा रंग अनोखा लग रहा था उस पर से हलकी हलकी भाप ने सजावट का काम किया था ! पड़ोस की बेकरी से लोकल मेड केक और कुकीज़ भी थे साथ में ! यहाँ चाय कपो में नहीं दी जाती ! बंधन नहीं है , खुले प्यालों में पीजिये , चाहे जीतनी !

           सब सलीके से चाय का मजा ले रहे थे की अचानक तमांग की बेहेन ने सन्नाटे हो तोडा !

शीनू ( तमांग की बहिन का नाम ) : पा ,  मेरी सायकल कब आईगी ? अब तो दादा ( बड़ा भाई तमांग ) भी आ गए ?

मिस्टर वू ( तमांग के पिता  ) : तमांग , आज तुम्हे क्या ऑफिस जाना है ?

तमांग : हाँ , क्यों ?

मिस्टर वू : नहीं सोच रहा था की आज शीनू की सायकल ले आते हैं , घाटी की बड़ी दूकान से !

तमांग : रूद्र चला जाएगा आपके साथ !

मिस्टर वू : तमांग अभी वो छोटा है !

तमांग : छोटा ? बारह साल का हो गया है इस सितम्बर में !

मिस्टर वू : फिर भी करीब पांच  किलोमीटर की दूरी है नीचे और वो भी घुमावदार , कैसे चला सकेगा इतना सायकल ?

तमांग : सब चला लेते हैं पा, आप ले कर तो जाइये ?

मिस्टर वू : नहीं ! तुम अपने काम पर जाओ मैं कुछ और इंतज़ाम करता हूँ ! रुद्र से इतना सायकल चलवाना ठीक नहीं ...अभी छोटा है वो ! तमांग की माँ ने भी मिस्टर वू की हाँ में हाँ मिलाई !

रूद्र : मैं चला लूँगा !

तमांग : तू चुपकर  !

मिस्टर वू : तमांग , ऐसे नहीं !

तमांग ने लगभग घूरते हुए रुद्र को देखा और शशांक के कंधे पर हाथ रखते हुए पुछा ? भाई चाय पी ली हो तो चलो मोर्निंग वाक पर चलते हैं !!

शशांक : हाँ बस आखिरी घूँट है , उतार लूं गले के नीचे !

         शशांक की  ये बात पता नहीं कैसी लगी सब को और सब ठाकाहे मार का हंसने लगे ! माहौल जो तमांग , रूद्र और मिस्टर वू की बातचीत के कारण तनाव भरा हो गया था ....अब हल्का हो चला था !
शशांक ने उठते हुए शीनू के कान में खुस्फुसते हुए कहा ...तेरी सायकल हम आज ही ले कर आयेंगे !
शीनू मुस्कुराई ....बहुत अपनत्व से नहीं छिचले विश्वास के साथ ...पहली बार जो मिली थी शशांक से !

भाई तू रूद्र को ही क्यों भेजना चाहता है वहां : शशांक ने तमांग से पहाड़ी की सड़क पर टलते हुए पुछा !

तमांग : तो क्या वो  नहीं जा सकता ?

शशांक : देख नीचे कितनी घुमावदार सड़क है ! ऊपर से नीचे नहीं नीचे से ऊपर आना है ....सायकल से ...अभी छोटा है यार रुद्र ! थक जाएगा ! तुझे ज़रा भी नहीं लगता की वो इस काम के लिए अभी छोटा है ?

तमांग : हाँ ,है तो छोटा , पर मैं क्या करू ?

शशांक  : अगर वो तेरा अपना छोटा भाई होता तो भी तू ये ही करता ?

तमांग सिर्फ शशांक की तरफ देखता रह गया !

शशांक और तमांग ने एक तिराहे पर जोजफ छोटी सी दुकान पर चाय पी फिर घर लौट गए !

           ऑफिस गए , घर से ही कंपनी वालों ने गाड़ी से उन्हें ले लिया था ! रस्ते से दुसरे बेच मेट्स को भी लिया ! दिन भर ऑडिट किया ! दोपहर में एक बड़े से रेस्तरो में लंच किया ! फिर शाम को चाय और पांच बजे के करीब घर वापस आगये !
           शशांक ने नोटिस किया की तमांग ने दोपहर जब सब लंच कर रहे थे तो तमांग ने एक अच्छी सी दूकान से एक बड़ी सी चोकलेट खरीदी थी , दो और छोटी छोटी भी ! घर में घुसते ही उसने शीनू और अपने छोटे भाई को बुलाया और दोनों तो छोटी छोटी चाकलेट दे दी !

रूद्र वहां नहीं था !

तमांग : माँ, रूद्र कहाँ है ?

माँ : पा के साथ नीचे घाटी तक गया है ?

तमांग से पहले शशांक ने पूछ लिया : क्यों ?

माँ : रूद्र की स्कूल की ड्रेस सिलने दी थी , वो ओर उसको जूते भी पहनाने थे तो उसके पा उसको साथ की ले गए हैं !

तमांग ने अपने पा को फ़ोन किया और कहा : पा , आप वहीँ रुकिए मैं और शशांक आ रहे हैं नीचे!

मिस्टर वू : ठीक है !

बाइक ले कर तमांग और शशांक नीचे पहुचे !

तमांग को देख कर रूद्र ने अपने को छुपाने की कोशिश करी दुकान के आड़ में , क्यों ....ये आप खुद सोचिये !!

रूद्र  वहां कहाँ खड़ा है , इधर आ ! तमांग ने बुलाया बिना बाइक से उतरे हुए !

       रूद्र नहीं आया , सहमा सा खड़ा रहा ! सोच रहा था पा ने मेरी ड्रेस और जूतों पर आज कुछ खर्च कर दिया है ....फिर तमांग भैया कुछ बोलेंगे , इस लिए नहीं आया !

       तमांग ने बाइक खड़ी करी और रूद्र के पास गया और झुकते हुए उसके गाल पर चूम लिया फिर गले से लगा लिया ! शायद इस पल का ही इंतज़ार था रूद्र को .....रूद्र जोर जोर से रोने लगा और अपनी पूरी ताकत से तमांग से लिपट गया , जैसे अमरलता लिपट जाती है किसी शाख से पुरे समर्पण के साथ !! तमांग की पलकें भी भीग चुकी थी ! कितना फासला कर लिया था तमांग ने अपनों से ही आज पता लगा उसे....रूद्र रोये जा रहा था !

तमांग : रूद्र , ले ये चकलेट ले और बाइक पर बैंठ मैं अभी आता हूँ !

रूद्र ने तमांग को नहीं छोड़ा ! आज पिछले छे सालों की प्यास बुझा लेना चाहता था ! बड़े भाई का हाथ छोटे भाई के सर पर कैसा होता है को वो तरस गया था ....आज सब से अमीर था रूद्र  दुनिया में ! भाई जो साथ था !

    तमांग ने बड़ी वाली चाकलेट रूद्र को दी और खुद गोदी में ले जा कर बाइक पर उसको बैठा दिया ! उसकी आँखों से आंसू पोछे  ! पा और शशांक ये सब देख रहे थे !  खाई देर से बनती है लेकिन उसको पाटना भी आसान है !

तीनो चारो बाज़ार गए - शीनू के लिए सायकल खरीदी ! छोटे भाई के लिए एक जोमेट्री बोक्स ख़रीदा ! रूद्र के लिए अच्छे से हैण्ड ग्लब्स ख़रीदे सफ़ेद रंग के ! पा अपनी बाइक पर आये थे ! शशांक ने अपनी बाइक पर रूद्र को लिया और पा के साथ घर की और चल दिए ! तमांग सायकल ले कर घर की और चल दिया ! शाम हो चली थी ! ठंडी हवाए ! कोहरे की हलकी चादर चढ़ने लगी थी! तमांग एक घंटे के बाद घर पहुच गया ! रूद्र घर के बाहर वाले दरवाज़े पर तमांग का इंतज़ार कर रहा था  ! शीनू भी नहीं थी बाहर जब की सायकल उसकी ही थी ! सब अन्दर चाय पी रहे थे !

तमांग ने रूद्र को देखा रूद्र ने तमांग को ....

तमांग : चलाएगा ?

रूद्र : हाँ !!

तमांग : तो आजा फिर !

सामने वाली सड़क का एक चक्कर लगाया रूद्र ने , फिर दोनों घर के अंदर गए ! 

           आज उसी सामने वाली सड़क पर जोजफ की चाय की दुकान पर पांच सालों के बाद शशांक चाय पीते हुए यादों के महल में चहलकदमी कर रहा था की उसके कंधे को हिलाते हुए किसी सुन्दर से लड़के ने कहा : नमस्ते !

शशांक के सामने एक सुन्दर सा लम्बी और भरी पूरी कद काठी  वाला अठारह साल का युवक खड़ा था !

शशांक : नमस्ते , माफ़ करना भाई मैं आपको पहचान ना सका !

रूद्र हूँ भैया मैं !

शशांक : अरे तुम रूद्र ! आओ आओ , जोजफ भाई एक काफी देना !

रूद्र : काफी किस के लिए ?

शशांक : तुम्हारे लिए  !

रूद्र : आपको कैसे पता की में काफी पिता हूँ ?

शशांक : बस पता है ! खैर क्या करते हो ? कहाँ हो ?

रूद्र : इस साल बी काम में   है एड्मिसन हुआ है और यहीं हूँ ! सुबह सवेरे आप यहाँ क्या कर रहे हैं ! और घर क्यों नहीं आये ? चलिए अभी चलिए !

शशांक : हाँ बस घर आता थोड़ी देर में !!

जोज़फ़ ने काफी का कप रूद्र की तरफ  बढ़ा दिया !

रूद्र : भाई कितने हुए ?

शशांक : हा हा हा ....अरे इतने बड़े नहीं हुए हो ...अपना पर्स जेब में रखो !

शशांक  की आवाज़ में आदेश था !

अब रूद्र शशंक के कन्धों से भी ऊँचा हो गया था ! दोनों घर की तरफ चल दिए !

रूद्र : आप यहाँ अचानक , कैसे ?

शशांक : अब मैं यहीं रहूँगा ! मेरी जॉब यहीं की बड़ी चाय की पत्ति वाली कंपनी में लगी है !

रूद्र : या बड़ी अच्छी बात है भैया !

           शशांक धीरे धीर घर की तरफ बढ़ रहा था और सोच रहा था जब वो खुद रूद्र की उम्र का था तब एक पापा के एक दोस्त ने उसका कैसे फायदा लिया था ! अपने बेटे की सायकल खरीदने और उसको चला कर ले कर आने की लिए उसको ले कर गए थे जबकि उनके बेटे से शशांक दो साल छोटा ही था !! 
       यादें कहाँ से कहाँ ले जाती हैं आपको ! समय जैसे रुक गया सा रहता है यादों के सहारे ! शशांक अभी ये सोच ही रहा था की रूद्र के फ़ोन की घंटी बजी - तमांग का फोन था !

रूद्र : तू जहाँ भी है , जल्दी दे बस स्टाप पर जा वहां शशांक भैया आ रहे हैं ! वसे मैं लेट हो चूका हूँ तुझे फोन करने में ....जा जल्दी जा उनको ले कर घर आना फिर आगे के लिए शाम को बात करते हैं - दूसरी तरफ से तमांग ने रूद्र से एक सांस में सब कह दिया !

रूद्र : तमांग भैया , शशांक भैया आ गए हैं और वो  में अपना  सामान रख चुके हैं ! अब में उनको घर ही ले जा रहा हूँ , लीजिये उनसे बात कीजिये ! रूद्र ने फ़ोन शशांक को दे दिया !

शशांक : हाँ भाई , घर के पास ही हूँ , शाम को बात करते हैं, ओके बाय !

रूद्र और शशांक घर में घुसे !

            शीनू और छोटे भाई दोनों ने शशांक के पैर छुए ! तमांग ने बताया था ऐसा करने को ! जब तमांग शशांक के घर गया था तो उसके छोटे भाई ने भी तमांग के पैर छुए थे ! शीनू को देख कर रूद्र ने भी शशांक के पैर छुए ! सब कितना पारिवारिक था !
        समयक परिवर्तन बहुत ज़रूरी हैं और उनके लिए ज़रूरी है ग्रहण करने की , सबकुछ अपना लेने की काबिलियत !!

रूद्र , तमांग , शशांक और सायकल ...सब साथ ही हैं , संसार तो चलता रहता है !!


                               
                                                                                                       ::: मनीष सिंह ::


Thursday, May 16, 2013

भावनाए, व्यापार करती हैं, समय के बाज़ार में !!

आँचल की गांठे,

सारा परिवार,
बांधे रखती हैं,
एक समय तक!

जब समय स्वयं,
घुलता हैं,
तपिश में,
संबंधों की,
तात्कालिक,
प्रतिक्रिया स्वरूप,
तब माँ ,
हार जाती है !

बंधन शाब्दिक
रह जाते है,
भावनाए,
व्यापार करती हैं,
समय के बाज़ार में !

                       ::: मनीष सिंह ::

पथिक की गति, जीवन्तता का हस्ताक्षर है !!

पथिक !
गतिशील हो तो,
संरक्षित रहते है,
आशाओं के ताल,
कोपलों में आनंद,
जीवट मानस में,
संबंधों के रंगों,
रंगे आँचल!

गलियों मुहल्लों,
शहरों - शहरों ,
गुजरता जीवन,
बचपन से,
उम्र होने तक,
पथिक ही तो है !

गतिशील रहिये,
पथिक की गति,
जीवन्तता का
हस्ताक्षर है ! 

                                                                                                :: मनीष सिंह ::

Thursday, May 9, 2013

" पलाश " के फूल !

मुस्कुराते हुए,
लहराते हुए,
खिलखिलाते हुए,
रहते हैं,
सुबह की खुश्बु,
भोर की ठंडक,
दोपहर की धुप,
से बाबस्ता,
रोज़ दीखते हैं !
" पलाश " के फूल,
हमारे आपके,
मन की तरह,
सब सहते हुए
समर्पित से !

Tuesday, May 7, 2013

एक कहानी : रिश्ते अर्थ चाहते हैं !!

            " माँ " के हाथो के आलू मेथी के गरमा गरम कुरकुरे पराठे जिन पर चम्मच भर सफेद मक्खन, एक टुकड़ा गुड, बथुवे का रायता, आम का खट्टा मीठा आचार और रविवार की सुबह !! साथ में टी वी पर रंगोली पर नए पुराने गाने , अदभुद समय था वो !

                                                    आज मन कुछ उदास था , उसका !
              रविवार होने पर वो वैसे तो सबसे पहले उठ कर हर एक के कमरे की बेल बजा कर सब को उठा देता था , आज उसने  बिस्तर ही नहीं छोड़ा था सुबह के आठ बजे तक !  सब हॉस्टल के दोस्त एक एक कर  के उठे और धीरे धीरे शील के कमरे की तरफ आने लगे , ये देखने की आज है कहाँ पूरे  हॉस्टल का दोस्त !!
                सूरज पूरी तरह  निकल चुका था ! दरवाज़ा अन्दर से खुला था , अन्दर की ओर खुलता था हलके से आवाज़ लगाते हुए वरुण ने पुकारा : शील , आज कहाँ है भाई , उठा नहीं अभी तक ? उठ ? पुरे दरवाज़ा खुल जाने पर भी शील ने कोई ज़वाब नहीं दिया ! हाँ वो उठ कर अपने स्टडी टेबल पर बैठा ज़रूर था हाथों में एक पुराने फोटो का एल्बम ले कर , शांत , कुछ सोचता हुआ !!
            वरुण और सन्देश ने एक दुसरे को आश्चर्य से देखा !

अरे क्या हुआ हीरो ? आज बड़ा सेंटी बन कर बैठा है ? : वरुण ने कहा !

कुछ नहीं यार , बस ऐसे ही आज मन नहीं है ? शील बोला !

वरुण : क्यों क्या हुआ ?

शील कुछ नहीं बोला !

सन्देश : यार कुछ हुआ भी ? क्या लड़कियों की तरह कर रहा है ?

शील : एसा नहीं है ,बस आज माँ की याद आ गई !

वरुण और सन्देश भी अब थोडा गंभीर हो गये !

तभी हॉस्टल के वार्डन की तरफ से

एक सुचना आई ,नाश्ता तैयार है चलिए खा लीजिये, १० बजे के बाद नहीं  मिलेगा !  

चल चल अब देर मत कर यार नहीं तो आज का दिन भूखा रहना पड़ेगा ! : वरुण ने चिंता जताई !

सन्देश ने कहा : भाई पता नहीं आज क्या मिलेगा खाने में !!

शील : ये फोटो देखो ?

वरुण ने कहा : भाई बाद ने देख लेना फोटो पहले नाश्ता कर लेते हैं !

शील : चल आज मेस का नाश्ता मत खाओ , मेरी तरफ से केन्टीन में !

वरुण / सन्देश :  अरे क्या बात है भाई , बता तो सही आज है क्या ?

शील : बोला ना, आज मन कुछ ठीक नहीं , तुम ये फोटो तो देखो ज़रा ! उसने एक पुरानी फोटो
दोनों की ओर बढ़ाते  हुए कहा !

वरुण ने अहिस्ता से फोटो अपने हाथों में ली और अचानक से उसके चहरे के भाव भी लगभग शील जैसे हो गए !!

सन्देश के साथ भी ऐसा ही हुआ जब फोटो उसके हाथों में आई !

कमरे में अचानक चुप्पी छा गयी !

तीनो एक   दुसरे को दया , करुणा , और लगभग छलक जाने वाली आँखों से देखने लगे !

अभी दो साल पहले ही की तो बात थी ! तीनो शील के घर गए थे ! छुट्टियों में !  वो तीनो नए नए दोस्त बने थे और ये दोस्ती जो कालेज दिनों में होती है अपनी जड़ें जल्दी जमा लेती हैं ...स्वाबलंबी जो होना होता है अच्छी नौकरी के साथ इत्यादि इत्यादि !!

हल्की गुलाबी ठण्ड थी उस सुबह जब वो सो कर उठे !

देर रात ट्रेन लेट हो जाने से २ बजे पहुचे थे घर ! माँ ने रात में कहवा बना कर दिया था !

ठिठुरते हुए सो रहे थे तो माँ ने रात में तीनो को कम्बल ओढाया था और माथा चूमा था !!

        घर के अन्दर के छोटे से  पार्क में सुन्दर गुलदावदी और डहेलिया  खिले हुए थे ! बीच में सफ़ेद रंग की बांस की चार कुर्सियां और एक बांस का ही एक गोल टेबल रखा था ! चारो में वहीँ बैठ कर नाश्ता किया था ! शील की मम्मी के हाथो की बने आलू मेथी के पराठे और साथं में रायता , आम का खट्टा मीठा अचार ! किसी को याद नहीं की कितने पराठे खाए होंगे ! पेट भर कर खाया था बस ये याद है ! नाश्ते के बाद शील के पापा ने हम सब की एक ग्रुप फोटो खेची थी , माँ के साथ ! माँ को शील रसोई से ज़बरदस्ती खीच लाया था ! हाथों से लगा आटा भी साफ़ नहीं कर सकीं थे वो ! आँचल कमर में कसा हुआ था ! हलके कच्चे पीले रंग की साड़ी और माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी ! कितनी अच्छी माँ , जैसी सब माँ होती हैं ! वरुण उनके सामने टेबल हटा कर बैठा था और शील दाएं और सन्देश बाएँ बैठा था ! शील के हाथो में एक पराठे का टुकड़ा था जिस से टपकता हुआ मक्खन वरुण की सफ़ेद टी शर्ट पर गिर गया था , जिसे माँ ने ही साफ़ किया था ! खुश थे सब ! चार दिन के बाद हॉस्टल लौट आये थे ! और उसी दिन शाम को  भूकंप की खबर आई ! माँ पिता जी नहीं रहे , घर भी नहीं रहा , सब ख़तम !
       एक महीने बाद फिर से हॉस्टल की पढाई शुरू हो गयी थी  ! शील के मामा जी ने सब इंतज़ाम कर दिया था ! 
       कल माँ की बरसी थी ! पुराने एल्बम से ये फोटो अचानक गिर गयी और मुझे सब याद हो आया दोस्त - शील ने कमरे में पसरी ख़ामोशी को तोड़ने की कोशिश करी !

वरुण और सन्देश - ने गहरी सांस ली !

शील का हाथ खीचते हुए वरुण बोला : चल जल्दी से शॉर्ट्स डाल कहीं ले चलना है  तुझे !

शील : पर कहाँ ?

वरुण : तू आ तो सही !

भाई तो जा और २ घंटो के लिए पास बनवा कर ले आ तब तक वार्डन से - वरुण ने सन्देश से कहा !

सन्देश : ठीक है , तुम मुझे मैं गेट पर मिलो , मैं वहीँ मिलूँगा !

       तीनो पास के एक मंदिर में गए ! भगवान् को प्रणाम किया ! फिर गए मंदिर के पीछे बने अनाथाश्रम में ,जहाँ वैसे तो खाना दान करने के लिए एडवांस में बुकिंग करी जाती है पर कुछ बांटना हो तो कोई मंजूरी की ज़रुरत नहीं !  खूब सारे फल , १० किलो जलेबी , बर्फी और शाम के लिए पूड़ी सब्जी का कह दिया वहां के हलवाई से , जो अभी फल और जलेबी बाँट दी और शाम को बाकि सामान बाँट देगा ! माँ और पिता जी के नाम से !

शील ये सब देख रहा था ! उसने वरुण और सन्देश से पुछा !

इतने पैसे कहाँ से लाया भाई ?

वरुण : माँ ने ही दिए थे !

शील : कब ?

वरुण  : चलते समय ! वो मैंने खर्च नहीं किये ! उसी दिन एक गुल्लक खरीदी और उसमे दाल दिए और आज इतने सारे हो गए माँ के कारण दो सालों में और अब माँ के नाम से ही दान कर रहा हूँ !
                शील और सन्देश : कुछ नहीं बोल सके बस वरुण को देखते रहे , ना जाने कितने सम्मान , ना जाने कितने आदर भरे शब्द दोनों की आँखों से बिना ध्वनि के बह रहे थे   और वरुण चिपचिपाते जलेबी के टुकड़ों को परोसता हुआ रिश्तों के बंधन मजबूत कर रहा था !

                                  रिश्ते  अर्थ चाहते हैं - केवल शब्दार्थ नहीं !!