Wednesday, January 30, 2013

शंख ,सीपियों के टुकडे और पीले-पीले से पन्ने जहाँ स्याही फैली-फैली सी है ...रिश्तों की तरह ....!!

          रोज़ सुबह के आठ बजे एक दो आवाजें हमारे छोटे से शहर को पूरी दुनिया से जोड़ देती थी ! आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले राष्ट्रिय समाचारों के माध्यम से हम पिछले 24 घंटो में घटी घटनाओं जुड़ जाते थे ....!!
                                              दो विशेष नाम मुझे याद हैं ;

                             " क्लेयर नाग " और " देवकी नंदन पाण्डेय "

          याद कीजिये वो अर्थपूर्ण और गंभीर उद्घोष जो आरम्भ होता था ...कुछ इन शब्दों से ...." ये आकाशवाणी है ...अब आप " क्लेयर नाग " / " देवकी नंदन पाण्डेय "  से समाचार सुनिए ! ऐसा लगता था मानो की आकाश से स्वयं कोई शक्ति हमें दुनिया से जुड़े रहने को कह रही हो ये बता कर !

             नानी दमन के समुद्र के किनारे पर अपने मौसेरे भाई के साथ काली काली रेत में अपना भविष्य तलाश रहा था ...और वो था की ...अँगुलियों के किनारों से बार बार निकल जाता था ....मैं फिर कॊशिश करता था .....बार बार , तभी अचानक रेडियो ...हाँ जी वोही आकाशवाणी का वाहक पर खबर सुनाई पड़ी की " क्लेयर नाग " जी का एक दुर्घटना में निधन हो गया है , देवकी नंदन जी की आवाज़ अब सुनाई नहीं देती ...जसदेव सिह जी जिनकी आवाज और 26 जनवरी की परेड का आंखोदेखा हाल सुनाया जाना एक दुसरे का पर्याय बन गया गया था ...अब सुने नहीं जाते !!
             रात का समय , प्यालियों में चाय और बिस्किट और बाहर होती बारिश में तेज़ चलती हवाओं में रेडियों पर आते समाचार ...जिनसे आवाज़ बार बार कही निर्वात में चली जाती थी ....फिर कोई ना कोई उस रेडियो को एक कोने में लेजाकर एडजस्ट करता था ...तब लगता मानो उद्घोषक की साँसों में सांस आई हो ...और आवाज़ सुनाई पड़ने लगती थी , आज वो आवाजें बिलकुल खामोश हैं .....ऍफ़ एम् चलता रहता है ...बस चलता रहता है !!
          
                सबेरे 6 बजे से रात के 11 बजे तक सुनाई देने वाली आवाजें .....अब हर वक़्त आती रहती हैं ....किस भी चीज़ का अधिक्य रोग की शक्ल ले लेता है और उसके कारण से बचने की सलाह दी जाती है ....!!
            विभिन्न आकर्षक शीर्षक वाले थोड़े थोड़े समय के कार्यकर्म जैसे :

1. जयमाला - फौजियों की रिक्वेस्ट पर आधारित गानों का कार्यकर्म,
2. छायागीत - रात में 10 बजे से पुराने गानों का कार्यकर्म,
3. विचित्र किन्तु सत्य - रोचक सत्य जानकारियो पर आधारित कार्यक्रम,
4. हवा महल - अनोखा कार्यक्रम

इत्यादि ....

                  राजधानी के 3 टियर कोच में साइड लोअर बर्थ ( मेरी पसंदीदा बर्थ ) पर लेटे हुए सफेद चादर ओढ़ कर " विपाशा " का कहानी विशेषांक पढ़ रहा था की अचानक किसी ने लगभग झकझोरते हुए कहा सर आपका मोबाइल गिर गया है .... मैंने उसे धन्यवाद देते हुए अपना मोबाइल उठाया और फिर से लेट गया ...क्या करता दोपहर के 12 बजे थे ...खाना 1 बजे लगने वाला था ...और अगला स्टेशन कुछ 2 घंटे के बाद आता ...और कोच में सब अपने अपने में मगन ...ना कोई बात ना चीत ....बस लेपटोप और आई फ़ोन पर आतंरिक खोखलेपन को कुछ दूर करने की बाहरी व्यस्तता का पारंपरिक ट्रेन का नज़ारा मेरे सामने था ....!! ये त्र्वेंद्रम राजधानी थी ...शाम को पहुचती दिल्ली .....किसी बीहड़ वन से होते हुए गुजरी तो दिखाई पड़ा की कुछ लोग एक घास के छप्पर वाली दूकाननुमा जगह पर रेडिओ सुन रहे थे  और स्वयं को दुनिया से जोड़ रहे थे ...ये ट्रेन भी दिखाई देती भर थी उनको , इसमें चढ़ने का सुभाग्य कहाँ !!

              कुछ दुरी पर समुद्र की सहायक नदी थे शायद ....जिसमे कुछ जीवन , जीवन ढूंढ़ रहे थे और बच्चे ढूंढ रहे थे शंख , सीपियाँ जो कभी हमरी पीढ़ी ने भी संजोई थीं अब टुकड़ो में हैं हमारी यादों में जिनको जोड़ कर यादें प्रतिरूप कर रहे हैं उनमे ...जो आज है , के कल थे के साथ ....किसी पुराने बसते की कोने की जेब में मिल जाती है कभी तो कभी अपने ही घर के आंगन की की दीवार की दो इंटों के बीच गडी हुई कील के रूप में मिलती है ....कभी दिखाई देती है अपने ही घर के किसी स्टोर रूम की बंद पड़ी अटेची में पीले पीले कागजों के रूप में ....जिस पर स्याही फैली फैली सी है ...रिश्तों की तरह ....!!

                                                              आपका अपना   
                                                                                       :  मनीष सिंह    

      

Saturday, January 26, 2013

.... विकास एक परम्परा है , जो निभाई जाती है , ज़रुरत हो तो शुरू भी की जाती है !!

                     " उत्सव " का दिन स्कूलों में गणतन्त्र दिवस हो या फिर स्वतंत्रता दिवस ...जाना तो होता है लेकिन उत्साह इस बात का की क्लासों में जाना नहीं होगा ....बस इधर उधर घुमते रहिये , उन्ही दोस्तों से इन दोनों दिनों में मिलने में , बातें करने में जो आनंद और समय के सदुपयों का अंदाजा होता है , वो अन्य किसी सामान्य दिन में नहीं होता .....!

             स्कूल के बगल वाली स्टेशनरी की दुकान पर आने वाले सारे के सारे नए बाल पेन देख लेने का समय इस दिन ही मिलता था ....

            टिक्की वाले और कुलचे वाले की ठेली पर देर तक खड़े हो कर उसको पत्ते बनाते हुए देखना का आनंद इसी दिन तो मिलता था ....

            स्कूल के बगल से गुजरती हुई सकरी गली से निकल कर बड़ी सड़क पर बने कम से कम 100 साल पुराने " चर्च " के अंदर जाने और उसकी उची उची दीवारों और उनके ऊपर बने बड़े बड़े चित्रों को देखते हुए ...यीशु की प्रतिमा के सामने खड़े हो कर परीछा में बढ़िया नंबरों क प्रार्थना करने का ...सामान्य से देर तक इसी दिन तो समय मिलता था ....

           नवयुग मार्किट के तिकोने पार्क में आधे घंटे बेठ कर फिर घर जाने के बाद ....घर पर या सफाई देना की स्कूल से आने में देर हो गयी की स्कूल से देर से प्रोग्राम ख़तम हुआ .....का आनंद ही कुछ और ही था ...समय भी और था ....
       
           मुकंद नगर से लोहिया नगर तक आने का सीधा सा रास्ता है ....लेकिन इन दोनों दिनों में ... चौपला मंदिर - हनुमान जी को प्रणाम पर के ,  दिल्ली गेट - विभिन्न तरह के जनरेटर और सिंचाइन की मशीनों को देखते हुए , अनाज मंडी - गहू , चावल , दाल और गुड की महक लेते हुए , गुड दाम पूछने क बहाने चखते हुए , गन्दा नाला - मिक्सी की अनेको प्रकारों और उनको ठीक होते हुए देखते हुए घर जाने का आनंद ही कुछ और था !!  घंटाघर से होते हुए मंडी , सब्जी मंडी , गोल मार्किट , फिर बजरिया और वहां से किराना मंडी , फिर गाँधी नगर और तुराब नगर और फिर बसंत सिनेमा हाल के सामने से होते हुए ...लगी हुई पिक्चर के पोस्टर देखते हुए ....नया गाज़ियाबाद रेलवे स्टेशन के प्लेटफोर्म के किनारे किनारे घर पर आने का आनंद और पुरे दिन को उल्ल्हास से बिता कर ....कोई नहीं पूछे की क्यों इतनी देर हुई ? चुप चाप बने खाने को थाली में ले कर टेलीविज़न देखते हुए ....मन ही मन पुरे दिन की यादों को अपनी आँखों में ले कर राजा होने की अनुभूति .....का तारतम्य अनोखा है .......

                   एक मुख्य आकर्षण इस दिन का होता था .....उस दिन मिलने वाले लड्डू , बर्फी , समोसे और कोई ना कोई फल का आनंद और खुद को उन्नंत मानने का आनंद ....         हमारे घर में आपके घरों में इस दिन जलेबी लाने और बांटने का भी चलन है .

                    इस दिन उपलब्धियां देश की राजधानी के विजय चौक  से होते हुए इंडिया गेट पर घूमती हैं और हम बचपन में इस दिन घुमते हैं अपने शहर की सड़कों और गलियों में ....स्कूल की ही यूनिफार्म में ....कोई नहीं पूछता , टोकता की इस समय कहाँ घूम रहे हो ....जैसे की देश की नयी पीढ़ी शहर का अंदाजा ले रही है की देश को आगे कैसे ले जाना है और कैसे सुरक्षित रखना है .......!!

                विकास एक परम्परा है ,  जो निभाई जाती है और ज़रुरत हो तो शुरू भी की जाती है !! इन दोनों दिनों में ये आशा करते हैं ....पारंपरिक तौर तरीकों को और प्रखर किया जाए एवं  नई पीढ़ी की प्रस्तावनाओं को जान समझ कर प्रराभ्ध से प्रारंभ भी किया जाना चाहिए ....कोई ना करे तो सवयम भी कदम उठाये जा सकते हैं ...... जय हिन्द - जय हिन्द की सेना और जय जय हिन्द के नव युवा - देश के किसान .....जय हो !!
        





          

Friday, January 25, 2013

एक कहानी : उस बिना जिल्द की कापी और फटे हुए पन्नो का सच !!

वो रोज़ की बातों को अपनी एक बिना जिल्द चढ़ी कॉपी में लिख लिया करता था , तारीख के साथ !!

            उसे तो 10 सालों के बाद मालूम हुआ की इस आदत को साहित्यक जगत में " डायरी लिखना " कहते है !!
           ---------------------------------------------------------------------------------------------
       "   लगभग 8 से 9 साल का रहा होगा जब उसने अपने आप को एक अनाथालय में पाया ! अभी कुछ दिन पहले ही तो वो अपनी माँ और बाबा के पास था फिर अचानक ना जाने क्या हुआ की बाबा के एक दोस्त उसको इस जगह पर छोड़ गए ....ये कह कर की कुछ काम है इस लिए कुछ दिनों के लिए तुम्हे यहाँ रहना होगा और फिर तुम्हारे माँ बाबा तुम्हे यहाँ से ले जायेंगे , 10 साल से अपने माँ बाबा के इंतज़ार करता करता वो .....आज सोचता है की : " जापान में भी ऐसा होता होगा क्या ? "
          आज जापान की राजधानी टोकियो के एक आलीशान होटल में अपने सबसे बेहतरीन कमरे से सूरज की पहली किरणों का एहसास करते हुए उसका हाथ अपनी उसी पुरानी बिना जिल्द लगी कापी पर चला गया ...जिसको उसने अनाथालय की बिकती हुई रद्दी में से चुने हुए खाली पन्नो से बनाया था ! मोटे धागे और सुई को वो सामने वाले इस्माईल मिया की दूकान से मांग लाया था और सिलते हुए उसके हाथों में एक बार सुई चुभ भी गयी थी , लेकिन वो सुख जो कापी से मिलने वाला था के सामने ये दर्द कोई वजूद नहीं रखता ......सारी बातें अचानक उसके सामने जैसे बैक फ्लेश में चलती हुई फिल्म से सामान गुजरने लगी ......!!
      

         " अरे बंधू कहाँ के हो ? " "कब आये ?" " क्यों आये ? " "माँ मर गयी या बाप ने दूसरी शादी कर ली ?"  किसी रेड लाइट एरिया के प्रोडक्ट हो क्या ?
            उस दिन ऐसे ना जाने कितने अनगिनत सवाल उस से पूछे गए जिनका कोई अर्थ उसको नहीं मालूम पड़ा था और वो ख़ामोशी और आखों में सवाल खुद से पूछते हुए चुप रह गया था ....उस दिन जिस दिन उसके अंकल उसको यहाँ छोड़ कर गए थे !! उन्होंने तो कहा था की कुछ दिनों के बाद उसके माँ बाबा उसको ले जाएँगे लेकिन ये 10 बीतने के बाद भी कोई उसको नहीं बता रहा की वो यहाँ क्यों है , और कब तक उसको यहाँ रहना है ..किस गुनाह में .....?
      उसका  दाखिला सामने वाले सरकारी स्कूल में करा दिया गया , 2.75 रूपए  हर माह फीस जाती थी ! कभी कोई दान में किताबे दे जाता था तो कोई बसते , कोई पेन्सिल रबर दे जाता था तो किसी ने खाने के सामानों की वेवस्था के दी थी .... !! उसको एक गुजरती माता जी ने जैसे गोद ले लिया था ....ना .,...कभी उसको अपने घर नहीं ले कर गयी लेकिन हर हफ्ते उसको मिलने आती थी ....और बाकि बच्चों की तरह उसको भी सब सामान दे कर जाती थी ...बस थोडा अधिक सा सामान मिल जाता था और कभी कभी उसके सर पर हाथ फेर कर कहती थी :

          " तुम मझे एक अच्छे परिवार के लगते हो , खूब मन लगा कर पढो मैं सब इन्तेजाम कर दूंगी ! " एक बार एक सुबह वो आई और कहा की तुमको दसवी के लिए मैं अमदावाद भेज रही हूँ , वही ठीक से पढ़ाई हो सकेगी तुम्हारी ...और में अमदावाद आ गया ....बचपन भर इधर उधर भटकता ही तो रहा हूँ मैं ...ये सोच कर रह जाता था !
       अंग्रेजी - कोंवेंट स्कूल में पढ़ाई होने लगी ...!! लेकिन वो बिना जिल्द वाली कापी उसके साथ हमेशा रही और रोज़ होने वाली बातों को लिखता रहा .....उन्ही शब्दों में .....जेसे जेसे पढ़ाई हुई ...शब्दकोष में विस्तार हुआ और लेखन में प्रखरता आती गयी ....!! उसने कभी दूसरी कापी नहीं बनाई पन्ने कम पड़ते तो किसी और कापी से फाड़ कर उस में ही जोड़ लेता था ! अजीब सा लगाव और भवनात्मक जुड़ाव जो हो गया था उसका उस कापी से .....माँ को सुनाने के लिए जो लिखा था उसने सब ... क्या क्या बीता उसके साथ उन 12 सालों में ...माँ से अलग रह कर ...सब लिखा था उसने ....कैसे उस मीटी खीर का मीठापन आंसुओं के कारण ना कहे जा सकने वाले स्वाद में बदल गया था ....कैसे उस दिन जब उसको क्लास में दूसरा स्थान मिला था तो कोई नहीं था उस पल उसके पास उसके सर पर हाथ फेरने वाला कोई नहीं था ....वो गुजरती आंटी थी तो वो भी एक हफ्ते बाद आती ...और तब वो भाव नहीं आते .....!!
         पढ़ाई में अच्छा था वो ....! इसलिए स्कूल से वजीफा मिला और  कनाडा के एक  प्रतिष्ठित संस्थान में उसको भेज गया .....आज भी वो उसी बिना जिल्द वाली कापी में वो सब लिखता था ....लिखता गया , लिखता गया ....और बढ़ता गया ....!!  इकोनोमिक्स में ग्रेजुअसन करने के बाद डाक्टरी करी ....और इकोनोमिक्स में ही आगे के शोध किये ...और आज जापान में होने वाले अन्तराष्ट्रीय इकोनोमिक्स मीट में कनाडा के दल की आगुआइ करने के लिए आया है ....साथ में उसके एक छोटा सा ...लगभग 5 वर्ष का बच्चा भी है ....कौन ...है किसका है नहीं मालूम .....!!
          ये सब सोच रहा था की अचानक जसे किसी ने उसकी तन्मयता को तोडा ...., दरवाज़े पर घंटी बजी : " रूम सर्विस " , हाँ हाँ अन्दर आजाओ  - टी सर !! उसने थोडा गुस्से से पुछा " और चॉकलेट वाला मिल्क कहाँ है ....वेटर बोला " सर बस ला ही रहा हूँ ...." जल्दी लाओ !
        रोहन , रोहन उठो , सुबह हो गयी ...और वो  5 साल का बच्चा उठा और अपने कोमल कोमल हाथों से सार्थक से लिपट गया ....कितना सुकून मिलता है जब रोहन उसके गले से लिपटता है ....कोई है जो उसका अपना है ...और अपनापन देता है ....पुरे खालीपन में एक रंगीन " तुलिका " जो जीवन को रंगों से भर देगी ......!!
        उसने रोहन को बनारस के एक अनाथालय से अडॉप्ट किया था पिछले साल जब वो अपनी माँ को खोजने भारत आया था ....माँ तो नहीं मिली ...किन्तु वो पिता बन गया ..." रोहन " का ...तब से वो उसके साथ है .... अकेलापन जो जान बूझ कर दिया गया हो ...वो सार्थक ने जिया है ...इस लिए रोहन उसके साथ है ...और साथ है वो पूरा समय शब्दों में लिखा गया उसकी बिना जिल्द वाली कापी में ....जो माँ और अकेलेपन की कमी को पूरा करती है ...

           भैया आप इन फटे पुराने पन्नो को क्यों अपने साथ रखते हो ? इनको फेक दो और नई डायरी खरीद लो ....ये अच्छी नहीं लगती .......रोहन ने वो बिना जिल्द वाली कापी अपने हाथो में ले कर मुह सिकोड़ते हुए बोला ....!  ये बात रोहन ने कही थी इस लिए वो बर्दास्त कर गया , कोई और एस कुछ उसकी इस कापी के बारे में कहे तो ......बस !!
          वो रोहन को चाकलेट वाले दूध को पिलाते हुए सोचने लगा " रोहन " ज़िन्दगी के बीते हुए दिन बदले नहीं जा सकते ....जो जैसा बीत गया वो वैसा ही रहता है ....हाँ आनेवाली ज़िन्दगी को बदलने का प्रयास किया जा सकता है ....जैसे मेरे साथ उन गुजराती आंटी जी ने लिया और अब मैं वो ही कोशिश तुम्हारे लिए करूंगा ....."

         वो ये सब सोच ही रहा था की उसके एप्पल के टेबलेट पर सारिका की काल आई
...और उसने पुछा ...रोहन ने दूध पिया ?

सिद्धार्थ : हाँ पी लिया ...और  अंशिका क्या कर रही है ...

सारिका बोली : बस स्कूल के लिए तयार होते हुए रोहन को याद कर रही है ....कब तब आओगे ?

सिद्धार्थ बोला " - कल सुबह " !

सारिका : ठीक है -

सिद्धार्थ : सारिका ,,,,, ये रोहन मुझे अभी भाई भैया ही बोलता है ?

सारिका हंसी और बोली : हा हा हा ...भाई मुझ तो माँ बोलता है ! ठीक है ...तुम आ जाओ मैं उसे सिखा  दूंगी .....चलो अब रखती हूँ ....अंशिका की स्कूल बस आ गयी ., ओके बाय रोहन का ख्याल रखना और मीटिंग के वक़्त उसको अपने आस पास ही रखना !

सिद्धार्थ  बोला  : अच्छा ठीक है ...बाए , रोहन : नही बेटा उन पन्नो को दो मुझे !

रोहन  बोला : आप इतना क्यों प्यार करते हो इन फटे पन्नों से ?   

           सिद्धार्थ ने मुस्कुराते हुए रोहन से एक कापी का अलग हुआ पन्ना वापस लिया और मन ही मन सोचा - बेटा , हो सके तो तुम ऐसे पन्नों को मत इक्कठा करना ....मेरी तरह !!!
                              एक-एक दिन कर के जुड़ते हुए पन्ने ही तो है , ये जीवन  !!

        जो कभी कभी सुन्दर जिल्द वाली किताब बन जाते हैं ...भरे पुरे परिवार और जिम्मेदारियां निभाते हुए और कभी कभी पूरी उम्र एक एक कर के पन्ने जुड़ते रहते हैं " जिल्द " कभी चढ़ती ही नहीं  !!

Monday, January 21, 2013

यद्यपि , कमियों में पूरे किये गए अच्छे शौक़ ... शौक़ नहीं रहते .... उनको पूरा करने का जूनून और किये गए प्रयास तथापि जीवन के " मार्गदर्शक " हो जाते हैं !!

                                    तब वो  यू एस एस आर ( U S S R )  हुआ करता था !!

                सन  उनीस सौ अट्ठासी (1988 ) उन्नीस सौ इक्क्यानबे (1991 ) के वर्षों के बीच की बात है ! हर रोज़ स्कूल से आते वक़्त मैं अपने दोस्तों के साथ एक किताबों की अस्थाई दूकान पर रुका  करता था , घंटों वहां पर रखी रंगीन और बढ़िया चित्रों वाली किताबों को अलट - पलट कर देखा करता था ! भाषा हिंदी , रुसी , अंग्रेजी और इतालवी में होती थी !! हिंदी भाषा की किताबें और उनके रंगीन कलेवर ( COVER ) , पन्नों और मुद्रण का स्तर इतना उम्दा की देखने वाला बरबस ही उनकी ओर आकर्षित हुए बिना न रह सके  !!
              वो समय भी सब के जीवन में विशेष होता है जब हम आठवीं और दसवीं क्लास में पढ़ रहे होते हैं ...जब सब कुछ पा लेने की चाहत होती है जो भी हमारे आस-पास होता है , चाहे जो कुछ भी हो ....अपनी सीमाओं में हो  या ना हो !! सब कुछ अपने पास रख लेने की चाह !!               
              कभी डाक टिकट इकठ्ठा करने में मन लगता है तो कभी रह चलते मिलती हुई खाली माचिस की डिब्बियों के ऊपर छपे विभिन्न चित्रों को संचित कर ने की इक्छा होती है ....फिर वो खाली डब्बी चाहे जीतनी भी धुल भरी जगह पर पड़ी हो ....उठा लेते हैं और रख लेते है ...अपने बचपन के खजाने को बढ़ाने के लिए ...!!  कभी बोटनी की क्लास में जाने का मौका मिले , वैसे सरकारी स्कूलों में इसे मौके सिर्फ एग्जाम के समय ही मिलते है जब दुसरे जगह के एक्स्ज़मिनर  लेने आते हैं ....वर्ना तो सारी पढ़ाई बिना प्रयोगशाला में गए ही पूरी हो जाती है ....और जब बोटनी की प्रगोय्शाला में जाते हैं तो उसी दिन से शुरू हो जाता है ....सभी दिखाई पड़ने वाले पेड़ पौधों के पत्तों को किताबों में रख कर सुखाने और संगृहीत करने का सिलसिला ....दर असल कई बार इस तरह से मैंने अपनी कितनी ही किताबों के पन्नो को खराब किया था !
            घर में लाइब्रेरी बनाने का  शौक़ चाहे अपने कोर्स की किताबों को पढ़ने का वक़्त मिले या ना मिले , पढ़ने का मन करे ना करे !! इसी शौक़ को हमारे मित्र देश रूस की लिए भारत में मुद्रित होने वाली किताबों ने और पंख लगा दिए ....रोज़ दोपहर स्कूल से लौटते वक़्त उस बस अड्डे के किनारे वाली अस्थाई दूकान पर घंटों खड़े हो कर देखने का मन और सामने से आती जाती बसों , कारों और ऑटो के शोर का कोई फर्क नहीं होना ...बस उस उम्र और चाहत के कारण था !! तब इस किनारे जहाँ आज भी एक मशहूर पोद्दार नर्सिंग होम है से G D A की विकास बिल्डिंग साफ़ साफ़ दिखाई पड़ती थी ...तब पुल नहीं बना था ...और संतोष मेडिकल कालेज का काम पहले होटल केलिंवोर्थ के नाम से प्रगति पर था .... !!
            अब आप समझ ही सकते हैं की उत्तर प्रदेश के किसी सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले किसी आठवीं के बच्चे की अंग्रेजी में कितनी पकड़ होगी ...फिर भी उस किताब की दूकान पर खड़े हो कर के अंग्रेजी में छपी और इन्गिनिरिंग की किताबों को अलट पलट कर देखने से गर्व महसूस हो था था ...और तब ज्यादा जब कोई हमें देख रहा हो ऐसा  करते हुए ...!! ये सही है !! उन किताबों के पीछे के पन्नों पर उनके दाम लिखे होते थे , स्टाम्प किये होते थे नील रंग की स्याही से !! सबसे मेहेंगी किताब उन दिनों मैंने उस दूकान पर देखि थे 50 रूपए की !! कुछ और भी मंहगी रही होंगी किन्तु इतनी मोटी और प्रभाव छोड़ती हुई , कभी उनको उठा कर भी  नहीं देख सका!! 
            मेरा  सब ले लेने का मन करता था बस उनके मुल्य चुकाने को पैसे नहीं होते थे ,आज पैसे हैं तो अब मन नहीं करता ....और वो किताबों की अस्थाई दुकाने भी नहीं लगती ! रोज़ या एक दिन बीच कर के मिलने वाले एक या दो रुपयों को सप्ताह भर इक्कठा कर के अंदाजा लगता था की कौन सी किताब आ सकती है ...किन्तु कई बार एसा हुआ की जब तक मनपसंद किताब के लिए पैसे जमा हुए तब तक वो अस्थाई दूकान शहर के किसी और इलाके में चली गयी ....और हम मन मार कर रह गए ....!! मैंने कई किताबें खरीदी थीं वहां से , कुछ तो आज भी मेरे पास हैं उनके शीर्षक ही मन को भा गए और फिर उनके रंगीन और आकर्षित करने वाले कलेवर तो क्या कहिये .....:

1. रुसी लोक कथाएँ ,
2. F I N S  - रंगीन मछलियों के चित्रों और उनकी जानकारी सही,
3. लेव टॉलस्टॉय की - क्ज्ज़क्क इत्यादि ...

            एक किताब तो कुछ 21 रूपए की है ...सन 1991 में ये भी बहुत थे भाई ....और मेरे पास 4 दिनों के बाद 21 रूपए पुरे होने वाले थे ...हब मैंने उस किताब बेचने वाले से एक सौदा किया ...की वो ये किताब मेरे सिवा किसी और को नहीं बेचेगा लेकिन इसके बदले में वो मुझ से 1 रुपया ज्यादा लेगा ....और मैंने उसको चार दिन बाद 22 रूपए दिया 21 किताब के और 1 उस किताब को मेरे लिए रखने के लिए !!  एसा था मैं .......कज्जाक तो सिर्फ 8.50 रुपए की है !! आज उसी जगह पर एक चाट वाला खड़ा होता है जिसकी चाट के एक पत्ते की कीमत है 25 रूपए ....लोग लाइन लगा कर खाते हैं ....!!  मेरे घर में आज भी हिंदी की चंदामामा आती है ! मेरी माँ को भी किताबें पढने का खूब शौक़ था , इंद्रजाल कामिक्स की तो दो मोटी मोटी एक साथ बाइन्द करी हुई किताबे आज भी हैं जिसमे " मेन्ड्रेक " और " बेताल " की किताबें आज भी हमको उन्ही जादुई दुनिया में ले जाती हैं !! वो नोवेल भी खूब शौक़ से पढ़ती थीं ...., कुछ तो आ भी रखीं हैं !!
          मेरे किताबों के खजाने में एक और किताब अपनी संख्या बाधा रही है ..." विपाशा " जी हाँ उस पत्रिका का नाम है !! मुझे कई विशेषांक भी मिले हैं उसके !!
          वस्तुतः हम जब किसी चीज़ को पाना चाहते हैं और वो बिना किस मशक्कत के मिल जाये तो "यादगार" नहीं बनती !
          यद्यपि  , कमियों में पूरे किये गए अच्छे  शौक़ ... शौक़ नहीं रहते .... उनको पूरा करने  का जूनून और किये गए प्रयास तथापि जीवन के " मार्गदर्शक " हो जाते हैं !!
            


Friday, January 18, 2013

~~~ भीगा-भीगा सा चाँद, कल रात सोया नहीं !!

                      **** भीगा - भीगा सा चाँद , कल रात सोया नहीं !! ****

              रूई से भी ज्यादा कोमल रेशों की तकिया बनवाई थी उसके पापा ने उसके लिए जब वो छोटा था ! पूरी पूरी रात कभी कभी तो अगले दिन भी वो अपने दफ्तर नहीं जाते थे ...इस लिए की वो अपने पापा की गोद में सोता रहता था ...और वो जाग ना  इस लिए वो अपने हाथों से उसको उतारते नहीं थे , और वो सोता रहता था !   आज उसके पापा उसके साथ नहीं हैं !! वो कोमल सा तकिया भी ना जाने किस के पास है ...उसके पास नहीं है !! वो दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह " पापा की गोद " भी उसके पास नहीं है ! आज वो देखता है बस और मन की समझा कर रह जाता है की ...कोई नहीं है सब था अब नहीं है !!
               कल रात बहुत ज़ोरों की बारिश आई और लगता था की ओले भी पड़ रहे थे ...उसको अपने बचपन की ऐसी  ही रात याद हो आई ...जब जोर से बारिश आई थी और उसके पापा ने उसको अपने सीने से लगा लिया था ...सारा डर , दिसंबर की सुर्ख सर्दी और कपकपाहट सब पापा ने ले लिया था और वो सुकून से सोया था !

                अगले ही दिन उसके पापा कहीं गए और फिर कभी नहीं लौटे !! उसकी गीली आँखे आज भी उस रात की ही तरह भयभीत है ...लेकिन उस दिन  तरह आज उसके पापा नहीं हैं उसके पास जो सब अपने में समां लेते ....!! कल रात भी बारिश हुई और सब कुछ वैसा ही हुआ ...बस पापा की गोद और उनके सीने से मिलते सुकून के सिवा !!

                रात भर बारिश होती रही और रह रह कर पापा के ना होने का खालीपन उसको खाता रहा !! ये भी एहसास करता था ...आज , कल और आने वाले कल में फर्क होता है ....!
               अपने सभी भाई बहनों में वो एक चाँद है ... और आज की रात ये भीगा भीगा सा चाँद सोया नहीं ....पूरी रात बारिश भिगोती रही और अपने खालीपन और आंसुओं से चाँद खुद भीगता रहा ...बिना किसी से कुछ कहे ...और जागता रहा ....चाँद सोया नहीं ....चाँद अकेले ही रहते हैं ...हमेशा भीगते हुए ...बारिश से आंसुओं की अकेले-अकेले !!

Wednesday, January 9, 2013

........कच्ची सड़क की पक्की रोड पर ....अनवरत ,निरंतर

                    दिसम्बर महीने का दूसरा हफ्ता था वो साल 2012 का ....भारत के पूर्वी नवीनतम राज्य झारखण्ड के एक मशहूर औद्योगिक शहर " टाटानगर " से हम वापसी कर रहे थे ! सुबह के तकरीबन 6 बजे के आस पास रेल गाड़ी का समय था! एक ही रेल से और भी कई मेहमान वापस अपने अपने घरों को जाने को थे !! मामा जी ने सभी के लिए अलग अलग ऑटो का इन्तेजाम करवाया था ! 
                सवेरे के 4 बजे लगभग सभी लोग जाग गए , चाय , बिस्किट, नमकीन सब कर लिया गया ...अब शादी का घर है तो इन सब चीजों की कमी तो होती नहीं है ! धीरे धीरे सबने अपने अपने सामान समेट लिए ..सब ने स्वयं को तयार किया और सर्दी की सुबह चलने की लिए चेहेल कदमी करने लगे ....!! ऑटो की आवाज़ों  ने  देर रात को सोये नया बाज़ार को झकझोर कर उठा दिया ...!! सबने अपने अपने सामान बटोरे और पहुच  गए लोह पथ गामिनी स्थल ...!!
               कितना असहज हो जाता है ना उन्ही लोगो का कुछ देर साथ रहना रेलवे स्टेशन पर ....और ज्यादा तब मुश्किल होती है जब सब को एक ही गाड़ी में जाना हो और सीटें अलग अलग बोगी में ....रिश्ते भी अलग अलग ......सबकी अपनी अपनी पहचान अपने अपने शहर में , सबका अपना रुतबा उस मेह्मानावाज़ के यहाँ ...किन्तु टाटानगर के प्लेटफोर्म नंबर 3 पर सब जहाँ तहां बैठे कर गाड़ी का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं ..... मामा जी सब के लिए चाय का इंतज़ाम करने में लगे हैं ....सब अपने अपने में मगन ...ये सोचते हुए ...कोई कुछ पूछ ना ले ...कोई सम्मानित करने वाला सवाल नहीं ...कोई मतलब हल करने वाली सुचना ...जैसे मोबाइल नंबर ....!!
            खैर जैसे तेसे कर के 20 मिनट्स कटे ! पुरुषोत्तम एक्सप्रेस आई , हम सवार हुए और वो चलदी ....मामा जी ने सब को एक एक कर के धन्यवाद दिया और अपने यहाँ अगले कार्यक्रम में आने का निवेदन किया !! सब ने अपने अपने डब्बों से हाथ हिला कर अनुग्रह की स्वीकारोक्ति प्रदान करी ....!! 
               मिठाइयाँ मिली थीं ! खाना मैंने चलती ट्रेन में खाना परोसने वाली एक रेलवे की सेवा पर आदेशित किया और वो मुग़लसराए में आ भी गया !! इस बीच गया - हाँ जी वही स्थान जहाँ भगवान श्री महात्मा बुध को बरगद के पेड़ के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी से भारतीय नवयुवकों की टोली हमारे कोच में चढ़ गयी ... कहने को हमारा कोच तीसरे दर्जे का वातानुकूलित कोच था किन्तु सब नयी पीढ़ी के लोग आ गए उसमे ...जी हाँ को भेद भाव में विशवास नहीं रखते सब सामान हैं उनकी निगाह में !! अब सब लोगो की तो पूछिए मत क्या हालत होगयी इतनी भीड़ हो गयी की ए सी क्या सामान्य हवा भी मुश्किल थी ... !! सामान्यत वातानुकूलित कोच में सब कुलीन लोग चलते हैं ...जो किसी से बोलते नहीं ...इस लिए नहीं की वो गूंगे होते हैं ..इस लिए की कही किसी  के सामने असलियत खुल ना जाये ...बिना बोले क्लीन बने रहिये ...!! किन्तु आज वातावरण एसा नहीं था कुछ लोग चाहते थे की कोई उनको सुने ....बोलने के भूखे ...बस ....
              हमारी 6सीटों से बस एक आगे एक बड़ी ही कर्कश आवाज़ वाली एक कथित कुलीन अधेड़ उम्र की रही होंगी महिला बैठी थीं , संत , ,साधू  सद्भावनाओं की चलती  फिरती भोंपू लगी ठेली ...जिसको सुनकर सब चाहें की जल्दी से आगे निकले ...किन्तु यहाँ तो खेल बिलकुल अलग था ...बेचारे बच्चे जो किसी कारण से इस बोगी में सवार हुए थे और उनके साथ कुछ और लोग भी चढ़ गए थे ....कहीं नहीं जा सकते थे ...उनको तो सुनना ही था उस महिला को ...!! एक सरदार जी भी थे ...वो अफगानिस्तान से लौटे थे और वहां पर बोली जाने वाली भाषा की तरह से हिंदी और पंजाबी बोल रहे थे ..वो महिला , स्वित्ज़रलैंड , फ़िनलैंड , अफगानिस्तान और ना जाने कहाँ कहाँ घूम कर आइ थीं , सबसे बुरा उनको भारत ही लग रहा था फिर भी लगभग 6 घंटो से बोले जा रही थीं विषये कोई नहीं ...बस बोलने से मतलब ...ऊपर नीचे , आस , पास यहाँ वहां सब परेशान ....किसी को उनकी बात सुन्नानी ही या नहीं बस उनको बोलने से मतलब ...एक बेचारी लड़की बार बार अपनी ऊपर की सीट से नीचे उतर कर के सर पकड़ कर बैठ जाती ...फिर किन्कर्ताविमूद हो कर ऊपर चली जाती ...लेकिन ज़रा भी तरस नहीं आता उन महिला को उस पर और बस बोलते जाती ....!!
          जब गाड़ी ने मुग़ल सराय में एंट्री मारी तो मेरी सिस्टर ने अग्रेजी में जोर से कहा " विल यू आल नाव कीप क्वाइत प्लेज ? पता नहीं कितना बोलते हैं आप लोग ..आपको परवाह है की कोई सुन्ना भी चाहता है की नहीं !! अबे मैंने कमान अपने हाथो में लि ली ... सर में दर्द कर दिया भाई !  वो महिला बोली किस के सर में दर्द हो गया भगवान् के नाम लेने पर ...मैंने कहा मेरे और भगवान् दोनों के ...अब कृपा कर के चुप हो जाइये .. 7 घंटो से बोले जा रहे हो ...इंसान की जैसे जैसे उम्र होती जाये उसको गंभीर होना  चाहिए पर आप तो ...हे भगवान् ...!! वो बोली : हमने तो पहली बार सुना की बड़ो को कम बोलना चाहिए ...मैंने कहा ...आज सुन लिया ना .अब किरपा कर के चुप हो जाइये ..सर में दर्द हो गया ... और ये बेहेस कुछ 5 मिनट्स चली होगी ...और वो बोली ठीक है हम चुप हो जाते हैं ...तो मैंने कहा थैंक यू ....थैंक यू ...और कुछ 2 मिनिट्स बाद वो चुप हो गयी ...तब एसा लगा सब को जैसे " आपके सर पर कोई गिद्ध बैठा हो और वो बिना गन्दगी    जाये !"  या आपके ऊपर वाले की घर की पानी की मोटर लगातार आवाज़ करते करते बंद हो जाये , या फिर आप किसी डग्गामार बस में बैठे हो और अचानक आपको लगे की बस वाले को आप पर दया आ जाये ओर कहे की चलो आब आगे वो नयी वाली बस जाएगी ...या आप बड़ी देर से लघुशंका रोके बैठे हो और अचानक मौका मिल जाये .....इत्यादि इत्यादि ....
            दर असल हम सबने अपने अपने आस पास कच्ची पक्की दीवारें बना रखी हैं ...और सब को उनके टूट जाने का डर बना रहता है !! पहचान खो जाने का भी डर रहता है ...जबकि सचाई ये है की जब एक पहचान खोएगी तभी तो नहीं मिलेगी ...!!  हमें चलते रहना चाहिए ...कच्ची सड़क की पक्की रोड पर ...अनवरत , निरंतर  कुटुंब बढ़ता जायेगा !! 

Tuesday, January 1, 2013

मेरठ में एक दिन .....!!

            रविवार का दिन ....सर्दियों की गुलाबी सुबह , सूरज महाराज का आज जल्दी उठने का कोई मूड नहीं , कोहरे की चादार धीरे धीरे अपने आगोश में सारी रौशनी को लेती हुई ....इंडिया पाकिस्तान का वन डे मैच होना तय आज ही के दिन ....और इन सब मनोहारी परिस्थितियों में घर से मेरठ जाने की तय्यारी करते हुए , बार बार बजते घडी के अलारम को अगले 5 मिनट के लिए सेट करते हुए !!
 
           हम दोनों भाई बहन निकले सुबह सवेरे लगभग 5:30 पर बस अड्डे की तरफ उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की पहली बस में चढ़ गए ... उसी इम्तेहान को देने और भी बहुत से बच्चे पहले ही से उस बस में बैठे थे ! बस लगभग 7:30 बजे मेरठ बस अड्डे पर  पहुचे !! वहां से किसी भाई से पूछ कर मेरठ की महानगर बस सेवा की बस में सवार हुए जो की रलवे स्टेशन से मीडिकल तक का सफ़र करती हैं , तेजगढ़ी चौपले पर उतर गए , कुछ कदम चले तो लगा की आज मेरठ को हम ही जगाने आये हैं ... पूरी सड़क सुनसान !! कुछ ही देर में स्कूल आ गया जहाँ एग्जाम होना   था ,  प्लान देखा और 9 बजने का  इंतज़ार करने लगे , इस बीच एक और भाई बहन आ गए और हमारी दोस्ती हो गयी ..दो दूर के शहरों से आये हुआ अजनबियों की एक अनजाने शहर में दोस्ती ....!! हम दोनों भाइयों की बहने अब 9 बजे एग्जाम देने अन्दर चली गयीं !
 अब हम दोनों भाई दोस्त हो कर किसी चाय वाले की तलाश में स्कूल के गेट से बहार की और चल दिये !!    कोहरा अभी भी था हलकी हवाओं ने उसका रुख मोड़ ज़रूर दिया था लेकिन  ठंडक ज़रूर थी !! दो तीन चाट पकोड़ी वाले गोलगप्पे वाले , चिल्ले बनाने वाले , और एक कोने में एक छोटासा लड़का अपनी चाय की ठेली लिए खड़ा था !! एसा लगा जैसे सूखे रेगिस्तान में पानी की धार दिखाई दे जाये !!  हम दोनों लपक कर वहां पहुचे दोनों ने एक एक चाय का आर्डर किया ...खालिस दूध की चाय है बाबु जी ...10 रुपे का एक कप है ...हमने सोचा यार मिल तो रही है ना ...ठीक है दो दो ...बस हम दोनों उसके स्टोव के आस पास ही खड़े हो गए हलकी हलकी गर्माहट से ठेले के चारो तरफ लोग हाथ सकने के लिए इसे खड़े हो गए थे जैसे की बीच में एक गुड की ढेली रखी और उस पर बैठने को तयार मखियाँ भिनभिना रही हो !! 
      हमारी चाय बन कर तयार हो चुकी तो हमें ध्यान आया की आज तो वन दे क्रिकेट मैच है ...मैंने उस चाय वाले को सलाह दी की तुम एक ट्रांजिस्टर का इंतज़ाम कर लो ... लोग जो चाय के बहाने आ रहे है उनकी संख्या दो गुनी हो जाएगी .... ! उसने उसके मोबाइल पर ऍफ़ एम् रेडिओ पर मैच की फ्रिक्व्नेसी सेट कर और मैच शुरू ..एसा लगाने लगा जैसे की शक्कर में मिठास और बढ़ गयी और ...और चीनी ज्यादा मीठी हो गयी हो ....कुछ लोग जो कुछ दूर खड़े थे चाय के ठेले के और करीब आगये ... आर्डर की संख्या बढ़ने लगी , स्टोव की लौ अब और तेज़ हो गयी थी !! अब एक एक बाल पर सबका ध्यान मेच की और जाता था .... और फिर कमेंट्रेटर की कही बात बात सब अपनी अपनी राय देते है ! धीरे धीरे 1 घंटा बीत गया !! अब टिक्की खाने ली इक्चा हुयी ...लिकिन हम नहीं खा सकते थे ...औरों ने खाया और हमें उन्हें खाते हुए देखा !! 
       अब सूरज कुछ ऊँघने लगा था ... !! जैसे बड़ी देर से सोया कोई बच्चा करवट बदल है ! एक दो किरणे दिखाई दी और इसके साथ साथ दिखाई दिए कुछ और लोग / माता पिता / भाई बंधू और अपने अपने करीबियों को इम्तेहान दिलवाने लाये थे लेकिन ठंडक के कारन कही किसी कोने में चुप चाप खड़े थे ....चाय की दूकान , खालिस दूध की चाय , साथ में फेन और इंडिया पकिस्तान के मेच की क्रिकेट कमेंटरी ...और क्या चाहिए भाई ...अचानक चाय वाले की आर्डर और बढ़ गए , वो लड़का बाबूजी बाबूजी करता हुआ ...लगातार चाय बनता जा रहा था और जिस जिस को चाय मिलती जाती थे और एक किनारे खड़े हो कर चुस्कियों के साथ हलकी धुप और किरकेट कमेंटरी का मजा लेने लगता था !!
       सुबह की पली का एग्जाम ख़तम हुआ ! अचानक सब बच्चे आ गए ! चाय वाले पर बोझ  बढ़ गया ! चाय ठीक से पक नहीं पा रही की लोग ले लेते थे , किसी को 10 रूपए की एक चाय होने का दुःख नहीं था ...मुश्किल थी तो इस बात की सब को चाय सिमित समय में मिल नहीं पार रही थी ! अगला पेपर और चाय के बीच सिर्फ 1 घंटे का समय और चाय का मिलना मुश्किल ..खैर जैसे तैसे सब को चाय मिली , सब ने पी और बच्चे अगले पेपर को देने फिर से स्कूल में चले गए ! रहगये हम भाई और बंधू बहार फिर से 3 घंटो के लिए , फिर से मैच , चाय , टिक्की , और अब कुलचे छोले , बर्गर भी मिलने लगे थे !!
                                     किसी खूब सूटेड बूटेड हो कर घुमने वाले बड़े - बड़े अधिकारिओं को ऐसे समय में देखा जा सकता है विचित्र अंदाज़ में घूमते हुए , लड़कियों वाले हैण्ड बैग अपने हाथों मैं खूबसूरती से ले कर यहाँ वहा घूमते नज़र आ रहे हैं !! किसी ने किताबें पकड़ रखी हैं , किसी ने विभिन्न प्रकार के साल्व्ड क्वेश्चन पेपर पकड़ रखे हैं जिनका असल में उनके साथ दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं ....फिर भी है ...! अब तक भारतीय खिलाडियों ने अपने अपने कारनामे और एक दुसरे का साथ निभा दिया था ....5 विकेट पर 29 रन थे ... और धोनी ने आ कर कुछ काम किया और सम्मानित रन तक गए ...!!
                   एक एक कप चाय और पी हमने फिर इंतज़ार करने लगे की कब घंटी बजे और लोग बहार आये ! कुछ देर में लोग बहार आये और हम घर की और चल दिए ! रविवार का दिन रोज़ की ही तरह लगा और घर शाम की चाय पी , खाना खाया समाचार देखे और सो गए अगले दिन फिर से काम पर जाने के लिए ...!! मेरठ कभी अच्छा नहीं लगा मुझे लेकिन क्यों या भी पता किन्तु उस चाय वाले लड़के के साथ और लोगो के साथ बिताये दिन से मेरठ फिर जाने का मन करता है ...उसकी बातें और समझ व्यापार को करने की ...पुरे 6 से 7 घंटे वो चाय बनता ही रहा और जितने लोग उतनी तरह की बातें ...बोलियाँ ...लिकिन उसके माथे पर कोई शिकन नहीं ...और वोही मुस्कुराता चेहरा .... आपको अपने मानस को बदलने की ज़रुरत है ...कोई भी चीज़ अच्छी या बहुत अच्छी लगने लगेगी ...!!