Wednesday, November 14, 2012

रिश्ते भी व्यापारिक कारणों से ही बनाते है , समर्पण के भाव ....से नहीं !!

                        व्यापारी और मौकापरस्त लोग रिश्ते भी व्यापारिक कारणों से ही बनाते है  , समर्पण के भाव ....से नहीं !! बल्कि समर्पित कभी हो ही नहीं सकते .....उन्हें स्वयं का शारीर भी अच्छे पहनने ओढ़ने के बाद ही अच्छा लगता है !! ..... इसे तरह के मानवों से बचना चाहिए ....किन्तु शर्त ये है की उनकी पहचान जल्दी हो सके .....जो की मश्किल काम है उन लोगो के लिए जो मौकापरस्त नहीं होते ...और व्यापारी भी नहीं !!

Tuesday, November 13, 2012

त्योहारों की तैय्यारी को जितना एन्जॉय कर लेते हैं उतना असल में त्यौहार मानाने को नहीं ....!!

                अब देखिये ना .आज दिवाली है ...अन्धकार से रौशनी की ओर जाने का पर्व ! अब अन्धकार किसी भी तरह से परिभाषित किया जा सकता है !!  वैचारिक , वाव्हारिक ,आलोचनातमक दृष्टिकोण इत्यादि इत्यादि ..... !

                अभी शाम के 9.30 बजे हैं और हमारे घर के सामने वाले पार्क को धुआं पूरी तरह से अपने आगोश में ले चुका है ! ठीक सामने वाले ब्लाक की रंगीन झालरें ठीक से नहीं दिखाई पद रहीं !! .... हर ब्लाक के सामने कोई ना कोई अपने अपने अंदाज़ से अपनी पहचान ज़यादा से ज़यादा पटाखे जला कर साबित करने में लगा है !! कितना अजीब है आज कल का माहौल , कल के बीते समय से बिलकुल अलग !! अभी कुछ दिनों पहले ही एक साथी हमें छोड़ कर इश्वर के पास चला गया , और साथ में चली गयीं उनकी यादें !! सब अपने अपने काम में मस्त / व्यस्त ! किसी को शयद याद भी ना आई हो ...और आई हो , तो आई हो ...दिवाली में क्या करियेगा !! दिवाली ही मनेगी !!

                 एक बार एक मित्र ने कहा था की <-> " रविवार से ज्यादा शनिवार को एन्जॉय करते हैं !" इस ख़ुशी में की कल छुट्टी है !! वैसे ही कल मुझे एहसास हो रहा था !!  रात के 10 बजे थे ...छोटी दिवाली के दिन , खाना खा कर के टहलने निकला था ...घर से पास के स्टेशन से होते हुए बसंत रोड पर निकल पड़ा ...वाह निकल गयी मुह से .... अमूमन 9:30 से 10:00 बजे सुनसान हो जाने वाली सड़क ....आज दिन के 10:00 की तरह से शबाब पर थी ...सभी दुकानें खुली थी और खरीदारी हो रही थी .... ! हाँ ये सड़क कुछ वर्षों पहले भी 9:00 और रात के 12:00 बजे गुलज़ार रहती थी ...जब " बसंत " सिनेमा हाल चला करता था .... मैंने भी उसमे एक आखिरी फिल्म देखि थी ...छोटे से अपने भाई अंकुर के साथ ...और फिल्म का नाम था " डर " !! आजकल उस जगह पर एक बहुत ही बड़ी कार बनाने वाली देसी कंपनी का शोरूम खुल गया है !! बड़े ही कुलीन लोग आते जाते हैं ...समय पर और समय पर वो बंद भी हो जाता है !! खैर हम तो सब दुकानों के खुले होने पर आश्चर्य प्रकट कर रहे थे !! मैं आधे घंटे में वापस आ गया और सोचा की क्यों ना कल की की जानेवाली खरीदारी को आज ही निबटा दिया जाये !
                 हमें एक थैला लिया , और चल पड़े बाज़ार ...रात के 10:45 पर !! मोटरसाइकल पर अब मुझे चोपला मंदिर और मोडल टाउन दिखाई देने लगा था ....बसंत रोड तो पैदल बाज़ार की लिए है ...मोटरसायकल पर तो घंटाघर और बजरिया की मार्किट बनती है ना  ......!! बसंत रोड से होते हुए ... मालीवाड़ा ...डासना गेट और फिर रमते राम रोड से आनंद चिकन ...फिर गंज से होते हुए चोपला ...वाह ...रात के 11:15 हो रहे थे और चहल पहल इस तरह की जैसे 7 तारीख के बाद पड़ने वाले किसी रविवार को होती हो !!
               खील , मीठी खील , खिलोने , बताशे , फल मोमबत्ती  , मिटटी के दिए ...रूई , तरह तरह की झालर ... रंगीन कागजों पर "  हैप्पी दिवाली " लिखा हुआ , पटाखे और ना जाने क्या क्या ....!! एक तबका तो अपनी अपनी संगिनी को ले कर के देसी घी के बने पकवान चखने में मशगुल दिखाई पद रहा था ....कंधे से कंधे टकरा जाएँ इस कदर भीड़ !! आलू की टिक्की , पानी के बताशे ( गोलगप्पे ) की ठेलियों पर तो लोग लाइन लगा लगा कर खड़े इस तरह की ...जैसे आज नहीं खाया तो ये स्वाद फिर शायद अगले साल ही नसीब हो ....!! 
               भगवान् की मूर्तियाँ ...! मोलभाव कर के खरीदते लोग अपने अपने भगवान जी को !! कम से कम भाव दे कर ख़रीदा जा सके ...खरीद लो ...कल उन्ही से जितना ज़यादा से ज़यादा माँगा जा सके !  माँ लक्ष्मी धन की देवी हैं और उन्ही को मोल भाव कर खरीद कर उन्ही से सम्पन्नता की आशा .... ये हम सब करते हैं ! अरे भाई दूकान पर तो मूर्ति बिकती हैं ...और भगवान् तो उनको हम अपने घरों में लाने के बाद बनाते हैं , तो मोल भाव करने में क्या संकोच करना ....अब ये कोई पके पकाए मिलने वाले फ़ास्ट फ़ूड की बात थोड़े ही है .की मोल भाव की संभावनाए नहीं ... !!  कल्कत्त्ता , टेराकोटा और लखनऊ की मूर्तियाँ कुछ जायदा महंगी है ...और जो लोकल मेड हैं ...वो कुछ कम दाम में उपलब्ध हैं ....पर उनको लेने वालों की कमी है ....अब घर में मंदिर को अपने आगंतुक मित्रों को दिखाएँगे क्या //// लोकल , ना जी ... ना टेराकोटा ही लेंगे भले महगी हो ...साल भर का त्यौहार होता है !! 
                  मोमबत्तियां , खील , बताशे , रूई , दिए और बाती खरीदी , एक पान खाया ( सादा ) और एक किनारे मोटरसाइकल खड़ी कर के बाज़ार की चेहेल पहल देखने लगा !! 

1. दीयों के ढेर के बगल में अम्मा जी खटोले पर बैठी थीं , शायद रात में वहीँ सोएंगी , उन दीयों के साथ जो नहीं जलेंगे ....नहीं बिकेंगे !

2. गन्नों का ढेर और उनके बगल में रखा एक तखत जिसपर उनसे जूस निकलने की मशीन लगी थी ...गुमसुम .. अब सर्दियों में गन्ने का रस कौन पीता है ...आज अगर ना बीके तो कल के लिए सोचेगा वो ...

3. मोमबत्तियों के ढेर , पेकेट और लड़ियों के बीच बैठा जुनैद .....जो बिकेंगी वो बिकेंगी नहीं तो फिर उसी अनाथ आश्रम में वापिस कर आऊंगा जहाँ से लाया था !

4. अंग्रेजी , हिंदी में लिखे हप्पी दिवाली की जुमले रंगीन कागजों पर ....अब शायद अगले साल ही कोई ले ....अगर आज नहीं बिके तो ...सोचता हुआ वसीम / तरुण मोल भाव में मगन !!

                पान का बाकि बचा हिस्सा खाया और चल दिया हनुमान जी के दर्शन करता हुआ घर की तरफ !! रस्ते में पूजा और पूजन से सम्बंधित सामग्री मिलती हुई दिखाई पड़ी ...और गर्व हुआ अपने भारतीय होने पर ...हम चाहे कितने भी आधुनिक और मॉल कल्चर के करीब क्यों ना आ जाएँ ...जब अपने संस्कारों और अपनी परम्पराओं की बात होती है तो हम ज़रूर अपने उन सभी पारंपरिक आलेखों को साफ़ कर के अपना लेते हैं जो हमारे बुजुर्गों ने हमें दिए हैं  !  एक रात को ही सही , हम सही में पारंपरिक हो जाते हैं !! कोई समझौता नहीं इसमें !! पूजा की थाल , उसमे सेब , केले , मीठे खिलोने , खील , मिठाई , चांदी का एक सिक्का , चन्दन , अगरबत्ती  , रोली , धुप , फूल माला , मिटटी के दिए , रूई की बाती , सरसों का तेल ...सब वो ही बरसों पुराना ...हम जुटा लेते हैं जैसा की हमारे और उनके माँ पिता ने बताया था !
             1812, 1912 और अब  2012 क्या कुछ नहीं बदला होगा वर्षों में बस लाल किला , ताज महल    को छोड़ दीजिये और भारत भी !! यद्यपि सब बदलता रहता है ...तथापि परिवर्तन का सामीप्य अर्थपूर्ण होना चाहिए !! ... मैं जैसे जैसे अपने घर की ओर बढ़ रहा था बजार की रौनक कम हो रही थी ... और एक अजीब सी शांति मुझे घेरने लगी थी ....रस्ते के निशाचर घूर घूर के मुझे देखने लगे थे ....अपने घर पंहुचा और सब सामान देखा ...कल की पूजन की तयारी पूरी थी !!

              आज ही वो कल वाला कल था ...मैंने अनुभव किया की हम स्वस्थ परम्पराओं और त्योहारों की तैय्यारी को जितना एन्जॉय कर लेते हैं उतना असल में त्यौहार मानाने को नहीं ....!! सहमती हो तो एन्जॉय कीजियेगा ...मुझ से शेयर कर के !! हप्पी दिवाली !! मेरा भांजा ( वासु - मृगांक ) कहता है ...हप्पी दियाली .....( दिवाली नहीं कह पता अभी ...) भवनाये और अनुभव दोनों शब्दों के मोहताज़ नहीं हैं !! 

...किसी के मिटटी के दिए लाने हों , रूई की बाती लानी हो.....

          " दीपावली " जी हाँ रौशनी का त्यौहार ...किन्तु इस के आते ही पुरे मोहल्ले में " प्रतिभावान " लड़कों के कमी सी पद जाती है ...अचानक !!
          सामान्य दिनों में किसी भी कोने पर दो चार के झुण्ड में कभी भी देखा जा सकता है और मन में विचार लाया जा सकता है ..." दिन भी कुछ काम नहीं इनको , बस नुक्कड़ पर खड़े रहने के सिवा " , पता नहीं पढ़ते लिखते भी हैं की नहीं ...आते जाते नमस्ते करवा लो इन से ...अरे बढती जवानी के लड़के हो अपनी बुध्ही का इस्तेमाल करो ...लिकिन मजाल है को कोई तस से मस हो जाए ...!! पता नहीं दिन भर की विषय पर चर्चा करते हैं की ख़तम ही नहीं होती ? और अगर कभी कभी दूर भी जाते हैं तो ये कहते हुए की ...चल मिलते हैं ..." बताइये .....ये क्या बात हुई !! कपडे ब्रांडेड पहनेगे ...!! वैसे तो सब रहते सूटेड बूटेड हैं फिर भी इनको अपने घर में कोई निमंत्रण दे कर नहीं बुलाता !!
        लेकिन दिवाली के आते ही देखिये इनका जौहर !! क्या थॉमस अल्वा एडिसन , जेम्स वाट ने बिजली और रौशनी की ख़ोज में अपना कमाल दिखाया होगा ...उन महान लोगो से 100% ज्यादा महानतम काम में दख्श हो सकते हैं ये नुक्कड़ के लड़के !! कैसे ? लीजिये कुछ उदाहर्ण प्रस्तुत हैं :

       अब तीन दिन बाद धनतेरस होने की बात चल पड़ी थी मोहल्ले में ! गोस्वामी जी का बेटा इस साल शायद आ ना सकेगा दिवाली में ...अभी पिछले साल ही तो 12000वि रैंक आई थी उनके बेटे की ...ओ बी सी और उसके दादा जी के स्वतंत्रता सेनानी के कोटे से एक दोयम दर्जे के एन्जेनिरिंग कालेज में दाखिला मिल गया था ... कम्पुटर साइंस में !! मारे गर्व के फूले नहीं समाते थे दोनों ! वैसे दो बेटियां है बड़ी डबल एमे , और एक लड़के से छोटी बी एस सी कर रही है माइक्रो बैलोजी में लेकिन उनको तो अपने बेटे की दोयम उपलब्धि पर नाज़ था ...बड़ी बेटियों की शादी हो चुकी थी और छोटी अभी पढ़ रही थे ...गिन के तीन लोग घर में ....बेटे के जाने के बाद !!  गोस्वामी जी ज़रा शारीर से कैलाश पर्वत सामान थे ....तो चलना मुहाल था ...और पत्नी जी ..बस झाड़ू लगा लेती थी ...और बाकि घर का काम काम वाली करती है !! खाना पीना तो बिना किसी संकोच के छोटी बेटी करती थी !!
      अब धनतेरस आ रहा है ! सफाई करनी है ! और घर सजाना है ...! भीतर भीतर का सजाना हो बड़ी शुध्ही से सब ने मिल कर कर लिए लेकिन बाहर की लड़ियों और साज सज्जा का काम कौन करेगा .....?? बेटा तो कालेज में कुछ और ही सजाने में मगन है इस साल , पिता जी शरीर संभल रहे हैं ...!! फ़ोन कर के इलेक्ट्रिशियन को पुछा तो बोला " 1000 रूपय लगंगे और दो दिन बाद आऊंगा ! अरे कल धनतेरस है और वो दिवाली वाले दिन लाइट लगाएगा तो क्या तो लक्ष्मी जी आएँगी और क्या मोहल्ले में इज्ज़त रहेगी ? अब क्या किया जाए ?

    अब शुरू होती है मोहल्ले के सब से नाकारा लड़कों की !! आज क्या पता भगवान् धन्वन्तरी के आशीष से प्रतिभा उनमे से अचानक प्रफुल्लित होने लगती है !! और सबसे अजूबी बात की गोस्वामी जी जैसे ना जाने कितने मोहल्ले वाले लोगो को ये दिखने भी लगती है !! सा सम्मान अपने घरो में उन्ही लड़कों को आमंत्रित करते हैं इन शब्दों के साथ : " बेटा - ज़रा हमारी भी लड़ियाँ देख लेना ! रोहन के जाने के बाद हमें तो कुछ पता ही नहीं की की कैसे के होता है !! अब तुम खुद ही देख लेना और सजा देना अपने आप सब ठीक से .... वो अन्दर के दीवान के अन्दर रखी हैं .... अंजू मदद कर देगी ढूँढने में ...!! अब देखिये क्या कमाल की बात है ! जिन लड़कों के साये से भी पुरे साल अपने बच्चों को ये दंपत्ति दूर रखता है वो आज दिवाली के मौके पर अपने घर में आने का आमंत्रण देता है और अपनी बेटी के साथ हाथ बटाने की बात करता है !! कमल का टेलेंट जन्म ले लेता हैं इनमे !!  कोल्ड काफी , हॉट टी और बर्गर के साथ लाइटिंग का काम पूरा कर के ही हटाते हैं ये प्रतिभवान लड़के ! एक से काम ना निबटे और अगले घर की टी भी लेनी हो तो मिल जुल कर काम करते हैं ....कैसी भी उलझी लड़ियों का काम हो ...बास चुटकियों में सुलझा देते हैं भाई !! बड़े गुणी लड़के हैं !! रंग बिरंगी झालर , बाज़ार से लाते हैं ...पसंद ना आये तो बिटिया को उन्ही के 1995 के स्कूटर पर बैठकर ले जा कर पसंद करवा कर जिमेदारी से लगते हैं !! बिजली तो उस दिन जैसे कालिया नाग बन जाती अहि उस दिन ...बिलकुल सीढ़ी और आज्ञाकारी ! कैसी भी समस्या मिनटों में सोल्व ! फिर आशीर्वाद मिलता है तानो के साथ : बेटा तुम इतने समझदार और होशियार हो ...सारा दिन घुमते रहते हों थोडा पढ़ा लिखा करो ...!  अब इनसे पूछे कोई ये सब क्या ज़रुरत रहती है कहने की ?  खुद का बेटा चाहे अपने कालेज के घर को ना सजा  कर अपने टूशन टीचर के घर की लड़ियाँ ठीक कर रहा हो लेकिन , इनको तो हम में खोट दीखता है ना !!
             आधुनिकता और तेज़ चलती इस दुनिया में हम भारतियों के त्यौहार आज भी अपनी गरिमा और गति बनाये हुए हैं जो काल के चक्र के चलने के बावजूद अपनी धुरी से अलग नहीं होने देता ..... जैसे ये लड़के पुरे साल जी घर में सिर्फ अपनी नज़रों से दाखिल होते रहते हैं को त्योहारों के मौके पर सा शरीर निमंतरण दे कर बुलाये जाते हैं और जिम्मेदारी से अपना काम कर के फिर अगले बरस की प्रतीचा में लग जाते हैं ....और ये सिलसिला चलता रहता है ..अगली पीढ़ी के आने तक !!  किसी के मिटटी के दिए लाने हों , रूई की बाती लानी हो, खील , खिलोने , बताशे लाने हों , गणेश , लक्ष्मी की मूर्ति लानी हैं , गेंदे की फूल माला , आम के पत्ते , घर के दरवाजों पर तोरण सजाना हो ....या भी लड़ियों के ठीक किये जाने से ले कर उनको लगाने तक के सब काम कर सकने की प्रतिभा जिन लड़कों में है वो शिक्षित किस मायने में नहीं है , ये निर्णय कौन करेगा !! शायद वो लड़के स्वयं क्यों की स्वयं का मूल्यानकन .... प्रमाणिक और प्रत्यक्ष होता है !! साल भर के बाद एक बाद कार्य को करवाते समय गुणों का आंकलन ...अनुबंधित होता है !!
              आज मोहल्ले और गलियों की धमनियों में बहता अपनापन निजिता और सामाजिकता को जीवित रखे हुए है , इश्वर से प्रार्थना करते हैं की मोहल्लों की जीवन्तता ऐसे ही बनाये रखिये !!
   

Sunday, November 11, 2012

अंजुली-अंजुली धुप छुपाकर....

अंजुली-अंजुली धुप छुपाकर,
चुटकी - चुटकी रंग बांटूं !
पलकों - पलकों ख्वाब छुपाकर,
सतरंगी   आँचल बांटूं !!

खुशबू- खुशबू गलियां सारी ,
आँगन - आँगन उजियारा !
जुगनू का सा हो जाऊं और,
रौशनी   केवल   बांटूं !!

**** हैप्पी दिवाली ****




Friday, October 26, 2012

.... अच्छे समय में उठाया गया कदम !!

                  सर्दियों की शाम के कोई चार बजने को थे , भारतीय घरों में सामान्यतः चाय का समय लेकिन वो कुछ परेशान सा था ...अभी अभी तो आया था माँ को अस्पताल में छोड़ कर बेसुध ...वो कुछ नहीं बोलती थी बस देखती रहती थी , आज भी नहीं बोली थी जब दोपहर को आये उनके लिए अस्पताल के खाने को ले कर उसने ही खाया ...क्यों की वो तो खाती नहीं थी ..बस आजतक सब का ख्याल रखती आई थीं ...आज भी उनके ही हिस्से का खाना बच्चों ने खाया था !! 1 घंटे का सफ़र कर के घर वापस आया था कुछ देर आराम करने के लिए ...अस्पताल में आराम कहाँ मिलता है ...वैस कर ने को कुछ काम नहीं होता लेकिन मानसिक तौर पर आप हमेशा व्यस्त रहेते हैं ... चिंताग्रस्त पता नहीं क्या होगा ? सोच सोच कर ....!!

            अभी तीन महीने पहले ही उसकी माँ को जोंडिस हुआ था , संभल गयीं थी उनकी सेहत लेकिन पूरा घर अव्यवस्थित हो गया था ....सब कुछ दिशाहीन हो गया था !!  कभी कभी लोग आते थे उनसे मिलने , बस मुस्कुरा देती थीं सारा दर्द अपने गले से निगलते हुए !!  कमर में भी दर्द रहने लगा था ! थोडा झुक कर चलने लगी थीं ! एक दिन सबेरे अचानक चल नहीं सकीं , रुक गयीं कुछ बुखार सा था राहुल ने काम पर जाने से मना किया ...मम्मी मत जाओ आज ....हाँ पिता के देहांत के बाद काम करना पड़ता था राहुल की माँ को , राहुल और दो और बहनों की पढाई और खाने पीने के लिए .... बस आज नहीं जा सकी ...दर्द ज्यादा था !! दिन , हफ्ते  और महीनी बीते ....इलाज चल रहा था ...और पैसा पानी की तरफ बह रहा था ...जो भी था उसी में से !!

          स्थानीय डाक्टरों ने 26 जनवरी सन 2000 को मना कर दिया और किसी सरकारी अस्पताल में ले जाने ...हाँ दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले जाने की सलाह दी , लगभग कह ही दिया !! लोकल अस्पताल में जो खर्चा आया उसका भुगतान राहुल के मौसा जी ने किया ....वो खुद नहीं आये थे कभी भी ...हाँ पैसो का इन्तेजाम कर दिया !! अब दिल्ली के जी टी बी में था अपनी माँ को ले कर के ...सरकारी अस्पताल में ....अकेला ...दो बहने , पडोसी लोग आते थे मिलने कभी कभी , कोई दफ्तर से शाम को आता था ....कोई दिन में ...एक बार तो हाँ सिर्फ एक बार पुरे महीने माँ के अस्पताल में भारती होने के बाद माँ की पड़ोसन दोस्त साथ में मिलने आयीं थीं  ! सब जिगरी दोस्त थीं राहुल की माँ की !!  किसी ने स्वेटर बनाना सीखा था तो किसी ने जीवन में कैसे अकेले लड़ा जाये सीखा था .... उनको देख कर पुरे महीने चुप रहने वाली राहुल की माँ पहली बार और आखिरी बार बोली थीं ...एक सबसे करीबी दोस्त को देख का  कर और उनके शब्द थे - " अब आई हो ?? "  जैसे बोलना चाह रहीं थे की बस अब तो मैं जा रही हूँ ...इतने दिनों तक इंतज़ार किया और तुम लोग नहीं आये ....अब आये हो ...?? !! लेकिन इस पुरे समय में राहुल की सबसे छोटी मौसी उसके साथ थी ! हर कदम पर ....किन्तु सब को चलना खुद ही होता है ...और पैर नगें हो तो तपिश ...चाहे वो कैसे भी रूप में हो ....पैसो की कमी , नाते रिश्तेदारों का नकारीबियत समय पर , समाज में कम पहचान , इत्यादि !!

                 दिन , हफ़्तों कर के वो दिन आ ही गया जब उसकी माँ चली गयी !! रात के करीब 12 बज रहे थे ,  अचानक माँ की साँसें तेज़ चलने लगीं , राहुल समझ गया था की आज सब ख़तम ....हो जायगा ...वो चुपचाप अस्पताल के उसक वार्ड के दरवाज़े पर खड़ा हो कर अपनी माँ को कराहते हुए जाते हुए देख रहा था ...ना रो पा रहा था , ना ही कुछ कर पा रहा था ....दौड़ कर रात की ड्यूटी पर के डाक्टर को ले कर आया ...उसने देखा और सब बंधन निकाल दिए ...नेबुलिज़ेर , सलाइन सब ...और कहा ...ये अब जिन्दा नहीं हैं ...मेरे साथ आइये ...मैं मृत्यु प्रमाण पत्र लिख देता हूँ !!  सब खामोश ...एक डरवाना सन्नाटा !! उस रात ....राहुल के दो दोस्त ...अमित और सुधांशु उसके साथ थे ....एक दूर के भैया भी साथ थे ...एक अम्बेसेडर कार में पिछली सीट पर राहुल और उसके दोनों दोस्तों की गोद में लेट कर आयीं थीं , अपने घर राहुल की माँ ...अंतिम बार ...फिर जा कर कभी ना आने के लिए !!  बहनों को सान्तवना दी ...और रिश्तेदारों को फ़ोन किये !! सब कुछ आस पड़ोस और कुछ लोगो ने अंतिम सब किया जो ज़रूरी था !!
                 ये कोई समय नहीं था राहुल की माँ का जाने का !! दिशाहीन और पैसों की कमी के कारन उनका इलाज़ सही ...और सही समय पर न हो सका !! पिता लगभग 15 साल पहले गुजर गए थे ..और अब माँ भी नहीं !! ज़रा अंदाज़ा लगा लीजिये ...उन बच्चों का ...रिश्तेदार आये और तय किया की राहुल को एक नौकरी में मदद करेगे ...आज राहुल नौकरी कर रहा है ...लेकिन एक बात हमेशा कचोटती है उसे ....माँ का इलाज़ सही से ना हो सका ..सही अस्पताल में ...पास में पैसे नहीं थे ...!! उसने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया ...बचपने में सुनी एक कहानी और किशोरावस्था में अपने साथ हुए माँ के हादसे से सबक लेते हुए !!  कहानी सुनी थी की जब अच्छे दिन हो तो ..खाने पिने की चीज़ों को जमा कर लेना चाहिए ....बुरे वक़्त के लिए ....!!  जब माँ अस्पताल में भारती थी को वहाँ एक सज्जन ने सलाह दी थी : जब भी नौकरी करो तो अपना मेडिकल बीमा ज़रूर करवाना ....ताकि आपका परिवार दो तरह से ना पीड़ित हो ...एक आप को देख कर और दुसरे ये सोच सोच के की पैसे कहाँ से आएंगे .. ठीक इलाज़ के लिए .....!! एक रोटी कम खा लेना लेकिन मेडिकल बीमा ज़रूर करवाना !! आज राहुल ने अपना मेडिकल बीमा किया हुआ है ...खुश है , ये सोच कर की यदि बीमार पड़ा तो इलाज़ के लिए पैसे का ना होना मुद्दा नहीं होगा !! .....
                  ज़िन्दगी हम सब को समय से पहले बड़ा होने के लिए हमेशा तयारी करती रहती है !!  एक बड़ा कदम हम सबको अपनी ज़न्दगी में ज़रूर उठाना चाहिए .... कुछ रकम अपने ऊपर मेडिकल बिमा करवा कर ताकि आपके असमय कहीं जाने की परिस्थिथि में अकेलापन  ...साथी ना बने क्यों की राहुल के रिश्ते के लोग बार बार बुलाने पर भी शायद इस लिए वहां नहीं आये ये सोच कर के कहीं खर्चे न करने पड़ें ...हमें राहुल की ज़गह खुद को रख कर देखा ...और पाया की ज़रुरत है ...बेहद ज़रुरत है बिलकुल वैसे ही किसी मेडिकल बीमे की जैसे की हमें स्वयं को जीवित रखने के लिए भोजन करना होता है !!
                समय कभी एक सा नहीं रहता , अच्छे समय में उठाया गया छोटा ही सही बीमित होने का कदम आपको मानसिक और आपके परिवार को सहारा देता है ...ताकि सम्मान और सांसारिक बंधन बने रहें लम्बे समय तक !!  सोचियेगा ... अन्यथा सब कुछ तो चल ही रहा है अपनी गति से अब पिछड़ना या साथ चलना हम पर है , वर्ना ,   हम में से कोई भी राहुल हो सकता है !!

Wednesday, October 24, 2012

.... नहीं तो बस सिद्ध कीजिये की आप ही आप हैं !!

              दिल्ली के आकाशवाणी भवन से बाहर निकला तो मेरे हाथ में एक निमंत्रण पत्र था जो उस दिन से मुझे दस दिनों पूर्व सन 1991 में एक सामान्य डाक से मिला था !
                आकाशवाणी के युववाणी के लिए कुछ कविताएँ रिकार्ड करवाने के लिए !
तकरीबन 10 मिनिट्स के लिए 2 गीत मैंने रिकार्ड करवाए अपने अन्य साथीयों के साथ !! वो बड़ा ही सुनेहरा दिन था , तीसरी बार आया था मेरे सामने ये समय , हर बार मैं कुछ सीखता ही जाता था !! 

                रिकार्डिंग के 10वें दिन एक चेक मिला " भारतीय स्टेट बैंक , संसद मार्ग " का एक पत्र के साथ जिसकी पहली पंक्ति को पढ़ कर लगता है जैसे की आप ने ना जाने कितना देश हित का कार्य कर दिया और किसके लिए आपको पारितोषिक दिया जा रहा है .... लिखा है ( है इस लिए लिख रहा हूँ क्यों की वो पत्र अब भी है मेरे पास ) " भारत के राष्ट्रपति की और से .....आपको दिनांक ......आपके द्वारा किये गए कविता पाठ के लिए प्रति पाठ रूपये मात्र 100/- संलग्न चेक भेजा जा रहा है जिसकी अवधि 6 माह है ( अब 3 माह हो गयी है ) ! अब उन दिनों मेरे पास कोई बैंक अकाउंट नहीं होता था  तो ये चेक कहाँ जमा करूं !! किसी बैंक में अकाउंट खुलवाना 1991 - 1995 में कितनी बड़ी बात और पेचीदा बात होती थी ....जो लोग उस समय के होने को पता होगा और मेरे से इत्तेफाक रखेंगे !!   एक रास्ता निकला !! एक बायलर बनाने वाली कंपनी के मालिक स्वर्गीय श्री संजीवा तानिय्यापा सुवर्णा जी के सबसे छोटे बेटे को हिंदी पढ़ता था तो उनकी पत्नी जी ने मेरा अकाउंट अपने बैंक " विजया बैंक " नवयुग मार्किट में खुलवा दिया ! मैंने चेक जमा करवाया और पुछा की सर कितने दिनों में पैसा आ जायगा ?

          मैं पंद्रह दिनों के बाद अपने बैंक पहुंचा ! सुबह के 10.15 बज रहे थे ! सरकारी बैंक अब भी 10 बजे ही खुलते हैं और पब्लिक डीलिंग 2 बजे बंद हो जाती है ! अजीब सी बात है ! अपना ही पैसा ! अपने ही काम के लिए किसी दुसरे की सुविधा के अनुसार प्रयोग में लाये जा सकते हैं !! कमाल है भाई ! वैसे आज कल कुछ निजी बैंकों ने फिर से सरकारी कर्मचारियों को थोडा और समय पर काम करने के किये मजबूर किया तो है !!   खैर हमें अपने सामने बैठे अधिकारी को पुछा की साहब ज़रा मेरे अकाउंट का बैलेंस देख कर बता दीजिये !! ठीक है अपना अकाउंट नंबर बोलिए ....हमने बताया , उन्होंने एक बड़ी मोटी  सी लेज़र जो की दो मोटे मोटे काले काले लकड़ी के दो फ़ाइल नुमा पन्नों को पलते हुए देखा और सबसे आखरी पंक्ति को पढ़ते हुए कहा ...हाँ जी इतना बैलेंस है ... मैंने हिसाब लगाया ...अरे अभी तो वही है जो खाता खुलवाते हुए था ...उन्होंने पुछा कब खुलवाया था ? 15 दिन पहले ....!! अच्छा रुकिए !!उन्होंने कहाँ ...हाँ रुकिए ..एक एंट्री करनी बाकी है ....हाँ अब इतना है !!

            सही रकम के बारे में आश्वस्त होने के बाद मैंने कहा कुछ पैसे निकलवाने हैं !! उन्होंने एक विद्रोवल फॉर्म मेरी और बढ़ा दिया ...इस को भर दीजिये ...! हमें भरा ! फिर उनको दिया !! उन्होंने एक टोकन नुम्बर उस पर लिखा और मुझे एक पीतल का टोकन दे दिया मुझे और कह दिया की वहां बैठ जाइए ...जब ये नंबर पुकारा जाए तो केश काउंटर पर जा कर पैसे ले लीजियेगा !! हम जैसे एकदम विजयी मुस्कान के साथ वहां रखे एक लकड़ी के बेंच पर बैठ गए और अपने चेक की यात्रा को देखने लगे !!
          सबसे पहले टोकन देने वाले साहब ने टोकन दिया और टोकन नुम्बर लिखा विठ्राल फॉर्म पर ! फिर वो चेक चला गया एक और वरिष्ठ अधिकारी के पास , उन्होंने फिर से उसी मोटी सी फ़ाइल को पलता और बस दो बार में ही मेरे अकाउंट वाला पेज निकाल लिया , और समान्तर ही कम्प्यूटर पर कुछ देखा ....और कुछ किया ...बाप रे  उसको करते हुए वो साहब कुछ कुछ सामंजस में थे ....पर कुछ कर गए ...! अब अगले काउंटर पर चेक गया ! ये काउंटर सब से महत्वपूर्ण !! अगर यहाँ से पास हो गया तो पैसा मिलेगा नहीं तो बस सिद्ध कीजिये की आप ही आप हैं !!  वहां क्या क्या की हुआ ..... पहले तो उन्होंने देखा ....टोकन नंबर लिखा है की नहीं , फिर दो मैन्युअल लेज़र में एंट्री है तो उसके होने के प्रमाण सवरूप पहले अधिकारी के हस्ताक्षर हैं की नहीं , फिर वो ही एंट्री कम्पुटर में है की नहीं ....अगर हैं तो उसके होने के प्रमाण सवरूप दुसरे अधिकारी के हस्ताक्षर हैं की नहीं ....चलिए ये दोनों तो मिल गए ...अब बारी आई ...मेरे हस्ताक्षर मिलाने की .... उन्होंने अपने सामने रखी एक अलमारी में करीने से रखे कुछ छोटे छोटे गट्ठों में से मेरे एकाउंट्स के नुम्बर वाले गट्ठे को निकला और वो ही कार्ड निकला जिसमे मेरे दो नमूना हस्ताक्षर थे ...उनसे मिलान किया गया ...तब सब ओके मिला तो वहां से अगले काउंटर पर दिया गया ...वहां नंबर से सैम को बुलाया जा रहा था ... लगभग 15 मिनट्स के बाद मेरा नंबर आया ...मेरा चेक मेरी तरफ ही बढाते हुए उन्होंने कहा अपने हस्ताक्षर कीजिये ...ये कन्फर्म करने के लिए की में ही हूँ ...जिसने वो चेक सबसे पहले काउंटर को अपना चेक दिया था !! और पूरे 1 घंटे के बाद मुझे मेरे ही पैसे मिले .. वाह वो ज़माना !!  और आज सिर्फ एक क्लिक करने के बाद हम निश्चिंत हो जाते हैं की हमारा पैसा सही जगह पर सही समय पर पहुच गया !! मुझे याद नहीं की आजकल मैं अपने बैंक में व्यक्तिगत रूप से कब गया होऊंगा !! जब आज कल की सुविधाएं नहीं थीं तब ये चाहिए था किन्तु ये भी सही है की 50% लोग ...अपने बैंक में व्यक्तिगत रूप से नहीं जाते और ये तक नहीं जानते की वो लोग जो ये सुविधाएँ दे रहे हैं वो दिखने में कैसे हैं .... !! अरे ये क्या बात कह दी मैंने ..ज़रुरत क्या है उनको देखने की ? काम हो रहा है ना !! भाई तो कम तो तब भी होता था लेकिन हम उनको देख पाते थे और मन की भड़ास निकल पाते थे ...पर आज समय पर काम हो रहा है तो भी उनको साधुवाद नहीं दे पाते ...हाँ मन में हुआ तो कस्टमर केयर पर एक इ मेल छोड़ देते हैं .......लेकिन सुना है की इन बैंकों के दफ्तर काफी बड़े और सुन्दर होते हैं ....और कर्मचारी ड्रेस कोड में रहते हैं ...सब सामान दिखने के लिए ...क्यों की सरकारी सोपानो पर  आरक्षण का सहारा भी होता है ना म उस पर ना असर पड़े इस लिए !! 
                     
         


Wednesday, October 17, 2012

.. स्वयं सरीखे कुछ बुत बनाने चाहियें, खुद की तलाश के लिए !!

                   अनमने मन से उठा और बाहर की तरफ देखा छोटे से परदे को बड़ी सी खिड़की से हटा कर ....तो खुला सा समुन्दर अपने पूरे जोश में सब को संभावनाएं बाँट रहा था , रोज़ की तरह ...लेकिन मेरे होटल के किनारे एक छोटी सी दूकान पर उस नन्ही सी जान के लिए कुछ भी नया नहीं था आज ....  उसके लिए बस एक दिन था जिसमे दिन में गर्मी रहती है और शाम को हल्का अँधेरा और शाम को खाना मिला मिला ना मिला लेकिन खुले आसमान की चादर और ठंडी धरती का बिस्तर ज़रूर नसीब में था !!

                बात उन दिनों की है जब हमने नया नया उड़ना / घूमना सीखा था और शहर शहर घूम रहे थे , अधिकारिक यात्रा पर !!  उत्तर के शहर इतने करीब से देखें हैं की कुछ गूढ़ नहीं दीखता ..किन्तु वहीँ दक्षिण के शहर कभी देखे नहीं तो वहां की गलियां तक विशेष लगती हैं ! पोंडिचेरी की गलियों की सैर कर रहे थे अकेले ....पैदल !!  हाथ में डाभ ( कच्चा नारियल , पानी से भरा हुआ ) ले कर , गटकते हुए !! गवर्नर के बंगले से होते हुए जैसे ही गाँधी जी के पुतले की ओर बढ़ते हैं तो कुछ दूरी पर एक रेत से भरा हुआ रास्ता मिलता है  बिलकुल एसा लगता है जैसे की वहां की सरकारी आँखें इस टूकडे को देख नहीं सकीं नहीं तो इसको भी पुरे प्रयास से पथरीला कर देतीं या फिर ये भी लगता है की शायद इस को इस लिए उसके मूल स्वरूप में छोड़ा गया हो की आने वाले लोगों की कुछ सामीप्य लगे ...अपनी ज़मीन से इन पथरीले रास्तों में !!
              उसी रेतीली ज़मीन पर सुबह और शाम को छोटा सा बाज़ार लगता है , अपने शहर और आगंतुकों दोनों के लिए !! वहां दक्षिण के पारंपरिक पकवान के सिवा ,,,उत्तर भारत के भी पकवान मिलते हैं ....जैसे आलू की टिक्की , गोलगप्पे किन्तु उनमे आपको दक्षिण की खुशबू ज़रूर मिलेगी ताकि आपको स्मरण रहे की आप मूल स्थान से हट कर आनंदित हो रहे हैं !!
             चाय भी मिलती है !! मुरुगन उसी चाय की दूकान पर रहता था ! मेरा रोज़ का साथी ! आज कुछ उदास था , चाय भी कुछ फीकी बनी थी ....न चीनी तो उतने ही चम्मच डाली थी ज़रूरी पानी में बस स्वाद आया ही नहीं !! चाय की छन्नी में रखे बारीक कपडे के ऊपर पूरी की पूरी चाय उधेल दी थी उसने कुछ बहार छलक कर उसके हाथ पर आ गिरी तो उसे ख़याल आया की कुछ गलत जो रहा है !!... मैंने पुछा " क्या बात है मनु ? " कुछ नहीं साब .. ठेठ दक्षिण भारतीय हिंदी में जवाब मिला !! कुछ तो है बोल तो मन हल्का होगा ......मैंने इतना कहते हुए उसके कंधे पर अपना उल्टा हाथ रख दिया और कोशिश करी की उसके सर को सहारा दूं .....एसा लगा जैसे उसको कुछ मिल गया हो जैसे मृग मरीचिका .... वो मेरे कंधे और छाती से लगभग चिपक कर रोने लगा ..... ये कहते हुए ...." कोई अपना नहीं है साब ....देख लिया मैंने " !! मैंने उसको अपने दुसरे हाथ से सहारा दिया और उठने के लिए कहा ....और हम चल दिये महात्मा गाँधी की मूर्ति के पास ....समुद्र में सम्भावनाये समेटने !!
              वो दिन आज़ादी का दिन था ...15 अगस्त , कुछ बच्चे छोटे छोटे तिरंगे बेच रहे थे ,,,,मैंने मुरुगन से पुछा लोगे ? हामी में सर हिला दिया उसने !! मैंने कुछ झंडे खरीदे ! मुरुगन से पुछा अब बताओ क्या बात हैं क्यों उदास हो ? वो बोला " साब में पढना चाहता हूँ पर मुझे स्कूल में एड्मिसन नहीं मिला ...और कोरास्पोंदेंस - पत्राचार की पढ़ाई के लिए एक मुश्त पैसे हैं नहीं मेरे पास ...और इस चाय की दूकान पर काम करते करते अगर पढ़ना चाहूं तो मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखाई देती की मैं समय पर अपनी पढ़ाई पूरी कर सकूंगा !! .... अच्छा तो तुमने कोई हल तो ढूँढा होगा इस समस्या का ...? मैंने पुछा ! वो बोला हाँ साब ...अगर मुझे कहीं स 2500 रूपये मिल जाएँ तो मैं एक मुश्त फीस भर कर अपनी पढ़ाई जारी रखूंगा और धीरे धीरे पैसे भी चुकता कर दूंगा काम करके ...लेकिन कोई देता नहीं ना ...सब जान पहचान की बात करते हैं की कोई गारंटी दे दे ...जब की मैं इसी शहर का हूँ ...सब मुझे जानते हैं ....मेरे पिताजी और माता जी जब तक सुनामी में नहीं गुजरे थे सब मुझे पहचानते थे अब मेरे पास कुछ नहीं ...तो ये लोग भी नहीं पहचानते ....!!  अच्छा तो तुम इस लिए परेशान हो मैंने मुरुगन की टीशर्ट का कालर ठीक करते हुए कहा ? चलो मूंगफली खाते हैं ....!!  दक्षिण भारत में मूंगफलियाँ सडक पर मिलती हैं ! हा हा हा ....भाई ये तो कोई बाद ना हुई ...मूंगफलियाँ उत्तर भारत के शहरों में भी सड़कों पर मिलती हैं और लोग तो इसको " गरीबों का मेवा " कहते हैं !! खैर दक्षिण में मूंगफलियों को पानी में उबाल कर सडकों पर बेचा जाता है ....मैंने और मुरुगन ने कुछ मूंगफलियाँ खरीदीं और समुद्र की तरफ मुह कर के दीवार पर बैठ गए !!
                 अब मुरुगन के चहरे पर मुस्कान थे ....उमीदों भरी ...पर मैं अब उलझन में था !! मुझे नहीं याद की मैंने उस की क्या मदद करी थी किन्तु इस बात को सोच कर उलझ गया था की .... क्या विचित्र सी बात है की स्वयं के  शहर में व्यक्ति परिचय ढूँढने को बाध्य हो जाता है और अपरिचित शहर में कैसे परिचित होने की सम्भावनाये जन्म लेती हैं !! मुरुगन मुझे मिलता है विभिन्न रूपों में आज भी सपनों में और यदाकदा उन्ही गलियों में मिटटी के दिए बेचते हुए , सुगन्धित अगरबत्ती बेचते हुए , सुन्दर से मुरझा जाने वाली मालाएं बेचते हुए ...अपने ही लोगो के बीच अपरिचित सा ...बस उसी समय जब वो स्वयं के बारे में सोचता है ....अन्यथा सब के समीप है ...सबका अपना है वो , चाय की मीठास रूंधे हुए गले के कसैलेपन को कम नहीं कर सकती !!
                हमें , स्वयं सरीखे कुछ बुत बनाने चाहियें और उनमे खुद को तलाशना चाहिए ...तब जब आपको परिचय की दरकार ना हो ....ताकि जब आप अजनबियों के बीच हों तो कम से कम स्वयं को तो स्वयं का परिचय ना देना पड़े !!  मुरुगन आज बारहवीं कर चुका है , स्वयं को स्थापित कर रहा है और मुरुगनो से परिचित होने के लिए !!!  ये तो सफ़र है , चलता ही रहेगा कभी आपसे मुआकात हो तो कृपया पहचान लीजियेगा , बिना परिचय दिए श्रीमान !!