" अक्सर हम अपने आसपास घटने वाली घटनाओ को कभी कभी सामान्यतः होने वाले बदलाव मान कर हलके में ले लेते हैं ....किन्तु जब उनका ही असर भारी सा लगता है तब विचारों के तहत उनका विश्लेषण करने का प्रयास करते हैं ....पर तब तक अत्यधिक देर हो चुकी होती है ...और संभलने का न तो वक़्त होता है और न ही कोई औचित्य !! " घटनाओ को घटने से नहीं रोका जा सकता किन्तु उसके अनुमानित असर को जानते हुए भी सही वक़्त पर कोई कदम नहीं उठाना असल में घटना को सही में घटना बना देता है, अन्यथा ......कोई और भी शब्द का प्रयोग संभव है !!"
Monday, June 4, 2012
Sunday, May 20, 2012
.....खालीपन का जो सबकुछ होते हुए भी बना रहता है !!
आज रविवार है !! छुट्टी का दिन !! मैं सुबह सुबह घर में होने वाली एक पूजा के लिए गेंदे के फूलों की माला लेने के लिए बाजार गया था , ये ही कोई 9 के आस पास का वक़्त होगा ! सब्जी मंडी के बहार का रास्ता पीले पीले आमों के ठेलों से पटा हुआ था , देखने में खूब सुन्दर और सलोने आम ! कुछ ठेले लीची के भी हैं , हरी हरी पत्तियों के साथ पानी से तर बतर !!
मैं आगे बढ़ा चोपला मंदिर की ओर नगरनिगम की ईमारत के पीछे से , नवयुग मार्केट की दोनों सड़कों पर दुकाने लगनी शुरू हो गयी थीं , आज रविवार को रविवार की पैठ लगती है , सुबह के सात बजे से येही कोई शाम के सात आठ बजे तक !!
कुछ दुकानों के देख कर सामान लेने की इच्छा ना हो हर उसको बेचने वाले की अवस्था पर कुछ सोचने को मजबूर होना पड़ा ! ये दुकाने थीं , सूखे मेवे बेचने वालों की ! अखरोट , काजू , किसमिस , बादाम , पिस्ता इत्यादि !! जिनको खाने के बाद हमारी सेहत ठीक ठाक हो जाती है , कोई रोग पास नहीं आता , शारीर मैं ताकत रहती है !! आज देखा की इन सामान को बेचने वालों की सेहत बिलकुल भी अच्छी नहीं नहीं , चेहरे पर चिंता , मुह पर झुरियां , पिचके हुए गाल , लावनया का कोई निशान नहीं क्या कमी है इनके पास , इतने सरे मेवे तो हैं , जब मेवे खरीद कर बेच सकते हैं तो खुद खा क्यों नहीं सकते , जो सेहत ठीक हो जाये ! ये सब लिख तो दिया मैंने लेकिन समझ नहीं पाया असली कारण इस खालीपन का जो सबकुछ होते हुए भी बना रहता है !!
मैं आगे बढ़ा चोपला मंदिर की ओर नगरनिगम की ईमारत के पीछे से , नवयुग मार्केट की दोनों सड़कों पर दुकाने लगनी शुरू हो गयी थीं , आज रविवार को रविवार की पैठ लगती है , सुबह के सात बजे से येही कोई शाम के सात आठ बजे तक !!
कुछ दुकानों के देख कर सामान लेने की इच्छा ना हो हर उसको बेचने वाले की अवस्था पर कुछ सोचने को मजबूर होना पड़ा ! ये दुकाने थीं , सूखे मेवे बेचने वालों की ! अखरोट , काजू , किसमिस , बादाम , पिस्ता इत्यादि !! जिनको खाने के बाद हमारी सेहत ठीक ठाक हो जाती है , कोई रोग पास नहीं आता , शारीर मैं ताकत रहती है !! आज देखा की इन सामान को बेचने वालों की सेहत बिलकुल भी अच्छी नहीं नहीं , चेहरे पर चिंता , मुह पर झुरियां , पिचके हुए गाल , लावनया का कोई निशान नहीं क्या कमी है इनके पास , इतने सरे मेवे तो हैं , जब मेवे खरीद कर बेच सकते हैं तो खुद खा क्यों नहीं सकते , जो सेहत ठीक हो जाये ! ये सब लिख तो दिया मैंने लेकिन समझ नहीं पाया असली कारण इस खालीपन का जो सबकुछ होते हुए भी बना रहता है !!
Monday, May 14, 2012
अंतर्मन भी सांस नहीं ले पता , भावनाओं के आभाव मैं !!
एक समय था !
ये ही कुछ १५ सालों पहली ही बात रही होगी मैं अपने एक मित्र के साथ उसके घर पर था ! उसके एक रिश्तेदार भी उसके घर मिलने को आये हुए थे ! सब कुछ सामान्य था बस एक बात के ! मेरी और मेरे दोस्त की निगाह उन बुजुर्ग रिश्तेदार पर चली जाती थी , दरअसल उन बुज़ुर्ग ने अपने कानो मैं इयर फोन लगा रखा था और उसकी तार उनकी जेब मैं एक मशीन से जुडी हुई थी !!
हाँ जी वो बहरे थे और वो मशीन बहार से आने वाली आवाजों को कुछ बढ़ा कर के उस तार के ज़रिये उनको कान तक पहुचता था और वो सुन सकते थे !!
अरे साहब हम एक बार नाक कान गले वाले हस्पताल गए , वहां तो ना जाने कितने लोग ये ही मशीन लगाये घूम रहे थे !! उस दिन के बाद जिस के कानो मैं ये मशीन देखि तो अपने आप पर फक्र महसूस होता - हम और हमारे कान एक दम दुरुस्त हैं ! उनकी और कुछ हे दृष्टि से देखते थे की देखो इनको कम सुनाई देता है ........!!
एक आज का समय है !!
सफेद , काले और ना जाने कितने ही तरह के इयर फ़ोन लगाये बच्चे घुमते रहते हैं ! इयर फ़ोन तो स्टेटस सिम्बल बन गया है ....जिसका जीतन अच्छा फ़ोन उतने और उससे भी अच्छा इयर फ़ोन तो होना ही चाहिए ......! बस मैं , टेम्पू मैं , रेलगाड़ी मैं , प्लेट फॉर्म पर, हस्पताल मैं , नदी के किनारे , पहाड़ पर चढ़ते हुए , दिवाली मानते हुए , राखी बंधवाते हुए , खाना खाते हुए , क्लास रूम मैं ( टीचर से नज़र चुराकर ) , शमशान मैं , शनिवार से अगले शुकर्वार तक , किसी भी तरह की अक्तिविटी करेती हुए ....बच्चे , किशोर, जवान , युवा , अधेड़ , बुजुर्ग सब इयर फ़ोन का इत्स्तेमाल करते हुए दिख जायेंगे !! ना ना ना ....ये सब बहरे नहीं हैं !! सब अपने को बड़ा और अलग दिखने की होड़ मैं हैं....महंगे मोबाईल के इयर फ़ोन के सहारे .....!!
फर्क है कल और आज की मशीन मैं .....वो बाहर से आपको जोड़ती थीं , आवाज़ बढ़ा कर आपको सुनाती थीं , और आज की मशीन आप और हम को बाहरी दुनिया से अलग कर देती हैं ...... अपने आस पास का , अपने अपनों का , अपने और दुसरो का कुछ सुनाई नहीं देता !! कभी कभी तो टूटन का पता भी नहीं चलता .....ये इयर फ़ोन बस तन्हाई को और बढाते हैं ......अंतर्मन भी सांस नहीं ले पता , भावनाओं के आभाव मैं !!
ये ही कुछ १५ सालों पहली ही बात रही होगी मैं अपने एक मित्र के साथ उसके घर पर था ! उसके एक रिश्तेदार भी उसके घर मिलने को आये हुए थे ! सब कुछ सामान्य था बस एक बात के ! मेरी और मेरे दोस्त की निगाह उन बुजुर्ग रिश्तेदार पर चली जाती थी , दरअसल उन बुज़ुर्ग ने अपने कानो मैं इयर फोन लगा रखा था और उसकी तार उनकी जेब मैं एक मशीन से जुडी हुई थी !!
हाँ जी वो बहरे थे और वो मशीन बहार से आने वाली आवाजों को कुछ बढ़ा कर के उस तार के ज़रिये उनको कान तक पहुचता था और वो सुन सकते थे !!
अरे साहब हम एक बार नाक कान गले वाले हस्पताल गए , वहां तो ना जाने कितने लोग ये ही मशीन लगाये घूम रहे थे !! उस दिन के बाद जिस के कानो मैं ये मशीन देखि तो अपने आप पर फक्र महसूस होता - हम और हमारे कान एक दम दुरुस्त हैं ! उनकी और कुछ हे दृष्टि से देखते थे की देखो इनको कम सुनाई देता है ........!!
एक आज का समय है !!
सफेद , काले और ना जाने कितने ही तरह के इयर फ़ोन लगाये बच्चे घुमते रहते हैं ! इयर फ़ोन तो स्टेटस सिम्बल बन गया है ....जिसका जीतन अच्छा फ़ोन उतने और उससे भी अच्छा इयर फ़ोन तो होना ही चाहिए ......! बस मैं , टेम्पू मैं , रेलगाड़ी मैं , प्लेट फॉर्म पर, हस्पताल मैं , नदी के किनारे , पहाड़ पर चढ़ते हुए , दिवाली मानते हुए , राखी बंधवाते हुए , खाना खाते हुए , क्लास रूम मैं ( टीचर से नज़र चुराकर ) , शमशान मैं , शनिवार से अगले शुकर्वार तक , किसी भी तरह की अक्तिविटी करेती हुए ....बच्चे , किशोर, जवान , युवा , अधेड़ , बुजुर्ग सब इयर फ़ोन का इत्स्तेमाल करते हुए दिख जायेंगे !! ना ना ना ....ये सब बहरे नहीं हैं !! सब अपने को बड़ा और अलग दिखने की होड़ मैं हैं....महंगे मोबाईल के इयर फ़ोन के सहारे .....!!
फर्क है कल और आज की मशीन मैं .....वो बाहर से आपको जोड़ती थीं , आवाज़ बढ़ा कर आपको सुनाती थीं , और आज की मशीन आप और हम को बाहरी दुनिया से अलग कर देती हैं ...... अपने आस पास का , अपने अपनों का , अपने और दुसरो का कुछ सुनाई नहीं देता !! कभी कभी तो टूटन का पता भी नहीं चलता .....ये इयर फ़ोन बस तन्हाई को और बढाते हैं ......अंतर्मन भी सांस नहीं ले पता , भावनाओं के आभाव मैं !!
Wednesday, May 9, 2012
..........इठलाता विस्थापित मन !!
***** सुप्रभातम *****
गंगा की लहरों के संग-संग,
रंग ओढे , सुगन्धित वन !
अलसाई किरणों के आँचल,
इठलाता विस्थापित मन !!
फूलों फूलों, फिर तलाशते,
भंवरे जीवन की बूँदें !
कलियों कलियों स्पर्शों से,
आनंदित होता , यौवन !!
गंगा की लहरों के संग-संग,
रंग ओढे , सुगन्धित वन !
अलसाई किरणों के आँचल,
इठलाता विस्थापित मन !!
फूलों फूलों, फिर तलाशते,
भंवरे जीवन की बूँदें !
कलियों कलियों स्पर्शों से,
आनंदित होता , यौवन !!
Monday, May 7, 2012
....ये हमारी ज़िन्दगी भी तो पिक्चर की तरह है
" उन दिनों मैं टाटानगर मैं रहा करता था , अपने नाना जी नानी जी के पास ये कुछ १९८६ - १९८७ के आस पास की बात होगी ! बस कुछ नहीं , तब अगर कोई सिनेमा घर मैं नई पिक्चर लगती थी तो उसकी जानकारी गली मुहल्लों मैं कुछ इस तरह से दी जाती थी ...."
१. एक साईकिल रिक्शा !
२. ३ गुना ५ के दो बोर्ड , आगे पीछे कुछ मुख्य द्रश्य उसी पिक्चर के रंगीन उकेर कर बाँध कर रखे हुए , पोस्टर जी हाँ !
३. रिक्शा के हेंडल पर एक लाउडस्पीकर और रिक्शा के पीछे एक लाउडस्पीकर .
४. बीच मैं एक बेटरी !
५. एक अम्प्लिफायर और कभी कभी माइक भी....
६. और अनाउन्समेंट :
" सुनिए सुनिए सुनिए , बहुएं , बेटियों , भाइयों , माताओं के साथ देखि जा सकने वाली एक बिलकुल नई पिक्चर लगी है , आपके नजदीकी ही सिनेमाघर मैं , कानो के भने वाला संगीत , सुन्दर रंग , आर दी बर्मन का संगीत , हेलन का नाच और साथ मैं डाकूओं से लोहा लेते हीरो को देखिये , शुरू के दिनों के छूट के दाम मैं , टिकट के दाम शुरू हैं :
अ . इस्पेसल - १० रूपया ,
ब . कुर्सी - ५ रुपया ,
स . बालकोनी - २० रुपया ....
आइये और देखिये नया खेला !!
इतिहास सा लगता है सब , ना ना लगता नहीं हो ही गया है !!
बस आज की रात भी कल इतिहास होगी और हम किसी और बीते हुए पल , घटनाओं की यादों मैं आखे मसलते रहेंगे और दिन निलकल आएगा और फिर सांझ होगी , और फिर रात फिर दिन ....समय चलता रहेगा ....ये हमारी ज़िन्दगी भी तो पिक्चर की तरह है ...जनम होने पर थाल पीट पीट कर पुरे मोहल्ले मैं बताया जाता है एक नया किरदार आया है अपना रोल अदा करने ...जैसे सब आते और जाते रहते हैं ....जीवन चलता रहता है ....चलते रहिये ....मिलना और मिलना कीजिये बिछड़ना तो है है सब को ..... aapka apna hai ....
१. एक साईकिल रिक्शा !
२. ३ गुना ५ के दो बोर्ड , आगे पीछे कुछ मुख्य द्रश्य उसी पिक्चर के रंगीन उकेर कर बाँध कर रखे हुए , पोस्टर जी हाँ !
३. रिक्शा के हेंडल पर एक लाउडस्पीकर और रिक्शा के पीछे एक लाउडस्पीकर .
४. बीच मैं एक बेटरी !
५. एक अम्प्लिफायर और कभी कभी माइक भी....
६. और अनाउन्समेंट :
" सुनिए सुनिए सुनिए , बहुएं , बेटियों , भाइयों , माताओं के साथ देखि जा सकने वाली एक बिलकुल नई पिक्चर लगी है , आपके नजदीकी ही सिनेमाघर मैं , कानो के भने वाला संगीत , सुन्दर रंग , आर दी बर्मन का संगीत , हेलन का नाच और साथ मैं डाकूओं से लोहा लेते हीरो को देखिये , शुरू के दिनों के छूट के दाम मैं , टिकट के दाम शुरू हैं :
अ . इस्पेसल - १० रूपया ,
ब . कुर्सी - ५ रुपया ,
स . बालकोनी - २० रुपया ....
आइये और देखिये नया खेला !!
इतिहास सा लगता है सब , ना ना लगता नहीं हो ही गया है !!
बस आज की रात भी कल इतिहास होगी और हम किसी और बीते हुए पल , घटनाओं की यादों मैं आखे मसलते रहेंगे और दिन निलकल आएगा और फिर सांझ होगी , और फिर रात फिर दिन ....समय चलता रहेगा ....ये हमारी ज़िन्दगी भी तो पिक्चर की तरह है ...जनम होने पर थाल पीट पीट कर पुरे मोहल्ले मैं बताया जाता है एक नया किरदार आया है अपना रोल अदा करने ...जैसे सब आते और जाते रहते हैं ....जीवन चलता रहता है ....चलते रहिये ....मिलना और मिलना कीजिये बिछड़ना तो है है सब को ..... aapka apna hai ....
Thursday, May 3, 2012
आँगन आँगन हां हां ही ही !
आँगन आँगन हां हां ही ही ,
गलियों गलियों बात चली !
आँख चढ़ाए सूरज आया ,
कलियाँ सारी खिली खिली !!
रात के सारे सुस्त खिलोने ,
फुदक फुदक कुछ गाते हैं !
हौले हौले ख़ामोशी अब ,
किरणों के संग चली चली !!
***** सुप्रभातम *****
गलियों गलियों बात चली !
आँख चढ़ाए सूरज आया ,
कलियाँ सारी खिली खिली !!
रात के सारे सुस्त खिलोने ,
फुदक फुदक कुछ गाते हैं !
हौले हौले ख़ामोशी अब ,
किरणों के संग चली चली !!
***** सुप्रभातम *****
Tuesday, April 24, 2012
.....बस गले नहीं लगाया उसने मुझे , कह कर चली गयी की आज तुम होश मैं थे .....फिर मिलेंगे !!
" उस दिन अदभुत खुश था मैं .....बस एक और यात्रा के बाद घर जो जाना था , पुरे पंद्रह दिनों से अपनी बहनों से दूर था !! "
"२००४ के शुरूआती दिन थे , अप्रैल का अंत और मई की शुरुआत के दिन थे , अधिकारिक काम से चेन्नई से कोलकत्ता गया था और फिर मुंबई होते हुए दिल्ली लौट रहा था , जेट एयरवेज़ की कोलकत्ता से मुंबई की शाम के ७.४५ की उड़ान थी ! बाँकुड़ा से हावड़ा आया , कुछ देर विक्टोरिया मेमोरिअल मैं तालाब के किनारे बैठा , चिनिया बादाम ( मूंगफली ) खाई, डाभ पिया और फिर दमदम की लिए निकल पड़ा , कोलकत्ता की मेट्रो के सहारे !! मोनोरम है सब देखना , टिकटिंग का अनोखा सिस्टम है , एक पतली सी टिकट मिलती है जो स्टेशन मैं प्रवेश करते समय वहां लगे अवरोधक के एक किनारे पर रखो और खट कर के वो अपने तरफ उसको खीच लेता है और दरवाजे की दूसरी निकल देता है ...और दरवाज़ा खुल जाता है आपको आगे जाने के लिए !! मेट्रो का सफ़र अच्छा रहा , एयर पोर्ट पर सब कुछ करने के बाद उड़नतश्तरी मैं बैठ गया , नाश्ता मिला , और फिर खाने की तयारी होने लगी, तभी ये लगा की हम बादलों के बीच से गुजर रहे हैं , बहार का नज़ारा और भी मनोरम सा लग रहा था , मैं खिड़की से बहार झाँकने लगा !!!
एसा लग रहा था की दो भूरी भूरी डबलरोटी के बीच मैं एक मक्खन की टिकिया रखी हो , और हम उसमे रखी फलों के तुकडे !! खैर खाना आया बस पहला कौर ही मुह मैं डाला था की , अचानक , बत्ती गुल और हमारा तैय्यारा , हवाई जहाज़ हिलने लगा , और बाहर खूब बिजली चमकने लगी ......तभी एक उद्घोषणा हुई " कृपया ध्यान दीजिये - " हम लखनऊ के ऊपर से गुजर रहे हैं और बहार के मुसम ख़राब है और संभवतः हमें आकस्मिक लैंडिंग करनी पद सकती है ...आप तयार रहिये ....और पूरा का पूरा ज़हाज़ हिल रहा था ये लग रहा था की शायद हम नहीं बचेंगे ....."
" पुरे पांच मिनट्स तक हम सब ने जो लोग भी ज़हाज़ मैं थे ना जाने किस किस को याद किया और किस किस से जिनसे भी हमने लड़ाई झगडा हुआ था सब से मुआफी मांग ली, और दोबारा एसा नहीं करने की कसम खा ली , खैर राम राम कर के सब मौत का तूफ़ान गुज़र गया और हम लखनऊ के ऊपर से निकल आये , और सुरक्षित थे .....मौत से सामना किया मैंने , बस गले नहीं लगाया उसने मुझे , कह कर चली गयी की आज तुम होश मैं थे .....फिर मिलेंगे !! "
जीवन मिल कर जी लीजिये , अकेला हो होना है ही ....!!
- आपका ही.......... मनीष
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