Monday, November 28, 2011

अनुमानों की कड़ियों में भी ,संभावित जुड़ जाते हैं,

" प्लेटफार्म के उद्घोषों सा, ही तो ये  जीवन है ,
होते होते होता है सब ,किन्तु सही समय पर क्या !
अनुमानों की कड़ियों में भी ,संभावित जुड़ जाते हैं,
कल की गति को कल देखेंगे ,आज चलो सो जाते हैं !!"

शुभदिवस के लिए ....शुभरात्री !!

Saturday, November 26, 2011

" वीकेंड ज्ञान "

" वीकेंड ज्ञान " -    " हमारे गाजीयाबाद मैं एक तिराहा है .... हां ठीक से पढ़िए ...तिराहा ...जिसका नामकरण यहाँ के सुविग्य , ज्ञानी लोगो ने " अग्रसेन चौक " जी हाँ चौक रखा है ...! " फोटो कल लगता हूँ... आपकी जिज्ञासा की जो बात है !  कल रविवार है जरा देख आइयेगा !

Tuesday, November 22, 2011

किलकारियां शब्द हो गयीं, रहेट कर रहे हैं खटपट !!

" गलियों-गलियों सौंधी खुशबु ,आँगन-आँगन चेहचाहट ,
चाँद सो गया तान के चादर , सूरज ने  भी ली करवट !
धुंध के घुंघट से अब किरणें ,    हौले हौले गाती हैं ,
किलकारियां शब्द हो गयीं,  रहेट कर रहे हैं खटपट !!
भोर हो गयी , अनुभव के कुछ गुंचे फिर मुस्काएंगे ,
जुड़ते-जुड़ते,पल-पल छिन- छिन दिन माला बन जायेंगे !!"

सुप्रभात ! आप का दिन आनंदमय रहे !!

 

       
      
           

हौले हौले ,गुन गुन करते , धीरे से सो जाएँ ! "

" ओस की नन्ही बूंदों से फिर , घर आँगन भीगा ,
      हरश्रृंगार की खुशबू फैली , चंचल मन बहका !
         रात के गुड्डे गुडिया आये,  अटखेली दिखलाएं ,
              हम सब अपने सपने देखें ,       आखें मुन्दलाएं ,
                   हौले हौले ,गुन गुन करते , धीरे से सो जाएँ !  "       

Sunday, November 20, 2011

" शोर " चित्रपट से कुछ पंक्तियाँ.

" पानी रे पानी तेरा रंग कैसा ? "

१. भूखे की भूख और प्यास जैसा !
२. सौ साल जीने की उमीदों जैसा !!
३. दुनिया बनाने वाले रब्ब जैसा !!!
                                               
 " शोर " चित्रपट से कुछ पंक्तियाँ.

Friday, November 18, 2011

........सबके होने की कोशिश करनी चाहिए !

अभी दो चार महीने पहले ही की बात है वो छोटा ही था ... हाँ अपने पिता की बात मानता था ....पर आज लगा वो शायद कुछ मनवाना चाहता है ....बड़ा हो गया है ... !

पिता को लगने लगा है की वो सिर्फ पैसे देने वाली मशीन थे और उनकी पत्नी पैसे दिलवाने वाला कार्ड ..... जब पैसे चैहिये होते थे ...माँ से सहारे से ...अपनी बात कह दी ...और माँ ने अर्रेंग्मेंट कर दिया ... और पिता को ये लगता था की बेटा मेरी इज्ज़त करता है इस लिए मुझ से सीधे सीधे अपनी बात नहीं करता ....किन्तु उनका के धोखा था ... !

अपने पिता को कभी वो दर्ज़ा दिया ही नहीं राहुल ने जो आम बच्चे अपने पिता को पिता होने का देते हैं .....

कभी कोई बात नहीं मानी जो बाप ने कही हो ...जो निर्णय अपने आप किये बस वो ही सही ...और उनको सही साबित करने के लिए चाहे किसी की भावनाए आहत होती हो तो भी परवाह नहीं की .... कभी सामाजिक रूप से जिम्मेदार नहीं बना ... और उसको बनाना भी नहीं चाहिए ... इसे राहुल किसी के नहीं हो सकते ....अपने भी नहीं ...खुद पर भी भरोसा नहीं होता इनको और बाप को भी उसकी उपलब्धियों पर प्रश्नचिन्ह लगाने से नहीं चूकते ....

आज राहुल के पिता नहीं हैं ...अपने मन की आई बातें उन्होंने मुझ से करी ...मुझे दुःख होता है ! वो अपने को हमेशा से छोटा और मजबूर महसूस करते रहे ...उनकी महिस्थाती को क्सिसी ने नहीं समझा ... बाहर वालों को नहीं समझना था... घर मैं वो सम्मान चाहिए था जिस को वो उम्र भर ढूँढते रहे किन्तु सब ने उनको एक सदस्य समझा ....घर का बड़ा नहीं .... अफ्सोसो है ..अफोसोस...!

राहुल आज अपनी चाहतों के कारन कुछ मुकाम पर है ...लेकिन वो अकेला नहीं ...उस जैसे जाने कितने हैं ...पर सब के पिता को इज्ज़त मिली ...सम्मान मिला ... राहुल ने एसा नहीं किया ...इस लिए वो आज अकेला है !

पिता ने उसको इस dharti पर लेन की जो जिमीदारी निभानी थे निभाई ...किन्तु ...मिला कुछ नहीं ...ना वो सम्मान न ही संतुष्टि .... रेल स्टेशन पर सब आपसे बात करते हैं लेकिन ...सब से आप सब उम्मीद नहीं करते ....अपने ही अपने होने का एहसास करते हैं ...!  एसा ना होने पर आप अपनी परिभाषाओं मैं उलझे रहते हैं जब की समाज मैं कुछ और ही चलन मैं होता है ....! सबके होने की कोशिश करनी चाहिए ....सिर्फ अपने बारे मैं तो चार पैर और एक पूछ वाले सोचते हैं ....!




Monday, November 14, 2011

.............रिश्ते, बर्फ खिलोने से !! "

" कड़वी-खट्टी सी दुनिया ,
   मित्र,  शहद  चबोने से !
   अंगारों सी  उम्मीदें  ,
   रिश्ते, बर्फ खिलोनों से !! "


आते -  आते ,आती है
अनुबंधों   मैं   गर्माहट,
घुलते - घुलते, घुलती है,
वर्षों की सब कडवाहट !!
मन गुलाब सरीखे से ,
चाहें, ओस की बूंदों सी,
किन्तु स्वप्न नहीं आते
काँटों  भरे बिछोनो  पे !!

अंगारों सी उमीदें,
रिश्ते, बर्फ खिलोनो से !!


चुटकी- चुटकी , अपनापन ,
अंजुली- अंजुली , आशाएं !
डिबिया-डिबिया , धुप खिली,
कंकर पत्थर     गरिमाएं !!
प्रतिबंधों   के    उजले पथ,
क्षितिज  सरीखी   मंजिलें !   
मिलने  के  कुछ पर्व नहीं ,
ना  खालीपन    खोने में !

अंगारों सी उमीदें ,
रिश्ते, बर्फ खिलोनो से !!