Wednesday, May 28, 2014

एक कहानी : वो गुलाबी पेन !!

            विशाखा अपने दफ़्तर में बैठी किसी का इंतज़ार कर रही थी ! उसकी निगाहें टिक - टिक करती पुरानी पेंडुलम वाली घड़ी पर टिकी थी ! खिड़कियों से आती जाती ठंडी हवांयें पास के मंदिर से लोहबान की खुशबू आपने साथ ले आती थीं ! सड़क पर शोर कुछ कम हो चला था ! पास के स्टेशन से आखिरी ट्रैन के अनाउंसमेंट हो चूका था ! पास के मोहल्ले में लगने वाली साप्ताहिक पैठ से अपनी दुकानदारी समेट कर व्यापारी वापसी  पर थे ! सब दीखता था विशाखा की पीछे वाली खिड़की से ! शाम रात में तब्दील होने को बैचैन थी की अचानक दरवाज़े पर तैनात सिपाही ने सेल्यूट करते हुए विशाखा का ध्यान अपनी तरफ खींचा !
 
जनाब, कोई आबिद आप से मिलना चाहते हैं !
 
विशाखा ने सम्भलते हुए कहा : हाँ , उन्हें अंदर भेजिए !
 
सिपाही ने फिर से सेल्यूट किया और गर्वीले अंदाज़ में घूम गया !
 
आओ आबिद आओ , कोई परशानी तो नहीं हुई आने में ! विशाखा ने २३ , २५ साल के युवक आबिद से ममता भरी आवाज़ में कहा ! अपनी सीट से उठ कर  लगभग दरवाज़े तक आ गयी थी वो आबिद को लेने के लिए  !
 
        आबिद , एक लम्बा अच्छी डिल डॉल वाला, नव युवक सुन्दर गोल चेहरा , नीली आँखे , काले रंग की टी शर्ट और डार्क ब्लू कलर की जींस में दरवाज़े की चोखट पर खड़ा झिझक रहा था रौबीली विशाखा के बड़े से दफ्तर में कदम रखने से ! वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थी वो जिले की ! ये पहली पोस्टिंग थी विशाखा की इस वरिष्ठ पद पर ! लगभग १५ सालों बाद मिल रहे थे दोनों एक दूसरे से !
 
आबिद ने विशाखा के पैर छुये और नमस्ते कहा !
 
डबडबाई आँखों से विशाखा ने आबिद को उठाते हुए उसका माथा चूमते हुए गले से लगा लिया !
 
विशाखा : आ , बैठ यहाँ !
 
         बड़े बड़े सोफों पर बैठने के इशारा करते हुए विशाखा ने आबिद का बैकपैक ले कर सिपाही से अपनी गाड़ी में रखने को दिया और थोड़ी देर में निकलते हैं कह कर तैयारी करने को कहा !
 
सिपाही ने जी जनाब कहते हुए लॉगबुक आगे कर दी !
 
विशाखा : आबिद वो पेन पकड़ाना !
 
आबिद ने अपनी जेब से एक पेन निकाल के विशाखा की तरफ बढ़ा दिया और विशाखा ने लॉगबुक पर सिग्नेचर कर के पेन आबिद की तरफ़ वापस बढ़ाया ,
 
तभी आबिद ने पुछा :
 
दी , आपको ये पेन याद है ?
 
विशाखा को जैसे किसी ने बर्फ के टुकड़े से छू दिया हो , ये प्रश्न ऐसा था उसके लिए !
 
आबिद : दीदी ,आपको ये पेन याद है ?

विशाखा : हाँ रे , इसी पेन से हो हमारी दोस्ती हुई थी ! वाह , तूने ये अभी तक संभाल कर रखा है !!
 
आबिद : दीदी ये मेरी बांह पर लगे ठीके  का दाग़ और ये पेन ताउम्र मेरे साथ रहेंगे !
 
विशाखा : पेन तो ये पकड़ और बता खा खाएगा , रस्ते से लेते चलेंगे घर पर तो नार्मल खाना बन चूका होगा मैंने किसी से तेरे आने की बात नहीं कही है !
 
आबिद : दीदी, अगर आज वो ही गोबी की पकौड़ियाँ खाई जायें तो ? जो आपने वैभव भैया की शादी के दिन बारात के जाने के बाद बनाई थी ?
 
             विशाखा ने मुस्कुराते हुए घर पर नौकर को गोबी खरीद कर रखने को कहा और आबिद को ले कर चल दी अपने बड़े से सरकारी बंगले की तरफ ! आगे पीछे सिपाहियों की कतारें ,  हर काम के लिए एक सिपाही ! 
 
            विशाखा के लिए रोज़ दफ़्तर से घर जाना जैसे एक दूसरी डियूटी पर जाने जैसा था ! अकेले रात भर सरकारी बंगले में कभी लैपटॉप तो कभी टेलीविज़न तो कभी रेडिओ के साथ नींद आने तक कर सफर और फिर सुबह जल्दी से दफ्तर , घर पर रुके भी तो किसके लिए और घर वापस जल्दी आये तो लिए !
 
            लेकिन आज ऐसा नहीं था ! उसका छोटा भाई आबिद था उसके साथ ! दफ्तर से सरकारी गाड़ी तक पहुचने में जितने भी अधिकारी मिले सब से आबिद को मिलवाती चली विशाखा मेरा छोटा भाई है कह कर !
 
सब अधिकारिओं ने पहली बार अपनी साब के चहरे पर मुस्कान देखी थी , मातृत्व देखा था !
 
विशाखा ने रस्ते से कुछ कोक और स्वीट्स खरीदी ! बंगले के पास के मदर डेरी वाले को फ़ोन कर दिया की घर पर एक टूटी फ्रूटी आइसक्रीम की ब्रिक पंहुचा दे !
 
आबिद पूरे रस्ते विशाखा को देखता रहा ! उसके हाव भाव पढता रहा ! बीच बीच में आते अधिकारीयों के फ़ोन काल पर वो कैसे बात करती थी , जवाब देती थी सुनता रहा और याद करता रहा १२ , १५  साल पहले का वो दिन जब पहली बार वो विशाखा से मिला था !

अरे आप कहाँ चली गयी थी फातिमा बी , इतना सारा काम पड़ा है ! विशाखा की चाची ने आबिद की अम्मी को ज़ोर दे कर बोला !

फ़ातिमा बी : जी , आबिद के स्कूल की  छुट्टी का वक़्त था तो बस उसको लेने थी !

चाची : ठीक है , अब आगया ना ! अब काम देख लीजिये !

फातिमा बी : जी अच्छा कहते हुए ८ , ९ साल के हाफ़ नेकर में खड़े आबिद से बहार बरामदे में जा कर बैठने को कहा !

आबिद : अम्मी , प्यास लगी है !

फातिमा बी : अच्छा तुम वहां चलो  पानी लाती हूँ !

          आबिद बाहर बरामदे में  किनारे बैठ गया और देखने लगा कही फूल तो कहीं लाईट लगाते कारीगरों को ! कभी कोई आता तो कभी कोई ! सब्ज़ियों के ठेले , तो कभी राशन वाले के रिक्शे ! कभी दूध के बर्तन तो कभी मिठाइयों से भरी टोकरियाँ ! कभी उसके आस पास से खेलते हुए गुज़ारे शादी में शामिल होने आये रिश्तेदारों के बच्चे तो कभी वैभव भैया के दोस्तों के  सिलसिला ! एक दो बार कुछ लोगो ने आबिद से घर से किसी को बुलाने को कहा और आबिद बड़े अपनत्व से भीतर जा कर जो भी पहला शख्स मिला उसे बुला लाया ! मानो जैसे उस बड़े घर में उसके होने की भी सब को फ़िक्र है ! कभी चाचा जी ने किसी मेहमान के आने पर आबिद से ही कह डाला जाओ अंदर जा कर चाय नाश्ते का देखो !

        इस सब में शायद अम्मी पानी देना भूल गयी थी आबिद को, पर कोई था जिसे ख्याल था की आबिद स्कूल से सीधे शादी के घर में आया है और भूखा प्यासा है सब बरात की तैयारी में लगे थे तो सका ख्याल अम्मी को भी नहीं रहा !

किसी ने आबिद की तरफ एक पत्ते का दोना और गिलास में पानी आबिद की तरफ बढ़ाते हुए कहा , लो तब तक पानी पियो तुम्हारी अम्मी काम कर रही है !
 
आबिद : जी अच्छा !

            इस घर में पहले तो देखा नहीं था आबिद ने इनको !  शायद वैभव भैया की रिश्तेदार होंगी और शादी में आई है ! कितनी अच्छी है ! आबिद पानी पीते और मिठाई खाते सोचता जाता था की तभी चाची ने आवाज़ लगाईं !

कहाँ रह गई विशाखा ?

विशाखा आई चाची कहती हुई  अंदर चली गयी !

चाची : विशाखा बार बार मैं काम के लिए टोकूंगी नहीं , बड़ी हो सब बच्चो में कुछ तो ख्याल करो भाभी जी और भैया का ! शादी के घर में कई तरह के लोग आते हैं और तुमको इस लिए भी हॉस्टल से शादी में बुलाया है की शायद किसी की तुम पर नज़र पड़े और तुम्हारी शादी की बात बने ! तुम्हारे चाचा कब तक अपने बच्चो के साथ साथ तुम्हारा भी खर्च उठाते रहेंगे ! भैया भाभी कुछ छोड़ कर तो गए यही जो था वो सब उनके इलाज़ पर खर्च हो चूका है ! तुम समझ रही हो ना ?

 " विशाखा तो जैसे कोने में लगी तुलसी सी सुकुड गई थी ! कड़वे शब्दों और घूरती निगाहों के स्पर्श से मुरझने को थी वो की तभी आबिद भीतर आया और बोला  : दीदी वो डाकिया आया है ,कोई रजिस्टरी है ,कहता है बिना सिग्नेचर के नहीं देगा ! "

चाची : अच्छा अच्छा उसको रोको अभी आती हैं तेरी दीदी !

विशाखा ने मन ही मन आबिद और देखिए को शुक्रिया कहा , नहीं तो और कुछ से चाची बातों के ताने देती !

डाकिया : यहाँ सिग्नेचर करिये !

विशाखा : जी पेन दीजिये !

डाकिया : बिटिया , आज पेन मेरा रास्ते में गिर गया !

विशाखा : ओह्ह , ठीक है रुकिए मैं लाती हूँ अंदर से !

आबिद : दीदी ये लीजिये पेन , चलता गुलाबी है मुझे पिछले हफ्ते ही क्लास टीचर ने दिया था , पूरी अटेंडेंस होने पर  !

विशाखा ने रजिस्ट्री ले ली और गुलाबी पेन को लिए लिए भीतर चली गयी !
 
आबिद बाहर बैठा बैठा इंतज़ार करता रहा ! अपनी अम्मी और विशाखा का भी !
 
       पूरी गली में रौशनी , बैंड बाजा, शहनाई का तरन्नुम , केवड़े और गुलाबजल की खुशबु , सजे धजे मेहमान ! चारो तरफ़ खुशियों और उल्लहास  माहौल ! वैभब भैया की बारात चलने को थी !
 
चाचा : अरे , विशाखा तुम नहीं चलोगी ?
 
अभी विशाखा कुछ बोलती चाची बीच में बोल उठी , सब शादी में चले जायंगे तो  घर पर कौन रहेगा !
 
चाचा : अच्छा ठीक है , विशाखा तुम यही रुको , फातिमा बी से भी बोल देता हूँ रात में इधर ही रुकने को !
 
विशाखा : जी चाचा जी आज देर शाम मेरे आई पी एस का रिजल्ट आने को है रिटन का मैंने आपका ही नंबर दिया है अपने दोस्त को , हो सका तो वो आपको फ़ोन करेगा लखनऊ से !
 
चाची : अरे इतने शोर में कहाँ फ़ोन सुनाई देगा ,कल सुबह शादी के बाद देख लेंगे !
 
मायूस हो गया विशाखा का चेहरा और पास खड़े आबिद को भी कुछ ठीक नहीं लगा ये सब !
 
             बारात जा चुकी थी ! घर में दिन भर के शोर ने ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली थी ! बड़े से घर के दरवाज़े खिड़की बंद कर के विशाखा अकेली बैठी थे ड्राइंग रूम में ! तभी नीचे से फातिमा बी ने आवाज़ लगाईं :
 
विशाखा दरवाज़ा खोलो , आबिद को तब तक रखो अपने साथ में घर पर खाना बना कर बुला लूंगी उसको !
 
विशाखा : चाची ( फातिमा बी को भी चाची पुकारा उसने ) , आप यही रहिये और यहाँ जो खाना बना है वो ही बहुत है हम सब के लिए !
 
        आबिद को अचानक जैसे किसी ने झकझोर दिया था ! उसकी माँ को किसी ने चाची कह कर पुकारा था ! वो भी विशाखा ने जो अब तक के मिले सब लोगो में सब से अच्छी लगी थी उसको !
 
मौसम खराब हो चला था ! तेज़ बारिश , बिजली का चमकना और फिर तेज़ हवायें ! ठंडक बढ़ गयी थी !
 
चाय पियेंगी चाची : विशाखा ने फातिमा बी से पुछा और आबिद से बोली तुम खाना खा लो ,  फिर सो जाना !
 
आबिद : क्या है , खाने में दीदी ?
 
कढ़ी और चावल ,पर पकौड़ियाँ खत्म हो गयी हैं !
 
आबिद : तो क्या हुआ , लाइये दीजिये बगैर पकौड़ियों के खा लूँगा !
 
     अजीब से संतोष की खुशबू  थी आबिद के इस कथन में जैसे भरी दोपहर में तेज़ लू के बीच अचानक चन्दन की खुशबू फ़ैल गयी हो !
 
अच्छा रुको आबिद कुछ देर ! विशाखा ने एक तरफ चाय और एक तरफ गोभी की पकौड़ियाँ बनाई !
 
आबिद खाने के बाद विशाखा की गोद में ही सो गया और फातिमा बी के  कहने के बावजूद उसने उसे अपने से अलग नहीं किया !
 
    पड़ोस के घर में लैंड लाइन कब से बज रहा था ! सब तो शादी में गए थे बस एक २० , २३ साल का लड़का विपुल  था जो कभी कभी विशाखा को छत से देखा करता था !
 
विपुल : अरे ,विशाखा है कोई वैभव भैया के घर में !

फ़ोन वाले घर से उस लड़के ने आवाज़ लगाईं !
 
विशाखा ने आबिद के सर को धीरे से सोफे के कुशन पर संभाल कर सरकाया और भाग कर गयी बरामदे में !
 
हाँ बोलो ?
 
विपुल : तुम विशाखा हो ?
 
हाँ ? क्यों क्या हुआ ?
 
विपुल : तुम्हारे चाचा जी का  फोन था , तुम्हारा रिज़ल्ट आ गया है और तुम ने क्लियर कर लिया है !
 
उछल पड़ी इतना सुन कर ! छलांग लगाने को तैयार इतना उत्त्साह !
 
विपुल : अरे , सम्भलना और पहले अंदर जाओ , मैं आता हूँ वहां थोड़ी देर में !
 
विशाखा बिना चुन्नी के चली आई थी बरामदे में , विपुल के अंदर जाओ कहने के बाद समझी और नज़रें झुका कर अंदर चली गयी !
 
विपुल दरवाज़े पर था छतरी लिए , फातिमा बी ने अंदर आने को कहा उसको !
 
विपुल : किस चीज़ का एग्जाम क्लियर किया तुमने ?
 
आय पी एस का रिटन ! विशाखा बोली !
 
वाओ , ये बड़ी अच्छी बात है ! लाओ मिठाई खिलाओ !
 
विशाखा ने लो कहते हुए परवल की घर में बनी मिठाई आगे बढ़ा दी !
 
अपना लैंड लाइन नंबर दे दो प्लीज़ , कभी  चाचा जी से बात करने को मन किया तो कॉल कर लूंगी !
 
विपुल  : हाँ हाँ , लाओ पेपर और पेन दो !
 
विशाखा ने वो आबिद का गुलाबी पेन आगे बढ़ा दिया ! विपुल ने नंबर लिखा और पेन अपनी जेब में रख लिया , शायद जान बूझ कर किया था उसने !
 
आबिद अब जाग गया था ! सब सुन और देख रहा था !
 
      बारिश थमी तो विपुल अपने घर लौट गया ! अगले दिन बारात वापस आई ! विशाखा अपने हॉस्टल  फिर वहां से ट्रेनिंग पर गयी ! सब का व्यवहार बदला बदला था ! कुछ दिनों में पोस्टिंग और पोस्टिंग के साथ वो आज सीनियर पोस्टिंग पर थी !

ड्राइवर ने लंबा हॉर्न दिया , गाड़ी बंगले के सामने कड़ी थी !
 
ओ भाई कहाँ खोये हो ? घर आ गया ! सरकारी गाड़ी में पुरानी यादों में खोये आबिद को विशाखा ने पुकारा !
 
आबिद का यादों का झूला अचानक थम गया था !
 
आओ आबिद ये है तुम्हारी दीदी का घर ! विशाखा ने गर्मजोशी से आबिद का स्वागत किया !
 
    डिनर के बाद आइसक्रीम खाते हुए आबिद ने विशाखा से पुछा : दीदी आप इतने साल मुझ से मिली क्यों नहीं ? आपने  मेरी हर ज़रुरत का ख्याल रखा फिर भी आप मुझ आज मिली जब मैं कुछ बन गया और नौकरी शुरू करने वाला हूँ , क्यों ? मुझे भी खुद से मिलने नहीं दिया , क्यों ? हर बार प्रिंसिपल से कह कर मुझे अपना पता देने से मना कर दिया !

अचानक डाइनिंग टेबल पर माहौल बदल गया था !

विशाखा ने खाना परोसने वाले सहायक को अंदर जाने को कहा !
 
विशाखा : क्या ये सब जानना ज़रूरी है आबिद  ? आज हम दोनों एक दूसरे के साथ हैं क्या ये ही कम है ?
 
आबिद : हाँ वो तो ठीक है पर क्या मुझे ये जानने का हक़ नहीं की मेरी परवरिश करने वाले ने क्यों मुझे खुद से अलग रखा इतने दिन ? आप बताइये और अभी बताइये !

आबिद ने अपनी चम्मच प्लेट में रखी पिघलती आइसक्रीम पर रख दी और आँखे नीची कर कर चुप हो गया !

           विशाखा जैसे ऐसे अधिकार को तरस रही थी ! कोई उस से ऐसा अधिकार जताता ! वो उठी और आबिद के करीब आ कर खड़ी हो गयी ! आबिद लिपट गया अमर लता सा विशाखा से ! अपने जीवन को सँवारने वाले से शिकवा करता हुआ ! विशाखा ने आबिद की आँखों टपकती लालसा देखी जो चाहती थी की उसे पता चले की माँ के बाद दूर रह कर भी कैसे कोई उसकी माँ का फ़र्ज़ निभा रहा था !

विशाखा ने आबिद के चहरे को दोनों हथेलियों से सँभालते हुए कहा : अच्छा चल , ये आइसक्रीम फिनिश कर फिर वाक पर चलते हैं , सब बताती हूँ !

विशाखा : वैभव भैया की शादी के बाद मैं ट्रेनिंग पर चली गयी ! बीच बीच में मैं विपुल  से बात करती रहती थी ! तुम्हारा हाल भी मिलता रहता था ! एक साल के बाद मेरी ट्रेनिंग खत्म हुई ! मुझे पहली  पोस्टिंग मिली ! मैंने ख़ुशी ख़ुशी विपुल  को  फ़ोन किया लैंड लाइन पर  तो मुबारकबाद के बाद उन्होंने बताया की फातिमा बी नहीं रही ! मुझे तुम्हारी चिंता हुई ! तब मैंने और विपुल ने तुम्हे अच्छे हॉस्टल में दाखिल करने का फैसला लिए ! हर महीने तुम्हारे स्कूल की फीस मैं भर्ती थी तो बाकि की चीज़ों का ख्याल विपुल करते थे ! दिन बीतते जा रहे थे , मैं और विपुल करीब आते जा रहे थे ! तुम्हारी पढ़ाई  ज़रूरतों का वो ही ख़याल करते थे ! मैं तो बस अपनी सैलेरी का एक हिस्सा तुम्हारे अकाउंट में ट्रांसफर करती थी जिसे वो ऑपरेट करते थे  तुम्हारे लिए !

सुनते सुनते आबिद ने ध्यान दिया की अचानक दीदी ने विपुल भैया को उन्हें , उनके कह कर सम्बोधित करना शुरू किया था !

विशाखा तो जैसे पानी से बही जा रही थी यादों की सुरंगों से ,जिसके एक किनारे पर आबिद था तो दूसरे किनारे पर विपुल !

विशाखा : एक रोज़ विपुल  ने मेरे सामने शादी का प्रोपोजल रखा ! अच्छा कारोबार था उनका ! अच्छा परिवार ! उनके परिवार ने मेरे चाचा जी से बात करी और शादी भी हो गयी ! कुछ दिन मैं रही भी अपने ससुराल फिर पोस्टिंग्स के कारण मुझे आना पड़ा ! व्यापार के कारन वो मेरे साथ नहीं आ सकते थे तो मैं नौकरी नहीं छोड़ना चाहती थी ! बस फिर धीरे धीरे हमारा मिलना कम हो गया और पिछले ३ सालों से बिलकुल संपर्क नहीं है !

आबिद बीच में बोला : लेकिन इतना सब के बाद भी मुझे और मेरी पढ़ाई पर आप दोनों ने कोई असर नहीं होने दिया !

विशाखा : हाँ वो ख्याल रखते है बहुत तुम्हारा !

आबिद विशाखा से लिपट गया और ज़ोर से पकड़ लिया अपनी दीदी को ,रूंधे गले भीगी आँखों से कहता हुआ आप दोनों एक साथ क्यों नहीं है ?

विशाखा के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था !

अगले दिन !

आबिद तुम आज रहोगे ना तुम्हारी जॉइनिंग तो कल से है ना ? विशाखा ने आबिद के कमरे के परदे सरकाते हुए पुछा !

आबिद : हाँ दी !

ठीक है , लो ऑरेंज जूस पियो और फिर अपने आप प्लान कर लो सब ,मैं गाड़ी और ड्राइवर छोड़े जा रही हूँ !

आबिद : जी दीदी ! ड्राइवर वही है ना जिसे आपने मुझे लाने के लिए हॉस्टल भेजा था !

विशाखा : हाँ , वो ही हैं ! पहचान हो गयी उनसे तुम्हारी ? गुड !

         शाम को विशाखा घर लौटी ! भीतर घुसते साथ लेवेंडर की खुशबू से सारा घर महक रहा था ! आबिद ने रजनीगंधा के गुच्छे से वेलकम किया अपनी दीदी का और कहा की आइये भीतर चलते है , विशाखा ने जैसे ही अगला कदम डाइनिंग रूम की तरफ बढ़ाया सामने टेबल के उस छोर पर विपुल को बैठा देखा फिर नज़रे आश्चर्य से आबिद की तरफ कर ली !

      डाइनिंग टेबल का माहौल बदल चूका था और पीछे दीवारों पर लगे वूफर्स पर मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ गूंज उठी "
                                           " ओ शहज़ादी सपनो की ,
                                                    इतनी तू हैरान ना हो !
                                                          मैं  भी  तेरा  सपना हूँ,
                                                              जान मुझे अनजान हो ! "
                                                                       जनम जनम का साथ है ,
                                                                               निभाने को ………   
                                                                                    सौ सौ बार मैंने जनम लिए !!

विपुल , विशाखा और आबिद याद कर रहे थे उस गुलाबी पेन को  जसे डाकिया ने माँगा था , जिससे लैंड लाइन नंबर लिखा था ................... उस बारिश की रात गोबी की पकौड़ियों की महक  के साथ

                                                                 ~~~~  समाप्त ~~~~

एक कहानी : वो गुलाबी पेन !

                                                                      ::: मनीष सिंह :::

Thursday, May 22, 2014

एक कहानी : चिरुनी ( कंघी ) !!

सिस्टर निरुपमा ने धीरे से दरवाज़े को भीतर की तरफ धकेलते हुए पुछा : उज्जवल बाबू आज कैसा महसूस कर रहे हैं आप ?
 
प्रतिउत्तर में में उज्जलव बाबू कुछ नहीं बोले !
 
सफ़ेद और हलके आसमानी रंग की अस्पताल के ड्रेस में कोई 80  - 85 बरस  बुजुर्ग हो चुके उज्जवल घोष एक टक टप - टप टपकती सलाइन की बोतल की बूंदों के देख रहे थे ! 
 
सिस्टर निरुपमा ने अपने साथ आई एक नयी ट्रेनी सिस्टर का परिचय करवाते हुए बेड पर BP नापने की मशीन रखी और बोली : ये अरुणिमा है , आज से ये आपका ख्याल करगी !  
 
उज्जवल बाबू ने मुस्कुराते हुए अरुणिमा के तरफ देखा तभी उनकी पलकों से दो बूँदें ढलक गयीं !

अरुणिमा अपनी सीनियर के रहते हुए भी खुद को रोक न सकी और उनके आंसुओं को कोमल गुलाबी अंगुलियों से पोछते हुए बोली !
 
क्या हुआ बाबा ? कुछ तकलीफ हो रही है ?
 
उज्जवल बाबू ने हामी में सर हिलाया !
 
सिस्टर निरुपमा : क्या हुआ ?
 
उज्जवल बाबू : आज सर में काफी दर्द है सिस्टर !
 
सिस्टर निरुपमा ने कोई टैबलेट लिखी पेपर पर और अरुणिमा को डाक्टर की विजिट के बाद खिला देना को कहा फिर अगले वार्ड में चली गयी !
 
अब उस वार्ड में उज्जवल बाबू और अरुणिमा रह गए थे !
 
अरुणिमा : बाबा, मैं ये टेबलेट ले कर आती हूँ !
 
उज्जवल बाबू : ठीक है बेटा !
 
और अरुणिमा बाहर चली गयी !
 
कैसे हैं उज्जवल बाबू : सीनियर डॉक्टर के साथ दो और जूनियर डॉक्टरों तपन और बियोज  ने वार्ड में आते हुए पुछा !
 
उज्जवल बाबू : ठीक हूँ सर , बस आज सर में कुछ दर्द है !

डाक्टर : हाँ, सिस्टर निरुपमा से बताया था , उन्होंने कोई टेबलेट लिखी है ! दिखाइये क्या लिखा है !
 
उज्जवल बाबू : वो तो एक नयी सिस्टर अरुणिमा लेन गयी हैं !
 
डॉक्टर : खुद लेने गयी हैं ? क्यों ,वो तो स्टोर का डिलीवरी बॉय पंहुचा जाता !
 
तभी अरुणिमा ने वार्ड के दरवाज़े पर दस्तक दी : में आय कम इन सर ?
 
सीनियर डॉक्टर : आइये , आप खुद क्यों गयी थीं ? आपको मालूम होना चाहिए की ये डॉक्टर्स के विजिट का वक़्त है और हर पेशेंट के साथ सिस्टर का साथ होना ज़रूरी है !

आप ड्यूटी आवर्स के बाद मुझ से मिल कर जाइयेगा और जो सिस्टर आपको  लीड कर रही हैं उनको बता दीजियेगा , हो सके तो उनको भी साथ में लाइए  !
 
अरुणिमा के चेहरे पर शांत भाव लेकिन आँखों में डर साफ़ घर कर गया था , आँख झुका कर धीरे से बोली : सॉरी सर !
 
वो टैबलेट दिखाइए : सीनियर डाक्टर ने कहा !
 
अरुणिमा ने छोटा सा काग़ज़ और टेबलेट आगे बढ़ा दी  !
 
सीनियर डाक्टर ने हां में सर हिलाया और कहा : ये ठीक है , ताज़े पानी से अभी एक टेबलेट दीजिये और फिर भी तकलीफ रहे तो मुझे बताइये मेरे एक्सटेंशन पर - खुद मत आइयेगा !
 
सिस्टर अरुणिमा ने हामी में सर हिलाया और बोली : जी सर ,मैं शाम को आप को रिपोर्ट करती हूँ !
 
ओ के कहते हुए डॉक्टर दरवाज़े से बाहर की तरफ बढ़ गए !
 
        डॉक्टर तपन को अरुणिमा ने और सिस्टर अरुणिमा ने डॉक्टर तपन को धीरे से पलकें उठा कर देखा  - ये सामान्य नहीं था ! अरुणिमा ने अपनी उठती पलकों से तपन को इस डांट से हुए को दर्द बताया हो जैसे , तो तपन ने अपनी धीरे से झुकती हुई पलकों से अरुणिमा को जैसे सांत्वना दी , कोई बात नहीं ,वो बड़े हैं , मैं हूँ न तुम्हारे साथ ! दो अनजान लोगो में अशब्द किन्तु अर्थपूर्ण संवाद जिसमे केवल समर्पण था !
 
दोनों लगभग हमउम्र डाक्टर तपन 25 बरस और अरुणिमा कुछ 21 बरस की उम्र में नर्सिंग की ट्रेनिंग पर इस अस्पताल में , आये थे ! ये पहली मुलाक़ात थी उनकी !
 
उज्जवल बाबू की तजुर्बे वाली निगाहें ये सब देख रहीं थी !
 
सादे पानी का गिलास और टेबलेट उज्जवल बाबू को देते हुए अरुणिमा ने कहा : बाबा , ये खा लीजिये फिर मैं आपके बेड के चादर और तकिया गिलाफ़ बदल देती हूँ !
 
उज्जवल बाबू : बेटा ,आज मैं बेड से उठ नहीं सकूँगा  , कमजोरी महसूस हो रही है , आज चादर बदलना रहने दो !
 
अरुणिमा : बाबा आपको उतरना नहीं होगा ,मैं आपके लेटे लेटे ही बदल दूँगी ! आप पहले टेबलेट खाइये !
 
उज्जवल बाबू ने पानी का गिलास अरुणिमा की तरफ कर दिया दवाई खा कर और लेट गए !
 
अरुणिमा : बाबा ,आप बेड के एक तरफ करवट ले लीजिए !
 
बस फिर सिस्टर अरुणिमा ने बारी बारी से पुरानी चादर हटाई और फिर नई चादर बदल दी !
 
उज्जवल बाबू के साथ एक हफ्ते में ये पहली बार था की चादर बदलने के लिए उनको बेड से उतरना नहीं पड़ा था !
 
सिस्टर अरुणिमा ने वार्ड में रखे सभी सामान को करीने से सजा दिया और फिर आ कर बैठ गयी उज्जवल बाबू के पास रखे स्टूल पर !
 
सिस्टर अरुणिमा : बाबा ,आपके सर के बाल इतने लम्बे क्यों हैं ?
 
उज्जवल : बेटा मुझे शौक़ था लम्बे बाल रखने का ! मेरे ज़माने में जाने माने लेखक और कलाकार रखते थे ! तुमने गुरुदेव रबिन्द्र नाथ की तस्वीर तो देखी होगी !
 
सिस्टर अरुणिमा : हाँ देखी तो है ! लकिन ये तो उलझ गए हैं ! आपके घर से कोई नहीं आता ! सर पर तेल लगा कर इनको ठीक करना ज़रूरी है !
 
घर की बात सुनते ही उज्जवल बाबू का मन दुखी हो गया  , शांत हो गए !
 
सिस्टर अरुणिमा : बाबा,आपके घर पर कौन कौन हैं ?
 
उज्जवल : दो बेटे , बहुए, शायद पोते पोती भी है !!
 
सिस्टर अरुणिमा : शायद , मतलब बाबा ?
 
उज्जवल बाबू ने काफ़ी देर शांत रहने और अरुणिमा के बार बार पूछने पर बोलना शुरू किया !
 
कोई 50 - 60 सालों पहले की बात है मैं तब छोटा था लेकिन जीने के लिए पैसा और पैसे के लिए मेहनत ज़रूरी है बहुत जल्दी समझ गया था !
 
          रोज़ सुबह देबासिस दा  की दुकान पर चाय  पीता था और वो चाय तब देते थे जब मैं दो ड्रम पीने का पानी भरता था ! फिर अखबार बांटना और 10 बजे से हावड़ा रेलवे स्टेशन पर रेल गाड़ियों के यात्रियों को चिरुनी ( कंघियाँ )बेचता था ! ड्यूटी जाने और वापस आने के समय पर चिरुनी खूब बिकती थी ! दोपहर में कम ! दिन भर में दस से बीस कंघियां बेच लेता था ! दोपहर का खाना वहीँ पर एक मठ था उसमे खाता था ! शाम को चाय नाश्ता भी करता था वहीँ देबसिस दा की दूकान पर दो ड्रम पानी और मठरी के लिए मैदा सानेने के बाद !
 
       ऐसे ही बचपन बीत रहा था ! मुझे नहीं पता की मैं कहाँ से हूँ ! किस परिवार से हूँ ! जब से होश संभाला देबसिस दा के पास पाया ! ना कभी मैंने पुछा और ना  कभी उन्होंने बताया !
 
सिस्टर अरुणिमा शान्त और नम आँखों से सब सुनती जाती थी ! बीच बीच में वो दवाओं और सलाइन का भी ख़याल कर लेती थी !
 
       उज्जवल बाबू को जैसे अपनापन अचानक मिल गया था बरसों बाद अरुणिमा के रूप में और मन की जड़ हो चुकी भावनायें पिघल कर बह चली थीं यादों की लहरों पर शब्दों की नावों पर सवार हो कर !
 
सिस्टर अरुणिमा आप लंच के लिए चलेंगी ? वार्ड के दरवाज़े को हलके से खोलते हुए डॉक्टर तपन ने पुछा !
 
उज्जवल बाबू ने अरुणिमा से पहले जवाब दिया : अंदर आइये छोटे डाक्टर बाबू !
 
         डॉक्टर तपन , २५ - २६ साल का सजीला युवक ! यौवन की चरम सीमा चहरे पर झलकती थी  ! बार बार अरुणिमा की निगाहें तपन को देख कर झुक जाती थी ! कुछ आधा फुट लम्बा था तपन अरुणिमा से ! आज उसने मूँगिया हरे रंग की शर्ट और लाइट चॉकलेट कलर का ट्राउज़र पहना था और ऊपर से सफ़ेद ऐप्रॉन ! गले में स्थेस्टस्कोप ! अरुणिमा ने कच्चे पीले रंग के सूट और सलवार उसपर काले रंग  की चुन्नी पहनी थी साथ में सफेद ऐप्रॉन सलीके से ओढ़ रखा था , दोनों सुन्दर और सोबर दीख पड़ते थे !
 
       बाबा हम लंच कर के आते हैं ! अरुणिमा और तपन दोनों ने एक साथ अगल बगल खड़े हो कर उज्जवल बाबू की तरफ देखते हुए पुछा  ! जैसे अनुमति चाहते थे इस असामान्य बात के लिए ,ये सामान्यतः संभव नहीं ड्यूटी टाइम में !
 
उज्जवल बाबू : हाँ , मैं खुद  अरुणिमा को लंच के लिए याद दिलवाने वाला था ! ठीक हुआ जो आप आ गए !
 
डॉक्टर तपन : जी ,बिलकुल चिंता न करें !
 
      अदभुद रश्तों के अंकुर पनप रहे थे ! कौन किस की देखभाल और देख रेख करने को था अस्पताल में  कुछ समझ नहीं आता था ! सारी परिभाषाएँ बदली बदली सी थीं !
 
दोनों मेस की तरफ बढ़ गए !
 
शाम की चाय और बिस्किट लिए उत्पल खड़ा था ! रोज़ वो ही चाय दे जाता था ! अरुणिमा ने चाय  बाबू को दी और उनसे अपनी बात आगे कहने को कहा !
 
उज्जवल बाबू कहने लगे : फिर २५ - २८ साल की उम्र में मेरे साथ बहुत सारी घटनाएँ एक साथ हुई ! एक दिन मैं हावड़ा से दुर्गापुर जाने वाली ट्रैन में चिरुनी बेच रहा था ! ट्रैन में भीड़ खचा खच थी !
 
         मैं अपने हाथों में कंघियों के गुच्छे लिए चिल्ला रहा था : चिरुनी ले लो चिरुनी ! सुन्दर , टिकाऊ चिरुनी ! आपके केश को ऐसा संवारे जैसे माँ का हाथ ! कोमल कोमल हाथों से ऐसे आनंद से जैसे की चमेली का तेल लगा हो केश में ! चिरुनी ले लो चिरुनी !
 
अरे, इधर आओ : एक रौबीले आदमी ने मुझे बुलाया !
 
उज्जवल : हाँ बाबू , कैसी चिरुनी लेंगे ?
 
आदमी : मुझे चिरुनी नहीं चाहिए ! तुम से कुछ बात करनी है ! मेरे साथ दुर्गापुर चलोगे ?
 
उज्जवल : वो क्यों ?
 
आदमी : वहां मेरी एक दूकान है और एक दुकान मैंने कोलकत्ता में भी ली है अब दोनों जगह मुझ से वो संभाला नहीं जाएगा ! बेटा है नहीं एक बेटी है , थोड़ी कमजोर है दिमाग से ! तुम अगर चाहो तो मेरे साथ मेरे घर चलो और सब सम्भालो !
 
उज्जवल : पर आप मुझ पर ऐसे कैसे विश्वास कर ले रहे हैं ! मैं तो आपको अभी अभी मिला ?
 
आदमी : मैं ट्रैन के इंतज़ार में तक बाहर देबसिस की पास बैठा था ! वो मेरे एक कोलकत्ता के दोस्त का दोस्त है ! वहीँ उसने  तुम्हारे बारे में बताया !
 
उज्जवल : मेरे सामने पूरा जीवन था और साथ में थी एक उम्मीद और मौका ! बस मैंने हाँ भर दी !
 
दो बेटे हुए , प्रभात और विनय ! दोनों जगह की दुकाने ठीक था चल रही थीं !
 
दोनों को अच्छा पढ़ाया ! बड़ा बेटा सरकारी नौकरी में है और दार्जिलिंग में ! उसकी शादी करी लड़की उसने अपनी पसंद की देखी ! शादी के बाद वो दार्जिलिंग से मुझे कभी मिलने नहीं आया !
 
दूसरे बेटे ने सारा काम संभाल लिया था ! उसकी माँ का देहांत हुआ तो  घर में किसी लड़की की कमी खेलने लगी ! मेरे गॉड फादर के ही घर से एक लड़की के साथ उसका विवाह कर दिया ! उस दिन से वो घर मेरे लिए जेल से कम नहीं रहा ! मैंने कोलकत्ता की दूकान में रहने का फैसला किया ! २० साल सब ठीक चला ! 
 
बाबा आप चाय लेंगे : अरुणिमा ने बीच में गंभीर होते माहौल को कुछ हल्का  करने की कोशिश करी और सफ़ेद बड़े बड़े चीनी मिटटी के प्याले में चाय उज्जवल बाबू की तरफ बढ़ा दी !
 
शाम हो चली थी !
 
दूर हावड़ा ब्रिज के सहारे सूरज ढल रहा था !
 
अरुणिमा ने खिड़कियों के परदे खोल कर ठंडी हवाओं को निमंत्रण दिया !
 
अब , अरुणिमा के जाने का समय था !
 
उज्जवल बाबू उदास हो गए थे !
 
कल आती हूँ कह कर अरुणिमा ने रात की सिस्टर से चेंज ओवर किया और चली गयी !
 
डाक्टर तपन ने अरुणिमा को टैक्सी में बैठाया और घर की  तरफ चल दिया ! कोलकत्ता की पहचान पिली पीली टैक्सी बरसों पुराने हावड़ा ब्रिज पर आगे बढ़ गयी ! उज्जवल बाबू देर तक खुले आकाश में सितारों को देखते रहे !
 
अगली सुबह !
 
आज आपको हल्का दूध देने को कहा है बड़ी सिस्टर ने वो भी छाली ( मलाई ) हटा कर ! सुबह सवेरे उत्पल ने बड़े गिलास में दूध  बिस्किट टेबल पर रखते हुए उज्जवल बाबू से कहा !
 
उज्जवल बाबू में आज अनोखी ऊर्जा थी आज ! जल्दी जल्दी दूध पिया और बिस्किट बचा लिए अरुणिमा के लिए !
 
अरुणिमा : केमोन आछेन बाबा ? ( कैसे हैं बाबा ?)
 
कमरे में जैसे गुलाब की खुशबू बिखर गयी हो ! रात भर उदास सिकुड़ी छुईमुई के पत्तों सरीखीं उज्जवल बाबू की पलकें अचानक खिलखिला गयी थीं अरुणिमा की आवाज़ सुन कर !
 
उज्जवल बाबू : मैं ठीक हूँ , तुम कैसे हो बेटा ?
 
अरुणिमा ने जल्दी जल्दी सब कमरा ठीक किया ! दवा दी ! चाय नाश्ते और सफाई का प्रबंध किया ! डाक्टर की विजिट पर समय पर रही ! सब ठीक ठाक था ! ११ बजे  बाद सब सामान्य कल की तरह !
 
अरुणिमा और उज्जवल बाबू वार्ड में बस !
 
अरुणिमा : बाबा कल अपने पुछा नहीं की सीनियर डाक्टर ने क्या कहा मुझे शाम को अपने केबिन में बुला कर ?
 
उज्जवल बाबू थोड़ा परेशान होते हुए : क्या तुम्हे उनके पास जाना पड़ा था ?
 
अरुणिमा : नहीं। ये ही तो बात थी मैं उनके पास गयी थी पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कोई बात नहीं जाओ ! मुझे लगा शायद तपन ने कुछ कहा होगा उनसे पर कल शाम तपन सर ने बताया उनकी कोई बात इस बारे में नहीं हुई !  समझ में नहीं आया की उन्होंने मुझे बुलाया  थी डांटने के लिए पर , कुछ कहा नहीं !
 
उज्जवल बाबू मुस्कुराये और बोले मेरी आगे की कहानी बताऊँ ? वो छुपा गए की कल उन्होंने ही बड़े डाक्टर से उसके लिए बात कर ली थी !
 
अरुणिमा : एक मिनट रुकिए !
 
           उसने अपने हैंडबैग से नारियल के तेल की शीशी , कंघी निकाल कर टेबल पर रखी ! बेड के लीड स्क्रू को लिवर के सहारे से घुमा कर उज्जवल बाबू का सिरहाने ऊंचा किया फिर उनके सर के पीछे स्टूल रख कर सर पर  तेल की मालिश करने लगी !
 
अब बोलिए बाबा : अरुणिमा बोली !
 
        उज्जवल बाबू को कोमल कोमल अँगुलियों के माथे पर एहसास ऐसे होता था जैसे दूधमुहे बच्चे के होठो पर रूई के फोहों में दूध  रखा हो ! असीम आनदं ! असीम वैराग्य से भरे जीवन में ये भावनात्मक पल ऐसे थे जैसे बड़े से पानी के बर्तन में बूँद बूँद टपकती नील , जो धीरे धीरे पुरे पानी को अपना सा कर देती है !अनोखा समय उज्जवल बाबू के लिए बरसों बाद ! माँ और बेटी के प्यार को तरसते उज्जवल बाबू की पलकें डबडबा गयी !
 
     मेरे बेटों ने मुझ से कोई संपर्क नहीं किया ! दुर्गापुर वाले को शायद एक बेटा और एक बेटी है , देबसिस बाबू कह रहे थे ! बड़े का तो कुछ पता नहीं ! यहाँ मैं बूढा हो गया तो अपने लिए ओल्ड एज़ होम में इंतज़ाम कर लिया ! सब की सेवा भी हो जाती है और मेरी खुद की देखभाल भी करते हैं सब !
 
अरुणिमा : दुर्गापुर में कहाँ रहते थे आप बाबा ?
 
उज्जवल बाबू : स्टेशन के पास के सब्जी बाजार में !
 
अरुणिमा : आप के बेटे का नाम क्या बताया ?
 
उज्जवल : प्रभात और विनय !
 
अरुणिमा धीरे धीरे कंघी से उनके लम्बे सफ़ेद बाल सीधे कर रही थी ! कितने दिनों  बाद मौका आया था ! पत्नी के गुजरने के बाद बालों को किसी ने नहीं सवांरा !
 
उज्जवल : ये बढ़िया और लड़कों वाली चिरुनी कहाँ से ली ?
 
अरुणिमा : तपन सर की है , वो भी तो दुर्गापुर के हैं !
 
उज्जवल : क्या उन्होंने अपनी कंघी मेरे लिए दी ?
 
अरुणिमा : हाँ , मैंने ये बता कर ली उनसे !
 
तभी दरवाज़े पर डाक्टर तपन ने दस्तक दी !
 
तपन : कैसे हैं बाबा आप ?
 
उज्जवल : अच्छा हूँ ! तुम कैसे हो ?
 
तपन : सब ठीक है !
 
उज्जवल बाबू : डाक्टर जी सिस्टर अरुणिमा बता रही थी की आप भी दुर्गापुर से हैं !!
 
तपन : हाँ जी स्टेशन के पास जो सब्जी बाज़ार है ना , बस वही हमारी भी मनिहारी की दूकान है ! बहुत साल पहले मेरे  बाबा के बाबा ने शुरू किया था , अब बाबा चलाते है ! मुझे डाक्टरी पढनी थी इस लिए मैंने वो काम नहीं किया !
 
उज्जवल : क्या नाम है तुम्हारे बाबा का ?
 
तपन : जी , विनय  !
 
उज्जवल : तुम्हारे बाबा के बाबा का क्या नाम है और कोई बड़े पिता जी भी हैं तुम्हारे ?
 
तपन : जी उनका नाम तो नहीं पता पर बड़े पिता जी तो हैं मेरे , बल्कि आज उनको साथ लाया हूँ , दार्जिलिंग में रहते हैं वो ! कल ही आये थे आँखों में तकलीफ है उनके !मेरे साथ हॉस्टल में ही ठहरे हैं  !
 
उज्जवल : क्या नाम ?
 
तपन : जी , उनका नाम प्रभात है !
 
अरुणिमा : अरे तपन सर मुझे लगता है की ये उज्जवल बाबा ही तुम्हारे बाबा के बाबा हैं !
 
तपन ने उज्जवल बाबा की तरफ देखा वो नाम आँखों से हाथ में तपन की दी चिरुनी को निहार रहे थे !
 
तपन : बाबा , क्या अरुणिमा सही कहती है ?
 
उज्जवल ने अपने होठों पर ढलके आँसुंओं को भीतर करते हुए चेहरा एक तरफ कर लिया  !
 
तपन लिपट गया उज्जवल से !
 
अरुणिमा सीमाओं से बंधी टकटकी लगाये देख  रही थे दादा पोते को !
 
सालों से अघोषित तलाश आज अंतिम पड़ाव पर थी !
 
क्या डॉक्टर तपन यहाँ हैं ? किसी ने वार्ड का दरवाज़ा खटखटाया !
 
अरुणिमा ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा : उज्जवल बाबा आपके बेटे , तपन सर आपके पिता जी !
 
कई शब्द गढ़ गए , कितनी परिभाषाएँ हो गयी और कितने सम्बन्ध बिखर के फिर बंध गए दो दिनों में !
 
उज्जवल बाबा : तपन चलो घर चलते है , अरुणिमा को लाने का दिन तय करना है !
 
अरुणिमा ने चाय का प्याला  उज्जवल बाबू की तरफ बढ़ाते हुए कहा : चाय लीजिये बाबा !
 
आज भी सूरज ढल रहा था , किन्तु सन्तोष और आग्रह के साथ !
 
       बड़ी सी गाड़ी में बैठे उज्जवल बाबा ने चलने का इशारा किया ! हावड़ा ब्रिज से गुजरते हुए किसी ने उज्जवल बाबा के बड़े बालों को  देख कर पुकारा : चिरुनी लेंगे बाबू ?
 
उज्जवल दा ने एक चिरुनी खरीद ली !
 
ना लेने के बाद की तकलीफ उन्हें पता थी , एक लम्बी तकलीफ जो सब के लिए सुखद अंत नहीं लाती !
 
एक कहानी : चिरुनी ( कंघी ) !
 
~~ समाप्त ~~ 
 
 
:::: मनीष सिंह ::::   
  

Monday, May 19, 2014

एक कहानी : उधार की पूजा !!

           " लाल  कपडे में लिपटे ताम्बे के कलश में स्पर्श माँ की अस्थियों को दोनों हाथों से अपनी छाती से चिपका लेता था , जब जब संगम में तैरती उसकी नाव डगमगाती थी , वैसे ही जैसे स्कूल से घर लौटने पर वो माँ से लिपट जाता था ! " 
 
       बेटा ये कलश यहाँ रखो और तुम गंगा जी में नहा कर कपडे पहन लो तब तक हम तैयारी करते हैं तब तक परिवार के कुल गुरु भी जा जाएंगे पूजा के लिए ! - पंडित जी ने स्पर्श से कलश लगभग लेते हुए कहा !
 
स्पर्श सहम गया ! क्या ये भी मेरे पास नहीं रहेगा सोचता हुआ और गंभीर हो गया !
 
संगम में नहाते हुए और सरस्वती को तलाशता था ! कोई दो बरस पहले की तो बात थी !
 
माँ : स्पर्श रुको , मुझे आने दो !
 
स्पर्श : बड़ा हो गया हूँ मैं माँ ? मैं ठीक हूँ !
 
माँ : हाँ , लेकिन तुम्हे अंदाज़ा नहीं है , वहां फिसलन है संभल के !
 
स्पर्श : अच्छा, आइये !
 
माँ : देखो यहाँ दो रंगों का पानी साफ़ साफ़ दीखता है ! एक है गंगा और एक यमुना !
 
स्पर्श : मैंने सुना है एक और नदी हैं यहाँ इसी लिए इसे त्रिवेणी कहते हैं !
 
माँ : हाँ , उस तीसरी नदी का नाम है सरस्वती , जो क़िले के भीतर से आती हैं , अब लगभग गुप्त सी हैं !

स्पर्श : अरे माँ आप का नाम भी तो सरस्वती है , लेकिन आप तो गुप्त नहीं मेरे सामने हैं !
 
माँ : कभी हो गयी तो ?
 
स्पर्श लिपट गया अपनी माँ से इस सवाल के जवाब में !
 
पंडित जी : बेटा संभल के !
 
और स्पर्श का ध्यान टूटा ! आज दोनों सरस्वती गुप्त थी स्पर्श के लिए !
 
स्पर्श का मानस कहीं और था और शरीर संगम में पूजा के लिए तैयार हो रहा था !
 
           जनेऊ , माथे पर चन्दन , सफ़ेद धोती जो उसके ताऊ जी के बेटे ने पहनाई थी स्पर्श रेत पर अपने पंजों के निशान छोड़ते हुए पूजा के लिए परिवार के सदस्यों की तरफ बढ़ रहा था ! सब की निगाहें उसकी ही तरफ ! उसको किसी तरह की परेशानी ना हो सब इसका ध्यान रख रहे थे ! आज इतने लोग मेरे लिए , माँ तो अकेले ही सब करती थी , सब जानती थी !
 
माँ : स्पर्श पैर पीछे करो , ये मछलियाँ तुम्हे नुकसान भी कर सकती हैं !
 
मानसर झील में मछलियों को आटा खिलाते खिलाते ज़्यादा करीब चला गया था वो और मछलियों का झुण्ड उसके हाथों के पास आ गया था !
 
आज देर तक नदी में रहा स्पर्श अकेले, भय तो था अनगिनत पानी के जीवों का ,लेकिन ये करना था उसको उसी माँ के लिए !
 
तभी पुल से गुजरती हुओ रेलगाड़ी ने स्पर्श का ध्यान फिर से टूटा !
 
जल्दी करो बेटा  , स्पर्श के चाचा जी ने पुकारा !
 
स्पर्श , जी चाचा जी कहता हुआ तेज़ क़दमों से आगे बढ़ा !

           रेत पर क़दमों के निशान कुछ ज़्यादा गहरे होते जाते थे और पंजों में ठंडी रेत लिपटती जाती थी जैसे बचपन की यादें परेशान कर देती हैं कभी कभी जब अपना दूर होता है , अचानक !

गंगा , यमुना का पानी बहता जाता था ! शांत और निर्मल !

              स्पर्श ने हर मन्त्र शांति से सुना , हर वो बात जो पंडित जी ने कही धीरज से सुनी , हर कुछ सही सही किया जो उस से करने को कहा गया ! माँ की अस्थियों को ले कर संगम में बीचों बीच गया नाव परिवार के साथ और प्रवाहित किया !

            पुल से गुजरती रेल और नीचे गंगा में बहती माँ अस्थियों सवरूप , स्पर्श के माथे का चन्दन पलकों से होता हुआ होठों पर बह चला था आँखों के पानी से लिपट कर !
 
कुछ दिनों पहले ही :
 
माँ :  इस बार कहाँ से शुरू करेंगे ?

पापा ने माँ के इस सवाल पर मुस्कुराते हुए स्पर्श की तरफ इशारा किया था और कहा था : यस शेर इस बार तू फिक्स कर एल टी सी का रोड मैप !

स्पर्श : पा , इस बार साउथ से शुरू करते हैं और लास्ट में दादी के घर चलेंगे कश्मीर , मानसर लेक  होते हुए !

माँ , पा : ओके

               कन्याकुमारी और मीनाक्षी मंदिर में माँ के दर्शन , पॉण्डीचेरी में  मडुकुल विनायकम मंदिर परिसर में घुमते हांथी को जब बनाना खिलाया था तो हाथ बचा लिया था माँ ने ! श्री अरबिंदो आश्रम में सफ़ेद गुलाबी फूलों से सजी समाधी के समीप माँ को हाथ जोड़ कर देख कर स्पर्श ही झुका था !

           पूरा भारत बचपन से घूमता आ रहा था स्पर्श चप्पे चप्पे के जानकारी थी उसे ! बस फर्क था तो हर साल होने वाले अनुभवों की ! किशोरावस्था , युवावस्था दोनों के अनुभव अलग होते हैं !

           कांगड़ा से जम्मू के लिए बड़ी गाड़ी से चले थे सब ! मानसर झील से जम्मू की तरफ बढ़ रहे थे की अचानक पहाड़ टूट कर गिरने लगे और हम खाई में थे !

माँ , पा ने स्पर्श को अकेला छोड़ दिया था !

कुलगुरु किनारे पर खड़े नाव के किनारे लगने का इंतज़ार कर रहे थे !

          स्पर्श ने पहली बार देखा था उनको ! वो कश्मीर में ही रहते थे ! उनके पास कभी नहीं आये थे दिल्ली में ! जब से स्पर्श ने होश संभाला था दिल्ली में ही रहा ! परिवार के कुल के काम में कभी कश्मीर नहीं गया ! माँ नहीं ले जाती थी , डर के कारण ! वो कहती थी की कश्मीर जल रहा है उनीस सौ अठासी से , मेरे जन्म के आस पास से ही !

कुलगुरु के सब ने एक एक कर के पैर छुए !

स्पर्श ने भी !

कुलगुरु जी की निगाहें शायद किसी को तलाश रहीं थी !

ताऊ जी ने कुछ भांपते हुए कुल गुरु को एक किनारे ले जाने की असफल कोशिश करी !

कुलगुरु : प्रबोध कहाँ है ?

ताऊ जी : जी महाराज वो घर पर ही है ?

कुलगुरु : अरे , तो तर्पण किसने किया किरण और विनोद का ?

ताऊ जी : जी , स्पर्श ने !
 
कुलगुरु जैसे अचानक नाराज़ हो गए थे !
 
ये क्यों : कुलगुरु बोले !

ताऊ जी : महाराज आप  आइये मेरे साथ !

भैया ने मुझे कस के पकड़ लिया और ताई जी जैसे अजीब से अनकही आत्मग्लानि से भर गयीं और दूर तक गंगा में देखने लगी ! स्पर्श समझ गया कुछ इस घटना से भी अधिक गंभीर है !

स्पर्श : भैया , मुझे बताइये क्या हुआ !

सहमा सा स्पर्श पसीने से भीग गया था और तनाव चेहरे पर था !
 
कुलगुरु जा चुके थे , नाराज हो कर !

भईया बताइये ना : स्पर्श ने जोर दे कर पुछा अपने कपडे पहनते हुए !

सबेरे की ट्रैन थी उनकी , इलाहाबाद से !
 
कमरे में बस वो और भाई ही थे !

प्रबोध : स्पर्श आज ये तर्पण मुझे करना था तुम्हे नहीं !

स्पर्श : क्यों ? तर्पण तो बेटा करता है ना ?

प्रबोध : हाँ !

स्पर्श : तो ?

प्रबोध : मैं उनका बायलॉजिकल बेटा हूँ , तुम नहीं !
 
 
              भाई के ये शब्द सुनते ही  जैसे लाखों गैलन पानी अचानक बाँध तोड़ कर अविरल भयावह आवाज़ करता हुआ स्पर्श के कानो के पास बहने लगा हो ! रात की शांत और शीतल आवाज़ें जैसे अचानक तेज़ कर्कश में बदल गयी हों ! रेल की पटरियों पर दौड़ती रेल गाड़ी ने अचानक ब्रेक लगा दी हो और तेज़ रगड़ से निलकली चिंगारियों से सब २१ - २२ सालों का तानाबाना छलनी हो गया हो ! सारे रिश्ते बेमानी ! सब सम्बन्ध अपरिभाषित , अजनबी से !
 
स्पर्श को जैसे उन शब्दों ने निष्प्राण कर दिया हो !
 
खुद से पूरा तन सवाल पूछता था :तो कौन हूँ मैं ?
 
प्रबोध : तुम एक कश्मीरी पंडित जी के बेटे हो जो हमारे कश्मीर के घर के पडोसी थे ! जिनको देहशदगर्दों ने शहीद कर दिया था और मेरे माँ पिता जी तुम को ले कर दिल्ली आ गए थे ! मुझे ताऊ जी के पास रहने दिया था क्यों की उनको कोई संतान नहीं थी ! क्योंकी मैं बड़ा था और तुम छोटे तो मुझे ही उनके पास रहने दिया गया , तुम्हे देख  रेख की ज़्यादा ज़रुरत थी उस समय !
 
 
स्पर्श : तो आज ताऊ जी ने आपसे पूजा क्यों नहीं करवाई ?
 
प्रबोध ने स्पर्श को दोनों हाथो से अपने आगोश में ले लिया और नम आँखों से बोला  : चल तूने पुछा और मैंने तुझे बता दिया ! सब याद रखने के लिए नहीं , बस तुझे पता रहे , भूल जा सब !
 
      स्पर्श का मन कचोटता था उसको भीतर ही भीतर आत्मग्लानि से जो की उसे बार बार झकझोरती थी कहते हुए सब जीवन उधार में पला और पूजा भी उधार की रही अपनी माँ पिता जी की तो दूसरी तरफ मानस कहता था की माँ ने जो दिया था वो मेरा था , कुछ भी फ़र्क़ किये बिना !
 
ट्रेन सरकने लगी थी , स्पर्श की निगाहें स्टेशन की बेंच पर बैठे एक बच्चे के माथे का पसीना पोछती उसकी माँ पर थी और दूसरी तरफ बैठा प्रबोध अब भी सोचता था की क्या उसने सही किया था  ................ ??
 
एक कहानी : उधार की पूजा !!
 
 ~~~~~~~~~~~~~~~~ मनीष सिंह ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 

Sunday, May 11, 2014

माँ , सीपियों सरीखी !!

माँ !
संसार के,
खारे पानी में,
सीपियों सरीखी !
सह लेती है,
सब उतार चढ़ाव,
तब पनपते हैं,
आप और हम,
मोतियों से,
गर्भ में,
सीपियों के !
 
आइयें 
हम और आप,
सहेजें इनको,
संसार के पानियों में,
उनके लिए,
जो वंचित हैं,
सीपियों से !!
 
माँ - अबतक भी अपरिभाषित शब्द !!

Friday, May 9, 2014

एक कहानी : तृप्ती

        " राहुल " ने कैब से उतरते हुये ड्राईवर से किराया पुछा ! जवाब मिल : सर, कुल तीन सौ चार रुपए , आपको बिल चाहिए ? राहुल ने मुस्कुराते हुये तीन सौ पाँच रुपये उसकी तरफ बढ़ा दिए और पुणे स्टेशन के मेन एन्ट्रेंस कि तरफ़ अपना लैपटॉप क बैग सँभालते हुये चल दिया !
 
            स्टेशन पर गहमा गहमी थी ! गर्मी भी बढ़ गयी थी लेकिन सहन करने लायक ! राहुल के मन में कुछ था , आँखे किसी तो ढूंढ रही थीं !डिस्प्ले बोर्ड पर अभी उसकी ट्रैन कि कोई सूचना नहीं थी ! प्लेटफॉर्म एक पर इंदौर पुणे एक्सप्रेस ट्रेन चलने को तैयार खड़ी थी शायद इसके बाद उसकी ट्रैन लगे सोच कर वहीँ खड़ा हो कर अपनी ट्रैन कि सुचना का इंतज़ार करने लगा और निगाहें किसी और का !
 
           एक पानी की बोतल खरीदने के बहाने राहुल ने अपनी ट्रैन के बारे में दुकानदार से पुछा ! जानकारी मिल गयी कि उसकी ट्रैन प्लेटफॉर्म एक पर ही आएगी ! प्लेटफॉर्म एक पर पहुच कर इधर उधर देखा शायद वो दिख जाये जिसे कभी देखा नहीं ! जब से पुणे से दिल्ली की टिकट एजेंट ने उसके हाथ में रखी थी , वो किसी को तलाश रहा था ! दरअसल एजेंट ने तत्काल टिकिट मे दो लोगो का टिकिट किया था एक राहुल का और एक तृप्ती का ! पता नहीं कैसी , कौन होगी उधेड़बुन मे वो १/२ घंटे पहले ही स्टेशन पहुँच गया था !
 
           इंदौर दिल्ली एक्सप्रेस धीरे धीरे सरकने लगी थी ! डिस्प्ले बोर्ड पर अब राहुल की ट्रेन की सूचना आ गयी थी ! कोल्हापुर हज़रत निज़ज़मुद्दीन एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नंबर एक जाएगी , शाम ४:१० बजे ! वो प्लेटफॉर्म पर जाने वाले रास्ते पर खड़ा हो कर अपनी तलाश में लग गया ! एक दो बार लग कि शायद वो हो लेकिन कभी वो अपनी माँ , पिता के साथ थी तो कहीं अपने भाई के साथ तो कभी अपने दोस्तों के साथ , उसे तो तलाश थी तो अकेली तृप्ती की जिसका टिकट उसके साथ हुआ था !
 
तभी चाय का प्याला लिये किसी ने राहुल के कंधे पर हाथ रखते हुये पूछा : ये आने वाली गाड़ी दिल्ली जाएगी ,सर ?
 
राहुल ने पलट कर देखा और कहा : जी हाँ !
 
लड़की : थैंक्स !
 
राहुल : आपका नाम तृप्ती है ?
 
लड़की : जी नहीं मुझे प्रज्ञा कहते हैं , क्यों ?
 
राहुल सकपकाते हुये बोल : असल में तृप्ती नाम की लड़की का टिकिट मेरे साथ हुआ है और वो अभी तक आयी नहीं और ट्रैन के चलने का वक़्त हो गया है , इस लिए पूछ रहा था !
 
लड़की : ओके बाय ! हैप्पी जर्नी  कहते हुई आगे बढ़ गई !
 
राहुल अब फिर अकेला था !
 
ट्रैन प्लेटफॉर्म पर लग चुकी थी ! राहुल बहुत धीरे - धीरे कोच B1 की तरफ बढ़ा ! चिपके हुये चार्ट पर अपना नाम देख और साथ में  उसका भी देख लिया कि ठीक  प्रिन्टेड है की नहीं 15 नम्बर कि बर्थ पर , जो की था !
 
थोड़ी देर में पूरा कोच हमसफ़रों से भर गया !
 
15 नम्बर कि बर्थ पर एक २३ , २४ साल की लड़की बैठी थी ! सोबर और शांत ! हलके गुलाबी रंग के चिकनकारी के सूट और सफ़ेद सलवार पहने ! घुटनो को अपने ओर मोड़े , बाँहों को मोड़ कर अपने चेहरे को बाँहों पर टिकाये एक टक खिड़की से बाहर देखते हुए !
 
तलाश ख़त्म हुई ! ट्रैन दिल्ली की तरफ बढ़ चाय !  दोनों ने चाय खरीदी ! तृप्ती ने अलग और राहुल ने अलग ! अभी तक दोस्ती कि कोई सूरत नहीं बन सकी थी दोनो के बीच ! ट्रैन ने १० मिनट का सफर पूरा कर लिया था !
 
लाओ अपना खाली चाय का कप दे दो मैं बाहर जा रहा हूँ, फेंक दूंगा ! राहुल ने चाय पी चुकी तृप्ति से कहा !
 
नहीं मैं फेंक दूँगी : तृप्ती संकोच से मुस्कुराते हुये बोली !
 
राहुल : अरे , लाओ भी !
 
राहुल के इस आदेशात्मक निवेदन पर तृप्ती ने ख़ाली कप उसके हाथों पर रख दिया !
 
टी  टी को एक ही आय कार्ड पर विश्वास हो गया ! अब तक सब ठीक था दोनो के लिए !
 
डिनर साथ ही किया दोनो ने ! 
 
ट्रेन अपनी रफ़्तार पर थी ! गति का एहसास ए सी कोच मे ठीक से हो जाता है ! हिचकोले ले कर चलती ट्रेन में राहुल ने तृप्ती के लिए बिस्तर लगा दिया था और खुद भी मिड्डिल बर्थ पर लेट गया था ! लेटते हि नींद आगयी थी उसे ! ठंडी हवा और दिन भर की थकान के बाद नये दोस्त का साथ उसे संतुष्ट कर रहा था !
 
ट्रेन के रुकने पर अचानक राहुल की नींद खुली और ध्यान तृप्ती कि तरफ गया वो किसी से मोबाईल पर  बात कर रही थी ! गला रूँधा हुआ , पलकें भीगी हुई , माथे पर शिकन परेशान सी लग रही थी वो ! वो उसे देखता रहा ! पूरी बात के दौरान उसने उसे नहीं टोका ! लगभग 15 मिनट के बाद जब फ़ोन खतम हुआ तो उसने पुछा !
 
क्या हुआ ? कुछ परेशानी है ?
 
तृप्ती : हाँ , मेरी शादी करना चाहते हैं सब !
 
राहुल : तो , इसमें क्या परेशानी है ! शादी तो सबकी होती है ! तृप्ती कि भी होगी ही !
 
तृप्ती : परेशानी ये नहीं की शादी है ! परेशानी ये है की मैंने अभी अभी जॉब शुरु कि है पढ़ाई के बाद और मैं चाहती हूँ की कम से कम ३ साल के बाद मेरी शादी हो और घर वाले जहाँ कहेंगे वही कर लूंगी !
 
राहुल : ३ साल बाद शादी करने का सही कारण क्या है ?
 
तृप्ती : बताया ना , अभी अभी इनफ़ोसिस मे जॉब शुरु कि है ! अब तक पढ़ती रही अब कुछ समय तो खुद को साबित करू फिर जहाँ वो कहेंगे मै शादी कर लूंगी !
 
राहुल : और अपने घर वालों के नज़रिये से देखो , इन ३ सालों में तुम्हे इनफ़ोसिस मे कोई और पसन्द आ गया तो ?
 
तृप्ति : तो क्या वो अगर उन्हें नहीं पसन्द होगा तो नहीं करूंगी वैसे तो ऐसा कुछ होगा नहीं !
 
राहुल : हम्म  !!
 
तृप्ती : तुम मेरे पेरेन्ट्स बात करो प्लीज़ , उनको समझाओ !!

          तीन घंटो में इतना विशवास की जीवन के इतने बड़े निर्णय में तृप्ति को राहुल की मदद लेने में हिचक नहीं थी ! सम्भावनाये हमारे इर्द गिर्द बिखरी पड़ी होती हैं बस ज़रुरत होती है तो ललक की और किसी सहायक की जो एक झटके में आपके जीवन में परिवर्तन ला सके !

        ये को बात करो , मेरा छोटा भाई है फोन पर ! तृप्ति ने अपना मोबाइल राहुल की तरफ बढ़ाते हुए निवेदन किया ! राहुल ने झिझकते हुए मोबाइल पकड़ा और बात शुरू की !

राहुल : हेलो , मैं राहुल बोल रहा हूँ !

दूसरी तरफ से : जी ? मैंने आपको पहचाना नहीं ! दीदी के फोन से आप कैसे बात कर रहे हैं ? दीदी कहाँ हैं ? कुछ हुआ है क्या उनको ? वो खुद बात क्यों नहीं करती ?

अरे नहीं , कहते हुए राहुल ने इशारे से तृप्ति से भाई का नाम पुछा और तृप्ती ने विवेक बताया !

राहुल : अरे विवेक मैं तुहारी दीदी का दोस्त हूँ और उन्हें कुछ नहीं हुआ है , बल्कि उन्होंने ही मुझे तुमसे बात करने के लिए कहा है और अगर तुम मेरी बात सुनो और समझो तो तुम अपनी दीदी को एक मुसीबत से बचा सकते हो !

विवेक : हाँ , कहिये क्या बात है ?

राहुल : तुम किस क्लास में पढ़ते हो पहले ये बताओ !

विवेक : 12th में !

राहुल :  अच्छा विवेक तुम्हे ये कहा जाये की 12th के बाद तुम्हे आगे पढाई नहीं करनी और अमेरिका में अच्छी जॉब करनी है तो तुम्हारा रिएक्शन क्या होगा ?

विवेक : ये कैसा सवाल है ?

आस पास की बर्थ पर ऊँघ रहे लोगो ने भी राहुल की तरफ कुछ उत्सुकता से देखा !

राहुल : हाँ ऐसा ही सवाल तुम्हारे माँ और बाबा ने तृप्ति के सामने रखा है !

विवेक : शादी का ?

राहुल : हाँ !

विवेक : तो इसमें क्या बुराई है ? सब की शादी होती है , दीदी की भी होगी !

राहुल : हाँ इसमें कोई बुराई नहीं बस वो ये चाहती है की उसकी शादी तीन साल के बाद हो ! अभी अभी अच्छी पढाई के बाद अच्छी नौकरी लगी है ! कुछ ये टाईम भी एन्जॉय कर ले और खुद को साबित कर सके फिर शादी तो होनी ही है !

विवेक : ओह्ह , तो आपको ये बात माँ और बाबा से करनी चाहिए ! शादी का निर्णय उन्होंने लिया है और इस पर आगे भी विचार वो ही करेंगे!

राहुल : हाँ दोस्त , अगर तृप्ति कहेगी तो मैं उनसे भी बात करूंगा लेकिन तुम बताओ की तुम अपनी दीदी के साथ हो ?

विवेक : हाँ , मैं दीदी के साथ हूँ ! अब मेरी दीदी से बात करवाइये !

तृप्ती धीरे धीरे बात सुनते हुए राहुल के कन्धों पर झुक गयी थी और सब सुन रही थी !

राहुल : लो, वो तुमसे बात करना चाहता है !

तृप्ती ने झिझकते हुए फ़ोन पकड़ा और अपने बालों को कान के पीछे करते हुए हेलो बोला !

राहुल ने अपने काम कर दिया था ! पहली जिम्मेदारी निभा दी थी ! विशवास के गर्भ से उत्पन्न हुई निवेदन भरी जिज्ञासा को उचित भविष्य की आस देने की जिम्मेदारी !

ट्रेन एक अँधेरे स्टेशन पर रुकी थी ! घुप्प अँधेरा पसरा था ! राहुल और तृप्ती दरवाज़े पर खड़े थे तो कोच अटेंडेंट ने उन्हें भीतर आने का इशारा किया रु दरवाज़ा ये कहते हुए बंद कर दिया की साब आगे घाट का रास्ता है और यहाँ डर है !

विवेक : हेलो दीदी , कैसी हैं आप ?

तृप्ती : मैं ठीक हूँ ! तू कैसा है ! बस माँ के अर्जेंट बुलावे पर तत्काल की टिकट ले कर आ रही हूँ !

विवेक : आइये आइये और अपने साथ उन दोस्त को भी लाइयेगा ! वैसे मैं हूँ तो बहुत छोटा आपसे लेकिन कुछ कुछ समझ रहा हूँ और अपने लेवल पर कोशिश करूंगा की आप के मन की बात हो सके !

तृप्ती : अच्छा सब समझ गया तू ?

विवेक : नहीं सब तो नहीं बस ये समझा की आप अभी शादी के लिए तैयार नहीं हैं , कुछ वक़्त चाहती हैं !

तृप्ति : ठीक है मेरे भाई , अब ज़रा माँ से बात करवा !

विवेक : माँ और बाबा सो गए हैं ! आप लोग ट्रैन में हैं इस लिए टाइम का अंदाज़ा नहीं है  , रात के 12 बजने को हैं !

तृप्ति : अरे हाँ , ठीक है कल सुबह 7 बजे कॉल करूंगी , फिर माँ से बात करेंगे !

विवेक : दीदी आपको याद है जब मैं 8th में था और दासगुप्ता अंकल की स्कूटी से जब मैंने टक्कर मारी थी तो अपने क्या किया था !

तृप्ती : हाँ याद है , अब ठीक चला लेता है की अब भी इधर उधर हो जाती है ?

विवेक : दीदी उनके एक बेटी है सुलोचना आजकल यही है , 8th के बाद वो यही आगयी थी बोर्डिंग स्कूल से और अब मैं उसको ले कर आता जाता हूँ !

तृप्ती : ओह्ह , मैं तो भूल गयी थी की तू अब 12th क्लास के टीनएजर है !

विवेक : तो फिर आपका ये भाई आपके साथ था और रहेगा ! अब आप सोइये और अपने उन दोस्त का नाम बता कर उनको फ़ोन दीजिये !

तृप्ति : उनका नाम राहुल है उन्होंने खुद बताया तो था तुम्हे ! चलो मेरी good night  ! अब राहुल से बात करो !

राहुल : मुझे राहुल कहते हैं दोस्त !

विवेक : ठीक है राहुल जी , शुभ रात्रि , कल फिर बात होगी !

        तृप्ती वाशरूम से निकली और अपनी बर्थ पर लेट गयी और राहुल अपनी बर्थ पर ! दोनों सोने की असफल कोशिश करने लगे ! दोनों को लग रहा था की कुछ सफलता हाथ लगी ! दोनों अपनी अपनी अधूरी सफलता पर खुश थे ! गहरी साँसों से दोनों ने एक दूसरे को फॉर्मल शुभ रात्रि कहा फिर पलकों में कल की योजनाओ के बीज बो दिए जिनके अंकुर सुबह 7 बजे फूटने वाले थे !

तुम चाय अभी लगी या फ्रेश होने के बाद ? राहुल ने अधिकार से तृप्ती से पुछा !

तृप्ति : तुम ले कर रखो मैं आती हूँ वाशरूम से !

अगल बगल के साथी रात भर में बदल गए थे ! कुछ बर्थ खाली थीं तो कुछ पर साथी बदल चुके थे !

राहुल तृप्ति की तरफ चाय का प्याला बढ़ते हुए बोला : डिप चाय में कड़कपन नहीं होता इस लिए मैंने एक ही कप में दो टी बैग डलवा लिए हैं , लो पियो !

तृप्ती की अँगुलियों का स्पर्श राहुल की हथेलियों से हो गया ! असीम अपनत्व का संचार हो चूका था दो आत्माओं में !

साइडलोअर सीट के बड़े से शीशे से उगता हुआ सूरज देख रही थी तृप्ती , सम्भावनाओ को मूर्तरूप देने के प्रयास में !

राहुल : मैं अभी वाशरूम से आता हूँ !

तृप्ती ने अपने हैंडबैग से अपना फेस वाश निकल कर राहुल की तरफ बढ़ा दिया और कहा : लो इस से साफ़ करना इतना ऑयली ऑयली हो गया है रात भर में !

अपनत्व भरा प्रतिवेदन स्वीकार किया राहुल ने !

ट्रैन के नए साथी इन दोनों को कुछ और समझ रहे थे जो हम जानते हैं ,वो तो बिलकुल ही नही !

तृप्ती : हेलो माँ , कैसी हो ?

माँ : हेलो बेटा , कहाँ तक पहुंची ?

तृप्ती : अभी झांसी पहुंच रही हूँ और फिर ५ , ६ घंटों में दिल्ली !

माँ : ठीक है , तेरे बाबा आयंगे तुझे लेने के लिए स्टेशन पर !

तभी पीछे से विवेक बोला : नहीं माँ मैं जा रहा हूँ दीदी को लेने , बाबा शाम की फ्लाइट से अर्जेंट मुंबई जा रहे हैं !

तृप्ति : माँ मेरे एक दोस्त तुमसे बात करेंगे , उनका नाम राहुल है !

माँ : हाँ ज़रूर बेटा बात करवाओ ! वैसे इनका ज़िक्र तुमने पहले कभी नहीं किया !

माँ की इस बात का जवाब तृप्ति देती की इस से पहले वो फ़ोन राहुल को दे चुकी थी !

राहुल : नमस्ते माँ जी , कैसी हैं आप ?

माँ : नमस्ते बेटा ! मैं ठीक हूँ तुम दोनों कैसे हो ! कुछ नाश्ता पानी हुआ तुम लोगों का ?

राहुल : जी , अभी चाय और बिस्किट खाए हैं , थोड़ी देर में नाश्ता करेंगे !

माँ : हाँ अच्छी बात , सफर में खाते पीते रहना चाहिए !

राहुल : हाँ माँ जी खाते पीते तो रहना चाहिए लेकिन समय आने पर ही तो !

माँ : हाँ एकदम सही बात ! समय पर खाया पिया पचता है ! असमय खाया पिया तबियत खराब कर देता है !

राहुल : माँ एक बात कहूँ ?

माँ : हाँ , बोलो बेटा !

तृप्ती लगभग राहुल के कन्धों पर अपना सर टिका कर सब सुन रही थी !

राहुल : माँ , अगर तृप्ति की शादी ३ साल के लिए टल जाती तो उसके लिए अच्छा होता ! उसको लगता है की ये सही समय नहीं है उसकी शादी का !

माँ : ओह्ह्, तो ये बात है ! तुम्हे भी लगता है की ये सही समय नहीं है उसकी शादी का ? २३ , २४ साल की हो गयी, पढ़ लिख ली , अच्छी नौकरी मिल गयी और अब किस चीज़ का इंतज़ार ?

राहुल : नहीं माँ  और बाबा से ज़यादा भला और कौन सोच सकता है बच्चों का लेकिन उस को बस नौकरी में अच्छी पोजीशन चाहिए , खुद को साबित करने का टाइम चाहिए जो शादी के बाद नहीं मिलेगा ! बस ३ साल और रुक जाते तो अच्छा होता !

माँ : फिर क्या होगा ?

राहुल : उसको संतुष्टि मिलेगी की जो उसने पढ़ा उसका उसने लाभ लिया !

माँ : और परिवार के मान और संतुष्टि का क्या ?

राहुल : फ़िक्र है ना उसकी भी उसको , ३ साल बाद करेगी ना शादी जहाँ आप कहेंगे वहां पर ही !

माँ : नौकरी तो वो शादी के बाद भी कर सकती है !

राहुल : माँ और बाबा के अंचल में बच्चा जितना स्वछंद और निर्भय होता है क्या वो कहीं और हो सकता है माजी ?

माँ को इस के आगे और कोई प्रश्न नहीं सूझ रहा था ! निरुत्तर हो चुकी थी वो !

राहुल ने पुछा : माँ आप लाइन पर हैं ?

माँ ने रूंधे गले से कहा : हाँ , तृप्ती को फोन दो !

राहुल ने तृप्ति को फोन दिया और उलटे हाथ से थम से जीत का इशारा किया ! तृप्ति ने एक हाथ से फोन और एक आठ से राहुल का हाथ पकड़ लिया और बर्थ पर बैठते हुए बोली :

हेलो माँ : कैसी हो ?

माँ : अपने बाबा से राहुल बात करा देना , वैसे मैं तेरी बात समझ गयी हूँ बेटा, हमारे निर्णय पर इतना परेशान क्यों हुई तू रे , एक बार बोला होता तो इतना आगे बात नहीं बढ़ाते है ! खेर , राहुल की बात ज़रूर करवा देना अपने बाबा से , वो मुंबई जाने वाले है आज !

फोन विवेक ने ले लिया था : दीदी शाम को मैं आ रहा हूँ आपको लेने ! बाबा अभी ऑफिस के लिए तय्यार हो रहे हैं ! आप बात ज़रूर कर लेना !

तृप्ति : ओके ठीक है ! और तो स्कूटी धीरे चलना !

विवेक : ठीक है दीदी , वैसे अब मैं स्कूटी नहीं चलता ! शाम को सरप्राइज़ दूंगा !

और फोन कट गया था !

राहुल ने नाश्ते में पोहा और कॉफी ऑर्डर किये थे ! दोनों ने नाश्ता किया और लेट गए अपनी अपनी बर्थ पर अपनी अपनी सफलताओं की सीढ़ियों को गिनते हुए , की अभी कितनी बाकि है ! दोनों की ट्रैन एक थी लेकिन मंजिल अलग अलग एक ही रह पर !

झाँसी में साँची के मीठे दूध के दो पैकेट लिए राहुल ने ! तृप्ती को मीठा पसंद नहीं था फिर भी राहुल का एक अनाम अधिकार हो चला था उस पर की उसके कथ्य को निर्विरोध स्वीकार करती जाती थी , सासम्मान !

तृप्ती : नमस्ते बाबा ! कैसे हैं ?

बाबा : मैं ठीक हूँ बेटा , सॉरी अर्जेंट काम से मुंबई आ गया , नहीं तो तुझे लेने मैं ही आने वाला था !

तृप्ति : हाँ बाबा , माँ और विवेक से बात हुई मेरी अभी ! बाबा मेरे एक दोस्त आपसे बात करेंगे !

बाबा : बिलकुल करवाओ बेटा !

राहुल के हाथो में मोबाइल दे चुकी थी तृप्ती और पूरी झुक गयी थी राहुल की छाती पर कशमश में की बाबा का रिएक्शन क्या होगा और राहुल ने अपने उलटे हाथों से उसको सहारा दिया था जैसे गमले के फैलते पौधों के समेट दिया जाता है एक सहारे से की बिखराव ना हो !

राहुल : नमस्ते अंकल जी !

बाबा : नमस्ते बेटा !

राहुल : कैसे हैं आप ?

बाबा : मैं एकदम ठीक हूँ ! आप तृप्ति के साथ काम करते हैं ?

राहुल : नहीं बाबा मैं तो बस इस ट्रैन में इनका दोस्त बना हूँ और दोस्ती इतनी हो गयी की इन्होने आपसे बात करवा दी !

बाबा : हाँ तो क्या हुआ , दोस्ती की कोई सीमा , उम्र नहीं होती !

राहुल : एक दम सही कहा आपने अंकल किन्तु आप ही बताइये दोस्ती और उसके संबंधों में परिवर्तिति होने के लिए समय दिया जाना चाहिए की नहीं ?

बाबा : हाँ वो तो है , किसी भी सम्बन्ध को बनाने के लिए समय दिया जाना ज़रूरी है और जो सम्बन्ध जल्दीबाजी में बनते हैं उनकी सीमाये काम और लचीली होती हैं जो नुक्सानदायक है !

राहुल : बाबा तृप्ति के तरफ से आप से एक रिक्वेस्ट करना चाहता था !

बाबा : हाँ कहो ?

राहुल : क्या तृप्ति की शादी की डेट ३ साल आगे नहीं बढ़ सकती ?

बाबा : क्यों तृप्ति इस रिश्ते से खुश नहीं है ?

राहुल : इस समय हो रिश्ता चाहती ही नहीं है ! ३ साल का समय चाहती है और उसके बाद परिवार जहाँ कहेगा वह शादी कर लेगी !

बाबा : ये बात तो वो खुद भी कह सकती थी मुझे से !

राहुल : हाँ बाबा मैंने बोला था उसको  की वो सीधे सीधे बात करे आप से लेकिन सोबर बच्ची है ना इस लिए रेस्पेक्ट में ये सब नहीं कर सकी बस लक्कीली मैं साथ था तो मेरे थ्रू उसके अपनी बाद रख दी आपके सामने ! आपने सब ने उसकी हर ज़रुरत का ख्याल रखा ! पढ़ाया और अच्छी नौकरी के लिए पुणे जाने की इज़ाज़त दी फिर शादी के सवाल पर तो आपका अधिकार है लेकिन वो चाहती है की शादी ३ साल बाद हो अभी नहीं ! २६ की उम्र के बाद !

राहुल बोलता जा रहा था और बाबा की आवाज़ नहीं आ रही थी !

राहुल : बाबा आप सुन रहे हो ना ?

बाबा : हां , मैं सब सुन रहा हूँ !

राहुल : तो आप अपनी तृप्ति का निवेदन मानेगे ?

बाबा : अपनी गुड़िया की ख़ुशी के लिए सब किया है तो ये भी मानूंगा , बस ज़रा उसके भाई और माँ राय  कर लू !

राहुल ने बिना देरी लगाये उत्तर दिया , उनसे बात हो गयी है सब तय्यार हैं बस आप की मंजूरी चाहिए !

बाबा : ठीक है तो ये तय रहा की जब ये चाहेगी और जहाँ चाहेगी तब उसकी शादी हम करंगे !

राहुल ने धन्यवाद दिया और अपने से लगभग लिपटी हुई तृप्ति को माथे पर चूम लिया !

अपनी सफलता पर दोनों खुश थी ! एक सफलता निश्चित थी तो दूसरी अभी हमारे दिमाग़ में आकार ले रही थी ! की क्या होगा !

ट्रैन निजामुद्दीन स्टेशन पर लग रही थी !

राहुल : ओके बाय , काल करना !

तृप्ति : अरे , विवेक से तो मिलते जाओ !

राहुल : नहीं मेरी बस निकल जाएगी , हम पहले ही लेट हो चुके हैं !

तृप्ति ने राहुल से हाथ मिलाया और अपने अगले सफर पर चल दिए , लाखों उमीदें पाले !

                  !! करीब दो साल बाद !!

राहुल के मोबाइल पर अननोन नंबर से कॉल आई ! रात के कुछ १० बजे होगे ! अपना अंतिम बुलेटिन पढ़ कर चलने की तैयारी में था वो !

राहुल : हेलो जी , कौन बोल रहाहै ?

दूसरी तरफ से : राहुल बेटा मैं तुम्हारी दोस्त तृप्ति का बाबा बोल रहा हूँ !

राहुल : ओह्ह बाबा , कहाँ हैं आप लोग  ? दो साल से कुछ खबर नहीं ! जो नंबर थे सब पर काल किया पर किसी को आप के बारे में खबर नहीं ! खैर , तृप्ति कैसी है ? कहाँ है ? जॉब कैसी चल रही है उसकी ? शादी कब है ? उसका नंबर तो चालू है पर २ साल में एक बार भी उसने मेरी काल नहीं ली और न ही काल बैक किया !

बाबा : बेटा क्या मैं तुमसे अभी मिल सकता हूँ ?

राहुल : हाँ , एड्रेस बोलिए मैं आ जाता हूँ !

राहुल ने डोरबेल बजाई , दरवाज़ा तृप्ति ने खोला ! सुहागन के रूप में !

राहुल : अरे तेरी शादी कब हुई ? बुलाना तो चाइये था ना भाई !

बाबा ने बात संभाली , अंदर आओ बेटा !

       बेटा उस दिन जब ये घर आई तो मैं तो मुंबई में था इसके ताऊ जी ने लड़के वालों को घर पर बुला रखा था और हम पता भी नहीं ! फिर उनके सामने ना तो इसकी माँ और न ही ये खुद माना  कर सकी और उसी दिन इसकी सगाई हो गयी  ! १ महीने बाद शादी भी ! शादी के एक हफ्ते बाद लड़का अमेरिका चला गया और अब वो लोग कहते हैं की ५  साल का प्रोजेक्ट है तब ही वापस आएगा और इसको वहां बुला भी नहीं सकता ! अब तृप्ति के लिए तो  वो तो घर जेल है ! ससुराल वालो बात करी तो वो कहते हैं की आप तलाक़ ले कर इसकी दूसरी शादी करा लो !

तुम्ही सलाह दो की अब हम क्या करें ?

राहुल : तृप्ति क्या चाहती है ?

तृप्ति : जब जो चाहती थी वो नहीं हुआ तो अब क्या चाहूंगी ?

राहुल : तुम मुझ से शादी करेगी ? मैं वादा करता हूँ की तुझे लिए बिना कभी अमरीका नहीं जाऊंगा !

विवेक ने इतना सुना और राहुल से लिपट गया तृप्ति की आँखे छलक आइ थीं ! बाबा और माँ एक दूसरे को देखते जाते थे !

दो साल पहले अगर ये ही प्रयास किया होता तो तृप्तता आज स्वयं तृप्त होती ! किन्तु ये सत्य है सम्बन्धो में परिवर्तन के लिए दोस्ती को समय दिया जाना ज़रूर चाहिए और ज़रूरी है की भवनाओं का सम्मान हो उचित समय पर !

एक कहानी : तृप्ती

                                 ~~~~   समाप्त ~~~~