Thursday, April 3, 2014

एक कहानी : बॉम्बे कुल्फी !!

       "राजधानी एक्सप्रेस कोटा स्टेशन के प्लेटफॉर्म से धीरे-धीरे सरकने लगी थी ! अटेंडेट हाथों में आइस्क्रीम के कार्टन लिए बारी बारी से लकड़ी कि चम्मचों के साथ पूछ पूछ कर यात्रियों कि पसंद के फलेवर सर्व कर रहे थे ! "

बी6 कि साइड लोअर बर्थ पर बैठे आलोक से अटेंडंट ने उसकी पसन्द पूछी ? 

सर , आपके लिए कौन सी रखूँ ? 

आलोक लगभग कॉप सा गया ,अंतस कि उधेड़-बुन को जैसे बाहरी विराम मिले हों ! 

जैसे मंदिर में जलते दिये कि लौ अचानक आये हवा के झोंके से काँप उठती है !

अटेंडेंट : सर , आपका डिनर तो ठंडा हो चुका  है , लाइए में दूसरा ला देता हूँ !

आलोक ने मूक सहमति दी !

अटेंडेंट ने दूसरी गरम थाली ला कर आलोक के सामने रख दी और कहा :

सर , डिनर कीजिये मैं आइस्क्रीम सर्व कर के आता हूँ ! आप का कौन सा फलेवर रहेगा ? 

आलोक ने अनमने मन से कहा : कोई भी दे दो !

अंकल , पिंक वाली लीजिये बहुत अच्छी है ! सामने कि बर्थ पर बैठे परिवार कि बच्ची ने अपनी निष्काम राय दी !

          आलोक के विचलित और अधीर मन कि कम्पन को जैसे बच्ची कि आवाज़ से दो ठंडी हथेलियों का सहारा मिला हो ! उसने अपने दोनों हाथ फैला दिए बच्ची कि तरफ और बच्ची के रूप में असीम आनंद आलोक के गले से लिपट गया , बिना देर किये !

         किसी को नहीं पता , क्यों और कैसे ये रिश्ते बन जाते है सफ़र में , और क्यों और कैसे रिश्ते दरक भी जाते है अत्याधिक आशाओं के ताप से शायद , ज़िन्दगी के इस सफ़र में ही  !

          डबडबाई आँखों से आलोक ने आइस्क्रीम के कप को अपनी हथेलियों में रख लिया और बच्ची गौरैया सी चहकते हुए उसमे लकड़ी कि चम्मच डूबोने लगी ! आलोक भीतर तक तृप्त होता जा रहा था स्नेह और अपनत्व धारा से ! सालों हो गए थे अपने बेटे को गोद में उठाये अलोक को , अब तो गोद लायक नहीं होगा , उसकी अँगुली पकड़े भी बरसों बीते !

" दिशा " , अंकल को डिनर कर लेने दो , फिर चले जाना उनके पास ! बच्ची के पिता ने बच्ची से आग्रह किया !

दिशा  ठीक है कहते हुए अपनी बर्थ पर आ गयी !

आलोक ने डिनर किया और नाईट सूट ले कर टॉयलेट कि तरफ बढ़ा तो किसी ने आवाज़ लगाई :

" तुम कबीर ही होना ? "

आलोक अचंभित था अपने बचपन के नाम को सुन कर जिसे उसने कब का भुला दिया था माँ के जाने के बाद  !

हाँ , तुम कौन ? आलोक ने पुछा !

        कोच के भीतर रौशनी कम हो चली थी ! लोग ऊंघने लगे थे ! कुछ ने परदे भी सरका लिए थे जिस से रौशनी और कम हो जाती थी , चेहरे साफ़ साफ़ नहीं दिखते थे !

आलोक ने थोडा झुकते हुए उस आवाज़ वाली बर्थ कि तरफ हो कर फिर से पुछा : कौन हो तुम ?

मुझे साक़िब  कहते हैं कबीर साहब : आवाज़ लगाने वाले शख्स ने उठते हुए जवाब दिया !

आलोक के मुँह से कुछ भी नहीं निकल रहा था !

         मानो शब्द रास्ता भटक गए हों और ज़ुबान वाक्य बनाने के लिए दिमाग से गुहार लगा रही हो और आँखे सब कुछ देख कर इधर उधर ताक रही हो जैसे खुद से निगाहे चुरा लेना चाहती हो कि ऐसा भी हो सकता है, भला !

सम्भलते हुए आलोक बोला : अरे साक़िब आज मिले हो दोस्त ! कितना ढूँढा तुम्हे ! वो उधार कि कुल्फ़ी  याद है कि नहीं ?

साक़िब ने आलोक को बैठने को कहा ! दो पुराने दोस्त सालों बाद मिले थे !

आलोक ने साक़िब से दरवाज़े के पास चलने को कहा : भाई लोग सो रहे हैं !

साक़िब ने स्लीपर पहनते हुए चलने का इशारा किया !

साक़िब : क्या, कहाँ , कब से हो ?

आलोक : मुम्बई में एक बड़ी कंपनी में बड़ा अधिकारी हूँ !

साक़िब : 3rd  ए सी से क्यों ?

आलोक : कहीं नहीं मिला तो इस में ही आना पड़ा ,अमूमन ऐसे नहीं आता ! मुझे ट्रेन में चलना पसंद नहीं है !

सुनते ही , साक़िब ने अपने हाथों में लिया छोटा पेकेट धीरे से पीछे छुपाने कि कोशिश करी !

आलोक :  क्या छुपा रहे हो ?

साक़िब : कुछ नहीं , तुम्हे पसंद नहीं आएगा !

लेकिन ये है क्या कहते हुए आलोक ने साक़िब से ज़बरदस्ती पेकेट छीन लिया !

            छोटी चाय कि पत्ती कि खाली पोलिथीन में बंधे घर के बने कुछ नमकपारे और मठरी थी उस पेकेट में जिसे साक़िब कि पत्नी ने सफ़र के लिए दिया था साक़िब को और बड़े उत्साह से साक़िब ने सोचा था कि बरसों बाद मिले अपने बचपन के दोस्त को घर का पका कुछ खिलाएगा लेकिन उसके एक कथन से कि ट्रैन में  चलना उसको पसंद नहीं , से हिम्मत नहीं पड़ी और छुपाने कि कोशिश कर के भी नहीं छुपा सका !

आलोक  ने मठरी का एक टुकड़ा चखते हुए तारीफ में कहा : भाभी जी तो बहुत अच्छा पकाती है ! तभी साक़िब के फ़ोन कि घंटी बजी और बंद हो गयी !

आलोक : साक़िब सुन लो किसी कि मिस कॉल है !

साक़िब : हाँ वो वाइफ कि ही होगी , कर लूँगा बात अभी तुझ से तो मन भर लूं , ले तू नमकपारे खा !

इस बीच एक बार फिर घंटी बजी और बंद हो गयी !

इस बार आलोक ने साक़िब से कुछ कहा नहीं बस देखा !

साक़िब ने अपने फ़ोन में देखा दोनों बार उसके घर से ही फ़ोन था ! उसने कॉल बेक किया !

आपने डिनर किया पापा ? साक़िब के बेटे ने दूसरी तरफ से पुछा !

साक़िब के चेहरे पर खीची तनाव कि रेखाये अचानक ग़ायब हो चुकी थीं जो बार बार फ़ोन कि घंटी के बजने से बनी थीं आलोक से सामने ! घर के सब लोगो से बारी बरी से बात करते करते साक़िब आलोक को भूल चूका था !

          ट्रेन धीरे धीरे नागदा स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर लग रही थी ! राजधानी के आने से कोई सामान बेचने वाले भी आस पास नहीं आते , क्यों ट्रेन से सफ़र करने वालो ने न चाह कर भी अद्रश्य दूरी जो बना ली होती है , कूलीन होने  और बन जाने के बीच !

साक़िब ने आलोक कि तरफ देखा !

वो एकटक साक़िब के चहरे पर आते ख़ुशी के भाव और सन्तुष्टि से जीवन का आनंद लेता दिख रहा था !

ट्रेन प्लेटफॉर्म से सरक रही थी ! साक़िब ने अटेंडेंट से दो आइसक्रीम मांगी !

सर फलेवर तो सिर्फ एक ही है दोनों एक सी ही दे दूं ? अटेंडेंट ने झिझकते हुए कहा !

हाँ हाँ दो कोई भी दो : आलोक बोला !

आलोक ने साक़िब से पुछा : तुम क्या करते हो ?

साक़िब : एक पक्की नौकरी कि तलाश में हूँ ! अपने गाव से आई टी आई किया था !  गाव में ही एक दूकान पर काम करता रहा ! अब शहर में एक कंपनी के ऑथोरीज़ेड सर्विस सेंटर पर कॉन्ट्रैक्ट पर काम करता हूँ ! जहाँ भी काम होता है कंपनी भेजती है ! अभी बरोड़ा जा रहा हूँ ! कंपनी ने टिकट दिया तो राजधानी का सफ़र नसीब हुआ वर्ना कहाँ ये सब मेरे बूते में है ! दो बच्चे है और बीवी , कुछ ना कुछ कर के महीना चला लेता हूँ ! बच्चे पढ़ रहे है ! बस अपनी तो ये ही है ! सुबह निकला तो शाम को बच्चो के चेहरे देख कर सब भूल जाता हूँ !

ट्रेन रतलाम स्टेशन पर लग रही थी !

आलोक : आ चल एक एक कुल्फी खाते हैं ! यहाँ का स्टॉपेज ज़यादा है , मुझे पता है !

दोनों रतलाम स्टेशन पर आधी रात के वक़्त कुल्फी खा रहे थे और खो गए पुरानी यादों में ! 

       क़बीर इतनी दोपहर में कहाँ जा रहे हो ? सात आठ साल के कबीर से उसकी माँ ने दरवाज़े से बहार निकलते हुए पुकारा !

       कबीर बचपन में गर्मियों कि छुट्टियों में अपनी नानी के घर जाया करता था ! वहीँ साक़िब उसका दोस्त हुआ ! दोपहर में धुल उड़ाती लू और नीम के पेड़ के नीचे " बॉम्बे कुल्फी " के नाम से गाव का ही एक लड़का अपनी जादुई पेटी को ठेले पर  लिए गॉव भर में घूम घूम कर कुल्फी बेचता था ! तेज़ धुप में कुल्फी खाते दोस्त जीवन के उतार चढ़ाव से अनजान धूल भरी पगडंडियों से खेत खेत घूम आते थे ! समय बीता , कबीर का गाव आना कम होता गया और शहर के बड़े स्कूल में दाखिले के वक़्त कबीर आलोक हो गया और साक़िब गाव के ही आई टी आई में दाखिल !

आलोक : तू मेरे साथ चल , दिल्ली !

साक़िब : कहाँ जा सकूंगा ! खैर घर पर कौन कोन है तेरे ?

आलोक : मेरे घर पर मुझे कोई मठरी और नमकपारे बना कर देने वाला नहीं है ! कोई नहीं है जो मेरे रात के खाने कि खबर ले ! कोई नहीं है जो मुझे से रात कि सलामती कि दुआ ले या दे ! दरअसल में किसी घर में रहता ही नहीं हूँ ! मैं तो ईंट पत्थरों के मकान में रहता हूँ ! कभी घर था ये भी पर बीवी बच्चो के चले जाने के बाद अब नहीं है !  

साक़िब हैरत से सब सुन और देख रहा था ! दोनों ट्रेन के सरकने के साथ उस पर चढ़ गए ! ट्रेन अपनी पूरी रफ़्तार पर थी और आलोक अभी शुरुआत भी नहीं कर सका था जीवन के सफ़र कि , ऐसा साक़िब समझ रहा था !!

ट्रेन बरोडा स्टेशन पर खड़ी थी !

साक़िब ने झिझकते हुए आलोक से कहा : कबीर अगर तू मेरे साथ मेरे घर चलता तो अच्छा था !

कबीर को जैसे ऐसे ही अनुरोध कि आशा थी !

अगले दिन कि रात को कबीर कि गोद में बैठा साक़िब का बेटा डिनर करते हुए केह रहा था :  चाचा आज खाने के बाद आइसक्रीम खाने चलेंगे , चौराहे पर " बॉम्बे कुल्फी " वाले के पास !

साक़िब : यहाँ भी एक उसी नाम का कुल्फी वाला है , खूब भीड़ होती है गर्मियों में शाम के वक़्त !

कबीर ने हाँ बेटा कहते हुए सफ़ेद रुमाल से भीगी पलकें पोंछ लीं और बोला : और कल चलेंगे आपकी चाची और कमल को लेने !

साक़िब का बेटा : हाँ चाचा , अब बहुत दिन हुए !

साक़िब के बेटे ने एक बड़ी बात कह दी थी !

        असंख्य उत्तर असंख्य सवालों के आने से पहले दिए जा चुके थे आलोक के द्वारा ! पिघलती कुल्फी से चिपकती उँगलियों कि  गुफ्तगू कई कहानियाँ  कहती  थीं, तो रात के सन्नाटे गुपचुप पलकों के नीचे छुपी बूंदो में आहिस्ता-आहिस्ता सब सुनते जाते थे !

एक कहानी : बॉम्बे कुल्फी !

Monday, March 31, 2014

केवल, रोटियों के लिए !!

वो रोज़,
अंगीठी कि आँच पर,
नुक्कड़ नुक्कड़,
गलियों गलियों,
पराठे पकाता है,
रोटियों के लिए !

और ,वो भी,
रोज़, भटकता है,
दफ्तरों-दफ्तरों,
डिग्रियाँ लिए,
उम्मीदों  पर !

अंततः
कच्चे कोयले सा,
ज़रूरतों,
ज़िम्मेदारियों,
कि अंगीठी में,
खुद को पकता पाता है,
केवल,
रोटियों के लिए !!

:: मनीष सिंह ::

Saturday, March 29, 2014

संस्मरणों कि पंक्तियाँ !!

गमछे से,
कोहनियों तक,
पोछता पसीना,
मूर्तिकार,
दिन भर, रात भर,
मूर्तियाँ बनाते हुए !

पूजा पंडालों में,
कल भगवान् ,
हो जाएंगी !
दूर हो जाएँगी,
दर्शनाथियों कि,
लम्बी पंक्तियों कि सी !

जैसे ,
दूर हो जाते हैं,
रात भर ,
दिन भर,
पाले पोसे,
मासूम चहरे,
हमारे घरों से !

फिर ,
बंध  जाती हैं,
संस्मरणों कि पंक्तियाँ,
आँखों से ,
पिघलती हुई !

Wednesday, March 26, 2014

एक कहानी : " टॉयट्रेन "

        " स्कूल के प्रिंसिपल सर ने सुबह कि प्रार्थना के  ख़तम होने के बाद घोषणा करी के अगले हफ्ते सिलीगुड़ी के कान्वेंट स्कूल के 12th क्लास के दस बच्चों कि टीम हमारे स्कूल के बच्चों के साथ २ दिन के जॉइंट टूर पर चलेंगे !"आप सभी बारहवीं के बच्चे मुझ से असेंबली के बाद  ऑफिस में मिलिए !
         १४ से १६ साल के बच्चों को उड़ने को बड़ा आकाश मिलने को था ! नए साथियों के साथ , नयी उमीदों के साथ !
         जैसे पतझड़ के बाद आयी नयी कोपलों को ओस कि बूंदों के स्पर्श से बनते संबंधों और भविष्य कि आशाओं को मूर्त रूप दे लेने के मौके मिलने को हों और रास्ता सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग के  बीच दौड़ती टॉय ट्रेन कि उस कोच से जाता हो जो रिज़र्व किया गया था, इस यात्रा के लिए !
        " आतिश "  से  बिजॉय दादा ने अपने पुराने विजय सुपर स्कूटर को  सुबह ७:३० बजे सिलीगुड़ी स्टेशन कि  पार्किंग में खड़ा  कर के इग्निशन स्विच को ऑफ करते हुए पुछा :

कहाँ खोये हो बंधू ?

         आतिश तो जैसे बड़े से लस्सी कि ग्लास में तैरते मक्खन कि तरह दिन भर में मिलने वाले नए साथीयों के साथ कि सम्भावित गरमाहट से पिघलता जाता था और बिजॉय दादा कि आवाज़ उसे ऐसी लगती थी जैसे ठंडक देते बर्फ़ के टुकड़े !

बिजॉय दा : कि रे , भालो तो ? ( क्या , ठीक तो हो ? ).

आतिश के कंधों को छूते हुए बिजॉय दा ने पुछा ! आतिश मलमली घांस से जैसे खुरदरी सड़क पर नंगे पैर अचानक आ गया हो और बोला :

हाँ दादा , क्या हुआ ?

बिजॉय दा ने मुस्कुराते हुए आतिश को कहा कुछ नहीं चल तेरे कान्वेंट स्कूल के साथी अपनी स्कूल बस से आ गए है , देख तुझे किसका साथ मिलता है !

आतिश वेटिंग रूम कि तरफ बढ़ गया जहाँ प्रिंसिपल और स्कूल के दूसरे लड़के पहले से इकठ्ठा थे !

कान्वेंट स्कूल के बच्चों में लडके और लड़कियां दोनों थे , स्कूल ड्रेस में !

दिसंबर कि सर्द सुबह ! कोहरे से जूझती सूरज कि किरणें !

      बीच बीच में सर्द हवाएँ किशोर किशोरियों के खुश्क होते चेहरों को और खुश्की दे जाती थीं तो कोई मफ़लर कस लेता था तो किसी कि हथेलियाँ स्वेटर कि जेबों में और गेहरी जा कर कस जाती थी !

हैलो , तुम्हारे पास वैसलीन है ? विभूती ने आतिश से पुछा !

विभूति कॉन्वेंट स्कूल के एक लड़की !

आतिश : हाँ, ये लो लेकिन यूज़ करी हुई है , तुम अपनी उंगली पर ले लो  ! वैसलीन कि ट्यूब विभूति कि तरफ़ बढ़ाते हुए बोला !

विभूति : तो क्या हुआ ? लाओ दो ! केहते हुए विभूति ने बिना झिझक ट्यूब अपने होठों पर फेर ली !

आतिश के लिए ये लम्हा अनोखा था ! जिसमे विश्वास  एवं  अपनत्व था ,साथ में था अधिकार का उदघोष ! ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था ! सरकारी स्कूल के  संस्कारों कि धूप से बनती परछाइयों के सिमटने कि घडी थी ये , नए साथीयों के सानिध्य एवं सम्भावित सम्बन्धों के फैलते प्रकाश में !

        चलिए भाई ट्रेन के आने में देर है नाश्ता कर लेते हैं ! कौशल भाई जो हॉस्पिटालिटी के लिए जिम्मेद्दार है ने ,दोनों तरफ के बच्चों को आवाज़ लगायी !

        गरमागरम पकौड़ियों और चाय कि चुस्कियों के साथ किशोर किशोरियों के ठहाके और विचित्र से सामीप्य कि मर्यादित कोशिश में सब ने नाश्ता ख़तम किया !

सब ने अपने अपने साथी चुन लिए थे , आगे के सफ़र के लिए !

यहाँ आ जाओ आतिश , विभूति ने अपने बगल कि सीट पर उसे लगभग खींच लिया !

       ट्रेन प्लेटफॉर्म से सरकने लगी थी ! दूर पहाड़ों पर उभरता हुआ सूरज अपनी किरणो से नई कोपलों को स्पर्श करता था तो दोनों स्कूल के प्रिंसिपल अपने साथियों के साथ सजग थे ! किशोरों के साथ एडुकेशनल टूर जो था , तमाम सम्भावनाएं लिए !

           छुक छुक करती ट्रेन करीब कि मार्किट से गुजर रही थे  ! बीच बीच में तामाम चीज़ों के बेचने वाले चढ़े और उतरे ! स्टेशन आते जाते रहे ! आतिश और विभूति खो गए थे !

बारिश कि फुहारों से ट्रेन कि रफ़्तार से तेज़ दौड़ते मन को विराम मिला !

आतिश : इस टूर से क्या हासिल होगा हमें ?

विभूति : मुझे तुम जैसा नया दोस्त हासिल हुआ !

आतिश ने हलके से मुस्कुराते हुए अपनी निगाहें नीचे लगभग सूख चुकी नदी कि तरफ कर ली !

विभूति : फ्यूचर का क्या प्लान है तुम्हारा करियर का ?

आतिश : तुम बताओ !

विभूति : 12th के बाद इंजीनियरिंग में दाखिला ! 3rd इयर में कैम्पस सिलेक्शन फिर पॉकेट और स्टडी के लिए कमाऊंगी और आय ए एस कि तय्यारी करुँगी , और फिर शादी वादी !

      बड़ी सहजता से बोल  गयी विभूति ! जैसे कलकल करता पानी रस्ते में पड़ने वाले सभी पेड़ पौधों को सींचता जाता है , आतिश कितने दिनों बाद आज तर हुआ था किसी कि मन कि बात में अपने को पा कर !

विभूति ने कुछ देर रुक कर पुछा : अब तुम बताओ !

      आतिश अभी कुछ बोल पाता कि ट्ट्रेन ने लम्बी सीटी लगाई ! विभूति ने अपना चश्मा उतारते हुए आतिश कि तरफ देखा और मुस्कुरा दी फिर अपने गले के मफलर से चश्मे के शीशे साफ़ करने लगी ! मफलर कंधे से कुछ ज़यादा नीचे सरक गया था  !  आतिश सम्भलते हुए अपनी निगाहें एक तरफ कर ली , अनदेखा करते हुए वो पल !

चाय चलेगी दोस्तों ? कौशल भाई ने पुकारा !

हाँ , सब के सब एक सुर में बोले !

प्रिंसिपल सर : अभी तक हमने आधा रास्ता तय कर लिया है , यहाँ से ट्रेन कुछ दूर पीछे चलेगी और फिर आगे ये एक अनोखा मोड़ है इस रस्ते का !

     आतिश और विभूति एक दूसरे को देखते हुए सोच रहे थे ! कहाँ अभी आधा रास्ता तय हुआ ! ठीक से पहचान भी नहीं हुई अभी तो ! दोंनो अपने इस सफ़र में एक नए सफ़र कि तलाश में थे !

       ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ ली थी ! हिचकोले खाती , घुमावदार रास्तों पर कन्धों से कंधे टकराती मस्ती करती टॉय ट्रेन दार्जीलिंग कि तरफ बढ़ रही थी कि सब के हाथो में कुल्हड़ में गरमा गरम चाय आ गयी साथ में गरमा गरमा समोसे अभी - अभी गुजरे " घूम स्टेशन " से दो लड़कों ने ये व्य्वस्था करी थी !

विभूति और आतिश ने अपनी सीट के बीच के हिस्से में समोसों कि प्लेट रखी और बतियाने लगे !

आतिश : तुम मेरे फ्यूचर प्लान के बारे में पूछ रही थी न ? वैसे मैंने अभी ज़यादा कुछ सोचा नहीं है ! बस अच्छे परसेंटेज से 12th पास हो जाये तो फिर दादा आय टी आय में दाखला दिलवाने कि बोल रहे थे ! तुम बताओ मुझे क्या करना चाहिए ?

विभूति : तुम्हारे स्कूल में करियर गाइडेंस नहीं देते ?

आतिश : ये क्या होता है ?

विभूति ने हलकी सी मुस्कराहट के साथ आतिश कि तरफ देखा !

      गाढ़े गेहुंए रंग के आतिश के चहरे पर हलके हलके उभार लेती रोओं कि कतारें , सख्त होने को थीं  ! ऊपरी होठो पर घने होते मूछों के बाल हलके हरे रंग कि आभा दे रहे थे ! यौवन दस्तक देता था , हर तरफ से ! 

    आतिश ने विभूति को हलके से ज़ोर देर कर पुछा : क्या हुआ बोलती क्यों नहीं ? एकटक क्या देखे जा रही हो ?

विभूति ऐसे में क्या बोलती , कई बार शब्द नहीं मिलते कुछ हालातों को व्यक्त करने के लिए ! किन्तु मन सब समझता है और आसानी से  समझा भी देता है !

आतिश तुम मेरी मानो तो स्पोर्ट्स में अपना करियर बनाओ !

     विभूति ने चुप्पी तोड़ते हुए आतिश से कहा कहा !तुम्हारी सोलिड बॉडी और हाइट सब ठीक ठाक है ,और एक स्पोर्टसमैन मुझे पसंद भी है ! तुम फ़ुटबाल खेलना शुरू करो !  

आतिश : फुटबॉल तो मैं खेलता ही हूँ ! एक बार गिरा तो घुटनो पर चोट लगी , चार टांके लगे थे उसके बाद से नहीं खेला !

ट्रेन अगले स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर लग रही थी !

ये लो , बड़े से पेड़ से एक गुलाबी और चटक लाल रंग एक बड़ा सा फूल ला कर आतिश ने विभूति को दिया !

थैंक यू : विभूति !

आतिश : क्या मुझे इंजीनियरिंग नहीं करनी चाहिए !

आतिश ने अपने मन में दबे हुए प्रश्न को शब्द दिए !

विभूति : क्यों नहीं , लेकिन तुम स्पोर्ट्स में अच्छा कर सकते हो !

आतिश : लेकिन में इंजीनियरिंग में भी अच्छा कर लूँगा !

ओके फिर ठीक है , जो मन करे करो कहती हुए विभूति सीट पर बैठ गयी लगभग रूठते हुए ! पीछे पीछे आतिश भी आ गया और दोनों हाथों से विभूति के कन्धों को सम्भालता हुआ बोला , ठीक है मैं फूटबाल ही खेलूंगा : अब खुश !

विभूति के होठों पर आती मुस्कुराहट के साथ ट्रेन ने लम्बी सीटी लगायी जैसे अपने होने का परिचय देती हो !

      दो अनजान युवा बरसों मन के भीतर सैकड़ों अनछुए विषयों कि जिज्ञासा संजोय कितने समीप आ चुके थे कि एक दूसरे कि मुस्कुराहटों कि चिन्ता होने लगी थी दोनों को , सिर्फ चार घंटों के सफ़र में !

धीरे - धीरे आतिश और विभूति दोस्त थे !

सफ़र बड़ा हो चला था , रस्ते छोटे पड़ेंगे दोनों को एहसास था ! 

     चिनार के पत्तों से झरती बारिश कि बूँदें ट्रेन के शीशे पर हवाओं कि तूलिका से आड़े टेढ़े चित्र उकेरती थीं जिनके अर्थ सिर्फ आतिश और विभूति को पता थे !

         दार्जिलिंग कि सड़कों पर सब अपने अपने प्रोजेक्ट के लिए सामान इकठ्ठा करने में लग गए , ये दोनों भी  ! होटल के कमरों में चेंज कर के सब रेस्टोरेंट में इक्कठा हुए , स्कूल ड्रेस में नहीं , नॉर्मल पहरावे में ! किशोरों के मन और इच्छाओं का वातावरण जिसे प्रिंसिपल सर और दूसरे अधिकारी अपनी पैनी निगाहों से नियंत्रित करते जाते थे फिर भी खुश्बुएं और रोशनी कहाँ बंधती हैं  बंधन में ! 

आज वापस लौटने का दिन है ! 

कहीं उत्साह तो कहीं कुछ समय और साथ रह पाने कि लालसा चहरे पर साफ़ साफ़ दिखाई देती थी !

ट्रेन के इंजन ने लम्बी सीटी दी !

भाप से पूरा इंजन लगभग छुप सा गया जैसे मन में उफनते कामनाओं के तूफ़ान में वापसी का समय इतनी 

तपिश दे रहा हो कि भविष्य भाप सरीखा उड़ ही जाएगा जो उसे अगर आज न समेटा तो , समय रहते !

        वापसी के सफ़र में भी आतिश और विभूति पास  पास ही रहे ! आते जाते स्टेशन पर उतरते चढ़ते लोगो कि चहल पहल रही ! लोकल मिलने वाले रंग बिरंगे फूलों कि डालियाँ तो कभी नाश्ते के  लिए चाय पकोडों के साथ सर्द हवाओं के झोके !

      एक दो बार आतिश ए सी कम्पार्टमेंट में भी झाँक आता था ! इंग्लिश न्यूज़ पेपर पढते सूटेड बूटेड लोग ! चीनी मिटटी के कप में चाय और नाश्ता !  देख कर सोच लेता मैं भी ये सब करूंगा ठीक से पढ़ लिख कर !

      चलो बस में बैठो बच्चों हमें अभी २० मिनट और चलना है ! अँधेरा होने को था ! सर्दी पल पल बढ़ती जाती थी !

विभूति और आतिश अभी प्लेटफॉर्म पर ही थे !

कॉन्टैक्ट नम्बर दे ले रहे थे ! 

२० - २५  सालों बाद ! 

एक कप चाय तो पिला दो मैडम !

नहीं सुबह से दो कप पी चुके हो अब लंच के बाद मिलेगी ! विभूति ने मेज पर पड़ी प्याली उठाते हुए कहा !

आतिश : ठीक है में थोड़ी देर में आता हूँ !  करुणा और सचिन कहाँ है , सुबह से देखा नहीं दोनों को ?

विभूति : आज स्कूल का एडुकेशनल टूर है , दोनों वहीँ गए हैं रात हो जाएगी ऐसा कहा था प्रिंसिपल ने मुझे !

आतिश : चलो उठो  कहीं चलना है !

विभूति : कहाँ ?

दार्जिलिंग , टॉय ट्रेन से  !

हाँ , वेसलीन साथ रख लेना तुम्हारे होठ सूख जाते हैं : आतिश ने मुस्कुराते हुए कहा !

ट्रेन ने प्लेटफॉर्म छोड़ दिया था !

 आतिश ने अपनी सरकारी गाड़ी के ड्राईवर से शाम को आने का इशारा करते हुए विभूति को ट्रेन में खीच लिया !

आपका टिकट तो ए सी का है , तो आप यहाँ क्यों बैठे हैं ?

विभूति ने आतिश को और आतिश ने विभूति को देखा और मुस्कुरा दिए !

ट्रेन ने लम्बी सीटी लगाई !  टी टी कुछ समझता हुआ आगे बढ़ गया , जैसे आप सब समझ चुके हैं !

                                       ~~~~~~        एक कहानी : " टॉयट्रेन "  ~~~~~~ 
::: ~~ ::: आपका मनीष 


Saturday, March 15, 2014

मैं तो महका, तुम भी महको, हो, अबीर, चन्दन - चन्दन !!

सडकों-सड़कों, जली होलिका,
गलियों-गलियों मिलन मिलन,
आँगन-आँगन ,छलके मटके ,
नुक्कड़-नुक्कड़   रंग - तरंग ! "

इससे दूरी, उससे दूरी,
कब तक  रखें , उलझे मन,
गुझियाँ महकीं, पापड़ चहके,
घोलो रंग - खोलो बंधन !

चुटकी- चुटकी चली सुगंधें,
माथे माथे सजी सजीं ,
सन्नाटों कि रातें गुजरीं,
प्रेम घंटियाँ बजी - बजी !

मैं तो महका, तुम भी महको,
हो , अबीर , चन्दन चन्दन !

सड़कों सड़कों जली होलिका,
गलियों-गलियों मिलन मिलन !
आँगन-आंगन छलके मटके,
नुक्कड़ नुक्क्ड़ , रंग-तरंग ! 

                ~~~~~ :  मनीष सिंह

Wednesday, March 12, 2014

एक कहानी : " छावनी " .

           ऑफिसर्स मेस से जल्दी जल्दी रात का खाना खा कर विक्रम विशेष परमिशन पर  छावनी के बाहर अपने एक और साथी के साथ निकला ही था कि हलकी बूंदा बांदी शुरू हो गयी और उन्हें बेग़म पुल के दूसरे छोर पर एक चाय कि दूकान पर रुकना पड़ा !

निशांत वर्मा : चाय लोगे केप्टन ?

विक्रम : मैं रात को चाय नहीं पीता !

निशांत : ये भी कोई स्कूल कि घंटी है जो रात में नहीं बजती , चल आज पी कर देख !

विक्रम : यार कुछ चीज़ों में मुझे जबरदस्ती पसंद नहीं और तू ये जनता है !

निशांत : ठीक है दोस्त , चाय के बहाने पुरानी यादें ताज़ा हो जाती , सोचा था !

विक्रम स्टूल को अपनी और खीचते हुए चाय वाले से बोला : भैया जी , दो कप अच्छी चाय बनाइये !

चायवाला : अदरक दाल दूं सर ?

विक्रम और निशांत ने एक दूसरे कि तरफ देखते हुए जैसे कुछ याद किया और गले मिले !

चायवाले ने अदरक वाली अच्छी सी चाय बनाई   मिटटी के कुल्हड़ में को सेना के नोजवान अधिकारियों कि तरफ बढ़ा दी !

            छत  पर पड़ी नीले रंग कि तिरपाल बार बार हलकी हवा से उड जाती थी और बारिश कि बूंदे दूकान के भीतर झाँक लेती थी ! कभी विक्रम कि पलकों पर तो कभी निशांत के बाँहों पर !

सड़क पूरी भीग चुकी थी !

बेग़म पुल पर एक किनारे से दूसरे किनारे पर सायकल , रिक्शा , बस , ट्रक और ठेले सब आते जाते थे !

विक्रम और निशांत के लिए नया नहीं था ये सब देखना हाँ समय और उम्र ज़यादा हो गयी थी ये नज़ारा देखे !

विक्रम तूने देखा वो गवर्नेंट कॉलेज के पीछे वाले गेट का नीम का पेड़ कितना घना हो गया है ! : निशांत ने ट्रक कि मैं लाइट से रोशन हुए नीम के पेड़ कि तरफ इशारा करते हुए कहा !

निशांत भाई सब कोलगेट जो करने लगे हैं , हमारे बचपन जैसे दातुन करते तो देखते इतना घना कैसे होता ये ! विक्रम ने चाय कि आखरी घुट लेते हुए जवाब दिया

चल भाई देर होने को आई , परमिट भी ओवर होने वाली है !

दोनों लौट आये छावनी में , अपने अपने कमरों में !

       बारिश रात भर होती रही ! हवाएँ शहर के इस कोने से उस कोने तक तेज़ चाल से टहलती रहीं ! छावनी के कोने कोने पर जवान अपने अधिकारियों कि रक्षा में रात भर पहरा देते रहे !  रात भर बेगम पुल से धीमे , तेज़ हॉर्न कि आवाज़ें आती रहीं ! फिर रोज़ कि तरह ये रात भी बीत गयी जैसे पास कि काली नदी कि गहराइयों में बारिश का पानी समां गया  , अगली बारिश के आने तक !

गुड मॉर्निंग निशांत : विक्रम ने कैम्पस के ग्राउंड में बड़े से झूले पर सर के पसीने को सफ़ेद तौलिये से पोछते हुए कहा !

निशांत : गुड मॉर्निंग दोस्त , कैसी लगी कैंटोनमेंट में पहली रात ?

विक्रम : रात भर सो न सका !

निशांत : क्यों भाई ?

विक्रम : तुम अगर आज फिर मेरे साथ उसी चायवाले भैया के पास चलो तो बताऊंगा !!

निशांत : नॉट ए बिग डील , ठीक है फिर शाम को छेः बजे शार्प मैं गेट पर मिलो !

विक्रम : ओ के !

मेन गेट से कुछ कदम कि दूरी पर के चोराहे से होते हुए बेगम पुल कि तरफ निशांत और विक्रम बढे ही थे कि किसी ने पीछे से आवाज़ लगायी !

साब एक बात पूछूं ? करीब १५ - १६ साल का लड़का हाथों में रजनीगंधा के फूलों के गुलदस्ते लिए खड़ा पूछ रहा था !

सेना कि वर्दी में रौबीले दो अधिकारीयों से एक आम लड़का ऐसे कैसे कुछ पूछ सकता है ! सामान्यतः ऐसा हो होता है ! पुलिस , सेना ही आम आदमी से सवाल करते हैं , पर आज कुछ उल्टा था !

विक्रम ने अपनी चाल कुछ कम करते हुए लडके के पुछा :  तुमने हमसे कुछ कहा ?

लड़का : जी  , मैं आपसे ही कुछ पूछना चाहता हूँ !

निशांत : हाँ बोलो, क्या बात है ?

लड़का पहले आप ज़रा किनारे हो जाइये , यहाँ पुल पर कम जगह है तो इस लिए गाड़ियों से बचना पड़ता है !

निशांत  , विक्रम : तुम जल्दी पूछो क्या काम है हमसे ?

लड़का : साब आप दोनों मेरठ कि ही हैं ना ?

निशांत और विक्रम : हाँ , तो ?

लड़का : साब ये आपके १०० रूपये बाबा बाबा ने दिए थे और कहा था कि अगर कभी आप लोग मिले तो लौटने को !

निशांत , विक्रम ने एक दूसरे को जैसे सवाल करते हुए देखा और बोले : ये क्या है भाई ?

लड़का : साब , अब मैं चलता हूँ !

विक्रम ने थोडा भारी  आवाज़ में लड़के से पुछा : देखो लड़के हम  तुम्हे नहीं जानते और ये कैसे रूपये है हमें नहीं पता लो ये वापस लो और हमें जाने दो !

लड़का : नहीं साब ये आपके ही रुपये है और ये काग़ज़ भी है मेरे पास जिसमे आपने बाबा को इस के बारे में कुछ लिखा था !

कहते हुए लड़के ने एक पीले पड़ चुके लिफाफे को विक्रम कि तरफ बढ़ा दिया !

            लिफाफे को देखते ही जैसे विक्रम और निशान्त अपने आप में नहीं रहे ! किनारे कि दीवार का सहारा ले कर कुछ देर खड़े रहे ! आँखे दब डबडबा रहीं थी और उनमे १० सालों पहले कि यादें काग़ज़ कि नावों कि तरह हिचकोले खा रहीं थी ! मन था कि कहता था कि सब अनोखा है और सच नहीं है लेकिन आखें थीं कि कहती थीं कि सब सच है और यथार्थ है !

       हम असमय मिली चीज़ों के लिए उतने उत्साहित नहीं होते जितना समय से पहले मिल जाने  वाली चीजो के लिए रहते हैं , किन्तु सहेजने कि आदत जब तक आती है तब तक समय निकल जाता है और प्राप्त चीज़ों का अर्थ सामयिक एवं तर्कसंगत नहीं रेह जाता !

दस साल पहले !

     नौचंदी में इस बार नई सर्कस आई है तू चलेगा  , निशांत ने विक्रम से कॉलेज से वापस लौटते हुए पुछा !

विक्रम सायकल से उतर गया और निशांत भी क्यों कि घर पास में ही था और रास्ता सायकल से जल्दी कट जाता फिर मौका कहाँ मिलता है इन सब बातों का !

विक्रम : हाँ , जाने का मन तो है लेकिन पैसे कहाँ हैं !

निशांत : ये ही तो परेशानी है !

विक्रम : फिर नौचंदी और सर्कस भूल जा , चल घर चल !

बेटा अगर तुम मेरा एक काम करो तो मैं तुम्हारे लिए नौचंदी का इंतेजाम कर सकता हूँ ! पास के चायवाले ने दोनों कि बातें सुन कर कहा !

वो कैसे ? : निशांत और विक्रम दोनों एक साथ बोले !

        दो दिन बाद जो इलेक्शन है ना उसमे अधिकारीयों को चाय देने का काम है सिर्फ एक दिन का काम है और वो भी चार फेरों का , तुम दोनों उस दिन मेरा या काम करो तो मैं दोनों को ५० ५० रुपए दूंगा !

विक्रम ने एक पल में हाँ केह दी निशांत ने अगले दिन अपनी माँ से पूछ कर हामी भरी !

         अगले दिन चाय वाले ने दोनों से एक सादे पेज़ पर लिखवाया कि " चाय के गिलास के टूटने पर कीमत हमारे तय मेहताने ५० रुपयों में से काट ली जाये ! "

इलेक्शन के दिन के बाद अगले दिन आने को कहा था चायवाले ने पर दुकान पर नहीं मिला , गाँव चला गया था शायद !

कॉलेज और फिर सेना कि भर्ती परीक्षा दोनों अच्छे से पास करी दोनों ने ! जीवन में कुछ बन जाने कि धुन में कुछ याद नहीं रहा !

सेना में भर्ती , फिर ट्रैनिंग , फिर दूर दूर कि पोस्टिंग्स !

मेरठ जैसे ख्याल में ही नहीं आया ! 
विक्रम  का तो कोई था नहीं खून के रिश्ते में मेरठ में ,अनाथाश्रम के मालिक और इंचार्ज से बीच बीच 
में ख़त लिख कर हाल ले लेता था और निशांत के माँ के देहांत के बाद उसने भी मेरठ से मुह मोड़ लिया था !

लेकिन आज सब कुछ अपना अपना सा लगने लगा था !

मेरठ कि छावनी में पोस्टिंग के दो दिन के समय में दोनों को कभी अपने बचपन कि याद नहीं आयी , पर सब आखों के सामने था ! दोनों दोबारा जी लेना चाहते थे वो ज़िन्दगी !

किन्तु , बीता समय नहीं आता ! 

कहाँ हैं तुम्हारे बाबा : निशांत ने  रूंधे गले से कहाँ !   

लड़का : वो तो बेगम पुल के उस किनारे पर ही तो दूकान है हमारी चाय कि !

निशांत और विक्रम चल दिए अपने पहले मालिक के पास जिसने

कर्मठ नौजवानो का मेहनताना सम्भाल कर रखा और उम्मीद 

जगाई अपने बेटे कि आँखों में कि

   संपर्क निशचल किन्तु भावपूर्ण होने चाहिए ताकि उनके गर्भ में स्वस्थ एवं सम्मानीय भविष्य पल सके !

छावनी के गेट पर हूटर ने आवाज़ लगायी !

निशांत और विक्रम तेज़ कदमो से वापस लौट चले !

एक दम निशब्द !  दोनों के मन बातें करते थे !

मानस अशब्द संवाद समझते थे और आखें भविष्य देखती थी !

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एक कहानी : छावनी  !!             ~~   मनीष सिंह

Tuesday, March 11, 2014

पुराना बूढा पेड़ , सूख गया !

मोहल्ले का,
एक और ,
पुराना बूढा पेड़,
सूख गया !

नगरनिगम के ,
टूटे नल से ,लगातार,
पानी मिलता था ,
फिर भी सूख गया !

कभी-कभी ,
ज़यादा एवं असमय,
कि गयी देखभाल,
ज़हर सरीखी,
हो जाती है !

देखिये ना ,
पानी मिला ,
फिर भी ,
बूढा पेड़ ,
सूख गया !