Sunday, September 2, 2012

मौन की बूंदों की आवाजें, सन्नाटों का हल्का शोर !

...................................   नमस्कार ......!!

कुछ दिनों के अंतराल के बाद फिर मुखातिब हूँ , नवीनतम के साथ ... ।

मौन की बूंदों की आवाजें,    सन्नाटों का हल्का शोर !


स्वयं से मिलना ऐसा जेसे, नदिया के दो अपने छोर !!

                                                                                      - मनीष

Wednesday, August 15, 2012

जैसे , अधिक काफी की मात्रा ,कड़क ना हो कर कडुवी जाती है !

                  ये ही कोई मध्यरात्री के बाद कुछ एक घंटा बीता होगा ....मैंने घडी देखी हो रात के लगभग एक बज रहे थे .....और मेरी गाड़ी तमिलनाडु में " के कामराज " हवाई अड्डे से पोंडिचेरी ( पुद्दुचेरी ) के लिए निकल रही थी ! सफ़ेद रंग की एम्बेसेडर नोवा गाड़ी थी ....साथ में सफ़ेद रंग के ही परदे लगे थे , एक शानदार और सुहाना सफ़र होने वाला था चेन्ने से पोंद्य्चेरी तक का !!   वैसे तो कई बार गया हूँ वह किन्तु इस् बार का सफ़र रात , नहीं नहीं देर रात का था ! मेरा यान लगभग 2 घंटे विलंबित हो गया था , बंगलुरु में ही एक घंटा रुक गया था !!
                  उस सडक को जिस पर से हमें हो कर गुजरना था को ईस्ट कोस्ट रोड बोलते हैं .....क्यों की वो भारत के सुदूर पूर्वी किनारे - किनारे से गुजरती है ....एक तरफ कभी-कभी अथाह जल लिए समुद्र होता है और दूसरी तरफ सपाट धरातल जिसमे अधिकतर समय धान की बालियाँ लहलहाती मिलती हैं ....सुर्ख हरे रंग में , किन्तु आज में उनके दर्शन नहीं कर सकूंगा क्यों की रात में चन्द्रमा ने अपनी चांदनी से उस सुर्ख हरे रंग को एक अनोखे रंग में तब्दील कर दिया है ....!!
                 तमिलनाडु में आपको स्वयं कोई ना कोई बहाना मिल जायेगा जिस से की आप की धार्मिक आस्था को और बल मिले और आप उनका निर्वहन कर सकें !!  थोड़े थोड़े अंतराल पर आपको नमन करने का अवसर मिल ही जायगा , कही कोई बड़ी ही विशेष कारीगरी और चटक रंगों से बने छोटे बड़े मंदिर मिल जायंगे , अनोखे किन्तु सरल तरीके के गिरजाघर और भी अन्य धार्मिक स्थानों के दर्शन हो जायेंगे ! एक मंदिर तो विशेषतः इस रस्ते पर सिर्फ ड्राईवर लोगो के लिए ही है , वो देवता सब ड्राईवर लोगो के लिए बड़े ही श्रधेय हैं ! पुरे रस्ते पर आपको कच्चे नारियल के तुकडे मिल जायेंगे ...जो की एक ही बार में फोड़े गए होते हैं देवता के सामने !
              लगभग रात के 2 बज चुके थे और मुझे भूख लग रही थी ....मैंने अपने ड्राईवर से कहा " कुछ खिला दीजिये " बोला " सर - आपके लायक इस रोड पर पोंडिचेरी से पहले कोई खाने का स्थान नहीं है .....मैंने कहा भाई कोई ढाबा भी हो तो रोक लेना .....हम आस लगाये आगे बढ़ रहे थे की एक गाँव जैसा रौशनी वाला कुछ दिखाई दिया ....और फिर एक छोटी सी दूकान दिखाई दी जो की रात के 2 बजे भी चल रही थी ....कुछ लोग टेबल पर बैठे थे और चुल्लेह के ऊपर रखे तवे पर से भाप उठती दिखाई दे रही थी !
                  हमने रुक कर पुछा तो पता लगा की डोसा और इडली मिल सकते हैं ....और कहेंगे तो काफी भी मिल जाएगी ....जैसे किसी तपते रेगिस्तान में किसी को कोई ठन्डे पानी के लिए पूछ ले और कहे की कुछ मीठा भी कहेंगे तो कैसी फीलिंग होगी ....बस वैसा ही महसूस किया मैंने और हामी भर दी !! उतर कर हाथ धोये और छोटी सी झोपड़ी नुमा दूकान के भीतर सर झुका कर घुस गए ....सर इस लिए झुकाना पड़ा क्योंकि वी छप्पर इस तरह से बना था की किसी भी 5 फुट के इंसान को झुकाना ही पड़े ....ये सब बारिश और कड़कती धुप से बचने के लिए किया जाता है ...भले ही रात में ये ज्यादा व्यावहारिक ना लगे किन्तु दिन के और बारिश के समय ये ही अतिआवश्यक है ! अन्दर गए - ऑर्डर किया - डोसा ...और काफी ! तमिलनाडु में दरअसल में डोसा नहीं बोला जाता ....वो डोसा को डोसाई बोलते हैं ...छोटे छोटे दो डोसे मेरे सामने थे चटनी और साम्भर के साथ ! कुछ लग सा स्वाद था ! अमूमन हम दिल्ली या उत्तर भारत के शहरों में जिस तरह के डोसे , इडली या साम्भर खाते हैं वो कुछ अलग तरह से होता है ....किन्तु वहां जहाँ पर उसका मूल है , वहां का स्वाद कुछ अलग मिला ....ज्यादा खट्टा , तीखा , कम तेल , चटनी में नारियल और दाल का अधिक्क्य और साथ में एक लाल रंग ली तीखी चटनी ! इडली भी खाई , काफी भी पी , कुछ विशेष बर्तन थे वो ! एक बड़ी कटोरी में उल्टा रखा हुआ गिलास और कटोरी में डाली गयी काफी !! दरअसल ठंडा कर के पीने में आसानी होती हैं इस तरह के बर्तनों में ! खा पी कर आगे चले  , और कुछ पौन घंटे में पुदुचेरी की गलियों में आ गए .....!

          रात के तीन बज रहे थे , यकीन मानिये सड़कों पर सफाई कर्मचारी सफाई कर रहे थे ! पूरी की पूरी सड़कों पर सफाई का काम चल रहा था !! मुझे लगा शायद कल कोई बड़ा नेता या अधिकारी आने वाला होगा तो ये सब हो रहा होगा , किन्तु जब सत्यता पता लगी तो यकीन ही नहीं हुआ !! दरअसल पोंद्य्चेरी में आज भी कुछ नियम पुराने समय के चल रहे हैं ....ये एसा मानिये जो नियम पुराने समय में अच्छे थे को वहां के नगर निगम ने वसा का वैसा ही स्वीकार कर लिया है !!  दरअसल पांडिचेरी में पुराने समय से ही रात में सडकों की सफाई हो जाती थी और आज भारत और पोंडिचेरी के आज़ाद होने के भी भी वोही चल रहा है ....रात में सड़कों पर करीने से सफाई होती है , पानी  छिड़का जाता है , कूड़ा उठाया जाता है ...ताकि जब आप सुबह को अपने अपने गंतव्य की तरफ जाएँ तो आपको एक स्फूर्ति भरा वातावरण मिले ! सुगन्धित वातावरण मिले !  ये उन सफाई कर्मचारियों के लिए भी ज़रूरी और अच्छा है , उनको रात में किसी भी प्रकार से ट्रेफिक का सामना नहीं करना होता और नागरिकों को धुल मिटटी , दुर्गन्ध से सामना नहीं करना होता !  मुझे ये बहुत ही मनभावन लगा ! हमारे अन्य शहरों को भी कुछ इस तरह के इन्तेजाम करने की सम्भावनाये सोचनी चाहिए !! जो अधिकारी नए नए अपने अपने पदभार संभाल रहे हैं उनको कुछ अच्छी सोच को प्रयोगात्मक रूप में पहल / चलन में लाना चाहिए !!

संवेदनशीलता ,जबतक प्रायोगिक ना हो परिभाषित नहीं करी जा सकती !                                           

अधिक  प्रयोगात्मकता , संवेदनहीनता का उदाहरण बन भी सकती है !! 

जैसे , अधिक काफी की मात्रा ,कड़क ना हो कर कडुवी जाती है !      

Monday, August 13, 2012

" बाइस्कोप " में तो बस समर्पण ही समर्पण है !!


            " बाईस्कोप " -   जो लोग 35 से 40 वर्षो के हो चले होंगे उनको इस शब्द से अनजानेपन का कोई कम्पन नहीं महसूस हो रहा होगा !!

             तब में शायद पांचवी ये छठी क्लास में पढता रहा होऊंगा तब की ही बात है ! घंटाघर के रामलीला मैदान पर हर साल की ही तरह दशेहरे के मौके पर "मेला " लगा था ! पुरे मौहल्ले से टोली की टोली जा रही थी घूमने के लिए !! बुजुर्गों की , युवाओं की , किशोरों की , घर की महिलाओं की और उनके साथ बच्चों की .... ! कोई बहुत ज्यादा रूपए पैसों को ज़रुरत नहीं होती थी उन दिनों , बस कुछ खास मौकों पर पहनने वाले कपडे और 100 - 200 रुपए ....बहुत हुआ करते थे  !!
               कहीं समोसे , कहीं आलू की टिक्की , कही फेनियाँ , कही पर सुगन्धित केवड़े वाला दूध वो भी कुल्हड़ में , कहीं चाट , कहीं फलों की चाट , कहीं पूरा खाना , कहीं गोलगप्पे और फिर झूलों की बारी ....सर्कस , मौत का कुआँ और चलता फिरता स्टूडियो  - इम्पाला में फोटो खिच्वाइये या फिर कश्मीरी पोशाक में .....बिलकुल पता ही नहीं चलेगा की आप ही कभी कश्मीर गए थे या विदेश में कब घूम कर आये ! कहीं गुब्बारे , कहीं तरह तरह की सीटियाँ, विशेष तरह के खिलौने , चीनी मिटटी के बने बर्तन ....और अचार रखने वाली बर्रनी !  अत्यंत धार्मिक पुस्तकों की दूकान , कपड़ों की दूकान , रंग बिरंगी मिठाइयों की दूकान ! साथ में कभी कभी उद्घोषणा करते भोपू - भाइयों और बहनों ...आज हनुमान जी को सीता मैया अपनी स्मृति चिन्ह के रूप में अपनी " चूड़ामणि " देंगी ...आइये और रामलीला का आनंद लीजिये ...मंच सज चूका है और राखी कुर्सियां आपकी प्रथीक्चा कर रही हैं ......अब बड़ी ही संजीदगी से कहता हूँ ....भी इतने भीड़ भरे मेले में से शायद ही १० प्रतिशत लोग इस आवाज को सुन पते होंगे और जितनो ने सुना उनमे से ३ प्रतिशत लोग वहां जा कर राम लीला देखते होंगे ....हाँ जो बैठे होते हैं उनको अपनी थकान मिटानी होती थी तो बैठ कर सुस्ता लेते होंगे ....रामलीला कौन मन से देखता है ....सबके अपने घरों में ही लीला कुछ कम होती है क्या ....और इसे मौकों पर लोग अपने रोज़मर्रा के झंझटो से थोडा सुकून पाने के लिए जाते हैं और वहां भी वो ही तनाव देखने को मिले तो ..........कम से कम मैं तो नहीं देखता था......हाँ देखता था एक विशेष चीज़ ......" बाइस्कोप "

          आजकल कभी कभी दिख जाता है .....किन्तु देखा नहीं जाता !!

                 बहुत दूर हो गए हैं हम इस से ....! इसमें होता था , दिल्ली का कुतुबमीनार , अगरे का ताजमहल , गोलकुंडा का गुम्बद , काशी का कशिविश्वनाथ मंदिर , दिल्ली का बिरला मंदिर, मुंबई - तब बॉम्बे का गेट वे ऑफ़ इंडिया , दिल्ली का इंडिया गेट ! राष्ट्रपति भवन , लाल किला और ना जाने क्या क्या ! एक मोड़ के रखे जा सकने वाले टेबल पे रखा हुआ एक एक तरफ से त्रिभुजाकार बक्सा ....जिसमे तीन तरफ छोटे छोटे गोल गोल छेद होते हैं ....जिनमे से अन्दर झाँक कर देखा जा सकता है !!  और अन्दर बेटरी  से जलने वाला बल्ब लगा होता है ... जिससे सब साफ़ दीखता है ....और बक्से के ठीक ऊपर एक गोल घुमाने वाला लीवर होता है जिसके एक किनारे पर अन्दर लाल किले से ले कर कुतुबमीनार तक की रील बंधी होती है ....जो बस एक चोर से दुसरे चोर पर कोई ५ मिनट में आ जाती है ...और सब देखने वाले पुरे भारत के दर्शन कर लेते हैं ....जबकि आज कल सन २०१२ में भी भारत में सबसे तेज़ चलने वाली उत्तर रेलवे की मुंबई राजधानी ( भोपाल शताब्दी को छोड़ कर ) से भी लगभग १६ से १७ घंटे लगते हैं ......!! वह कमाल है .....ना ना था ,,,,,,,,,उन दिनों ....   
                        आजकल बाइस्कोप तो है ...हर एक के पास किन्तु उसमे सिर्फ अपने मतलब के चित्र लगे हुए हैं या लोग अपने मतलब के ही चुनिदा चित्र लगाते हैं ....देखते भी खुद हैं और परिवर्तन भी खुद के लिए ही अनुमोदित करते हैं ....किन्तु लाभ का जब भी सरोकार होता है तो वो सब सामान्य से अलग वर्गों के मुताबिक ही चाहिए ....तब उन्हें अलगाव पसंद है ...किन्तु जब संज्ञात्मक या प्रचारात्मक द्रष्टिकोण हो तो बाइस्कोप में सिर्फ अपने मतलब के ही चित्र चाहिए .....वो जो बाइस्कोप चला कर दिखता है शायद वो स्वयं उन जगहों / तजुर्बों से मुखातिब ना हुआ हो जिनको वो सलीके से दिखा रहा होता है ....किन्तु जब वो आपको वो सब दिखता है हो एक मंझे हुए खिलाडी की तरह व्यवहार करता है ताकी उसपर विशवास बना रहे और मनोरंजन एवं मुलाकातों का रिश्ता बना रहे , हर अगली मुलाक़ात पर वो इसे और सुदृढ़ करने की कोशिश करता है .....भले ही कुछ बचपन से साथी बड़े हो रहे हों और दुनियादारी के साथ साथ मौकापरस्ती से ग्रसित हों.....!!
           बाइस्कोप में जड़ता होती है ....किन्तु अविरलता के साथ साथ ....जिसका हर नयन के जोड़े को पता होता है किन्तु फिर भी वो देखता है .....क्यों .....क्यों की वो चाहता है की जीवन की सतत तरलता का गीलापन कभी कभी सघनता को  तलाशता है , हाँ समर्पण के साथ , " बाइस्कोप " में तो बस समर्पण ही समर्पण है ....पूर्णतः !!



Sunday, August 5, 2012

" ग्राहक राजा होता है ,और राजा मोलभाव नहीं करते !! "

               कल एक दुकान पर गया, मुंबई के अँधेरी स्टेशन के पूर्व तरफ  ....जहाँ लिखे एक सूचनापट को पढ़ कर अच्छा लगा साथ ही एसा भी लगा की अपनी बात कई तरह से कही जा सकती है ,सही है जो मूल भावनाओ को एकदम वैसे ही रख कर प्रभावी ढंग से कहा जा सकता है ! उदहारण के तौर पर ये ही जो ये थी !!

        " ग्राहक राजा होता है  ,और राजा मोलभाव नहीं करते !! "

      एक ही पंक्ति में सब को सन्देश ! बुरा लगने वाले वाक्य :

" आज नकद कल उधार "

या

" एक दाम की दूकान  "

या

 " उधार मांग कर शर्मिंदा ना करें !!"

         इसी तरह से रिश्ते होते हैं , आप के द्वारा दी जाने तवज्जो पर निर्भर !!

बस शब्दों का हेरफेर

है और भाव बदल जाते हैं जिनके साथ साथ रिश्तों की दिशा और दशा तथा उम्र बंध जाती है !

रिश्तों में वैसे तो वक़्त का अहम् रोल है , किन्तु समय और विषय के मेल के शब्दों का चयन   "वक़्त " को कम कर देता है तथा सामीप्य को जल्दी लाता है !!

Friday, August 3, 2012

...उस डोरी को खीचता है तो वो घंटी धीर से बज जाती है तन्न्न से ....

               वैसे तो कई बार मायानगरी मुंबई आया हूँ ....और घूमा हूँ किन्तु इस बार कुछ बदलावों ने अपनी और मेरा ध्यान खीचा , जिनका रेखांकित किया जाना मेरे लिए ज़रूरी है !
               ये कोई वर्ष 2003 के अंतिम महीनो की बात रही होगी ! एक अधिकारिक कार्य से मुझे मुंबई आना पड़ा , अपने एक वरिष्ट अधिकारी के साथ ! कुछ वेशेष होने जा रहा था हमारी कंपनी में , जिसके लिए एक विभाग के विभागाध्यक्ष के सहायक के रूप में मेरा चयन हुआ ! कोई सितम्बर महीने की बात होगी ...हाँ दिनांक 28 नवम्बर 2003 को में आया था ! फिर लगभग 1.5 वर्ष यहाँ रहा ...! 
                मुंबई की बस सेवा और उसका संचालन वाकई में तारीफ़-ए-काबिल है , मेरा अनुभव जो रहा है ! दिल्ली और वहां पर भी संख्या से मार्गों का नामांकन किया गया है और बसें चलती हैं ! जो विशेष देखा वो था :

1. बसों में कोई भी प्रेश्रर होर्न नहीं है ..... हाथ से दबा कर भोपू की तरह बजने वाला यन्त्र लगा है जिस से कोई भी ध्वनि प्रदूषण नहीं होता !

2. बसों को गंतव्य पर रोकने और चलने के लिए सहायक - कंडेक्टर दिल्ली की तरह सीटी नहीं बजता जो की एक दम बुरी तरह से आवाज़ करती है ...यदि आपके पास कोई नव जात बच्चा हो तो वो डर ही जाये !!....मुंबई में एक बहुत ही साधारण किन्तु महत्वपूरण प्रणाली लगी है ...कंडक्टर का संकेत ड्राईवर तक पहुचने ले लिए .....दर असल उन्होंने पीछे से दरवाज़े से ले कर के ड्राईवर के ठीक सर के लगभग ऊपर एक नायलोन की रस्सी करीने से बाँधी हुई है , जो कहीं भी किसी यात्री के सर को नहीं छूती और ड्राईवर के सर के पास एक घंटी बंधी है ....जब कंडक्टर कहीं से भी उस डोरी को खीचता है तो वो घंटी धीर से बज जाती है तन्न्न से ....हाँ रुकने और चलने के लिए घंटी के बजने और बजाने की अपनी अगल प्रणाली है जो ड्राइवर और सहायक / कंडक्टर के बीच ही नियत है !

3. यहाँ सब कंडक्टर अपनी  उनिफ़ोर्म में मिलते हैं , और जगह भी होते होंगे मेरा अबुभाव यहाँ का ही है ....!!

4. कितनी भी भीड़ हो कंडक्टर हर यात्री के पास जाकर पहले एक पंचिंग करने वाले लोहे के  यंत्र से तक तक की आवाज़ कर के उसकी टिकिट बनता था .... आपके लिए बड़े सलीके से जितने मूल्य की टिकट होनी चाहिए निकाल कर उसी यंत्र से पञ्च कर देता था ....और आपसे पासे ले लेता था ....आजकल एक बदलाव देखने को मिला .... वो कागज़ की तिअक्त नहीं होती , ना ही वो यंत्र होता है ....बस एक बत्तरी चालित मशीन है जिस से बटन दबाने पर टिकट निकलती है .... किन्तु आज भी कंडक्टर आपके पास ही जा कर टिकट निकलता है ...दिल्ली की दी टी सी की तरह नहीं की कंडक्टर पिचली सीट पर बैठा रहेगा और किसी ने किसी वजह से टिकट नहीं ली तो वो यात्री खुद ज़िम्मेदार ....!

5. एक और बात अलग है यहाँ की बसों में ....पिचले और अगले टायरों के ऊपर की सीट पर बैठने का मन करता है ...आराम दायक होती हैं ...दिल्ली जैसी नहीं की कुछ तेधिमेधि उभरी हुई की पूरा रास्ता आपका अपने को एड्जसत करने में ही कटे !!

    आधुनिकता और प्रगति के लिहाज़ से मुंबई अग्रणी है किन्तु पर्यावरण और अपने यात्रियों का ख़याल करना इस शहर जो आता है , तेज़ गति में अपने शहर का धवनी प्रदुषण ना हो के लिए हाथ से मुअल चलने वाले भूपू हैं , और सीटी की जगह पर हाथ से बजने वाली डोरी की घंटी है ... हम सब ये कर सकते हैं बस ज़ज्बा और सहयोग की ज़रुरत होती है ...जो थोडा थोडा ही बहुत हो जाता है ...!!

Monday, July 30, 2012

..जुड़ाव निष्काम होना चाहिए हमेशा प्रतिउत्तर में कुछ पाने का जुड़ाव व्यर्थ है !!

             कल फिर से अपने जाने पहचाने सफ़र पर निकला था ...हजरत निज़म्मुदीन से मुंबई ...अधिकारिक सफ़र रहता है ये अमूमन ...हाँ एक साल पहले ये ही साफ एक पारिवारिक कार्यकर्म में शरीक होने के लिए था जब मेरी दीदी के बड़े बेटे की शादी थी !!
           खैर , देखते हैं इस बार क्या कुछ क्या हुआ ! बी सिक्स ( बी 6 ) में बर्थ संख्या 23 थी मेरी , मनपसंद सीट , साइड लोवर !! 4 : 55 शाम को खुलती है और सवेरे लगभग 9:15 तक बोरीवली ! क्या शहंशाही सफ़र होता है ...एसा मन को लगता है , भाई राजधानी एक्स्प्रेक्स में जो किया है !! भारतीय रेल के विषय में क्या लिखूं ...अगर में आज 10 साल सफ़र कर के राजधानी में उसके बारे में कुछ तारीफ करूंगा तो केंद्रीय मंत्री जी श्री जयराम रमेश की बात झूठी हो जाएगी ना ..उन्होंने कल या परसों ही कहा था : " भारतीय रेल सबसे बड़ा खुला टायलेट ( शोचालय ) है ! " सही है !! ट्रेन प्लेटफोर्म पर कड़ी होने पर इसका प्रयोग ना करने का निवेदन करते विभिन्न प्रकार के बोर्ड लगे दिखेंगे , लेकिन देखते सब हैं किन्तु इसको मानता कौन है ....सवारी तो बाद में चढती है किन्तु उनके पहले बहुत से समाज सेवी आपके प्रयोग में ले से पूर्व ही उनका प्रयोग कर के देख लेते हैं कही आपको कोई तकलीफ ना हो , प्रयोग में !!
            एक अन्तराष्ट्रीय क्लब है , नाम नहीं लिख सकता संभव है उनके संविधान में इस के नाम के किसी भी प्रयोग पर हम पर शायद कुछ कानूनी कार्यवाही हो जाये .... चलिए इस क्लब के एक विशेष और महत्वपूर्ण कार्यकर्म पर नज़र डालते हैं !! , मेरी सीट पर एक सोबर सी महिला आकर बैठी ...उनका 24  नंबर था बर्थ का , साइड अप्पर !! हमें ने एक दुसरे को एक हलकी सी मुस्कान से देखा , अब जिन दो लोगों को लगभग 16 घंटे साथ में जाना हो वो कम से कम एक दुसरे को मूक नहीं हैं, तो समझायेंगे !! 
           थोड़ी देर में एक आवाज़ आई , चाय काफी ? मैंने चाये की  किट ली और उन्होंने काफी !! बस थोड़ी देर में वो गरम पानी का मग दे गया ...ये निर्देश देते हुए " एक में दो बन जायेंगे " !! में तो चुप रहा ...किन्तु दूसरी तरफ बीते एक सूरत के साडी व्यापारी श्री पोपट लाल जी ने कहा : ...क्यों भी रेलवे के पास भी पानी की कमी हो गयी है क्या ?? नाही साब आप बोले तो अलग अलग मग दे देता हूँ .... !! सब ने मन कर दिया !! एक ही में काफी पानी रहता है ...! तब पोपट जी ने राजधानी का मुझ से ज्यादा सफ़र किया था ...वो बताने लगे ...अब देखना 20 साल से चला आ रहा ही मेनू बोलेगा और खिलायेगा ....और हुआ भी वही ...बाद में लिखता हूँ !
             में अपनी चाय बनाने लगा !! मने गरम पानी लिया , और चय के दोनों पैक ( डीप वाले ) काग़ज़ के गिलास में दाल लिए ...और जब दूध का पाउडर डालने लगा तो मुझे एहसास हुआ की मैंने गलती कर दी है ...तभी उन सोबर महिला ने कहा की आपने पहले दूध मिलाना चाहिए था ...उन्होंने अपना गिलास मेरे आगे बाधा दिया ...किन्तु मेने वो नहीं लिया और मनेज़ कर लिया ...!! उसके बाद श्री पोपट जी की बात सुनने लगे , 20 साल से एक ही मीनू है : वेज में : पनीर की सब्जी , अरहर की दाल, सलाद , दही , पराठा - 2 नग , चावल , अचार , नमक ( मांगने पर ) और बाद में एक आइसक्रीम !! नॉन वेज़ में : पराठे ( 2 नग ) , चिकन कर्री , चावल , ,रायता  अचार , दही सलाद और आइसक्रीम !! हाँ एक एक नीम्बू का टुकड़ा भी पानी के एक बोतल तो दे ही चुके होते 7 बजे के लगभग टमाटर का सूप भी !!  नाश्ते में , पोहा या , उपमा , ब्रेड ऑमलेट , ब्रेड वेज़ कटलेट , एक एक मांगो फ्रूटी और टी बस !! जी बिलकुल ये ही होता है ...मुझे या किसी भी सह यात्री की कही भी पोपट भाई को कुछ भी सहायता नहीं करनी पड़ी की आप कुछ भूल रहे हैं ....सब कुछ सही कहा था ....उन्होंने ! हम सब मंद मंद मुस्कुरा रहे थे ....या हम सब की मूक सहमति थी ....किन्तु किंकर्तव्यविमूढ़ता के साथ !! 
              हम सब आठ लोगों के साथ एक और था जिसके लिए ये सब एकदम नया और अनोखा सा था !! नाम : माउले , नागरिकता - ब्राज़ील , उम्र - लगभग 15 वर्ष ! वो उन महिला के साथ ही था , वो उसको अपने साथ दिल्ली और आगरा घुमाने के गयी थी वापी से और हमारे साथ अगस्त क्रांति राजधानी में वापस लौट रही थीं !! मुझसे रहा नहीं गया और शायद वो भी उत्सुक थी कुछ विशेष बताने के लिए ...बस उन्होंने जो बताया ...वो अनोखी सोच को प्रायोगिक कर के आनंद लेने की चरम सीमा के सामान है ....जो श्रध्हा के साथ संतुष्टि देता है .... !!
                दर असल उस कल्ब में जिसकी वो महिला सदस्य हैं में एक कार्यकर्म चलता है ...जिसके अंतर्गत 12 से 15 वर्ष के युवाओं को अपने और दुसरे देश को समझाने के लिए यूथ आदान प्रद्दन किया जाता है , जिसमे दो परिवार एक दुसरे परिवार के युवाओं को एक दुसरे के देश में किसी प्रतिष्ठित परिवार में भेझाते हैं !! जिसका चयन एक विशेष चयन समिति करती है ...जो युवा के पसंद और ना पसंद के हिसाब से नियत करती है की किस को कहाँ जाना है !! उसी के अंतर्गत वो युवा जिसका नाम मोरिलो है आया था ....सुन्दर सा किन्तु गंभीर बच्चा , जिसका की वो महिला बिलकुल अपने बच्चे सा ध्यान रख रही थी !! उसके भोजन चयन पर भी उन्होंने राय दी की उसको वेज़ आर्डर करना चाहिए क्यों की उसको भारतीय मसाले नहीं पसदं किन्तु उसके नॉन वेज़ आर्डर किया ....!! ये उन्होंने मुझे बताया !!  इनके यहाँ से इनका नेफ्यू मोरिलो के घर गया था ...एक सुखद अनुभव ले कर आया !! और ये भी यहाँ से सुखद एवं जीवन पर्यंत याद रखने वाला अनुभव ले कर के जाए ....क्यों की वहां पर ये परिवार जो भारत में इसका ,ध्यान  पसंद ना पसंद , संस्कार का ध्यान रख रहा है दरअसल पुरे भारत का प्रतिनिधित्व ..करेगा ..और एक भी चूक ...भारत की चूक होगी ....जैसे ओलम्पिक में हम अ बी सा नहीं ....भारतीय हैं ....और किसी एक का भी प्रदर्शन भारत का प्रदर्शन होता है खराब या अच्छा !! उसे - मोरिलो को सॉकर देखना अच्छा लगता है किन्तु टेनिस ज्यादा पसंद है , मेने पुछा तो उसने ये ही कहा ....और मुझ से पुछा तो मैंने बताया की मुझे क्रिकेट पसंद है ...वो हल्का सा मुस्कुराया और उस अपनी भारतीय माँ की  तरफ देखा ....तो उन्होंने उसको मुस्कुराते हुए बोला ....हियर इन इंडिया मोस्ट ऑफ़ थे पीपल्स लिखे क्रिकेट !! रात हो गयी।.. हम सब अपनी अपने सीट पर सोने चले गए ...और सवेरे वो वापी उतर गए ....एक सफ़र में क्या क्या समझ बूझ लिया ....सब दुनिया क्या क्या कर रही है , जीवन चलते रहना चाहिए ....अगर कुछ विशेष करते हुए चलेगा तो मानसिक एवं हृदियक संतुष्टि मिलती है , किन्तु ये भी सत्य है की कुछ भी विशेष करने के लिए आपको जुड़ना होता है ...और जुड़ाव निष्काम होना चाहिए हमेशा प्रतिउत्तर में कुछ  पाने  का जुड़ाव व्यर्थ है , स्वयं के लिए !!

Wednesday, July 25, 2012

...कितना भालो लगता है ना....अपना छोटा नैनो.... !

               वो कई दिनों के बाद मिलने वाली ख़ुशी थी .... ! उस दिन अचानक ही बारिश हुई थी ....लगातार हो रही थी ....हमारे इलाके में !!  हम उत्तरप्रदेश में रहते हैं ! सरकार नहीं है ....हाँ सरकार के बनाने से पूर्व भी बारिश हुई थी ...जैसे की होती है ...वादों की ...अब ये मत पूछिए की पुरे हुए कितने ! ये भी कोई सवाल है ? वादे क्या पुरे करने के लिए किये जाते हैं ?? ना ना वो तो सरकार बनाने के लिए किये जाते हैं ...खैर छोडिये हम कहाँ इस बिना नीति के विषय पर दिमाग लगाने लगे .... आइये कुछ बाते बताते हैं उस दिन बारिश के दिन हुए एक गंभीर एहसास के बारे में ........!!
               हाँ , दफ्तर में सब बातें कर रहे थे आज राम जी बरसेंगे , आज तो धरती की प्यास बुझेगी , आज तो सारा वातावरण सुहावना हो जायेगा ....और कितना जिस की सीमा सोचने की और शब्दावली थी सब ने कुछ ना कुछ  कहाँ शायद ही होने वाली बारिश के बारे में ,,,, !
               शाम के छे बजे , हम ने कमर कसी , सब से पारम्परिक विदा ली , और चल पड़े अपनी फटफटिया की तरफ ! कुछ साफ़ किये और किक मार कर चल पड़े ...रस्ते में घोष बाबु को लिया ...एक पान खाने की इक्चा जताई किन्तु घोष बाबु ने हमें मना कर दिया ...लगभग डाँटते हुए !!
               कुछ आगे बढे ....हमारे कारखाने से मेरे घर की दुरी कुल 40 किलोमीटर है ...हमें 5 किलोमीटर की दूरी तय करी तभी हमें कुछ पानी की बूंदों का एह्साह हुआ ...हमें जल्दी से रस्ते के एक बस स्टैंड पर रुके , और अपना अपना रेनकोट ( बरसाती ) पहनी और फिर चल पड़े अपने गंतव्य पर ....झमाझम बारिश , खुली खुली सड़कें , कम ट्रेफिक , और जगह जगह पानी ....और में और घोष बाबु चले जा रहे थे ....कपडे तो भीगने का सवाल नहीं ...रैन कोट जो पहना था ...दर किस बात का !!.......अचानक ही घोष बाबु ने कुछ एसा कहा की मुझे अपने ऊपर गर्व होने लगा , एसा लगने लगा की कहाँ हम कहीं कम हैं ...बस ज़रुरत है तो बस सोच बदलने की .... चलिए बताते हैं घोष दा ने क्या कहा .... बारिश में भीगते हुए बाइक पर सफ़र करना अपने पा में ही अनोखा अनुभव है ....और उस में घोष जी ( अपनी बंगला टोन में ) .... "" कितना भालो लगता है ना ....अपना छोटा नैनो  .... !""  मैंने पलट का पुछा छोटा नेनो ....मतलब ? अरे ये बाईक अपना छोटा नेनो तो है .... छोटा ...जिसमे बारिश भी नहीं लगता ( रैन कोट जो पहना है ) कम फियुल लगता है ....सो ये नेनो नहीं है किन्तु छोटा नेनो है ...बिना छत के .... !
                   हम लोग कितना धोखे में रखते हैं ना खुद को ... पर ये ज़रूरी भी है नहीं तो अगर जीवन सिर्फ यथार्थ की ही सीढियां चढ़ता जाये तो ....साँसे जल्दी फूल जाएँगी और साथ छूठ जायगा .....इस लिए अपनी " मोटरसाइकिल को छोटा नैनों  " मान कर चलिए.....ख़ुशी मिलेगी जब तक " औदी " नहीं ले लेते !!