Tuesday, April 24, 2012

.....बस गले नहीं लगाया उसने मुझे , कह कर चली गयी की आज तुम होश मैं थे .....फिर मिलेंगे !!

" उस दिन अदभुत खुश था मैं .....बस एक और यात्रा के बाद घर जो जाना था , पुरे पंद्रह दिनों से अपनी बहनों से दूर था !! "   

   "२००४ के शुरूआती दिन थे ,  अप्रैल का अंत और मई की शुरुआत के दिन थे , अधिकारिक काम से चेन्नई से कोलकत्ता गया था और फिर मुंबई होते हुए दिल्ली लौट रहा था , जेट एयरवेज़ की कोलकत्ता से मुंबई की शाम के ७.४५ की उड़ान थी ! बाँकुड़ा से हावड़ा आया , कुछ देर विक्टोरिया मेमोरिअल मैं तालाब के किनारे बैठा , चिनिया बादाम ( मूंगफली ) खाई, डाभ पिया और फिर दमदम की लिए निकल पड़ा , कोलकत्ता की मेट्रो के सहारे !! मोनोरम है सब देखना , टिकटिंग का अनोखा सिस्टम है , एक पतली सी टिकट मिलती है जो स्टेशन मैं प्रवेश करते समय वहां लगे अवरोधक के एक किनारे पर रखो और खट कर के वो अपने तरफ उसको खीच लेता है और दरवाजे की दूसरी निकल देता है ...और दरवाज़ा खुल जाता है आपको आगे जाने के लिए !! मेट्रो का सफ़र अच्छा रहा , एयर पोर्ट पर सब कुछ करने के बाद उड़नतश्तरी मैं बैठ गया , नाश्ता मिला , और फिर खाने की तयारी होने लगी, तभी ये लगा की हम बादलों के बीच से गुजर रहे हैं , बहार का नज़ारा और भी मनोरम सा लग रहा था , मैं खिड़की से बहार झाँकने लगा !!!
    एसा लग रहा था की दो भूरी भूरी डबलरोटी के बीच मैं एक मक्खन की टिकिया रखी हो , और हम उसमे रखी फलों के तुकडे !! खैर खाना आया बस पहला कौर ही मुह मैं डाला था की , अचानक , बत्ती गुल और हमारा तैय्यारा , हवाई जहाज़ हिलने लगा , और बाहर खूब बिजली चमकने लगी ......तभी एक उद्घोषणा हुई " कृपया ध्यान दीजिये - " हम लखनऊ के ऊपर से गुजर रहे हैं और बहार के मुसम ख़राब है और संभवतः हमें आकस्मिक लैंडिंग करनी पद सकती है ...आप तयार रहिये ....और पूरा का पूरा ज़हाज़ हिल रहा था ये लग रहा था की शायद हम नहीं बचेंगे ....."

    " पुरे पांच मिनट्स तक हम सब ने जो लोग भी ज़हाज़ मैं थे ना जाने किस किस को याद किया और किस किस से जिनसे भी हमने लड़ाई झगडा हुआ था सब से मुआफी मांग ली, और दोबारा एसा नहीं करने की कसम खा ली , खैर राम राम कर के सब मौत का तूफ़ान गुज़र गया और हम लखनऊ के ऊपर से निकल आये , और सुरक्षित थे .....मौत से सामना किया मैंने , बस गले नहीं लगाया उसने मुझे , कह कर चली गयी की आज तुम होश मैं थे .....फिर मिलेंगे !! "
        जीवन मिल कर जी लीजिये , अकेला हो होना है ही ....!!
                                                    - आपका ही.......... मनीष

Thursday, April 19, 2012

" भूलना और याद न रखना दोनों भिन्न भिन्न बातें हैं "

               "   भूलना और याद न रखना दोनों भिन्न - भिन्न बातें हैं " ....यकीनन ....एक का होना प्राकर्तिक है और दुसरे के लिए हैं खुद को तैयार करते हैं ....किसी विशेष घटना के बाद .....लिकिन ये भी सत्य है की , ये याद ना रखने के प्रयास में हम उस शक्स या घटना को ज्यादा  - ज्यादा  याद रखा करते हैं की उसको भूलना है ......सही है ना.....?  सोचियेगा , सबके साथ होता है ये ...!!
                  

Saturday, April 14, 2012

हम शनिवार को ज्यादा आनंदित रहेत हैं....रविवार की बनिस्बत....!!

                      " आनंद " जी हाँ कितना मुश्किल होता है इसे प्राप्त करना , और इसके लिए कोई विशेष विषय की आवश्यकता नहीं होती.....

         अब देखिये ना ...आज  शनिवार है और कल रविवार ....सामान्यतः ये कोई नई बात तो नहीं ...हमेशा ही शनिवार के बाद रविवार ही आता है ....इस मे क्या नया हुआ ....जो प्रफुल्लित और आनंदित होने का मन हो ....?? आइये हम कुछ वार्ता करते हैं ....!!

        हम नौकरी पेशा लोग शनिवार को रविवार से ज्यादा आनंदित रहते हैं और रविवार से ज्यादा शनिवार का इंतज़ार करते हैं.....वो इस लिए शनिवार को ऑफिस का काम भी होता रहता है और आनंद भी ये सोच कर की कल काम पर नहीं आना ....जल्दी नहीं नहाना , टाइम पर नहीं दूध लाना , दो से ज्यादा बार चाय मिलेगी सुबह सुबह ....ये सब शनिवार को नहीं होता, हाँ शनिवार के बाद मैं होता है ...रविवार को...तो ये शनिवार है तो रविवार है ...इस लिए हम शनिवार को ज्यादा आनंदित रहेत हैं....रविवार की बनिस्बत....!!

      " ये मेरे और आप की बात है ...बस आज का विषय मेरे एक नवीनतम " यात्रा मित्र " ने दिया ....बातों ही बातों मैं उन्होंने कहा ...मैं रविवार से ज्यादा शनिवार को एन्जॉय करता हूँ...आनंदित रहता हूँ...सही कहा ..मेरे और आपके मन की बात कही उन्होंने ...तो आपके मन के बात शब्दों के साथ ...आपके सामने हैं......आनंद लीजिये , प्रफुल्लित रहिये !! "

                                                    स्नेह सहित आपका अपना ही .... मनीष अवधनारायण सिंह





Friday, April 13, 2012

"गलियों- गलियों ढोल- बांसुरी, धान और गेंहूँ की सरगम ! "

"गलियों- गलियों ढोल- बांसुरी,
 धान और गेंहूँ की सरगम !.
 हरा- गुलाबी , लाल - नारंगी,
 आँगन आँगन , सब चन्दन !!
 बीहू के कुछ श्वेत पुष्प और,
 स्नेह दीये , सुख की बाती !
 रंगीले पोंगल के संग संग ,
 आओ      मनाये  बैसाखी !!"
         हार्दिक बधाईयाँ !! 

Wednesday, April 11, 2012

सब की अपनी अपनी ख्वाहिशें हैं और अपने अपने भगवान् ...!!

             " आज बारिश का सा मौसम हुआ है ...हाँ बरस भी सकते हैं ...!! संभावना है .......पार्क मैं मोटापे और शुगर से परेशान लोग घूमते हुए ज़िक्र कर रहे हैं की काश बरस जाते तो मौसम सुहाना हो जाता और घूमने का मजा कुछ और होता ....!!
            ये लोग घूमने इस लिए निकलते हैं की कुछ अनियमित खा कर शुगर और शारीर बिगड़ गया है ...और सुधार के लिए घूमना चाहते हैं .....ठंडी हवा मैं .........

           लेकिन वहीँ दूसरी और किसान दुआ करता है की कुछ दिन और मत बरसना राम जी ....अनाज सुखा पड़ा है ....काट कर घर रख लूं तो साल भर को खाने को हो जाएगा ....वरना सब बेकार....!!
            एक झोपड़ी मैं लेटी बूढी नानी अपने धेवते को देख कर बोलती है की आज कुछ कम है ताप , हे भगवान् आज मौसम ठंडा मत करो दवा के पैसे भी नहीं ...

कमाल है ...इश्वर किस तरह से देखे ये सब ....सब की अपनी अपनी ख्वाहिशें हैं और अपने अपने भगवान् ...!!

Tuesday, February 28, 2012

गुल्लक से भी कीमत वाले,तुझ संग बीते ,वो पलछिन !!

" कांच के टूटे छल्लों जैसी ,
 मेरी - तेरी यादें और दिन !
 गुल्लक से भी कीमत वाले,
 तुझ संग बीते , वो  पलछिन !!
 युगों- युगों की प्यास बुझाते,
 मन शब्दों के सुलझे बोल ,
 मर्यादित से, स्पर्श आलिंगन,
 अनजाने अवरोधों के बिन !! "

गुल्लक से भी कीमत वाले,
तुझ संग बीते ,वो पलछिन !!

  

Friday, February 24, 2012

नदियों की लहरें का कम्पन, मिलते और बिछुड़ते मीत !

            " कितना कठिन होता है कभी कभी ऐसी परिस्थिति का सामना करना जो अपनापन होने के ढोंग जैसी हो...अपनेपन सा  नहीं ....!! "  अपने अपने जीवन मैं हम सब एक ना एक बार ऐसे किसी अनुभव से दो चार ज़रूर हुए होते हैं...हाँ ये ज़रूर है की समझ मैं तब आता है जब कुछ समझने लगते हैं ...यानि बड़े होते है और तब तक सब कुछ घट चूका होता है....और घटना तजुर्बा हो जाती है .....

"नदियों की लहरें का कम्पन,
मिलते और बिछुड़ते मीत !
अपनों का कुछ अपनापन,
बहते झरने, बूँदें और नीर  ,
मन एकांकी, सन्नाटों सा ,
स्वयं संजोया कुछ संगीत !!"