Manish Awadh Narayan Singh
Thursday, February 2, 2012
जुगनु-तारे और ख़ामोशी,हैं सन्नाटों की भाषाएँ !!
" माथे-माथे सूरज बिंदिया , आँखों-आँखों उजियारा,
दिन-घंटों की गठरी बांधे,चढ़ता आता अँधियारा !
मुट्ठी-मुट्ठी कसती जातीं, कल होने की आशाएं ,
जुगनु-तारे और ख़ामोशी,हैं सन्नाटों की भाषाएँ !!"
+ * + * + * शुभरात्री * + * + * +
Tuesday, January 31, 2012
यादें, अनुभव, टूटे सिक्के , सब कुछ था ,पर बिखरा-बिखरा !!
" चलिए उन गलियों मैं जाएँ, जिनसे अपना बचपन गुजरा,
चलिए वो शाखें छु आयें , जिनके सहारे यौवन उतरा !!
इनके उनके लाखों बंधन , जिनका होना, आवश्यकता थी,
यादें, अनुभव, टूटे सिक्के , सब कुछ था ,पर बिखरा-बिखरा !! "
Saturday, January 28, 2012
" रोज़ सहेज सी सांझ ढले , रोज़ - दिवस आता बसंत !! "
" उजले पीले फूल खिले, मन मेरा , अब दर्पण सा,
स्नेह सुगंध की अन्जुलियाँ , नयनो की सब अर्पणता !
अपने संबंधों की सीमा , ज्यों नभ का विस्तार अनंत ,
रोज़ सहेज सी सांझ ढले , रोज़ - दिवस आता बसंत !! "
सरस्वती पूजा एवं बसंतपंचमी की शुभकामनाएं !!
* * * * * >> सुप्रभात << * * * * *
Wednesday, January 25, 2012
सुख और सुख की चाहत दुःख का मुख्य कारण बनती है !!
" सुख और सुख की चाहत दुःख का मुख्य कारण बनती है ....लेकिन ये भी सच है ...सुख की चाहत किये बिना जीवन नहीं आनंदमय लगता ! " अकारण और अनावश्यक आनंद एवं अनुभूत दुख में भेद कर पाना ही ....चलायमान जीवन की कुंजी , संभवतः है !!
शुभ दिवस !!
दिन की कठिनता , को विश्राम दें !!
" सर्द रातों मैं झरती हुई, पंखुरी,
डाली-डाली पवन हो रही, बांसुरी !
ओस के सब दिए, आँखे मूंदे हुए,
शब्द गढ़ते हुए, कर रहे आरती !!
समय हैं , निशा है, निशानों को जोड़ें,
दिन की कठिनता , को विश्राम दें !!
एकांकी नुक्कड़, सड़कें, गलियाँ वीरानी,
हम भी अपनी आंखें मूंदें, सो जाएँ !!
***** शुभरात्री *****
Tuesday, January 24, 2012
......... गुल्लक की टूटी हुई , पेंदियाँ !
" किताबों में मिलते गुलाब, अब कहाँ,
गुल्लक की टूटी हुई , पेंदियाँ !
दीवारों पे लिखी हुई कुछ ग़ज़ल ,
पन्नों मैं लिपटी हुई तितलियाँ !!
बचपन को जल्दी भुलाने की ज़िद,
अपने घरोंदों के होने की, लौ !
सभी कुछ मिले ,ये सोचा किये,
फिसलता गया सब, ज्यों मछलियाँ !! "
>>>> शुभ दिन <<<<<
Monday, January 23, 2012
गुन-गुन करती रात के संग, धीरे धीरे सो जाएँ !!
चाँद की शीतल किरणों का , हौले हौले से आना,
रेल की पटरी का कम्पन , धीरे धीरे थम जाना !
पुल पे चलती सर्द हवाओं के संग उडती धुल नहीं,
हम भी भूले, तुम भी अपना खालीपन लौटा आना !!
दिन के सारे कारण , लंबित अंधियारों से बतियाएँ ,
यादों के कुछ ताप सहें, उलझन मैं सब आशाएं ,
गुन-गुन करती रात के संग, धीरे धीरे सो जाएँ !!
@ @ @ @ @ शुभरात्री @@@@@
Newer Posts
Older Posts
Home
Subscribe to:
Posts (Atom)