Friday, June 27, 2014

एक कहानी : " सेतु "

         " कसौनी " की एक पहाड़ी पर सूरज ऊँघ रहा था ! नीचे तलहटी में ठंडी हवाएँ कोहरे को गोद में उठाये लहरों पर सफर पे निकली थी ! परमहंस त्रिपाठी अपने बंगले में पूरे जोश से जलते अलाव के सामने बैठे नीबू की चाय का आनंद ले रहे थे की अचानक काँच के बर्तन के टूटने की आवाज़ ने उन्हें उस बेहद सर्दी की शाम कंपकपा दिया ! "
 
          मुझ से ये टूट गया !  स्वेटर कोहनियों तक चढ़ाये , हाफ नेकर में , गले में गुलाबी मफलर और सर पर मंकी टोपी पहने  सौम्य उनके सामने खड़ा था , डरा सहमा हुआ !
 
सफ़ेद पश्मीना का दोशाला ठीक करते हुए त्रिपाठी जी ने उसे देखा और मुस्कुराते हुए बोले : एक कप और चाय ले कर आओ !
 
सौम्य : साब , मुझ से ये टूट गया !
 
त्रिपाठी जी : हाँ ,वो तो देख रहा हूँ !
 
सौम्य : तो ?
 
त्रिपाठी जी : तो क्या ?
 
सौम्य : आप मुझे कुछ नहीं कहेंगे ?
 
त्रिपाठी जी : हाँ कह तो  रहा हूँ , एक कप और चाय ले कर आओ !
 
सौम्य हाथों में पकडे टुकड़ों की तरफ देखता हुआ रूंधे गले से बोला: ये बहुत महंगा था ना साब !
 
त्रिपाठी जी : भाई , इस वक़्त मुझे चाय चाहिए और उसकी कीमत मुझे पता है इस समय , तुम गए की में खुद जाऊं किचन में ?
 
सौम्य भागता हुआ किचन में गया और कप भर लाया !
 
सौम्य कप को उनकी तरफ बढ़ाते हुए बोला : साब , आप मुझे कुछ क्यों नहीं कहते इतना नुक्सान होने के बाद भी ?
 
त्रिपाठी जी फिर मुस्कुराये और बोले : बाहर से एक गुलाब का फूल तोड़ कर लाओ और लौटते वक़्त दरवाज़े के शीशे मत बंद करना ! बाहर की बत्ती जला देना और गेट पर ताला मत लगाना आज !
 
सौम्य : फिर तो ठंडी हवा और कोहरा अंदर आ जाएगा !
 
त्रिपाठी जी : हाँ , आने दो , तुम गुलाब के कर आओ , फिर बात करते हैं !  और हाँ , अपना ट्रैक सूट पेहेन लो ठण्ड बढ़ रही है ! होमवर्क पूरा नहीं हुआ हो तो वो भी लेते आना ! 
 
त्रिपाठी जी कंधे से सरकते दोशाले को ठीक करते हुए बोले !

     सौम्य उठा और ढलती शाम के सहारे धरती पर उतरते कोहरे की चादर के बीच से होता हुआ लॉन के दूसरे छोर कर लगे गुलाब को ले आया ! बाहर की लाइट जला दी ! पड़ोसियों के घर से हलवे के लिए देसी घी में भुनती सूजी की खुशबू ने उसे कुछ देर दरवाज़े पर ही रोके रखा !

त्रिपाठी जी : क्या हुआ सौम्य, अंदर आ जाओ !

सौम्य ने दरवाज़ा बंद किया और गुलाब का फूल ले कर अंदर अपने कमरे में चला गया ! ट्रक सूट पहना और फिर त्रिपाठी जी के पास आकर फूल उनकी तरफ बढ़ाते हुए बोला : ये लीजिये !
 
          त्रिपाठी जी एक बड़ी यूनिवर्सिटी के रिटायर VC थे तो गंभीरता स्वभाव में ऐसी थी जैसे रंगीन काग़ज़ पर उकेरी गयी स्याह तस्वीर !

         अलाव में जलती लकड़ियों की चरमराहट ने अनोखा संगीतमय माहौल सृजित कर दिया था ! पहाड़ों के शांत आँचल में अटखेलियां करती नदी की लहरें और उनसे उठता तरन्नुम अपनी और खींचता था तो दूर खिलते चाँद को बाग़ में फूटते हरश्रृंगार की खुशबू टिमटिमाते तारों को खूबसूरत घरती का रास्ता दिखाती थीं !
 
सर, वाक़ई आप मुझे कुछ नहीं कहेंगे ?

सौम्य ने  गंभीर होते वातावरण में हलके से शाब्दिक कंकरी उछाली !
 
त्रिपाठी जी लगभग ऊँघ रहे थे !
 
सर, काफ़ी महंगा होगा ना वो जो मुझ से टूट गया ? सौम्य ने फिर कोशिश करी ! 
 
हाँ , महंगा तो था बेटा !

त्रिपाठी जी ने पहला प्रश्न भी सुना था किन्तु उत्तर बाद वाले का दिया , कुर्सी पर ठीक से पीछे सरकते हुए !
 
सौम्य : तो सर अब मैं क्या करूँ ?
 
त्रिपाठी जी : क्या , अभी तक टुकड़े डस्टबीन में नहीं रखे ?
 
सौम्य : हाँ , वो तो डाल दिए, लेकिन  ……। 
 
त्रिपाठी जी : क्या चाहते हो ?
 
सौम्य : सर, मुझे आत्मग्लानि हो रही है !
 
त्रिपाठी जी अपनी आराम कुर्सी से उठे और सौम्य के करीब आ कर गाढ़ी लाल रंग की कालीन पर बैठ गए !
 
सौम्य सिकुड़ सा गया ! वैसे ही जैसे छुई मुई के पत्ते सिकुड़ जाते हैं गंभीर स्पर्श से !
 
      जब मैं तुम्हारी उम्र का था तब आया था दिल्ली और वही पर मेरी मुलाक़ात हुई थी विष्णु से ! चांदनी चौक पर जब में भटक रहा था तब मुझे विष्णु ने सहारा दिया था ! दो हफ्ते उसके साथ ही रहा था ! पटरियों के किनारे उसके झोपड़े में !
 
          विष्णु का दिन शुरू करता था भगवान की पूजा से ! उस झोपड़ी में जिसका खुद का कोई भविष्य नहीं था वो अपने और फिर दो हफ़्तों तक मेरे अच्छे भविष्य की कामना करता था ! फिर वो निकल पड़ता था काम पर ! ढेर सारे फूल और उनकी खुशबू के बीच उसका दिन गुजरता था ! कभी गुलाब की पंखुड़ियों का गठर उठाना तो कभी मोतिया के लच्छों को यहाँ वहां पहुचना ! कभी गेंदे के फूलो को तोड कर ढेर बनाना तो कभी रजनीगंधा की कलियों पर पानी का छिड़काव ! कभी  अशोक के पत्तों की लड़ियाँ बनाना तो कभी सूखे हुए फूलो को ठिकाने लगाना ! पूरा दिन फूलों के बीच ! चाय पानी , खाना पीना , नाश्ता और फिर घर शाम को थक हार कर आ जाना ! दिन में कभी गुरूद्वारे में लंगर कर लिया तो कभी जैन मंदिर में प्रसाद खा लिया ! कभी लाजपतनगर में पीपल के पेड़ के नीचे छोले भठूरे खा लिए तो कभी दूर लाल क़िले के पास छोले कुलचे का स्वाद ले लिया ! दो हफ्ते मैंने ही किया ये सब ! फिर पता लगा की अपनों का होना कितना ज़रूरी है इस दुनिया में जब तक आप ज़िंदा हैं !
 
त्रिपाठी जी सौम्य के कन्धों पर हाथ रखे रखे बोल रहे थे और सौम्य अपने वर्तमान को समझने की कोशिश करता था हर शब्द के साथ !
 
त्रिपाठी जी ने आगे कहना शुरू किया :   एक रोज़ सुबह सवेरे छुट्टी का दिन था पिताजी रात देर से लौटे थे ! हम दोनों भाई खाना का कर उछल कूद कर रहे थे की मेरी निगाह पिता जी के स्टडी टेबल पर रखे सुन्दर गोल्डन कैप वाले फाउंटेन पेन पर पड़ी और मैंने झट से उठा लिया ये कहते हुए की ये मैं लूँगा ,बस छोटे भाई से मेरी खींचा तानी हुई और ऐलुमिनियम का गोल्डन प्लेटेड कैप ज़मीन पर गिर गया और उस पर मेरा पैर पड़ गया !

वो चिपटा हो गया था !

पिता जी कच्ची नींद में थे , रात देर से सोये थे वापस लौटने के बाद !

         हमारा शोर अचानक से  रुक गया और वही सन्नाटा कारण बना पिता जी के नींद से जागने का , उन्होंने ज़मीन पर पड़े चिपटे कैप को देखा और एक तमाचा जड़ दिया मेरे गुलाबी गाल पर ये कहते हुए की : तुम बड़े हो सिर्फ उम्र से अकल से कब बड़े होओगे ? दे देते छोटे भाई को , कम से कम नुकसान से तो बच जाते !

         ये सब इतना अचानक हुआ की कुछ समझ नहीं आया ! माँ , बड़ी दीदी ,  घर में काम करने वाली आंटी और पड़ोस से आई एक दीदी की सहेली सब देख रहे थे ! अच्छा नहीं लगा मझे !

मुझे पता नहीं क्या सूझा और मैंने जवाब दिया पिता जी को : क्या मुझे पीटने से नुकसान की भरपाई हो गयी आपकी ?  इसके जवाब में एक और तमाचा मेरे गाल पर पड़ा और फिर माँ ने मुझे अपने से चिपका लिया !

          पूरा दिन और पूरी रात मेरे दिमाग में ये सब चलता रहा ! क्यों किया पिताजी ने मेरे साथ ऐसा सब के सामने ! मुझे कितने सवाल खुद से करने पड़ रहे थे और उनके जवाब ढूंढने निकल पड़ा मैं देर रात एक चप्पल और वही टूटा कैप का पेन ले कर सुनसान रस्ते पर ! रोडवेज़ की बस से दिल्ली पहुंच गया ! वहीँ विष्णु ने मुझे से गेंदे के फूलों का गट्ठर सर पर रखने की मदद मांगी और फिर बातों बातों में मैं उसके साथ हो लिया !
          
         पूरे दो हफ़्तों बाद पता लगा की अपनों की कमी …………तब ज़यादा लगती है जब आपको पता हो की आपके आपने आपके आस पास हैं लेकिन आपके साथ ना हों !

        कुछ दिनों के बाद विष्णु ने ही मुझे मेरे घर भेजा ! उसने सब किया मेरे लिए ! मेरे घर पर इत्तला दी ! फिर पढ़ाई लिखाई और सरकारी नौकरी ! मैं विष्णु को भूल ही गया था जैसे ! कई बार सोचा अपनी ट्रांसफर वाली नौकरी में एक बार तो फूल बाजार जा कर पता करूँ विष्णु के बारे में लेकिन अफ़सोस मुझे समय नहीं मिला और समय निकलता गया !
               
         सौम्य गुमसुम सा सब सुनता जाता था ! बाहर ठंडक बढ़ गयी थी ! भीतर यादों की ताप से वातावरण गरमाया सा था और त्रिपाठी जी बोलते जाते थे !
 
        त्रिपाठी जी ने पानी का गिलास पास की टेबल पर रखते हुए आगे कहा :

          एक रोज़ जब यूनिवर्सिटी के काम से दिल्ली में था तो अचानक उस से मुलाक़ात हो गयी ! वो अब भी फूलों के करीब था ! फ़र्क़ था तो इतना की नगर निगम के पार्क में कॉन्ट्रैक्ट के माली के रूप में ! मैं चांदनी चौक पर नई सड़क की तरफ मुड़ने वाली सड़क के कोने पर रखे लंबे बेंच पर दरी वाले के सामने खड़े छोले कुलचे वाले से नीम्बू लेने को मुड़ा ही था की वो मुस्कुराता चेहरा मुझे दिखा ! बरसों पहले वाली ही मुस्कान ! तज़ुर्बा चहरे की झुर्रियों  से बाहर झांकता था तो भावनाओं के पानी से सूख चुकी आँखें भीतर गड़ी जाती थीं ! हम अचानक मिले थे ! उसे याद  मेरा नाम हंस !
 
सौम्य : आप उनको लेकर अपने साथ आ गये ?
 
त्रिपाठी जी : नहीं ,वो नहीं आया ?
 
सौम्य : तो अब वो क्या वही रहते हैं ?
 
त्रिपाठी जी : हाँ शायद !
 
सौम्य : फिर आप कभी नहीं मिले उनसे ?
 
ना : त्रिपाठी जी बोले !
 
घने होते कोहरे के बीच बाहर दरवाज़े पर कुछ आहट हुई !
 
त्रिपाठी जी : देखो तो सौम्य !
 
सौम्य दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा !
 
अरे दादा जी आप यहाँ अचानक ? कुछ खबर नहीं दी ?  : सौम्य किसी से पूछ रहा था !
 
त्रिपाठी जी भी पश्मीना का दुशाला ठीक करते करते दरवाज़े के करीब आ गये थे !
 
कौन है सौम्य ? त्रिपाठी जी ने बाहर टिमटिमाते बल्ब की धुँधली रौशनी में देखने की कोशिश करते हुए पुछा !
 
मेरे दादा जी है : सौम्य ने चहकते हुए जवाब दिया !
 
इतनी रात में और यहाँ ? तुमने तो कभी इनका ज़िक्र नहीं किया ! ठीक है अंदर आओ उनको ले कर बाहर ठंडक है बढ़ रही है : त्रिपाठी जी बोले !
 
          चहरे पर हलकी सी दाढ़ी ! मुस्कुराता चेहरा ! आँखों पर पुराना ऐनक और एक हाथ में छड़ी लिए एक व्यक्तित्व धीरे धीरे अँधेरे से रौशनी की तरफ बढ़ रहा था ! भीतर खड़े त्रिपाठी जी के चहरे पर की सिकुड़न विस्तृत होती जाती थी और होठो से अचानक शब्द निकले : अरे , विष्णु तुम ?
 
        दो बीतते युग आमने - सामने थे और उनके बीच खड़ा वर्तमान जो अभी अभी बीते कल के सफर से गुजरा था अपने भविष्य की राह देखता था दोनों की बाँहों के सहारे ! स्तब्ध और शांत ! अलाव की लकड़ियाँ चरमराते हुए आवाज़ लगा रही थी की करीब आओ और जमीं हुयी यादों एवं प्रश्नो की बर्फ को पिघलने दो !
 
         रात के खाने के बाद सौम्य तो सो गया तब विष्णु ने सब कहा : बहुत साल पहले मुझे सौम्य मुझे स्टेशन पर भटकता मिला था जिसे मैंने अनाथश्रम में रखवा दिया ! वहाँ से तुम उसे अपने साथ ले आये ! ये जब भी मौका मिलता मुझे मिलने ज़रूर आता था वही सरदार पटेल की मूर्ति वाले पार्क में ! हम दोनों एक एक कंचे वाली ठंडी निम्बू पानी की बोतल पीते और फिर उसको मैं बस में बैठा कर वापस आ जाता ! स्कूल यूनिफार्म में खूब अच्छा लगता है मुझे ये ! जब तुम रिटायर हुए तब इसने मुझे बताया की तुम दूर पहाड़ पर रहने जा रहे हो और वहां का पता दिया !  
 
           रिटार्यड परमहंस त्रिपाठी और विष्णु की आवाज़ें गुजरती रात के साथ - साथ मद्दम होती जाती थीं और दूर बहती नदी पर बने सेतु से गुजरते रात के मुसाफिरों की फुसफुसाहटों से सन्नाटा बार - बार नींद से जाग जाता था ! बगल के कमरे में सोता इन दोनों के बीच का सौम्य रूपी " सेतु " भविष्य के आगंतुकों की राह तकता था करवटें बदलते हुए चादर की सलवटों में गुलाब की पंखुड़ियों सा !
 
एक कहानी  : " सेतु " 
 
                                            **********  समाप्त **********

Wednesday, May 28, 2014

एक कहानी : वो गुलाबी पेन !!

            विशाखा अपने दफ़्तर में बैठी किसी का इंतज़ार कर रही थी ! उसकी निगाहें टिक - टिक करती पुरानी पेंडुलम वाली घड़ी पर टिकी थी ! खिड़कियों से आती जाती ठंडी हवांयें पास के मंदिर से लोहबान की खुशबू आपने साथ ले आती थीं ! सड़क पर शोर कुछ कम हो चला था ! पास के स्टेशन से आखिरी ट्रैन के अनाउंसमेंट हो चूका था ! पास के मोहल्ले में लगने वाली साप्ताहिक पैठ से अपनी दुकानदारी समेट कर व्यापारी वापसी  पर थे ! सब दीखता था विशाखा की पीछे वाली खिड़की से ! शाम रात में तब्दील होने को बैचैन थी की अचानक दरवाज़े पर तैनात सिपाही ने सेल्यूट करते हुए विशाखा का ध्यान अपनी तरफ खींचा !
 
जनाब, कोई आबिद आप से मिलना चाहते हैं !
 
विशाखा ने सम्भलते हुए कहा : हाँ , उन्हें अंदर भेजिए !
 
सिपाही ने फिर से सेल्यूट किया और गर्वीले अंदाज़ में घूम गया !
 
आओ आबिद आओ , कोई परशानी तो नहीं हुई आने में ! विशाखा ने २३ , २५ साल के युवक आबिद से ममता भरी आवाज़ में कहा ! अपनी सीट से उठ कर  लगभग दरवाज़े तक आ गयी थी वो आबिद को लेने के लिए  !
 
        आबिद , एक लम्बा अच्छी डिल डॉल वाला, नव युवक सुन्दर गोल चेहरा , नीली आँखे , काले रंग की टी शर्ट और डार्क ब्लू कलर की जींस में दरवाज़े की चोखट पर खड़ा झिझक रहा था रौबीली विशाखा के बड़े से दफ्तर में कदम रखने से ! वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थी वो जिले की ! ये पहली पोस्टिंग थी विशाखा की इस वरिष्ठ पद पर ! लगभग १५ सालों बाद मिल रहे थे दोनों एक दूसरे से !
 
आबिद ने विशाखा के पैर छुये और नमस्ते कहा !
 
डबडबाई आँखों से विशाखा ने आबिद को उठाते हुए उसका माथा चूमते हुए गले से लगा लिया !
 
विशाखा : आ , बैठ यहाँ !
 
         बड़े बड़े सोफों पर बैठने के इशारा करते हुए विशाखा ने आबिद का बैकपैक ले कर सिपाही से अपनी गाड़ी में रखने को दिया और थोड़ी देर में निकलते हैं कह कर तैयारी करने को कहा !
 
सिपाही ने जी जनाब कहते हुए लॉगबुक आगे कर दी !
 
विशाखा : आबिद वो पेन पकड़ाना !
 
आबिद ने अपनी जेब से एक पेन निकाल के विशाखा की तरफ बढ़ा दिया और विशाखा ने लॉगबुक पर सिग्नेचर कर के पेन आबिद की तरफ़ वापस बढ़ाया ,
 
तभी आबिद ने पुछा :
 
दी , आपको ये पेन याद है ?
 
विशाखा को जैसे किसी ने बर्फ के टुकड़े से छू दिया हो , ये प्रश्न ऐसा था उसके लिए !
 
आबिद : दीदी ,आपको ये पेन याद है ?

विशाखा : हाँ रे , इसी पेन से हो हमारी दोस्ती हुई थी ! वाह , तूने ये अभी तक संभाल कर रखा है !!
 
आबिद : दीदी ये मेरी बांह पर लगे ठीके  का दाग़ और ये पेन ताउम्र मेरे साथ रहेंगे !
 
विशाखा : पेन तो ये पकड़ और बता खा खाएगा , रस्ते से लेते चलेंगे घर पर तो नार्मल खाना बन चूका होगा मैंने किसी से तेरे आने की बात नहीं कही है !
 
आबिद : दीदी, अगर आज वो ही गोबी की पकौड़ियाँ खाई जायें तो ? जो आपने वैभव भैया की शादी के दिन बारात के जाने के बाद बनाई थी ?
 
             विशाखा ने मुस्कुराते हुए घर पर नौकर को गोबी खरीद कर रखने को कहा और आबिद को ले कर चल दी अपने बड़े से सरकारी बंगले की तरफ ! आगे पीछे सिपाहियों की कतारें ,  हर काम के लिए एक सिपाही ! 
 
            विशाखा के लिए रोज़ दफ़्तर से घर जाना जैसे एक दूसरी डियूटी पर जाने जैसा था ! अकेले रात भर सरकारी बंगले में कभी लैपटॉप तो कभी टेलीविज़न तो कभी रेडिओ के साथ नींद आने तक कर सफर और फिर सुबह जल्दी से दफ्तर , घर पर रुके भी तो किसके लिए और घर वापस जल्दी आये तो लिए !
 
            लेकिन आज ऐसा नहीं था ! उसका छोटा भाई आबिद था उसके साथ ! दफ्तर से सरकारी गाड़ी तक पहुचने में जितने भी अधिकारी मिले सब से आबिद को मिलवाती चली विशाखा मेरा छोटा भाई है कह कर !
 
सब अधिकारिओं ने पहली बार अपनी साब के चहरे पर मुस्कान देखी थी , मातृत्व देखा था !
 
विशाखा ने रस्ते से कुछ कोक और स्वीट्स खरीदी ! बंगले के पास के मदर डेरी वाले को फ़ोन कर दिया की घर पर एक टूटी फ्रूटी आइसक्रीम की ब्रिक पंहुचा दे !
 
आबिद पूरे रस्ते विशाखा को देखता रहा ! उसके हाव भाव पढता रहा ! बीच बीच में आते अधिकारीयों के फ़ोन काल पर वो कैसे बात करती थी , जवाब देती थी सुनता रहा और याद करता रहा १२ , १५  साल पहले का वो दिन जब पहली बार वो विशाखा से मिला था !

अरे आप कहाँ चली गयी थी फातिमा बी , इतना सारा काम पड़ा है ! विशाखा की चाची ने आबिद की अम्मी को ज़ोर दे कर बोला !

फ़ातिमा बी : जी , आबिद के स्कूल की  छुट्टी का वक़्त था तो बस उसको लेने थी !

चाची : ठीक है , अब आगया ना ! अब काम देख लीजिये !

फातिमा बी : जी अच्छा कहते हुए ८ , ९ साल के हाफ़ नेकर में खड़े आबिद से बहार बरामदे में जा कर बैठने को कहा !

आबिद : अम्मी , प्यास लगी है !

फातिमा बी : अच्छा तुम वहां चलो  पानी लाती हूँ !

          आबिद बाहर बरामदे में  किनारे बैठ गया और देखने लगा कही फूल तो कहीं लाईट लगाते कारीगरों को ! कभी कोई आता तो कभी कोई ! सब्ज़ियों के ठेले , तो कभी राशन वाले के रिक्शे ! कभी दूध के बर्तन तो कभी मिठाइयों से भरी टोकरियाँ ! कभी उसके आस पास से खेलते हुए गुज़ारे शादी में शामिल होने आये रिश्तेदारों के बच्चे तो कभी वैभव भैया के दोस्तों के  सिलसिला ! एक दो बार कुछ लोगो ने आबिद से घर से किसी को बुलाने को कहा और आबिद बड़े अपनत्व से भीतर जा कर जो भी पहला शख्स मिला उसे बुला लाया ! मानो जैसे उस बड़े घर में उसके होने की भी सब को फ़िक्र है ! कभी चाचा जी ने किसी मेहमान के आने पर आबिद से ही कह डाला जाओ अंदर जा कर चाय नाश्ते का देखो !

        इस सब में शायद अम्मी पानी देना भूल गयी थी आबिद को, पर कोई था जिसे ख्याल था की आबिद स्कूल से सीधे शादी के घर में आया है और भूखा प्यासा है सब बरात की तैयारी में लगे थे तो सका ख्याल अम्मी को भी नहीं रहा !

किसी ने आबिद की तरफ एक पत्ते का दोना और गिलास में पानी आबिद की तरफ बढ़ाते हुए कहा , लो तब तक पानी पियो तुम्हारी अम्मी काम कर रही है !
 
आबिद : जी अच्छा !

            इस घर में पहले तो देखा नहीं था आबिद ने इनको !  शायद वैभव भैया की रिश्तेदार होंगी और शादी में आई है ! कितनी अच्छी है ! आबिद पानी पीते और मिठाई खाते सोचता जाता था की तभी चाची ने आवाज़ लगाईं !

कहाँ रह गई विशाखा ?

विशाखा आई चाची कहती हुई  अंदर चली गयी !

चाची : विशाखा बार बार मैं काम के लिए टोकूंगी नहीं , बड़ी हो सब बच्चो में कुछ तो ख्याल करो भाभी जी और भैया का ! शादी के घर में कई तरह के लोग आते हैं और तुमको इस लिए भी हॉस्टल से शादी में बुलाया है की शायद किसी की तुम पर नज़र पड़े और तुम्हारी शादी की बात बने ! तुम्हारे चाचा कब तक अपने बच्चो के साथ साथ तुम्हारा भी खर्च उठाते रहेंगे ! भैया भाभी कुछ छोड़ कर तो गए यही जो था वो सब उनके इलाज़ पर खर्च हो चूका है ! तुम समझ रही हो ना ?

 " विशाखा तो जैसे कोने में लगी तुलसी सी सुकुड गई थी ! कड़वे शब्दों और घूरती निगाहों के स्पर्श से मुरझने को थी वो की तभी आबिद भीतर आया और बोला  : दीदी वो डाकिया आया है ,कोई रजिस्टरी है ,कहता है बिना सिग्नेचर के नहीं देगा ! "

चाची : अच्छा अच्छा उसको रोको अभी आती हैं तेरी दीदी !

विशाखा ने मन ही मन आबिद और देखिए को शुक्रिया कहा , नहीं तो और कुछ से चाची बातों के ताने देती !

डाकिया : यहाँ सिग्नेचर करिये !

विशाखा : जी पेन दीजिये !

डाकिया : बिटिया , आज पेन मेरा रास्ते में गिर गया !

विशाखा : ओह्ह , ठीक है रुकिए मैं लाती हूँ अंदर से !

आबिद : दीदी ये लीजिये पेन , चलता गुलाबी है मुझे पिछले हफ्ते ही क्लास टीचर ने दिया था , पूरी अटेंडेंस होने पर  !

विशाखा ने रजिस्ट्री ले ली और गुलाबी पेन को लिए लिए भीतर चली गयी !
 
आबिद बाहर बैठा बैठा इंतज़ार करता रहा ! अपनी अम्मी और विशाखा का भी !
 
       पूरी गली में रौशनी , बैंड बाजा, शहनाई का तरन्नुम , केवड़े और गुलाबजल की खुशबु , सजे धजे मेहमान ! चारो तरफ़ खुशियों और उल्लहास  माहौल ! वैभब भैया की बारात चलने को थी !
 
चाचा : अरे , विशाखा तुम नहीं चलोगी ?
 
अभी विशाखा कुछ बोलती चाची बीच में बोल उठी , सब शादी में चले जायंगे तो  घर पर कौन रहेगा !
 
चाचा : अच्छा ठीक है , विशाखा तुम यही रुको , फातिमा बी से भी बोल देता हूँ रात में इधर ही रुकने को !
 
विशाखा : जी चाचा जी आज देर शाम मेरे आई पी एस का रिजल्ट आने को है रिटन का मैंने आपका ही नंबर दिया है अपने दोस्त को , हो सका तो वो आपको फ़ोन करेगा लखनऊ से !
 
चाची : अरे इतने शोर में कहाँ फ़ोन सुनाई देगा ,कल सुबह शादी के बाद देख लेंगे !
 
मायूस हो गया विशाखा का चेहरा और पास खड़े आबिद को भी कुछ ठीक नहीं लगा ये सब !
 
             बारात जा चुकी थी ! घर में दिन भर के शोर ने ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली थी ! बड़े से घर के दरवाज़े खिड़की बंद कर के विशाखा अकेली बैठी थे ड्राइंग रूम में ! तभी नीचे से फातिमा बी ने आवाज़ लगाईं :
 
विशाखा दरवाज़ा खोलो , आबिद को तब तक रखो अपने साथ में घर पर खाना बना कर बुला लूंगी उसको !
 
विशाखा : चाची ( फातिमा बी को भी चाची पुकारा उसने ) , आप यही रहिये और यहाँ जो खाना बना है वो ही बहुत है हम सब के लिए !
 
        आबिद को अचानक जैसे किसी ने झकझोर दिया था ! उसकी माँ को किसी ने चाची कह कर पुकारा था ! वो भी विशाखा ने जो अब तक के मिले सब लोगो में सब से अच्छी लगी थी उसको !
 
मौसम खराब हो चला था ! तेज़ बारिश , बिजली का चमकना और फिर तेज़ हवायें ! ठंडक बढ़ गयी थी !
 
चाय पियेंगी चाची : विशाखा ने फातिमा बी से पुछा और आबिद से बोली तुम खाना खा लो ,  फिर सो जाना !
 
आबिद : क्या है , खाने में दीदी ?
 
कढ़ी और चावल ,पर पकौड़ियाँ खत्म हो गयी हैं !
 
आबिद : तो क्या हुआ , लाइये दीजिये बगैर पकौड़ियों के खा लूँगा !
 
     अजीब से संतोष की खुशबू  थी आबिद के इस कथन में जैसे भरी दोपहर में तेज़ लू के बीच अचानक चन्दन की खुशबू फ़ैल गयी हो !
 
अच्छा रुको आबिद कुछ देर ! विशाखा ने एक तरफ चाय और एक तरफ गोभी की पकौड़ियाँ बनाई !
 
आबिद खाने के बाद विशाखा की गोद में ही सो गया और फातिमा बी के  कहने के बावजूद उसने उसे अपने से अलग नहीं किया !
 
    पड़ोस के घर में लैंड लाइन कब से बज रहा था ! सब तो शादी में गए थे बस एक २० , २३ साल का लड़का विपुल  था जो कभी कभी विशाखा को छत से देखा करता था !
 
विपुल : अरे ,विशाखा है कोई वैभव भैया के घर में !

फ़ोन वाले घर से उस लड़के ने आवाज़ लगाईं !
 
विशाखा ने आबिद के सर को धीरे से सोफे के कुशन पर संभाल कर सरकाया और भाग कर गयी बरामदे में !
 
हाँ बोलो ?
 
विपुल : तुम विशाखा हो ?
 
हाँ ? क्यों क्या हुआ ?
 
विपुल : तुम्हारे चाचा जी का  फोन था , तुम्हारा रिज़ल्ट आ गया है और तुम ने क्लियर कर लिया है !
 
उछल पड़ी इतना सुन कर ! छलांग लगाने को तैयार इतना उत्त्साह !
 
विपुल : अरे , सम्भलना और पहले अंदर जाओ , मैं आता हूँ वहां थोड़ी देर में !
 
विशाखा बिना चुन्नी के चली आई थी बरामदे में , विपुल के अंदर जाओ कहने के बाद समझी और नज़रें झुका कर अंदर चली गयी !
 
विपुल दरवाज़े पर था छतरी लिए , फातिमा बी ने अंदर आने को कहा उसको !
 
विपुल : किस चीज़ का एग्जाम क्लियर किया तुमने ?
 
आय पी एस का रिटन ! विशाखा बोली !
 
वाओ , ये बड़ी अच्छी बात है ! लाओ मिठाई खिलाओ !
 
विशाखा ने लो कहते हुए परवल की घर में बनी मिठाई आगे बढ़ा दी !
 
अपना लैंड लाइन नंबर दे दो प्लीज़ , कभी  चाचा जी से बात करने को मन किया तो कॉल कर लूंगी !
 
विपुल  : हाँ हाँ , लाओ पेपर और पेन दो !
 
विशाखा ने वो आबिद का गुलाबी पेन आगे बढ़ा दिया ! विपुल ने नंबर लिखा और पेन अपनी जेब में रख लिया , शायद जान बूझ कर किया था उसने !
 
आबिद अब जाग गया था ! सब सुन और देख रहा था !
 
      बारिश थमी तो विपुल अपने घर लौट गया ! अगले दिन बारात वापस आई ! विशाखा अपने हॉस्टल  फिर वहां से ट्रेनिंग पर गयी ! सब का व्यवहार बदला बदला था ! कुछ दिनों में पोस्टिंग और पोस्टिंग के साथ वो आज सीनियर पोस्टिंग पर थी !

ड्राइवर ने लंबा हॉर्न दिया , गाड़ी बंगले के सामने कड़ी थी !
 
ओ भाई कहाँ खोये हो ? घर आ गया ! सरकारी गाड़ी में पुरानी यादों में खोये आबिद को विशाखा ने पुकारा !
 
आबिद का यादों का झूला अचानक थम गया था !
 
आओ आबिद ये है तुम्हारी दीदी का घर ! विशाखा ने गर्मजोशी से आबिद का स्वागत किया !
 
    डिनर के बाद आइसक्रीम खाते हुए आबिद ने विशाखा से पुछा : दीदी आप इतने साल मुझ से मिली क्यों नहीं ? आपने  मेरी हर ज़रुरत का ख्याल रखा फिर भी आप मुझ आज मिली जब मैं कुछ बन गया और नौकरी शुरू करने वाला हूँ , क्यों ? मुझे भी खुद से मिलने नहीं दिया , क्यों ? हर बार प्रिंसिपल से कह कर मुझे अपना पता देने से मना कर दिया !

अचानक डाइनिंग टेबल पर माहौल बदल गया था !

विशाखा ने खाना परोसने वाले सहायक को अंदर जाने को कहा !
 
विशाखा : क्या ये सब जानना ज़रूरी है आबिद  ? आज हम दोनों एक दूसरे के साथ हैं क्या ये ही कम है ?
 
आबिद : हाँ वो तो ठीक है पर क्या मुझे ये जानने का हक़ नहीं की मेरी परवरिश करने वाले ने क्यों मुझे खुद से अलग रखा इतने दिन ? आप बताइये और अभी बताइये !

आबिद ने अपनी चम्मच प्लेट में रखी पिघलती आइसक्रीम पर रख दी और आँखे नीची कर कर चुप हो गया !

           विशाखा जैसे ऐसे अधिकार को तरस रही थी ! कोई उस से ऐसा अधिकार जताता ! वो उठी और आबिद के करीब आ कर खड़ी हो गयी ! आबिद लिपट गया अमर लता सा विशाखा से ! अपने जीवन को सँवारने वाले से शिकवा करता हुआ ! विशाखा ने आबिद की आँखों टपकती लालसा देखी जो चाहती थी की उसे पता चले की माँ के बाद दूर रह कर भी कैसे कोई उसकी माँ का फ़र्ज़ निभा रहा था !

विशाखा ने आबिद के चहरे को दोनों हथेलियों से सँभालते हुए कहा : अच्छा चल , ये आइसक्रीम फिनिश कर फिर वाक पर चलते हैं , सब बताती हूँ !

विशाखा : वैभव भैया की शादी के बाद मैं ट्रेनिंग पर चली गयी ! बीच बीच में मैं विपुल  से बात करती रहती थी ! तुम्हारा हाल भी मिलता रहता था ! एक साल के बाद मेरी ट्रेनिंग खत्म हुई ! मुझे पहली  पोस्टिंग मिली ! मैंने ख़ुशी ख़ुशी विपुल  को  फ़ोन किया लैंड लाइन पर  तो मुबारकबाद के बाद उन्होंने बताया की फातिमा बी नहीं रही ! मुझे तुम्हारी चिंता हुई ! तब मैंने और विपुल ने तुम्हे अच्छे हॉस्टल में दाखिल करने का फैसला लिए ! हर महीने तुम्हारे स्कूल की फीस मैं भर्ती थी तो बाकि की चीज़ों का ख्याल विपुल करते थे ! दिन बीतते जा रहे थे , मैं और विपुल करीब आते जा रहे थे ! तुम्हारी पढ़ाई  ज़रूरतों का वो ही ख़याल करते थे ! मैं तो बस अपनी सैलेरी का एक हिस्सा तुम्हारे अकाउंट में ट्रांसफर करती थी जिसे वो ऑपरेट करते थे  तुम्हारे लिए !

सुनते सुनते आबिद ने ध्यान दिया की अचानक दीदी ने विपुल भैया को उन्हें , उनके कह कर सम्बोधित करना शुरू किया था !

विशाखा तो जैसे पानी से बही जा रही थी यादों की सुरंगों से ,जिसके एक किनारे पर आबिद था तो दूसरे किनारे पर विपुल !

विशाखा : एक रोज़ विपुल  ने मेरे सामने शादी का प्रोपोजल रखा ! अच्छा कारोबार था उनका ! अच्छा परिवार ! उनके परिवार ने मेरे चाचा जी से बात करी और शादी भी हो गयी ! कुछ दिन मैं रही भी अपने ससुराल फिर पोस्टिंग्स के कारण मुझे आना पड़ा ! व्यापार के कारन वो मेरे साथ नहीं आ सकते थे तो मैं नौकरी नहीं छोड़ना चाहती थी ! बस फिर धीरे धीरे हमारा मिलना कम हो गया और पिछले ३ सालों से बिलकुल संपर्क नहीं है !

आबिद बीच में बोला : लेकिन इतना सब के बाद भी मुझे और मेरी पढ़ाई पर आप दोनों ने कोई असर नहीं होने दिया !

विशाखा : हाँ वो ख्याल रखते है बहुत तुम्हारा !

आबिद विशाखा से लिपट गया और ज़ोर से पकड़ लिया अपनी दीदी को ,रूंधे गले भीगी आँखों से कहता हुआ आप दोनों एक साथ क्यों नहीं है ?

विशाखा के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था !

अगले दिन !

आबिद तुम आज रहोगे ना तुम्हारी जॉइनिंग तो कल से है ना ? विशाखा ने आबिद के कमरे के परदे सरकाते हुए पुछा !

आबिद : हाँ दी !

ठीक है , लो ऑरेंज जूस पियो और फिर अपने आप प्लान कर लो सब ,मैं गाड़ी और ड्राइवर छोड़े जा रही हूँ !

आबिद : जी दीदी ! ड्राइवर वही है ना जिसे आपने मुझे लाने के लिए हॉस्टल भेजा था !

विशाखा : हाँ , वो ही हैं ! पहचान हो गयी उनसे तुम्हारी ? गुड !

         शाम को विशाखा घर लौटी ! भीतर घुसते साथ लेवेंडर की खुशबू से सारा घर महक रहा था ! आबिद ने रजनीगंधा के गुच्छे से वेलकम किया अपनी दीदी का और कहा की आइये भीतर चलते है , विशाखा ने जैसे ही अगला कदम डाइनिंग रूम की तरफ बढ़ाया सामने टेबल के उस छोर पर विपुल को बैठा देखा फिर नज़रे आश्चर्य से आबिद की तरफ कर ली !

      डाइनिंग टेबल का माहौल बदल चूका था और पीछे दीवारों पर लगे वूफर्स पर मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ गूंज उठी "
                                           " ओ शहज़ादी सपनो की ,
                                                    इतनी तू हैरान ना हो !
                                                          मैं  भी  तेरा  सपना हूँ,
                                                              जान मुझे अनजान हो ! "
                                                                       जनम जनम का साथ है ,
                                                                               निभाने को ………   
                                                                                    सौ सौ बार मैंने जनम लिए !!

विपुल , विशाखा और आबिद याद कर रहे थे उस गुलाबी पेन को  जसे डाकिया ने माँगा था , जिससे लैंड लाइन नंबर लिखा था ................... उस बारिश की रात गोबी की पकौड़ियों की महक  के साथ

                                                                 ~~~~  समाप्त ~~~~

एक कहानी : वो गुलाबी पेन !

                                                                      ::: मनीष सिंह :::

Thursday, May 22, 2014

एक कहानी : चिरुनी ( कंघी ) !!

सिस्टर निरुपमा ने धीरे से दरवाज़े को भीतर की तरफ धकेलते हुए पुछा : उज्जवल बाबू आज कैसा महसूस कर रहे हैं आप ?
 
प्रतिउत्तर में में उज्जलव बाबू कुछ नहीं बोले !
 
सफ़ेद और हलके आसमानी रंग की अस्पताल के ड्रेस में कोई 80  - 85 बरस  बुजुर्ग हो चुके उज्जवल घोष एक टक टप - टप टपकती सलाइन की बोतल की बूंदों के देख रहे थे ! 
 
सिस्टर निरुपमा ने अपने साथ आई एक नयी ट्रेनी सिस्टर का परिचय करवाते हुए बेड पर BP नापने की मशीन रखी और बोली : ये अरुणिमा है , आज से ये आपका ख्याल करगी !  
 
उज्जवल बाबू ने मुस्कुराते हुए अरुणिमा के तरफ देखा तभी उनकी पलकों से दो बूँदें ढलक गयीं !

अरुणिमा अपनी सीनियर के रहते हुए भी खुद को रोक न सकी और उनके आंसुओं को कोमल गुलाबी अंगुलियों से पोछते हुए बोली !
 
क्या हुआ बाबा ? कुछ तकलीफ हो रही है ?
 
उज्जवल बाबू ने हामी में सर हिलाया !
 
सिस्टर निरुपमा : क्या हुआ ?
 
उज्जवल बाबू : आज सर में काफी दर्द है सिस्टर !
 
सिस्टर निरुपमा ने कोई टैबलेट लिखी पेपर पर और अरुणिमा को डाक्टर की विजिट के बाद खिला देना को कहा फिर अगले वार्ड में चली गयी !
 
अब उस वार्ड में उज्जवल बाबू और अरुणिमा रह गए थे !
 
अरुणिमा : बाबा, मैं ये टेबलेट ले कर आती हूँ !
 
उज्जवल बाबू : ठीक है बेटा !
 
और अरुणिमा बाहर चली गयी !
 
कैसे हैं उज्जवल बाबू : सीनियर डॉक्टर के साथ दो और जूनियर डॉक्टरों तपन और बियोज  ने वार्ड में आते हुए पुछा !
 
उज्जवल बाबू : ठीक हूँ सर , बस आज सर में कुछ दर्द है !

डाक्टर : हाँ, सिस्टर निरुपमा से बताया था , उन्होंने कोई टेबलेट लिखी है ! दिखाइये क्या लिखा है !
 
उज्जवल बाबू : वो तो एक नयी सिस्टर अरुणिमा लेन गयी हैं !
 
डॉक्टर : खुद लेने गयी हैं ? क्यों ,वो तो स्टोर का डिलीवरी बॉय पंहुचा जाता !
 
तभी अरुणिमा ने वार्ड के दरवाज़े पर दस्तक दी : में आय कम इन सर ?
 
सीनियर डॉक्टर : आइये , आप खुद क्यों गयी थीं ? आपको मालूम होना चाहिए की ये डॉक्टर्स के विजिट का वक़्त है और हर पेशेंट के साथ सिस्टर का साथ होना ज़रूरी है !

आप ड्यूटी आवर्स के बाद मुझ से मिल कर जाइयेगा और जो सिस्टर आपको  लीड कर रही हैं उनको बता दीजियेगा , हो सके तो उनको भी साथ में लाइए  !
 
अरुणिमा के चेहरे पर शांत भाव लेकिन आँखों में डर साफ़ घर कर गया था , आँख झुका कर धीरे से बोली : सॉरी सर !
 
वो टैबलेट दिखाइए : सीनियर डाक्टर ने कहा !
 
अरुणिमा ने छोटा सा काग़ज़ और टेबलेट आगे बढ़ा दी  !
 
सीनियर डाक्टर ने हां में सर हिलाया और कहा : ये ठीक है , ताज़े पानी से अभी एक टेबलेट दीजिये और फिर भी तकलीफ रहे तो मुझे बताइये मेरे एक्सटेंशन पर - खुद मत आइयेगा !
 
सिस्टर अरुणिमा ने हामी में सर हिलाया और बोली : जी सर ,मैं शाम को आप को रिपोर्ट करती हूँ !
 
ओ के कहते हुए डॉक्टर दरवाज़े से बाहर की तरफ बढ़ गए !
 
        डॉक्टर तपन को अरुणिमा ने और सिस्टर अरुणिमा ने डॉक्टर तपन को धीरे से पलकें उठा कर देखा  - ये सामान्य नहीं था ! अरुणिमा ने अपनी उठती पलकों से तपन को इस डांट से हुए को दर्द बताया हो जैसे , तो तपन ने अपनी धीरे से झुकती हुई पलकों से अरुणिमा को जैसे सांत्वना दी , कोई बात नहीं ,वो बड़े हैं , मैं हूँ न तुम्हारे साथ ! दो अनजान लोगो में अशब्द किन्तु अर्थपूर्ण संवाद जिसमे केवल समर्पण था !
 
दोनों लगभग हमउम्र डाक्टर तपन 25 बरस और अरुणिमा कुछ 21 बरस की उम्र में नर्सिंग की ट्रेनिंग पर इस अस्पताल में , आये थे ! ये पहली मुलाक़ात थी उनकी !
 
उज्जवल बाबू की तजुर्बे वाली निगाहें ये सब देख रहीं थी !
 
सादे पानी का गिलास और टेबलेट उज्जवल बाबू को देते हुए अरुणिमा ने कहा : बाबा , ये खा लीजिये फिर मैं आपके बेड के चादर और तकिया गिलाफ़ बदल देती हूँ !
 
उज्जवल बाबू : बेटा ,आज मैं बेड से उठ नहीं सकूँगा  , कमजोरी महसूस हो रही है , आज चादर बदलना रहने दो !
 
अरुणिमा : बाबा आपको उतरना नहीं होगा ,मैं आपके लेटे लेटे ही बदल दूँगी ! आप पहले टेबलेट खाइये !
 
उज्जवल बाबू ने पानी का गिलास अरुणिमा की तरफ कर दिया दवाई खा कर और लेट गए !
 
अरुणिमा : बाबा ,आप बेड के एक तरफ करवट ले लीजिए !
 
बस फिर सिस्टर अरुणिमा ने बारी बारी से पुरानी चादर हटाई और फिर नई चादर बदल दी !
 
उज्जवल बाबू के साथ एक हफ्ते में ये पहली बार था की चादर बदलने के लिए उनको बेड से उतरना नहीं पड़ा था !
 
सिस्टर अरुणिमा ने वार्ड में रखे सभी सामान को करीने से सजा दिया और फिर आ कर बैठ गयी उज्जवल बाबू के पास रखे स्टूल पर !
 
सिस्टर अरुणिमा : बाबा ,आपके सर के बाल इतने लम्बे क्यों हैं ?
 
उज्जवल : बेटा मुझे शौक़ था लम्बे बाल रखने का ! मेरे ज़माने में जाने माने लेखक और कलाकार रखते थे ! तुमने गुरुदेव रबिन्द्र नाथ की तस्वीर तो देखी होगी !
 
सिस्टर अरुणिमा : हाँ देखी तो है ! लकिन ये तो उलझ गए हैं ! आपके घर से कोई नहीं आता ! सर पर तेल लगा कर इनको ठीक करना ज़रूरी है !
 
घर की बात सुनते ही उज्जवल बाबू का मन दुखी हो गया  , शांत हो गए !
 
सिस्टर अरुणिमा : बाबा,आपके घर पर कौन कौन हैं ?
 
उज्जवल : दो बेटे , बहुए, शायद पोते पोती भी है !!
 
सिस्टर अरुणिमा : शायद , मतलब बाबा ?
 
उज्जवल बाबू ने काफ़ी देर शांत रहने और अरुणिमा के बार बार पूछने पर बोलना शुरू किया !
 
कोई 50 - 60 सालों पहले की बात है मैं तब छोटा था लेकिन जीने के लिए पैसा और पैसे के लिए मेहनत ज़रूरी है बहुत जल्दी समझ गया था !
 
          रोज़ सुबह देबासिस दा  की दुकान पर चाय  पीता था और वो चाय तब देते थे जब मैं दो ड्रम पीने का पानी भरता था ! फिर अखबार बांटना और 10 बजे से हावड़ा रेलवे स्टेशन पर रेल गाड़ियों के यात्रियों को चिरुनी ( कंघियाँ )बेचता था ! ड्यूटी जाने और वापस आने के समय पर चिरुनी खूब बिकती थी ! दोपहर में कम ! दिन भर में दस से बीस कंघियां बेच लेता था ! दोपहर का खाना वहीँ पर एक मठ था उसमे खाता था ! शाम को चाय नाश्ता भी करता था वहीँ देबसिस दा की दूकान पर दो ड्रम पानी और मठरी के लिए मैदा सानेने के बाद !
 
       ऐसे ही बचपन बीत रहा था ! मुझे नहीं पता की मैं कहाँ से हूँ ! किस परिवार से हूँ ! जब से होश संभाला देबसिस दा के पास पाया ! ना कभी मैंने पुछा और ना  कभी उन्होंने बताया !
 
सिस्टर अरुणिमा शान्त और नम आँखों से सब सुनती जाती थी ! बीच बीच में वो दवाओं और सलाइन का भी ख़याल कर लेती थी !
 
       उज्जवल बाबू को जैसे अपनापन अचानक मिल गया था बरसों बाद अरुणिमा के रूप में और मन की जड़ हो चुकी भावनायें पिघल कर बह चली थीं यादों की लहरों पर शब्दों की नावों पर सवार हो कर !
 
सिस्टर अरुणिमा आप लंच के लिए चलेंगी ? वार्ड के दरवाज़े को हलके से खोलते हुए डॉक्टर तपन ने पुछा !
 
उज्जवल बाबू ने अरुणिमा से पहले जवाब दिया : अंदर आइये छोटे डाक्टर बाबू !
 
         डॉक्टर तपन , २५ - २६ साल का सजीला युवक ! यौवन की चरम सीमा चहरे पर झलकती थी  ! बार बार अरुणिमा की निगाहें तपन को देख कर झुक जाती थी ! कुछ आधा फुट लम्बा था तपन अरुणिमा से ! आज उसने मूँगिया हरे रंग की शर्ट और लाइट चॉकलेट कलर का ट्राउज़र पहना था और ऊपर से सफ़ेद ऐप्रॉन ! गले में स्थेस्टस्कोप ! अरुणिमा ने कच्चे पीले रंग के सूट और सलवार उसपर काले रंग  की चुन्नी पहनी थी साथ में सफेद ऐप्रॉन सलीके से ओढ़ रखा था , दोनों सुन्दर और सोबर दीख पड़ते थे !
 
       बाबा हम लंच कर के आते हैं ! अरुणिमा और तपन दोनों ने एक साथ अगल बगल खड़े हो कर उज्जवल बाबू की तरफ देखते हुए पुछा  ! जैसे अनुमति चाहते थे इस असामान्य बात के लिए ,ये सामान्यतः संभव नहीं ड्यूटी टाइम में !
 
उज्जवल बाबू : हाँ , मैं खुद  अरुणिमा को लंच के लिए याद दिलवाने वाला था ! ठीक हुआ जो आप आ गए !
 
डॉक्टर तपन : जी ,बिलकुल चिंता न करें !
 
      अदभुद रश्तों के अंकुर पनप रहे थे ! कौन किस की देखभाल और देख रेख करने को था अस्पताल में  कुछ समझ नहीं आता था ! सारी परिभाषाएँ बदली बदली सी थीं !
 
दोनों मेस की तरफ बढ़ गए !
 
शाम की चाय और बिस्किट लिए उत्पल खड़ा था ! रोज़ वो ही चाय दे जाता था ! अरुणिमा ने चाय  बाबू को दी और उनसे अपनी बात आगे कहने को कहा !
 
उज्जवल बाबू कहने लगे : फिर २५ - २८ साल की उम्र में मेरे साथ बहुत सारी घटनाएँ एक साथ हुई ! एक दिन मैं हावड़ा से दुर्गापुर जाने वाली ट्रैन में चिरुनी बेच रहा था ! ट्रैन में भीड़ खचा खच थी !
 
         मैं अपने हाथों में कंघियों के गुच्छे लिए चिल्ला रहा था : चिरुनी ले लो चिरुनी ! सुन्दर , टिकाऊ चिरुनी ! आपके केश को ऐसा संवारे जैसे माँ का हाथ ! कोमल कोमल हाथों से ऐसे आनंद से जैसे की चमेली का तेल लगा हो केश में ! चिरुनी ले लो चिरुनी !
 
अरे, इधर आओ : एक रौबीले आदमी ने मुझे बुलाया !
 
उज्जवल : हाँ बाबू , कैसी चिरुनी लेंगे ?
 
आदमी : मुझे चिरुनी नहीं चाहिए ! तुम से कुछ बात करनी है ! मेरे साथ दुर्गापुर चलोगे ?
 
उज्जवल : वो क्यों ?
 
आदमी : वहां मेरी एक दूकान है और एक दुकान मैंने कोलकत्ता में भी ली है अब दोनों जगह मुझ से वो संभाला नहीं जाएगा ! बेटा है नहीं एक बेटी है , थोड़ी कमजोर है दिमाग से ! तुम अगर चाहो तो मेरे साथ मेरे घर चलो और सब सम्भालो !
 
उज्जवल : पर आप मुझ पर ऐसे कैसे विश्वास कर ले रहे हैं ! मैं तो आपको अभी अभी मिला ?
 
आदमी : मैं ट्रैन के इंतज़ार में तक बाहर देबसिस की पास बैठा था ! वो मेरे एक कोलकत्ता के दोस्त का दोस्त है ! वहीँ उसने  तुम्हारे बारे में बताया !
 
उज्जवल : मेरे सामने पूरा जीवन था और साथ में थी एक उम्मीद और मौका ! बस मैंने हाँ भर दी !
 
दो बेटे हुए , प्रभात और विनय ! दोनों जगह की दुकाने ठीक था चल रही थीं !
 
दोनों को अच्छा पढ़ाया ! बड़ा बेटा सरकारी नौकरी में है और दार्जिलिंग में ! उसकी शादी करी लड़की उसने अपनी पसंद की देखी ! शादी के बाद वो दार्जिलिंग से मुझे कभी मिलने नहीं आया !
 
दूसरे बेटे ने सारा काम संभाल लिया था ! उसकी माँ का देहांत हुआ तो  घर में किसी लड़की की कमी खेलने लगी ! मेरे गॉड फादर के ही घर से एक लड़की के साथ उसका विवाह कर दिया ! उस दिन से वो घर मेरे लिए जेल से कम नहीं रहा ! मैंने कोलकत्ता की दूकान में रहने का फैसला किया ! २० साल सब ठीक चला ! 
 
बाबा आप चाय लेंगे : अरुणिमा ने बीच में गंभीर होते माहौल को कुछ हल्का  करने की कोशिश करी और सफ़ेद बड़े बड़े चीनी मिटटी के प्याले में चाय उज्जवल बाबू की तरफ बढ़ा दी !
 
शाम हो चली थी !
 
दूर हावड़ा ब्रिज के सहारे सूरज ढल रहा था !
 
अरुणिमा ने खिड़कियों के परदे खोल कर ठंडी हवाओं को निमंत्रण दिया !
 
अब , अरुणिमा के जाने का समय था !
 
उज्जवल बाबू उदास हो गए थे !
 
कल आती हूँ कह कर अरुणिमा ने रात की सिस्टर से चेंज ओवर किया और चली गयी !
 
डाक्टर तपन ने अरुणिमा को टैक्सी में बैठाया और घर की  तरफ चल दिया ! कोलकत्ता की पहचान पिली पीली टैक्सी बरसों पुराने हावड़ा ब्रिज पर आगे बढ़ गयी ! उज्जवल बाबू देर तक खुले आकाश में सितारों को देखते रहे !
 
अगली सुबह !
 
आज आपको हल्का दूध देने को कहा है बड़ी सिस्टर ने वो भी छाली ( मलाई ) हटा कर ! सुबह सवेरे उत्पल ने बड़े गिलास में दूध  बिस्किट टेबल पर रखते हुए उज्जवल बाबू से कहा !
 
उज्जवल बाबू में आज अनोखी ऊर्जा थी आज ! जल्दी जल्दी दूध पिया और बिस्किट बचा लिए अरुणिमा के लिए !
 
अरुणिमा : केमोन आछेन बाबा ? ( कैसे हैं बाबा ?)
 
कमरे में जैसे गुलाब की खुशबू बिखर गयी हो ! रात भर उदास सिकुड़ी छुईमुई के पत्तों सरीखीं उज्जवल बाबू की पलकें अचानक खिलखिला गयी थीं अरुणिमा की आवाज़ सुन कर !
 
उज्जवल बाबू : मैं ठीक हूँ , तुम कैसे हो बेटा ?
 
अरुणिमा ने जल्दी जल्दी सब कमरा ठीक किया ! दवा दी ! चाय नाश्ते और सफाई का प्रबंध किया ! डाक्टर की विजिट पर समय पर रही ! सब ठीक ठाक था ! ११ बजे  बाद सब सामान्य कल की तरह !
 
अरुणिमा और उज्जवल बाबू वार्ड में बस !
 
अरुणिमा : बाबा कल अपने पुछा नहीं की सीनियर डाक्टर ने क्या कहा मुझे शाम को अपने केबिन में बुला कर ?
 
उज्जवल बाबू थोड़ा परेशान होते हुए : क्या तुम्हे उनके पास जाना पड़ा था ?
 
अरुणिमा : नहीं। ये ही तो बात थी मैं उनके पास गयी थी पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कोई बात नहीं जाओ ! मुझे लगा शायद तपन ने कुछ कहा होगा उनसे पर कल शाम तपन सर ने बताया उनकी कोई बात इस बारे में नहीं हुई !  समझ में नहीं आया की उन्होंने मुझे बुलाया  थी डांटने के लिए पर , कुछ कहा नहीं !
 
उज्जवल बाबू मुस्कुराये और बोले मेरी आगे की कहानी बताऊँ ? वो छुपा गए की कल उन्होंने ही बड़े डाक्टर से उसके लिए बात कर ली थी !
 
अरुणिमा : एक मिनट रुकिए !
 
           उसने अपने हैंडबैग से नारियल के तेल की शीशी , कंघी निकाल कर टेबल पर रखी ! बेड के लीड स्क्रू को लिवर के सहारे से घुमा कर उज्जवल बाबू का सिरहाने ऊंचा किया फिर उनके सर के पीछे स्टूल रख कर सर पर  तेल की मालिश करने लगी !
 
अब बोलिए बाबा : अरुणिमा बोली !
 
        उज्जवल बाबू को कोमल कोमल अँगुलियों के माथे पर एहसास ऐसे होता था जैसे दूधमुहे बच्चे के होठो पर रूई के फोहों में दूध  रखा हो ! असीम आनदं ! असीम वैराग्य से भरे जीवन में ये भावनात्मक पल ऐसे थे जैसे बड़े से पानी के बर्तन में बूँद बूँद टपकती नील , जो धीरे धीरे पुरे पानी को अपना सा कर देती है !अनोखा समय उज्जवल बाबू के लिए बरसों बाद ! माँ और बेटी के प्यार को तरसते उज्जवल बाबू की पलकें डबडबा गयी !
 
     मेरे बेटों ने मुझ से कोई संपर्क नहीं किया ! दुर्गापुर वाले को शायद एक बेटा और एक बेटी है , देबसिस बाबू कह रहे थे ! बड़े का तो कुछ पता नहीं ! यहाँ मैं बूढा हो गया तो अपने लिए ओल्ड एज़ होम में इंतज़ाम कर लिया ! सब की सेवा भी हो जाती है और मेरी खुद की देखभाल भी करते हैं सब !
 
अरुणिमा : दुर्गापुर में कहाँ रहते थे आप बाबा ?
 
उज्जवल बाबू : स्टेशन के पास के सब्जी बाजार में !
 
अरुणिमा : आप के बेटे का नाम क्या बताया ?
 
उज्जवल : प्रभात और विनय !
 
अरुणिमा धीरे धीरे कंघी से उनके लम्बे सफ़ेद बाल सीधे कर रही थी ! कितने दिनों  बाद मौका आया था ! पत्नी के गुजरने के बाद बालों को किसी ने नहीं सवांरा !
 
उज्जवल : ये बढ़िया और लड़कों वाली चिरुनी कहाँ से ली ?
 
अरुणिमा : तपन सर की है , वो भी तो दुर्गापुर के हैं !
 
उज्जवल : क्या उन्होंने अपनी कंघी मेरे लिए दी ?
 
अरुणिमा : हाँ , मैंने ये बता कर ली उनसे !
 
तभी दरवाज़े पर डाक्टर तपन ने दस्तक दी !
 
तपन : कैसे हैं बाबा आप ?
 
उज्जवल : अच्छा हूँ ! तुम कैसे हो ?
 
तपन : सब ठीक है !
 
उज्जवल बाबू : डाक्टर जी सिस्टर अरुणिमा बता रही थी की आप भी दुर्गापुर से हैं !!
 
तपन : हाँ जी स्टेशन के पास जो सब्जी बाज़ार है ना , बस वही हमारी भी मनिहारी की दूकान है ! बहुत साल पहले मेरे  बाबा के बाबा ने शुरू किया था , अब बाबा चलाते है ! मुझे डाक्टरी पढनी थी इस लिए मैंने वो काम नहीं किया !
 
उज्जवल : क्या नाम है तुम्हारे बाबा का ?
 
तपन : जी , विनय  !
 
उज्जवल : तुम्हारे बाबा के बाबा का क्या नाम है और कोई बड़े पिता जी भी हैं तुम्हारे ?
 
तपन : जी उनका नाम तो नहीं पता पर बड़े पिता जी तो हैं मेरे , बल्कि आज उनको साथ लाया हूँ , दार्जिलिंग में रहते हैं वो ! कल ही आये थे आँखों में तकलीफ है उनके !मेरे साथ हॉस्टल में ही ठहरे हैं  !
 
उज्जवल : क्या नाम ?
 
तपन : जी , उनका नाम प्रभात है !
 
अरुणिमा : अरे तपन सर मुझे लगता है की ये उज्जवल बाबा ही तुम्हारे बाबा के बाबा हैं !
 
तपन ने उज्जवल बाबा की तरफ देखा वो नाम आँखों से हाथ में तपन की दी चिरुनी को निहार रहे थे !
 
तपन : बाबा , क्या अरुणिमा सही कहती है ?
 
उज्जवल ने अपने होठों पर ढलके आँसुंओं को भीतर करते हुए चेहरा एक तरफ कर लिया  !
 
तपन लिपट गया उज्जवल से !
 
अरुणिमा सीमाओं से बंधी टकटकी लगाये देख  रही थे दादा पोते को !
 
सालों से अघोषित तलाश आज अंतिम पड़ाव पर थी !
 
क्या डॉक्टर तपन यहाँ हैं ? किसी ने वार्ड का दरवाज़ा खटखटाया !
 
अरुणिमा ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा : उज्जवल बाबा आपके बेटे , तपन सर आपके पिता जी !
 
कई शब्द गढ़ गए , कितनी परिभाषाएँ हो गयी और कितने सम्बन्ध बिखर के फिर बंध गए दो दिनों में !
 
उज्जवल बाबा : तपन चलो घर चलते है , अरुणिमा को लाने का दिन तय करना है !
 
अरुणिमा ने चाय का प्याला  उज्जवल बाबू की तरफ बढ़ाते हुए कहा : चाय लीजिये बाबा !
 
आज भी सूरज ढल रहा था , किन्तु सन्तोष और आग्रह के साथ !
 
       बड़ी सी गाड़ी में बैठे उज्जवल बाबा ने चलने का इशारा किया ! हावड़ा ब्रिज से गुजरते हुए किसी ने उज्जवल बाबा के बड़े बालों को  देख कर पुकारा : चिरुनी लेंगे बाबू ?
 
उज्जवल दा ने एक चिरुनी खरीद ली !
 
ना लेने के बाद की तकलीफ उन्हें पता थी , एक लम्बी तकलीफ जो सब के लिए सुखद अंत नहीं लाती !
 
एक कहानी : चिरुनी ( कंघी ) !
 
~~ समाप्त ~~ 
 
 
:::: मनीष सिंह ::::   
  

Monday, May 19, 2014

एक कहानी : उधार की पूजा !!

           " लाल  कपडे में लिपटे ताम्बे के कलश में स्पर्श माँ की अस्थियों को दोनों हाथों से अपनी छाती से चिपका लेता था , जब जब संगम में तैरती उसकी नाव डगमगाती थी , वैसे ही जैसे स्कूल से घर लौटने पर वो माँ से लिपट जाता था ! " 
 
       बेटा ये कलश यहाँ रखो और तुम गंगा जी में नहा कर कपडे पहन लो तब तक हम तैयारी करते हैं तब तक परिवार के कुल गुरु भी जा जाएंगे पूजा के लिए ! - पंडित जी ने स्पर्श से कलश लगभग लेते हुए कहा !
 
स्पर्श सहम गया ! क्या ये भी मेरे पास नहीं रहेगा सोचता हुआ और गंभीर हो गया !
 
संगम में नहाते हुए और सरस्वती को तलाशता था ! कोई दो बरस पहले की तो बात थी !
 
माँ : स्पर्श रुको , मुझे आने दो !
 
स्पर्श : बड़ा हो गया हूँ मैं माँ ? मैं ठीक हूँ !
 
माँ : हाँ , लेकिन तुम्हे अंदाज़ा नहीं है , वहां फिसलन है संभल के !
 
स्पर्श : अच्छा, आइये !
 
माँ : देखो यहाँ दो रंगों का पानी साफ़ साफ़ दीखता है ! एक है गंगा और एक यमुना !
 
स्पर्श : मैंने सुना है एक और नदी हैं यहाँ इसी लिए इसे त्रिवेणी कहते हैं !
 
माँ : हाँ , उस तीसरी नदी का नाम है सरस्वती , जो क़िले के भीतर से आती हैं , अब लगभग गुप्त सी हैं !

स्पर्श : अरे माँ आप का नाम भी तो सरस्वती है , लेकिन आप तो गुप्त नहीं मेरे सामने हैं !
 
माँ : कभी हो गयी तो ?
 
स्पर्श लिपट गया अपनी माँ से इस सवाल के जवाब में !
 
पंडित जी : बेटा संभल के !
 
और स्पर्श का ध्यान टूटा ! आज दोनों सरस्वती गुप्त थी स्पर्श के लिए !
 
स्पर्श का मानस कहीं और था और शरीर संगम में पूजा के लिए तैयार हो रहा था !
 
           जनेऊ , माथे पर चन्दन , सफ़ेद धोती जो उसके ताऊ जी के बेटे ने पहनाई थी स्पर्श रेत पर अपने पंजों के निशान छोड़ते हुए पूजा के लिए परिवार के सदस्यों की तरफ बढ़ रहा था ! सब की निगाहें उसकी ही तरफ ! उसको किसी तरह की परेशानी ना हो सब इसका ध्यान रख रहे थे ! आज इतने लोग मेरे लिए , माँ तो अकेले ही सब करती थी , सब जानती थी !
 
माँ : स्पर्श पैर पीछे करो , ये मछलियाँ तुम्हे नुकसान भी कर सकती हैं !
 
मानसर झील में मछलियों को आटा खिलाते खिलाते ज़्यादा करीब चला गया था वो और मछलियों का झुण्ड उसके हाथों के पास आ गया था !
 
आज देर तक नदी में रहा स्पर्श अकेले, भय तो था अनगिनत पानी के जीवों का ,लेकिन ये करना था उसको उसी माँ के लिए !
 
तभी पुल से गुजरती हुओ रेलगाड़ी ने स्पर्श का ध्यान फिर से टूटा !
 
जल्दी करो बेटा  , स्पर्श के चाचा जी ने पुकारा !
 
स्पर्श , जी चाचा जी कहता हुआ तेज़ क़दमों से आगे बढ़ा !

           रेत पर क़दमों के निशान कुछ ज़्यादा गहरे होते जाते थे और पंजों में ठंडी रेत लिपटती जाती थी जैसे बचपन की यादें परेशान कर देती हैं कभी कभी जब अपना दूर होता है , अचानक !

गंगा , यमुना का पानी बहता जाता था ! शांत और निर्मल !

              स्पर्श ने हर मन्त्र शांति से सुना , हर वो बात जो पंडित जी ने कही धीरज से सुनी , हर कुछ सही सही किया जो उस से करने को कहा गया ! माँ की अस्थियों को ले कर संगम में बीचों बीच गया नाव परिवार के साथ और प्रवाहित किया !

            पुल से गुजरती रेल और नीचे गंगा में बहती माँ अस्थियों सवरूप , स्पर्श के माथे का चन्दन पलकों से होता हुआ होठों पर बह चला था आँखों के पानी से लिपट कर !
 
कुछ दिनों पहले ही :
 
माँ :  इस बार कहाँ से शुरू करेंगे ?

पापा ने माँ के इस सवाल पर मुस्कुराते हुए स्पर्श की तरफ इशारा किया था और कहा था : यस शेर इस बार तू फिक्स कर एल टी सी का रोड मैप !

स्पर्श : पा , इस बार साउथ से शुरू करते हैं और लास्ट में दादी के घर चलेंगे कश्मीर , मानसर लेक  होते हुए !

माँ , पा : ओके

               कन्याकुमारी और मीनाक्षी मंदिर में माँ के दर्शन , पॉण्डीचेरी में  मडुकुल विनायकम मंदिर परिसर में घुमते हांथी को जब बनाना खिलाया था तो हाथ बचा लिया था माँ ने ! श्री अरबिंदो आश्रम में सफ़ेद गुलाबी फूलों से सजी समाधी के समीप माँ को हाथ जोड़ कर देख कर स्पर्श ही झुका था !

           पूरा भारत बचपन से घूमता आ रहा था स्पर्श चप्पे चप्पे के जानकारी थी उसे ! बस फर्क था तो हर साल होने वाले अनुभवों की ! किशोरावस्था , युवावस्था दोनों के अनुभव अलग होते हैं !

           कांगड़ा से जम्मू के लिए बड़ी गाड़ी से चले थे सब ! मानसर झील से जम्मू की तरफ बढ़ रहे थे की अचानक पहाड़ टूट कर गिरने लगे और हम खाई में थे !

माँ , पा ने स्पर्श को अकेला छोड़ दिया था !

कुलगुरु किनारे पर खड़े नाव के किनारे लगने का इंतज़ार कर रहे थे !

          स्पर्श ने पहली बार देखा था उनको ! वो कश्मीर में ही रहते थे ! उनके पास कभी नहीं आये थे दिल्ली में ! जब से स्पर्श ने होश संभाला था दिल्ली में ही रहा ! परिवार के कुल के काम में कभी कश्मीर नहीं गया ! माँ नहीं ले जाती थी , डर के कारण ! वो कहती थी की कश्मीर जल रहा है उनीस सौ अठासी से , मेरे जन्म के आस पास से ही !

कुलगुरु के सब ने एक एक कर के पैर छुए !

स्पर्श ने भी !

कुलगुरु जी की निगाहें शायद किसी को तलाश रहीं थी !

ताऊ जी ने कुछ भांपते हुए कुल गुरु को एक किनारे ले जाने की असफल कोशिश करी !

कुलगुरु : प्रबोध कहाँ है ?

ताऊ जी : जी महाराज वो घर पर ही है ?

कुलगुरु : अरे , तो तर्पण किसने किया किरण और विनोद का ?

ताऊ जी : जी , स्पर्श ने !
 
कुलगुरु जैसे अचानक नाराज़ हो गए थे !
 
ये क्यों : कुलगुरु बोले !

ताऊ जी : महाराज आप  आइये मेरे साथ !

भैया ने मुझे कस के पकड़ लिया और ताई जी जैसे अजीब से अनकही आत्मग्लानि से भर गयीं और दूर तक गंगा में देखने लगी ! स्पर्श समझ गया कुछ इस घटना से भी अधिक गंभीर है !

स्पर्श : भैया , मुझे बताइये क्या हुआ !

सहमा सा स्पर्श पसीने से भीग गया था और तनाव चेहरे पर था !
 
कुलगुरु जा चुके थे , नाराज हो कर !

भईया बताइये ना : स्पर्श ने जोर दे कर पुछा अपने कपडे पहनते हुए !

सबेरे की ट्रैन थी उनकी , इलाहाबाद से !
 
कमरे में बस वो और भाई ही थे !

प्रबोध : स्पर्श आज ये तर्पण मुझे करना था तुम्हे नहीं !

स्पर्श : क्यों ? तर्पण तो बेटा करता है ना ?

प्रबोध : हाँ !

स्पर्श : तो ?

प्रबोध : मैं उनका बायलॉजिकल बेटा हूँ , तुम नहीं !
 
 
              भाई के ये शब्द सुनते ही  जैसे लाखों गैलन पानी अचानक बाँध तोड़ कर अविरल भयावह आवाज़ करता हुआ स्पर्श के कानो के पास बहने लगा हो ! रात की शांत और शीतल आवाज़ें जैसे अचानक तेज़ कर्कश में बदल गयी हों ! रेल की पटरियों पर दौड़ती रेल गाड़ी ने अचानक ब्रेक लगा दी हो और तेज़ रगड़ से निलकली चिंगारियों से सब २१ - २२ सालों का तानाबाना छलनी हो गया हो ! सारे रिश्ते बेमानी ! सब सम्बन्ध अपरिभाषित , अजनबी से !
 
स्पर्श को जैसे उन शब्दों ने निष्प्राण कर दिया हो !
 
खुद से पूरा तन सवाल पूछता था :तो कौन हूँ मैं ?
 
प्रबोध : तुम एक कश्मीरी पंडित जी के बेटे हो जो हमारे कश्मीर के घर के पडोसी थे ! जिनको देहशदगर्दों ने शहीद कर दिया था और मेरे माँ पिता जी तुम को ले कर दिल्ली आ गए थे ! मुझे ताऊ जी के पास रहने दिया था क्यों की उनको कोई संतान नहीं थी ! क्योंकी मैं बड़ा था और तुम छोटे तो मुझे ही उनके पास रहने दिया गया , तुम्हे देख  रेख की ज़्यादा ज़रुरत थी उस समय !
 
 
स्पर्श : तो आज ताऊ जी ने आपसे पूजा क्यों नहीं करवाई ?
 
प्रबोध ने स्पर्श को दोनों हाथो से अपने आगोश में ले लिया और नम आँखों से बोला  : चल तूने पुछा और मैंने तुझे बता दिया ! सब याद रखने के लिए नहीं , बस तुझे पता रहे , भूल जा सब !
 
      स्पर्श का मन कचोटता था उसको भीतर ही भीतर आत्मग्लानि से जो की उसे बार बार झकझोरती थी कहते हुए सब जीवन उधार में पला और पूजा भी उधार की रही अपनी माँ पिता जी की तो दूसरी तरफ मानस कहता था की माँ ने जो दिया था वो मेरा था , कुछ भी फ़र्क़ किये बिना !
 
ट्रेन सरकने लगी थी , स्पर्श की निगाहें स्टेशन की बेंच पर बैठे एक बच्चे के माथे का पसीना पोछती उसकी माँ पर थी और दूसरी तरफ बैठा प्रबोध अब भी सोचता था की क्या उसने सही किया था  ................ ??
 
एक कहानी : उधार की पूजा !!
 
 ~~~~~~~~~~~~~~~~ मनीष सिंह ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 

Sunday, May 11, 2014

माँ , सीपियों सरीखी !!

माँ !
संसार के,
खारे पानी में,
सीपियों सरीखी !
सह लेती है,
सब उतार चढ़ाव,
तब पनपते हैं,
आप और हम,
मोतियों से,
गर्भ में,
सीपियों के !
 
आइयें 
हम और आप,
सहेजें इनको,
संसार के पानियों में,
उनके लिए,
जो वंचित हैं,
सीपियों से !!
 
माँ - अबतक भी अपरिभाषित शब्द !!