Wednesday, January 25, 2012

सुख और सुख की चाहत दुःख का मुख्य कारण बनती है !!

" सुख और सुख की चाहत दुःख का मुख्य कारण बनती है ....लेकिन ये भी सच है ...सुख की चाहत किये बिना जीवन नहीं आनंदमय लगता ! " अकारण और अनावश्यक आनंद एवं अनुभूत दुख में भेद कर पाना ही ....चलायमान जीवन की कुंजी , संभवतः है !! 

शुभ दिवस !! 

दिन की कठिनता , को विश्राम दें !!

" सर्द रातों मैं झरती हुई,   पंखुरी,
  डाली-डाली पवन हो रही,  बांसुरी !
 ओस  के सब दिए, आँखे मूंदे हुए,
 शब्द गढ़ते हुए, कर रहे आरती !!

 समय हैं , निशा है,  निशानों को जोड़ें,
 दिन की कठिनता ,  को विश्राम दें !!
 एकांकी नुक्कड़, सड़कें, गलियाँ वीरानी,
 हम भी अपनी आंखें मूंदें,  सो जाएँ !!

         *****  शुभरात्री *****

Tuesday, January 24, 2012

......... गुल्लक की टूटी हुई , पेंदियाँ !

" किताबों में मिलते गुलाब, अब कहाँ,
  गुल्लक की टूटी हुई ,  पेंदियाँ  !
  दीवारों पे लिखी हुई कुछ ग़ज़ल ,
  पन्नों मैं लिपटी हुई तितलियाँ !!

  बचपन को जल्दी भुलाने की ज़िद,
  अपने घरोंदों के होने की,  लौ !
  सभी कुछ मिले ,ये सोचा किये,
  फिसलता गया सब, ज्यों मछलियाँ !! "

        >>>> शुभ दिन <<<<<

Monday, January 23, 2012

गुन-गुन करती रात के संग, धीरे धीरे सो जाएँ !!

चाँद की शीतल किरणों का , हौले हौले से आना,
रेल की पटरी का कम्पन , धीरे धीरे थम जाना !
पुल पे चलती सर्द हवाओं के संग उडती धुल नहीं,
हम भी भूले, तुम भी अपना खालीपन लौटा आना !!
दिन के सारे कारण , लंबित अंधियारों से बतियाएँ ,
यादों के कुछ ताप सहें,  उलझन मैं सब  आशाएं ,
गुन-गुन करती रात के संग, धीरे धीरे सो जाएँ !!

@ @ @ @ @ शुभरात्री @@@@@

Saturday, January 21, 2012

धीरे - धीरे आंच बने, अनुवान्छित सा ताप मिले !

" लकड़ी - कोयले का धुआं, मेरा तेरा अपनापन,
  हौले - हौले से उठती, अभिलाषाओं की सिहरन !
  धीरे - धीरे आंच बने,  अनुवान्छित सा ताप मिले,
  जिससे अनुकृत होता है, अनुबंधित ,पर नव जीवन !!"


Friday, January 20, 2012

आरक्षण के सहारे ऊचे पदों पर जाना आसान है किन्तु पहचान और भी मुश्किल हो जाती है !

" सोने के बर्तन मैं रखे जाने के बावजूद कोयला , कोयला ही होता है ....और दाग लगने के डर से दस्ताने पहन कर ही उसको छुआ जाता  है ! आरक्षण के सहारे ऊचे पदों पर जाना आसान है  किन्तु पहचान और भी मुश्किल हो जाती है ...क्यों की एक ठप्पा लग जाता है की ये स्थान आरक्षण से मिला है ...जिसके लायक कोई और था !!  जो जरूरतमंद था लेकिन आरक्षण वालो के कारण एक सही और जानकार व्यक्ति देश की सेवा से चूक गया .... ये आरक्षण के सहारे से बढती जा रही कम और अनुपयुक्त लोगो की फ़ौज देश को खोखला बनाए जाने मैं सबसे प्रबल दावेदार होगी !! " सरकार को आरक्षण दिए जाने के सिस्टम पर पुनर्विचार करना चाहिए !! देश हित और आगे आने वाली पीढ़ी के हित मैं ...! "
" धुंध मैं खो गए सारे खवाबों के झुण्ड,
  सब यथार्थ हो गया !!
  जब चला छोड़ कर अंगुलियाँ औरों की,
  सब यथार्थ हो गया !!
  सहारे-सहारे जो भी मिलता रहा ,
  उपलब्धियां नहीं, चरितार्थ हो गया !! "