Sunday, November 20, 2011

" शोर " चित्रपट से कुछ पंक्तियाँ.

" पानी रे पानी तेरा रंग कैसा ? "

१. भूखे की भूख और प्यास जैसा !
२. सौ साल जीने की उमीदों जैसा !!
३. दुनिया बनाने वाले रब्ब जैसा !!!
                                               
 " शोर " चित्रपट से कुछ पंक्तियाँ.

Friday, November 18, 2011

........सबके होने की कोशिश करनी चाहिए !

अभी दो चार महीने पहले ही की बात है वो छोटा ही था ... हाँ अपने पिता की बात मानता था ....पर आज लगा वो शायद कुछ मनवाना चाहता है ....बड़ा हो गया है ... !

पिता को लगने लगा है की वो सिर्फ पैसे देने वाली मशीन थे और उनकी पत्नी पैसे दिलवाने वाला कार्ड ..... जब पैसे चैहिये होते थे ...माँ से सहारे से ...अपनी बात कह दी ...और माँ ने अर्रेंग्मेंट कर दिया ... और पिता को ये लगता था की बेटा मेरी इज्ज़त करता है इस लिए मुझ से सीधे सीधे अपनी बात नहीं करता ....किन्तु उनका के धोखा था ... !

अपने पिता को कभी वो दर्ज़ा दिया ही नहीं राहुल ने जो आम बच्चे अपने पिता को पिता होने का देते हैं .....

कभी कोई बात नहीं मानी जो बाप ने कही हो ...जो निर्णय अपने आप किये बस वो ही सही ...और उनको सही साबित करने के लिए चाहे किसी की भावनाए आहत होती हो तो भी परवाह नहीं की .... कभी सामाजिक रूप से जिम्मेदार नहीं बना ... और उसको बनाना भी नहीं चाहिए ... इसे राहुल किसी के नहीं हो सकते ....अपने भी नहीं ...खुद पर भी भरोसा नहीं होता इनको और बाप को भी उसकी उपलब्धियों पर प्रश्नचिन्ह लगाने से नहीं चूकते ....

आज राहुल के पिता नहीं हैं ...अपने मन की आई बातें उन्होंने मुझ से करी ...मुझे दुःख होता है ! वो अपने को हमेशा से छोटा और मजबूर महसूस करते रहे ...उनकी महिस्थाती को क्सिसी ने नहीं समझा ... बाहर वालों को नहीं समझना था... घर मैं वो सम्मान चाहिए था जिस को वो उम्र भर ढूँढते रहे किन्तु सब ने उनको एक सदस्य समझा ....घर का बड़ा नहीं .... अफ्सोसो है ..अफोसोस...!

राहुल आज अपनी चाहतों के कारन कुछ मुकाम पर है ...लेकिन वो अकेला नहीं ...उस जैसे जाने कितने हैं ...पर सब के पिता को इज्ज़त मिली ...सम्मान मिला ... राहुल ने एसा नहीं किया ...इस लिए वो आज अकेला है !

पिता ने उसको इस dharti पर लेन की जो जिमीदारी निभानी थे निभाई ...किन्तु ...मिला कुछ नहीं ...ना वो सम्मान न ही संतुष्टि .... रेल स्टेशन पर सब आपसे बात करते हैं लेकिन ...सब से आप सब उम्मीद नहीं करते ....अपने ही अपने होने का एहसास करते हैं ...!  एसा ना होने पर आप अपनी परिभाषाओं मैं उलझे रहते हैं जब की समाज मैं कुछ और ही चलन मैं होता है ....! सबके होने की कोशिश करनी चाहिए ....सिर्फ अपने बारे मैं तो चार पैर और एक पूछ वाले सोचते हैं ....!




Monday, November 14, 2011

.............रिश्ते, बर्फ खिलोने से !! "

" कड़वी-खट्टी सी दुनिया ,
   मित्र,  शहद  चबोने से !
   अंगारों सी  उम्मीदें  ,
   रिश्ते, बर्फ खिलोनों से !! "


आते -  आते ,आती है
अनुबंधों   मैं   गर्माहट,
घुलते - घुलते, घुलती है,
वर्षों की सब कडवाहट !!
मन गुलाब सरीखे से ,
चाहें, ओस की बूंदों सी,
किन्तु स्वप्न नहीं आते
काँटों  भरे बिछोनो  पे !!

अंगारों सी उमीदें,
रिश्ते, बर्फ खिलोनो से !!


चुटकी- चुटकी , अपनापन ,
अंजुली- अंजुली , आशाएं !
डिबिया-डिबिया , धुप खिली,
कंकर पत्थर     गरिमाएं !!
प्रतिबंधों   के    उजले पथ,
क्षितिज  सरीखी   मंजिलें !   
मिलने  के  कुछ पर्व नहीं ,
ना  खालीपन    खोने में !

अंगारों सी उमीदें ,
रिश्ते, बर्फ खिलोनो से !!







                    

Saturday, November 12, 2011

... मन कनेर के फूल सा, रंग हैं पर बिन सुगंध !

" जब चनारों पर  उमीदों  ने घर कर लिए ,
       मन कनेर के फूल सा, रंग हैं पर बिन सुगंध ! "

" उचाइयां ठीक है,  खुद के बूते की हों ,
     इक सहारे लिया तो , विकलांग  ही हुए !"
   

Thursday, November 3, 2011

...................किन्तु आधुनिकता की नीव पुरातन पर ही निर्भर है !

" किसी फास्टफूड के बड़े से होर्डिंग के नीचे खड़े होकर देखिये ...हाँ बगल मैं वो फास्ट फ़ूड की शॉप भी होनी चाहिए ....आप को कई तरह के नज़ारे देखने को मिलेंगे ...कुछ का शाब्दिक चित्रण मैं करता हूँ शायद कभी आप भी इस से रूबरू हुए हों ....:

" कोलर उचे , चिपकी हुई जींस , गले के बटन ऊपर से २ खुले हुए, हाथ पर एक बड़े नंबर  वाली रिस्त वाटच , कानो मैं आईपॉड के एअर्फोंन और कुछ एक के हाथों मैं जल रही श्वेत दंडिका ( सिगरेट ) भी .... और एक सलोनी सी विभिन लिंग की साथी ... किसी ठन्डे पे पदार्थ का सेवन करते हुए पता नहीं किस भविष्य के सपनो को साकार करते हुए बात करते दिखाई दे जायंगे ....नै पीढ़ी है ये ...हाँ बहुत तेज़ है ... सम्बन्ध बस अपने मतलब के हिसाब से बनती है ... ! "

अब दुसरा दृश्य : इसे ही आगे बढ़ाते हैं .... एक के बाद एक कुछ न कुछ ख्य अजा रहा है ...और खर्च शायद २ से ३ हज़ार की ऊपर चला गया है पर कोई चिंता नहीं ... ज़िन्दगी का आनंद अधिक महत्त्व रखता है ...ना की पैसा .... कल किस को नसीब या सब ...आज ही सब का लुत्फ़ उठा लेना चाहिए ....तब अचानक एक फटे पुराने कपड़ो मैं दो छोटे छोटे बच्चे आ कर हार फेला देते हैं ... ये nayi pedhi जो समाज बदलने की बात करती है ....मैं से २० रूपये निकल कर देती है ...तभी दूसरा बोलता है ...२० रूपये दोगे ? ये वही लोग हैं जो अपने ऊपर २ से ३ हज़ार खर्च करते हुए ....तनिक भी नहीं सोचते और जिसमें ९९ रुपे का एक बर्गर आता है ...और २० रुपे देते वक़्त इतना सोचते हैं की देश के लिए प्लानिंग करने वाले मोंटेक सिंह भी इनको अपने साथ रखने के लिए सोचे !! "
   " भविष्य वर्तमान के गर्भ मैं पलता है....सही है , किन्तु आधुनिकता की नीव पुरातन पर ही निर्भर है ! " 

     

Wednesday, November 2, 2011

............. हमारी चेतना और दृष्टिकोण द्वारा की गयी परिभाषा !

" यही कोई १९८५ की बात होगी ,हाँ छोटा ही था ...उन दिनों छपे हुए पर्चे बांटने का चलन कुछ ज्यादा ही था ... और हम स्कूल से आने के बाद कोशिश करते थे की जितने ज्यादा से ज़यादा इसे पर्चे इकट्ठे कर सके ! "
  
       तपती दोपहर में मैं और मेरे कुछ साथी जिनमे से कुछ के नाम याद हैं .... राजे , बबलू और भी कुछ निकल पड़ते थे अपने इस बहुमूल्य और उत्साहित कम को अंजाम देने के लिए .... !
       जब तक कोई माइक पर आवाज नहीं आती थी पता नहीं चलता था की कोई रिक्शे पर पर्चे बाँट रहा है की नहीं ....और इस बीच हम एक और महत्वपूर्ण काम किया करते थे ...पड़ोस की आंटी जी के क्यारी मैं एक अमरुद का पेड़ था उस पर अमरुद तो कम ही लगा करते थे फिर भी आंटी जी को उसकी चिंता खूब रहती थी.... साथ मैं और भी बहुत से फल के पेड़ थे ...पर फल कम ही लगते थे उनपर.... हाँ एक वैज्ञानिक उपाय किया हुआ था उन्होंने अपने सब पेड़ पौधों को पानी देने का ..... वो अपने घर के अन्दर बनी पानी की हौदी से एक छोटा सा प्लास्टिक का पाइप निकल कर ज़मीन पर रख देती थीं , और उसको अपने मुह से खीच कर पानी का प्रभाव बना देती थी जिस से जब पानी बाहर आने लगता था ...और वो ज़मीन का मुहाना उनकी क्यारी पर खुलता था बस ....दिन भर पानी औंकी क्यारी मैं चलता रहता था ...और पेड़ सूखते नहीं थे .... अद्भुद !!
 खैर हम अपना महत्वपूर्ण काम काया करते थे पर्चे बटोरने से पहले ...." हम उनके अमरुद के पेड़ से कुछ पत्ते तोड़ कर उनपर नमक लगा कर पान की तरह खाया करते अनोखे आनंद की प्राप्ति ....क्या  आनंद मिलता होगा सच्चा पान खाने वालों को ....पैसा भी खर्च किया और थूक भी दिया .... और ये अनुभव तो अनोखा था ... पान का स्वाद , बिना पैसे का, उत्साह और वीरता का अनुभव , पूरा का पुर पान खा जाइए थूकना भी नहीं .... कहने का अर्थ ये की नुक्सान कही से भी नहीं ...सब पाना ही पाना है ....! 

     हाँ अब मुख्य बात करते हैं ....तो तपती दोपहर हो या सर्दी की सुबह सी लगने वाली दोपहर ... किसी माइक के आवाज सुनी नहीं की दौड़ पड़ते थे , जीतनी कोशिश कर सकते थे करते और ज़यादा से ज्यादा पर्चे इकठ्ठा कर लेने की ....और शाम को हम सब दोस्त गिनती करते की किस के पास कितने पर्चे हैं ....जिसके पास ज्यादा होते वो तो बस मत पूछिए .... राजा का दर्जा पा जाता था ...अगली शाम तक उसको सब सम्मान देते थे ...जैसे किंग को मिलता है ...घर पर बनी सब अच्छी अच्छी चीजें उसको दी जाती थी ..... असामान्य से दिन थे वो ...फिर नहीं आ सकते ....कोशिश भी करें तो भी ....! !

    "  छपे हुए पर्चे - आज हम खुद इनको किस तरह से देखते हैं ये कोई परभाषा देने की बात नहीं ....किन्तु उन दिनों ये ही पर्चे महत्वपूर्ण थे ....आप को कुछ विशेष दिखने के माध्यम थे ....अमरुद के पत्ते अनोखी अनुभूति देने मैं सक्षम थे किन्तु आज कोई मूल्य नहीं ....इन चीज़ों का एसा हम मान सकते हैं ..."       कुछ भी विशेष हम से है ...कुछ भी मूल्यवान हम से है ... हम और आप किसी भी वक़्त कुछ भी संभव कर सकते हैं, यादों को संजो कर रखिये ताकि वर्त्तमान की कोख मैं भविष्य उस गर्माहट को अनुभव करते हुए बढे और आकार ले  ...एक नवीन चेतना के साथ ...नवीन पीढ़ी के लिए ....! "

 " पल - पल विशेष है , हां हमारी चेतना और दृष्टिकोण द्वारा की गयी परिभाषा उसको भविष्य के लिए संजोती है , ताकि संभावित अनुकरण हो सके ! "

Friday, October 28, 2011

" पूर्वाग्रह ( Bias ) " की " तपिश ( Heat ) "

" किसी भी तरह के "" पूर्वाग्रह ""  की "" तपिश "" आप के कोमल और अनमोल विचारों एवं उनकी  अभिव्यक्ति को भंजित अथवा " नष्ट " कर देती है ! "