Thursday, October 27, 2011

अधिक सहारा ...बोझ सा लगता है........

   " आज वो दोपहर याद आ गयी जब मैं अपने स्कूल से पैदल खरखाई नदी के पुल को पार कर रहा था .... दुरी पर एक दूसरा पुल था ...जिस पर से रेलगाड़ी आया जाया करती थी , पर पिछली रात एक दुर्घटना हुई थी.... पुरुषोत्तम एक्सप्रेस को एक माल गाड़ी ने टक्कर मार दी थी ... भयानक मंजर था ... माल गाड़ी का इंजन पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के पिछले डब्बे के लगभग ऊपर की जा चढ़ा था ... बहुत लोगो की मौत और घायल होने का समाचार आया था .... ! "

      हाँ लेकिन मेरे और मेरे जैसे और कितने ही लोगों के लिए एक सामान्य सा दिन था.... ... स्कूल से छुट्टी के बाद मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ मदमस्त हो कर के वापस आ रहा था.... नदी पर पहुँच कर हम कुछ देर के लिए रुके और दुर्घटना को देखने लगे .... बचाव का काम चल रहा था .... कुछ जीवें अगर बच सकें तो बचा लिए जाए , प्रशाशन के प्राथमिकता ....!!
      नदी के किनारे किनारे खूब घने पेड़ थे.... और जंगल कहा जाये तो भी कोई बात नहीं .... हमें दर नहीं लगता था....क्यों की "छठ " के अवसर पर हम यहाँ आया करते थे ... .... पर आज कुछ अजीब सा वातावरण था... इस लिए हम जंगल मैं नहीं गए .... ! आदित्य पुर की तरफ नदी का पुल पार होते ही एक छोटी सी चाय वाले की दूकान थी...४ गुना ४ की... उसमे वो चाय और मठरी रखता था.... पर मुझे पसंद थे उसके गुलगुले ..... जो वो अक्सर बारिश के दिनों मैं बनता था ...और चार आने के ४ देता था..... लेकिन उन दिनों चार आने बमुश्किल मिलते थे .... !
             एक बार तो मुझे अपने एक ग्रुप फोटो को खरीदने के लिए ५ रुपे की ज़रुरत थे... पेसे जमा करने की आखरी तारीख पास थी और मुझे कोई उम्मीद नहीं की मुझे पैसे मामा जी या मामी जी देंगी.... हाँ पिता जी के देहांत के बाद मुझे मेरे मामा जी के घर रहना पड़ा था कुछ ५ साल.... तो मैंने अपने मामा जी के जेब से २० रुपे चुराए थे ५ - ५ के चार नोट.....जमा भी किये.... फोटो भी मिला ..और चोरी के जुर्म मैं खूब पिटाई भी हुई.... !

            आप क्या हैं ये आपके साथ बीते और किये गए व्यवहार पर भी निर्भर करता था.... साधन की बात बहुत बाद मैं आती है.... आप क्या चाहते हैं पहले ये नियत होना चाहिए ...और उसके लिए वातावरण , और वातावरण के लिए आप के बड़ों की पहेल ....और सब हो जाए तो साधन जुटाने की बात.... आती है.... !  हम अपने को दूसरों के लिए सही या गलत करते वक़्त ये भूल जाते हैं ...की दूसरा भी आप के ही तरह इंसान या सोच रखने वाला है...... बड़ों को ये चाहिए की यदि आप किसी भी तरह से छोटो के लिए ज़िम्मेदार हैं तो अपनी ज़िम्मेदारी निभाइए ....झूठा आश्वाशन या निभाने के ढोंग की प्रकिया आप को ही उनकी नज़रों मैं छोटा कर देगी ....और आपके द्वारा बाद के वादे कोई मायने नहीं रखेंगे ....क्यों की जिस वक़्त बेल को सहारे की ज़रुरत थी आप नहीं थे और आज जब संभल गये तो अधिक सहारा ...बोझ सा लगता है........

समय पर लिया गया कोई भी निर्णय ......निर्णायक ही साबित होता है .... चाहे किसी भी सन्दर्भ मैं हो....फिर....हाथ पर हाथ रख कर कोई मंजिल नहीं मिला करती.... बस के तमगा मिलता है.... ये इंसान कभी कुछ गलत नहीं .......न ...न .न..... कुछ करता ही  नहीं !

..............याद रखना होता है !

रौशनी के उत्सव पर विशेष तजुर्बा - " रौशनी करने के लिए अंधेरों को अधिक प्रबलता से याद रखना होता है ! "

Sunday, October 23, 2011

एक समाचार " इस बार दिवाली पर उल्लुओं की किस्मत खराब ! "

                 एक समाचार " इस बार दिवाली पर उल्लुओं की किस्मत खराब ! " .... लोग दिवाली पर उल्लू की बलि दे कर के लक्ष्मी को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं ......की लक्ष्मी उनके पास आयेंगी !
     भाई लेकिन मेरे हिसाब से तो इस दिवाली पर कुछ उल्टा ही है .... उल्लुओं की मौज है ....!
कंपनी मैं जो लोग पुरे साल  उल्लू कहे जाते हैं .... बराबर का इन्क्रीमेंट पाते हैं ....
     पूरी क्लास मैं उल्लू कहे जाते हैं.... बस एक आरक्षण का कार्ड चलते हैं ... वोही सीट पाते हैं जिसके लिए दुसरे  जी जान लगाते  हैं .... उल्लू ...अपना उल्लू सीधा कर जाते हैं ... दिवाली मानते हैं ...!

  भाई इस दिवाली उल्लू परेशानी मैं नहीं मौज मैं है ,,,,, और आरक्षण वाले तो पुरे साल ही मौज मैं होते हैं...और पुरे के पुरे घी मैं दुबे रहते हैं... इश्वर की ये तो माया है ... कहीं सिर्फ धुप तो कहीं छाया ही छाया है....  " उल्लू मौज मैं हैं भी , कभी भी ... कहीं भी ..... बे शक ! "  







Friday, October 21, 2011

रात के ग्यारह बजा चाहते हैं..............नमस्कार " जय हिंद "

" विविध भारती " .... जी हाँ आपने भी सुना होगा ये नाम तो ... अच्छा जो लोग १९८८ से पहले जन्मे हैं वो ज़रूर जानते होंगे !! एक रेडियो स्टेशन है ....जी हाँ आज भी है ...किन्तु ऍफ़ एम् रेडियो आ जाने के बाद इस महान रेडियो की आवाज़ कम सुनाई देती है ... लेकिन जब भी सुनाई देती है ...आपके कदम रोक लेती है ... मजबूर करती है की आप ठिठक कर , रुक कर कुछ देर सुने इस को .... और अपनापन महसूस करैं .....

मैं आठवीं या नौवी मैं पढता रहा होऊंगा , हम तीनो बहिन भाई अच्छे से स्कूल की ड्रेस पहन के के तैयार... और हमारी मम्मी जी गर्म गर्म पराठे बना कर दे रही होती हमें दही के साथ थोड़ी चीनी दाल कर ... सच मैं अद्भुद स्वाद ... कभी कभी आलू ये भिन्डी के भुज्जी स्वाद और बढ़ा देती थी....और इन सब के साथ " रेडियो पर चल रहे पुराने गाने " "विविध भारती " पर... .... आनंद दो गुना कर देती थी .... कार्यकर्म शाश्त्रिये संगीत पर आधारित होता था ... 
             सवेरे ९ बजे एक प्रोग्राम आता था नाम था " चित्रलोक " आनंदित कर देने वाले गाने ... फिर १० बजे एक नया प्रोग्राम " संगम " अच्छे लोगो की फ़र्मिऐश पर अगने आते थे .... ...

शाम को कुछ बहुत अच्छे अच्छे कार्यकर्म आते थे " विचित्र किन्तु सत्य " ...
" जयमाला " - ये प्रोग्राम सिर्फ सैनिक भाइयों के लिए होता था ....
सुप्रभात , संगीतमाला - पहले  "बिनका " थी, फिर बाद मैं " सिबाका " हो गयी .... अमीन सायानी जी के साथ .....उनका उनवान था " हाँ बहनों और भाइयों ....." मस्त अंदाज़ और अनोखी बोली... वाह... इन्होने राह दिखाई लोगो को किस तरह से रेडियो पर बोला जाता है .... दिशानिर्देशक थे वो लोग...

हर रोज़ एक प्रोग्राम आता थे नाम था " हवा महल " .... उस प्रोग्राम के शुरू करने की धुन ही मुझे अनादित कर देती थी .... और दिन के अंत मैं प्रोग्राम आता था ... नाम था " छाया गीत " और अंत मैं रात के ११ बजे कुछ मुख्य समाचारों को सुना कर उद्घोषक का कहना " रात के ग्यारह बजा चाहते हैं , अब हम आपसे विदा लेते हैं , कल पुन आपके भेंट होगी ... नमस्कार " जय हिंद " .... आप को अपने भारतीय होने का एहसास होता था !

कल जो बीत गया ....उस को बीतना ही था ...आज के लिए , और आज जो बीत रहा है , वो कल के लिए  ये आज के नवजीवन का दायित्व बनता है की कल आप याद किये जाएँ की आप उनको एक सुदर्ध विरासत दे कर गए हैं ...!

क्या क्या हमें मिला है ... मेरी मम्मी जी ने मेरे लिए इंद्रजाल कोमिक्स के दो संकलन छोडे हैं .... मैं चंदा मामा का पिछले १० सालों का " चंदामामा " का संकलन जोड़ रहा हूँ... और भी बहुत कुछ है ...
                                        
                    आइये ज़िन्दगी को जिया जाए , उल्लाह्स को संजोया जाए ...आज की उपलब्धयों से साथ-साथ पुराने संकलन को सहेज कर........ !





Thursday, October 20, 2011

उन दिनों मोबाइल फोन नही थे ...! हम उन दिनों एक दुसरे को पोस्ट कार्ड लिखा करते थे !


" जब मैं बी कॉम कर रहा था उस वक़्त मेरा एक दोस्त रुड़की से अभियांत्रिकी की पढ़ाई कर रहा था.... " उन दिनों मोबाइल फोन नही थे ...! हम उन दिनों एक दुसरे को पोस्ट कार्ड लिखा करते थे ! अनोखा समय था ... ! रोज़ एक दुसरे को आशा होती थे की कोई कार्ड आया हो ...! "

वो इन्तेजार और उसका जव्वाब देने की जल्दी ... बस बयान नहीं किये जा सकते ! हम घंटो बैठ कर के सोचते रहते की १० पंक्तियों मैं काया कुछ लिख दें की एक महीने का काम चल जाए !!

वो सब अनोखा था ... आज कल एस एम् एस और फ़ोन कॉल से काम चल जाता है ....  हां काम ही चलता है ...... 

चिट्ठियां जहाँ से चली और उसके अपने गंतव्य तक पहुँचने के बीच के समय का आनंद ... जी आनंद आज कल के एस एम् एस मैं नहीं ... कुछ और है जो कल नहीं था...  समय है ...और समय के साथ चलना चाहिए .... उसको पकड़ने को कोशिश हमेशा आपको पीछे ही रखती है ... ! समय के साथ चलिए ...!  पत्र के लिखने का आनंद तो अपनी डायरी लिखेने से भी प्राप्त किया जा सकता है !!..
                       " चिट्ठी लिखना और उसको गंभीरता से पढना दोनों ही आसान नहीं ! "

Wednesday, October 19, 2011

और जिस दिन बदला ..... सब ख़तम .... !

" रोज़ सुबह मैं अपने को कुछ अलग सा देखता हूँ.... हाँ कल जैसा देखा था , खुद को !!"
पर कुछ है अपने मैं जो होश संभालने के बाद से आज तक " वैसा " ही है जैसा तब था जब अपने से पहली बार मिला था !! वो आज तक नहीं बदला ! ना बदलेगा ..... और जिस दिन बदला ..... सब ख़तम .... !

Sunday, October 16, 2011

कम्पनों को भुला पुल हुआ मलमली !!

राख होने को है अब ये  चूल्हे की लौ ,
       द्वार की कुण्डियाँ भी स्थिर हो चलीं !,
              नल के बूंदों के स्वर भी शिथिल हो गए,
                    कम्पनों को भुला पुल हुआ मलमली !!
                           नयन तारों के गाँव में बसने चले ,
                                 शोर थमने लगा , रात बढ़ने लगी ,
                                      आओ तुम हम भी राहों को आसान करें ,
                                            खुद को गुम कर चले , और  खो जाएँ ,
                                               .......................... धीरे धीरे सो जाएँ !!