Sunday, April 24, 2011

पिंजरों के सब पंछी सोये , सपनों संग आज़ाद हुए !

" ओस की बूंदे , जुगनू , तारे सबने साथी ढूंढ लिया ,
        दिनभर तपती धरती को भी चंदा ने स्पर्श किया !
                  पिंजरों के सब पंछी सोये , सपनों संग आज़ाद हुए ,
                           कल की उमीदों को हम भी अब पलकों में बो जाएँ , सो जाएँ !! "

Monday, April 18, 2011

" प्रतिपल उठती यौवन की भाप सरीखे हम ! "

" जाने कितनी तितलियों के पंख गिने होंगे ,
        रंग बिरंगी सीपियाँ और शंख गिने होंगे !
                  कितनी ही गौरैयाओं को स्पर्श किया होगा ,
                            आलिंगन और भावों के कई दंश दिए होंगे !"
" प्रतिपल उठती यौवन की भाप सरीखे हम !
        जी हाँ , हरपल , हरदम बिलकुल आप सरीखे हम !!"
                                                                                                   - मनीष सिंह

Monday, March 28, 2011

कल कुछ ऐसा हुआ ! जो अच्छा लगता है !!

                     कल कुछ ऐसा हुआ ! जो अच्छा लगता है !!
              " कल , जी बीता हुआ कल , दिनांक २७.०३.२०११ दिन रविवार के सुबह तकरीबन ७:४० का मैं अपनी मोटर सायकल पर दूध लेने के लिए निकला ......बहन के कहा ...सर्फ़ भी लेते आना ..." दूध लिया और सर्फ़ लेने के लिए कोई खुली हुई दूकान तलाशने लगा....अब सब हमारी तरह आराम करने के दिन ...जल्दी उठ कर अपनी सुबह खराब करेगा, लेकिन उम्मीद पे दुनिया कायम है ....तो मैं कभी वसंत रोड , सब्जी मंदी, घंटा घर , चोपला , बजरिया , और नाजाने कहाँ कहाँ ,,,,पर अपने ही लोहिया नगर के बी ब्लाक के मार्केट मैं एक दुकान मिल गयी ....जैन जी की दुकान .....

       वहां एक    बुजुर्ग खड़े थे ! रौबीला चेहरा ....सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहने हुए ! मैं भी जयपुरी प्रिंट का फिट फिट कॉफ़ी रंग का कुर्ता और ब्लू रंग की जींस पहन राखी थी ! मैंने कुछ नहीं कहा ....और खड़ा हो गया क्यों की दूकानदार और वो बुजुर्ग बात कर रहे थे......कुछ पलों मैं दूकानदार ने मुझसे पुछा आपको क्या चाहिए ..? मैंने सर्फ़ माँगा ! दूकानदार लेने चला गया ! इस बीच उन बुजुर्ग ने मुझसे पुछा :

बुजुर्ग : कहाँ रहते हो ?
मैं : जी, लाल क्वाटर मैं .
बुजुर्ग : कब से ?
मैं : जी, बचपन से .
बुजुर्ग : अग्रवाल हो ?
मैं : जी नहीं ....छात्त्रिये हूँ.
बुजुर्ग : अच्छा ....मुझे जानते हो ?
मैं : जी.........देखा तो है आपको कोने की कोठी के बाहर कुछ और बुजुर्गों के साथ बैठे.
बुजुर्ग : हाँ बी ...... मैं रहता हूँ......तुम मुझे अच्छे से लगे इस लिए बात करने का मन किया और कर ली....
मैं : जी.....
बुजुर्ग : क्या करते हो ?
मैं : जी मैं नील.......मैं आईटी ...मैं हूँ...ग्रेटर नॉएडा !
बुजुर्ग : अच्छा मेरा बेटा भी ...अ....कंपनी मैं जेनेरल मेनेजर है......आईटी मैं ही...
तुम मुझे अच्छे से लगे और इस लिए मन किया बात करने का ....कहते हुए उन्होंने अपना उल्टा हाथ मेरे सीधे कंधे पर रख दिया .....बड़ा अदभूद एहसास था वो....

इसी बीच दूकानदार ने आवाज दी....आपका सामान !!...मैंने पैसे दिए और उन बुजुर्ग जी को नमस्ते करी और अपनी राह हो लिया !!

एसा भी होता है....!!  कोई आप को कब कहाँ मिलजाए और इतना अच्छा लगे की आप उससे बात करने का मन करने लगे ....तो अपने मन को मत  रोकिये ........बात कर लेनी चाहिए !!
                   ज़िन्दगी जीने के लिए है ...घुटन के लिए इस मैं कोई जगह नहीं होनी चाहिए ....खुश रहने और जीने का नाम ही...ज़िन्दगी है !
                                                 - आपका अपना है - मनीष

Friday, March 18, 2011

" आइये रंगों से मन बहलाएं ! "

                          " आइये रंगों से मन बहलाएं ! "
           बस अभी कुछ ही दिनों की बात ही उसको उंगली पकड़ कर टहलने ले जाया करता था ....ये क्या है , वो क्या है .. एसा क्यों है ...ये एसा क्यों नहीं है....और न जाने कितने ही तरह के बचपने के सवाल ....जिनका हर बार उत्तर मेरे पास नहीं होता था ....पर हर बार मेरा मन करता की वो ये सब मुझसे पूछे और मैं जिसका दे सकूं उत्तर दूं और बाकि के सवालों के उत्तर तलाशते हुए सो जाऊ और नए दिन की शुरुवात हो...!
           आज नया दिन है ...साल भर का त्यौहार है होली ....पर कुछ रंग नहीं हैं...कुछ हैं तो कुछ के बिना वो भी अपना वजूद तलश रहे हैं ...!
             मैं पीछे रह गया लगता हूँ ....हमेशा नहीं कभी कभी ..!! कुछ बहुत नजदीकी ही हमें इस का एहसास करते हैं....कमी हमारे मैं ही होती है की...हम समय पर नहीं समझ पाते और खुद को तकलीफ देते रहते हैं... खामख्वाह !!!!
              आप के पास दो ही चीज़ हो सकती हैं ...या तो किसी के पास रहने के अधिकार या किसी से पास से दूर होने का ...जो बीच मैं रहा उसकी तो बस परेशानी ही परेशानी होती है !
   अरे मैं ये सब क्या लिख रहा हूँ....परसों तो रंगों का त्यौहार है ...होली......उस पर बात होनी चाहिए ....और हम ये संब क्या बात करने लगे !!

              दुःख , तकलीफ , परेशानी , किसी दोस्त का दूर जाना , किसी का आपको धोखा देना...और ना जाने क्या क्या ...ये सब रंग हैं जिनसे होली खेलने का अपना मजा है !!
           
                                     हैप्पी होली , हैप्पी होली...हैप्पी होली.
                                                                                                   - मनीष

              

Monday, March 14, 2011

जापान, जी हाँ इस नाम से विकास की परिभाषा लिखी जाती है !

             जापान जी हाँ इस नाम से विकास की परिभाषा लिखी जाती है ....सामाजिक तानेबाने की सोच को नै दिशा मिलती है ....विश्व के सर्वाधिक बुजुर्गो के देश मैं आज हम प्राक्रतिक त्रासदी देख रहे हैं. हजारों जान चली गयी , सालों तक पूरा नहीं हो सकने वाला नुक्सान हुआ ! फिर भी हम अपने जापानी दोस्तों के हौसलों को सलाम करते हैं और उनके इस दुखदाई समय को सहन कर सकने और इस से उबर सकने के जज्बे को सलाम करते हैं .....इस समय मैं हम सब भारत वासी आपके साथ हैं ....जिस भी तरह की आवयश्कता होगी ...हम आपके साथ है.

               हे इश्वर हमें अपने दिए वचन पर कायम रहने और हमारे जापानी दोस्तों को इस त्रासदी को सहन करने की शक्ति दीजिये ..........हम विकास को जारी रखना चाहते हैं और अपने दिशा देने वालों की सम्पनता की कामना करते हैं. आमीन !
                                                                           हम सब भारतवासी आपके साथ हैं.

Sunday, March 13, 2011

जब कहीं हों, बस हम हों ....बदले नहीं !!

       हम जब कहीं हों बस हम हों ....बदले नहीं !

         " जी हाँ कई बार ये सुनने को मिलता है अपनों से की " आप अपने को बदल लीजिये नहीं तो लोग आप को इस तरह ही मुर्ख बनाते रहेंगे और आप धोखा खाते रहेंगे ...." असलियत मैं ये बात कुछ हद तक ठीक भी है...पर पूरी तरह से नहीं ....कम से कम मैं तो नहीं मानता ....! क्यों अरे भाई तजुर्बा है मुझे ...धोखा खाने का और बिना खुद को बदले अपनी नज़र मैं नहीं गिरने का !

                       लोग कुछ सम्बन्ध बनाते हैं कुछ समय के लिए बस कुछ फायदे के लिए ....और उनका मकसद पूरा हुआ और वो चले अपने रस्ते और हम वहीँ खड़े रह जाते हैं लेकिन वही रहने के लायक रहते हैं और वो लोग मुह चुराते हुए ....दर दर भटकते रहते हैं ....जगह तलाशते रहते हैं की कही जिसको उन्होंने धोखा दिया है उससे सामना नहीं हो जाये ....आँख नहीं मिला सकेंगे ना इसलिए.

                  हम अपनी नज़र मैं नहीं गिरते ....क्योँ की हम नहीं बदलते ....अरे कोई कितनी बार धोखा देगा ...? कितनी बड़ी है ये ज़िन्दगी....? और ये दुनिए कितनी बड़ी हैं....कभी ना कभी तो मिलना होगा ही ना उस शक्श से .....उस वक़्त मैं नज़र मिला सकूंगा ....और वो ...नज़र चुराएगा !!

    आज मैं एक अवार्ड प्रोग्राम देख रहा था ....उसमे वे सामाजिक कार्यकता को पुरूस्कार दिया गया और उसने अपने शब्द कुछ इस तरह कहे "   मैं ये जानती हूँ की एक रोटी से पूरी दुनिया ka पेट नहीं भर सकता , मैं ये भी जानती हूँ की एक ढाल से हज़र्रों तलवारों से नहीं बचा जा सकता ...और मैं ये भी जानती हूँ एक को सहारा देने से पूरी दुनिया के बे सहारों को सहारा नहीं मिलेगा ....लिकिन मैं अपना काम करती रहूंगी क्योंकि मेरा ये विशवास है की जब दुनिया मैं सताने वालों और बचने वालों की गिनती होगी तो मेरा नाम ...बचने वालों मैं होगा !"

          मैं खुद दो से चार बार कुछ लोगों ka शिकार हो चूका हूँ...उनका नाम नहीं लिखूंगा ....क्यों की उनको हीरो थोड़े बनाना है...! पर मैं ये zaroor जनता हूँ की मैं, मैं था और मैं ही रहूँगा !! wo muh aur apni nazar chupate phir rahe hain....bechare 11

 आप अपने ऑफिस मैं कई बार बहुत कुछ करते हैं....जो सामाजिक दृष्टिकोण से ठीक नहीं पर करना होता है....और ऑफिस से निकले और सब भूल जाते हैं ....और एसा ही करना चाहिए !

                                  जो अपनी नज़र मैं गिर जाता है उसको किसी भी तरह प्रयास नहीं उठा सकता ....उसका कोई नहीं होता ...क्योँ की जब कोई खुद ka नहीं हुआ ....अपने संस्कारों का नहीं हुआ ...उसका कौन होगा ....इसे लोग अपने माँ , पिता को भी अप्सब्द सुनवाते हैनं..जो उचित नहीं है ! अपने संसकारों की भी जड़ों को हिला देते हैं ....और जब एक बार किसी बड़े पेड़ की जड़ ढीली पद जाये तो फिर उसके पुराने पत्ते झड़ने तो निश्ची हैं....और नए पत्ते आने मैं भुत वक़्त लगता है....नए पत्ते आ भी जाएँ तो उनके बड़े बड़े होने ka कोई भरोसा नहीं और वो छोटापन औने आने वाली पीढ़ी मैं भी जाता है .....!!
               सोचिये इस प्रकार के लोग ....सिर्फ अपने लिए ही परेशानी का कारण नहीं बनते बल्कि पुरे समाज के लिए कमजोर बीज bone ka काम करते हैं. और वो लोग जो बदलते नहीं ....वो मस्तक उंचा कर के चलते हैं ....और उनकी naee पीढ़ी संस्कारों की होती हैं....जो समाज को बैलेंस कर के चलती है ....क्यों की सिर्फ एक तरफ झुका पलड़ा टूट भी सकता है....

                 इसलिए ....हम हैं जो कहीं  भी हम ही रहते हैं .....बैलेंस करने से साथ साथ बदलते नहीं ....अपनी नज़रों मैं झुकते नहीं !!
                                                            नमस्ते , आपका अपना ही - मनीष सिंह

Wednesday, March 9, 2011

मैं का हम होना !!

                     मैं का हम होना !! जी हाँ जब मैं हम होने लगता है तो कई बंधन टूटते हैं और कई नए रिश्ते बनते हैं .....हम हो जाते हैं !
                    मेरा एक दोस्त है ....वो आज कल हम होने को है !! नहीं नहीं शादी नहीं हो रही उसकी ....वो तो किसी और को सलाह देने लगा है...और थोड़ी थोड़ी देर मैं उसको फ़ोन लगा कर पुच लेता है की भाई ....हमें ठीक किया ना ?    उधर से जवाब आता है ...हा भाई हम कभी गलत करते ही नहीं ....!
                 एक मेरा दोस्त है ...उसको मैंने फोन किया की एक दुसरे दोस्त का नंबर लेने के लिए ....तो बोलता है की भाई थोड़ी दे मैं बताता हूँ क्यों की अभी मेरा मोबाइल नहीं मिल रहा और वो नंबर उसी मोबाइल मैं है ,......तब मैंने कहा साले बात किस से कर रहे हो ??? तो बोला हम ज़रा भूल गए थे ....हाँ लोग हम होने के चक्कर मैं भूलने भी लगते हैं !

                 Sab को saath के कर चलिए हम होने का मजा आजायेगा ....मैं तो sab हैं.
हम कभी कभी बना जाता है .....पर हम होने पर saari दुनिया अपनी होने लगती है ....संसार छोटा लगता है.
           सोच कर देखिये , अपना कर देखिये , हम हो कर देखिये ....आनंद आने लगेगा .....आप और मैं हम होने लगेंगे.